दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए धरना प्रदर्शन की चर्चाएं पूरे देश में हो रही है। कॉकरोच जनता पार्टी और छात्रों ने नीट पेपर लीक मामले में आंदोलन धरना और प्रदर्शन किया और अपनी शर्ते रखी। शर्त अनुसार धर्मेंद्र प्रधान जी ने इस्तीफा भी दिया। जंतरमंतर पर जीत की खुशी का जश्न मनाकर छात्र भी अपने-अपने घर को लौट गए ।यह जीत बहुत बड़ी जीत है छात्रों की और कॉकरोच जनता पार्टी की।
इस पूरे आंदोलन में लोकतंत्र के नियम भी समझने को मिले की लोकतंत्र मे स्वतंत्रता,सामान्यता, सहभागिता सबके लिए बराबर है और आम जनता व नागरिक के पास शासन की शक्ति होती है।
इस आंदोलन में प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने भी छात्रों को साथ दिया और प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठे स्पष्ट है कि लोकतंत्र में अपने उद्देश्यों को पाने के लिए और अपनी बात को रखने का वैध जरिया है। कहां जाए तो आम नागरिक के पास अपनी बात को पहुंचने का जरिया लोकतंत्र से होकर है।
पर लोकतंत्र में रहकर हमें नागरिक होने के साथ-साथ देश के प्रति और लोकतंत्र के प्रति समझदारी भी दिखानी होगी और हमें अपने संवादों में प्रयोग किये गए और कहे गए शब्दों पर ध्यान रखने का जिम्मा भी संभालना होगा । लोकतंत्र में शांति और समझदारी के साथ नागरिक को अपनी बात रखने असहमति जतानी आनी चाहिए ना की अराजकता और हिंसा से। क्योंकि जंतर मंतर पर आंदोलन के वक्त कुछ असामाजिक तत्वों की वजह से आंदोलन को अराजकता और हिंसा की तरफ मोड़ दिया गया और इसका नुकसान मासूम जनता को भी उठाना पड़ा।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण ढंग से और पारदर्शिता के साथ देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने का और असहमति जताने का प्रावधान है और यह वैध जरिया है। नेता प्रतिपक्ष भी अपने असंतोष और असहमति को जाहिर करने के लिए लोकतंत्र का रास्ता अपनाते हैं।
यहां सवाल है लोकतंत्र के साथ नागरिक की समझ कैसी है। क्या लोकतंत्र में अपनी असहमति जताने के साथ-साथ अराजक होना और किसी भी सम्माननीय व्यक्ति के खिलाफ भद्दी भाषा या टिप्पणी करना शोभा देता है । देश के नागरिक मर्यादा में रहकर भी अपनी असहमति और गुस्से को प्रदर्शित कर सकते हैं और यही सबसे अच्छा तरीका है।