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  • ग्रहिणियां राष्ट्रीय निर्माता

    सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है गृहणियां घर संभालने वाली महिलाएं नहीं बल्कि राष्ट्रीय निर्माता हैं। उनके द्वारा घर के किए गए कार्य को और समाज के लिए किए गए कार्य को उचित कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए ।

    गृहणी घर के सारे कार्यों को निस्वार्थ भाव से करती है पर उसके द्वारा किए गए कार्य का कोई मोल नहीं समझा जाता ।

    यह तो हम सब अच्छी तरीके से जानते हैं कि घर को परिवार को चलाने के लिए और इसकी जिम्मेदारी ग्रृहणी ही कुशलता से कर सकती है।

    महिलाओं के लिए खुशी का समय है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के घरेलू काम को कानूनी मान्यता मिले ऐसा कहा है।

    अदालत ने कहा गृहणियों का योगदान सिर्फ़ परिवार तक ही सीमित नहीं होता बल्कि वह मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए उन्हें केवल होम मेकर के बजाय राष्ट्र निर्माता कहा जाना चाहिए ।और भविष्य में गृहणियों के योगदान को समाज और न्याय व्यवस्था दोनों मैं उचित सम्मान मिलेगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा होम मेकर यानी ग्रहणियों को परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो की एक समस्या भी है । गृहणी घर के सारे कार्य को और परिवार की देखभाल को सुचारू रूप से करती है और गृहणियों पर ही परिवार की देखभाल और घर के कार्यों की जिम्मेदारी होती है।

    अदालत ने कहा किसी ग्रहणी के कार्य को कुछ न समझना महिलाओं के कार्य को कम आंका जाता है जबकि गृहणी बच्चों की पहली शिक्षक होती हैं।

    गृहणी परिवार के नैतिक मूल्यों अनुशासन सामाजिक व्यवहार मानवी संवेदनाओं का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं इस तरह गृहणी देश की आर्थिक और सामाजिक विकास की आधारशिला बनती है।

  • दवा फर्मो पर छापे

    दवा कारोबारी की फर्मों पर औषधि विभाग की छापे की कार्रवाई हुई ।छापे में अब तक करोड़ों की सैंपल की दवाएं जब्त हो चुकी हैं ।आगरा के फब्बारे बाजार में नकली और सैंपल की दावों के मामले सामने आ रहे हैं।

    औषधि विभाग की कार्रवाई में भारी मात्रा मे फिजिकल सैंपल भी मिले है। इन दवाओं को बिना लाइसेंस के रखा गया था और उनके नकली होने की भी आशंका है।

    जब बड़ी-बड़ी कंपनियां ही जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करेंगी तो कैसे एक इंसान सुरक्षित और स्वस्थ रह सकता है ।आज के वक्त में किस पर विश्वास किया जा सकता है यह एक बहुत बड़ी चिंता जनक बात है ।

    दवा फर्मों पर औषधि विभाग के छापे के दौरान कई सैंपल मिले इनमें मधुमेह हृदय रोग तथा त्वचा रग पेट रोग समेत अन्य मर्ज की एंटी-बायोटिक दवाएं सिरप टैबलेट और कैप्सूल मिले।

    आखिर ये कब तक होगा और कब इस पर रोक लगेगी यह कोई पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी दवा की फर्म पर गोदाम में छापे पड़े हैं और जांच भी हुई है पर फिर भी अभी तक निराशा ही हाथ लगी है।

    इससे पहले बच्चों के सिरप में भी मिलावट की खबर आई थी और काफी जोर जोर से इस खबर को सब ने जानने की कोशिश की क्योंकि बात बच्चों की सेहत को लेकर थी।

    आखिर प्रशासन नकली दवा और एक्सपायर्ड दवाओं पर रोक लगाने के लिए कोई सख्त कानून क्यों नहीं बनाती ।आखिर कैसे नकली दवा एक्सपायर्ड दवा दुकानदारों के पास सेल के लिए पहुंच जाती है और इससे होने वाला भारी मुनाफा कौन लेता है ।

  • खालीपन में रंग भरिए

    हम इंसान किसी संग्रहालय की दीवार पर टंगी हुई कोई तस्वीर नहीं है जिसे केवल देखा जाए और सराहा जाए। ईश्वर शक्ति प्रकृति या जो भी शक्ति हमें यहां इस धरती पर जन्म देकर भेजती है वह हमें केवल विस्तार देती है जीवन जीने की सोच और समझ भी देती है यही स्वतंत्रता मनुष्य का सबसे बड़ा उपहार भी है। अतः इंसान को अपने जीवन को यूं ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

    अपने जीवन को कभी भी दुख या फालतू की सोच में व्यर्थ ना करें और ना ही अपने जीवनकाल की धार को को यूं ही खाली न बहने दें बल्कि अपने खालीपन में उत्साह के रंग भरना सीखें कभी-कभी इंसान किसी को पसंद करता है और उसी के जैसे ही अपने जीवन को जीने लगता है और मैं खुद क्या चाहता है वह कभी समझने की कोशिश नहीं करता और ना ही जीवन के अर्थ को समझने की कोशिश करता इंसान औरों द्वारा मिले विचार को अपने जीवन में ग्रहण करते जाता है और इस तरह अपने जीवन को नीरस बना लेता है।

    मनुष्य जीवन एक खाली कैनवस की तरह है जिसकी सुंदरता उसके साहस पूर्वक उठाई गई कदमों में है जो व्यक्ति भय असफलता पीड़ा और प्रेम मैं सफल होने से बचता रहता है वह शायद गलतियों से बच जाए पर जीवन की गहराई को खो देता है। जीवन उन लोगों का याद रहता है जिन्होंने डर के बावजूद अपने हाथों में अपने जीवन की खालीपन भरने केलिए साहस के कदम उठाए

    समाज हर उस व्यक्ति को दंडित करता है जो सामान्य होने से इनकार कर दे और समाज के द्वारा बनाए गए नियमों का पालन न करे। इतिहास में हर सुंदर चीज को कभी ना कभी पागल कहा गया है जैसे कवि पागल, चित्रकार पागल, प्रेमी पागल सामान्य लोग संसार को वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसा की वह है । पर कुछ लोग इन नियमों से अलग होकर अपने जीवन में सपनों के रंग भरते हैं और एक नया इतिहास लिखते हैं।

  • विश्व खाद सुरक्षा दिवस

    हर साल 7 जून को विश्व खाद सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। विश्व खाद सुरक्षा दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के खाद एवं कृषि संगठन द्वारा वर्ष 2018 में की गई थी। इसका उद्देश्य लोगों को सुरक्षित पौष्टिक और संतुलित भोजन के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना है। खाद्य-सुरक्षा का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो।

    विश्व खाद सुरक्षा दिवस जिसकी शुरुआत 2018 में हुई थी एक महत्वपूर्ण तिथि थी जिसकी वजह से इंसान जागरूक हुआ और विश्व खाद सुरक्षा दिवस के द्वारा भोजन के महत्व को समझकर और साथ ही साथ भोजन संतुलित पर्याप्त और पौष्टिक भी होना चाहिए इसकी तरफ भी जागरूकता बड़ी है।

    संयुक्त राष्ट्र की यूएन क्रूड बेस्ट इंडेक्स 2021 रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में दुनिया भर में लगभग 93 करोड़ भोजन बर्बाद हुआ। इसी तरह भारत में भी प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति द्वारा लगभग 50 किलोग्राम भोजन व्यर्थ होता है जो की काफी शर्मनाक है क्योंकि भारत जैसे शहर में एक भारी आबादी है जो कि रोज के भोजन के लिए संघर्ष करती है और भुखे पेट सोने को मजबूर हैं।

    भारत जैसे देश में जहां की संस्कृति मे अन्न को भगवान का दर्जा दिया गया है अन्न को भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाता है ऐसे देश में भी भोजन का इस तरह भोजन का तिरस्कार करना एक गलत बात है यहां तक की शादी विवाह और अन्य समारोह में जाकर आवश्यकता से अधिक भोजन लेकर उसे फेंक देते हैं ।

    इसी तरह विदेशों में भी खान-पान की बदलती शैली के कारण संतुलित आहार और स्वस्थ भोजन से दूरी बढ़ रही है जिसका असर युवाओं और बच्चों की सेहत पर दिखाई पड़ता है कम उम्र मेंआख दांत पेट संबंधित बीमारी बढ़ रही हैं

    अतः समय रहते हमें स्वस्थ भोजन के प्रति जागरूक होना चाहिए क्योंकि खानपान की बदलती शैली जो कि स्वास्थ्य के लिए हितकारी नहीं है ।और दूसरी तरफ हद से ज्यादा खाने को व्यर्थ करना भोजन की कीमत को ना समझना यह बातें व्यक्ति के अंदर भोजन के प्रति जागरूक न होने की वजह से होती है ।

  • Daily Budget likhna

    Khushi parivar jo ki bahut hi khush rehta hai vaise to vah parivar ki khushi ki kaafi vajah hoti hai per ham yahan baat kar rahe hain apne budget mein hi apne ghar ko chalana aur apne sare kharcha ko pura karna padega aur aapke kaam waqt per ho jaye yah bhi ek parivarik khushi ki ek bahut badi vajah hoti hai aur jise parivarik mahaul aur parivar kie sabhi sadasya khush rahte hain.

    Mujhe yaad hai Jab main chhoti thi .Hamare ghar ke angan mein sham ki chai sab saath milkar baithkar Peete the yah waqt hota tha Jab pure din ke kharche ka buora mere dadaji liya karte the aur hisaab lagaya karte the aaj kitna kharcha hua hai.

    Lakin aaj samay pehle jaisa nahin hai Aaj parivar ke sabhi sadasyon ke apne -apne kharch karne ke tarike hote hain aur kisi ko rok -tok bhi pasand nahin hai per yah kharcha adhik ho jata hai aur fir apne se badho ko batate bhi nahin hai aur kabhi -kabhi udhari bhi ho jaati hai jis karan mahine ke ant tak roj ki jaruri kharcha bhi bhari lagne lagte hain kya jaruri hai fijulkharchi kya nahin reh sakte hain ham Bina fijulkharchi ke yeh samjhe agar aap jaye to apne parivar ke kharcha jo jaruri hai unhe samay per kar sakte hain per pehle.hamein iske liye Budget banana seekhna hoga .

    Kitchen Budget

    Kitchen, rasoi ghar jismein parivar ke sabhi sadasyon ka khana pakaya jata hai Parivar ki sadasya milkar khana khate hain jismein budget ka ak bada hissa ismein jaata hai kyunki agar ham apne kitchen mein hi budget nahin lagaenge to yahan khana pakane mein pareshani hogi kahate hain pehle pet puja fir kaam duja agar ham khaenge hi nahin energy kahan se aaegi aur kaam mein man bhi nahin lage ga.

    Isliye hamen chahiye hamen kitchen ki budget ko mahine ki shuruaat mein hi nikalna chahie apni salary mein se jisse ki hamen roj ki kitchen mein jaruri saman khatm ho jaane per pareshani nahin hogi aur kitchen ka budget pura ho jaane se kitchen bhi sucharu roop se chalegi aur hamare khane ki thali mein hamara pet bharane ke liye khana uplabdh rahega.

    School Fees

    Agar aapke bacche school padhne jaate hain to har mahine unka fees kharch bhi hota hai.

    bacche desh ka bhavishya hai bacchon ko shiksha dena hamara mahatvpurn karya hai agar bacchon ko shiksha acchi milati hai to bacche apne acche bhavishya ka nirman karte hain.

    Bacchon ke school ke mahine ki fees ko hamen pahle se hi apne budget mein se nikal kar rakhna chahie jisse ki bacchon ki padhaai mein fees ki vajah se koi pareshani na khadi ho

    Jaruri kharche

    Hamare ghar ke aur bhi jaruri kharche hote hain jaise ki saaf safai ke kaam ane waali jarurat ka saman, Ghar ke bade bujurg ki dawai ke kharche, Tyohar aane per hone waale kharche, ine kharche ke alava aur bhi kharche hote hain Jo ki jaruri hote hain ine sab kharch ko hamen ek diary mein note karke likhna chahie jisse ki mahine ki ant mein ham pata kar saken ki hamari kamai kahan -kahan kharch hui aur hamen likhane se pata chalta hai kya jaruri kharche karne the aur kya kharche humne fijul kharch kiya.

    Hamen jama karne ki aadat bhi banani chahie jisse ki bhavishya mein koi bhi ghatna ho to ham use mushkil ghadi mein khud Ko sambhal sake iske alava ghar mein hone wali shadiyan ke kharche bhi pahle se hi dhyan rakhkar jama karte rahana chahiye is tarah ham apni bhavishya ki yojana ke saath samajhdari ke saath chal sakte hain aur ek khush jivan ko ji sakte hain.

    Iske alava fijul kharchi karne per rok lagani hogi hamen swayam per rok karni hogi aur dikhave ki duniya aur banavati duniya se bhar niklna hoga kyunki aajkal dikhava jyada chal raha hai aur vyakti ek dusre ko dekhkar fijul kharchi karna sikh gaye hain fijul kharchi karne se hamen baad mein dukh ho milta hai aur hamara budget ka bahut bada hissa bigad jata hai jisse ki hamare liye aur nayi samasya en khadi ho jaati hai kabhi- kabhi to udhar lene ki naubat a jaati hai isliye soch samajhkar budget ko lekar aur apne salary amount ko samajhdari ke sath kharch karna sikhen aur kharch kiye hue budget ko ek diary mein

  • बिखरती तृणमूल

    अभी हाल में बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल को जो हार मिली उसकी वजह से तृणमूल कांग्रेस में आपसी मतभेदों के कारण पार्टी राजनीतिक संकट का सामना कर रही हैं ।

    राजनीति में चुनाव होते हैं और हार जीत भी होती है हारी हुई पार्टी विधायक और सांसद विपक्ष में बैठ कर एकता बनाए रखते हैं और चुनाव में मिली हार को भूलकर आगे की तरफ बढ़ते हैं।

    पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की पार्टी में हार के 1 महीने बाद ही विधायकों व सांसदों की बगावत बढ़ रही है और ममता बनर्जी के लिए संकट का समय है ।तृणमूल कांग्रेस पार्टी के सामने चुनौती पश्चिमबंगाल में फिर से अपनी जगह प्राप्त करने का ही नहीं बल्कि उससे भी बड़ी परेशानी अपनी राजनीति पहचान बनाए रखना है।

    इसमें कोई संदेह नहीं है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को खड़ा करने में ममता बनर्जी का ही हाथ है पर फिर भी ममता बनर्जी को यह नहीं भूलना चाहिए किसी भी बड़े दल का भविष्य केवल करिश्माई नेतृत्व पर ही निर्भर नहीं रह सकता ।समय के साथ ममता बनर्जी को पार्टी को मजबूत भी रखना होगा और आगे के नेतृत्व के लिए तैयार करना होगा।

    किसी समय कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन हुआ था ।आज सुनने में आता है कि अब उसी कांग्रेस में ममता बनर्जी को कथित तौर पर वापसी का प्रस्ताव दिया गया है कभी तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरी पर मौजूद हालात बेहद खराब हो चुके हैं ।

    आने वाले वक्त में तृणमूल कांग्रेस के क्या हालात होगे यह तो समय ही बतायेगा क्योंकि इस वक्त पार्टी तिनका तिनका बिखरती जा रही है और इस संकट की गूंज संसद तक पहुंचती दिखाई दे रही है हो सकता है तृणमूल कांग्रेस किसी पार्टी के साथ गठबंधन भी कर ले क्योंकि ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी से सांसद और विधायक दूसरी पार्टी में भी जा सकते हैं तो ऐसे में ममता के सामने गठबंधन ही एकमात्र उपाय है अपनी पार्टी को बचाने के लिए । यह समय ममता के लिए संकट का समय है ।आने वाले समय में पार्टी चुनौती का सामना कैसे करती है और कौन इस पार्टी के भविष्य को दिशा देता है यह समय ही बतायेगा।

  • शिक्षक बने राजनीतिक

    अभी कुछ ही समय पहले की बात है कुछ लोकप्रिय कोचिंग संस्थानों और उन कोचिंग को चलाने वाले संचालकों द्वारा अपने शैक्षणिक विषयों से हटकर देश के पत्रकारों ,भारतीय इतिहास और न जाने कितने विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर सोशल मीडिया कई मंचों से प्रहार करने लगे।

    इस तरह कोचिंग संस्थान के संचालकों ने महसूस कराया कि देश को और देश की युवा वर्ग को शिक्षा की कितनी जरूरत है यह एक अच्छी बात है परंतु साथ ही साथ एक मीडिया कर्मी द्वारा की गई कोचिंग संस्थानों पर भद्दी टिप्पणियों पर बहस छेड़ दी। और देखते ही देखते राजनीति‌ शुरू कर दी।

    कोचिंग संस्थानों द्वारा छेड़ी गई आपसी लड़ाई में नुकसान विद्यार्थियों का ही हो रहा है इस बात को समझना होगा और इसका असर युवा वर्ग की सोच पर क्या पड़ेगा यह समझना होगा।

    शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को ज्ञान और कौशल प्रदान करना होता है ना कि उन्हें किसी विशेष वैचारिक या राजनीतिक दिशा में प्रभावित करना।

    आजकल के वक्त में सोशल मीडिया की पहुंच आम आदमी से लेकर एक बड़ी हस्ती तक है और जब इस तरह की सामग्री युवा वर्ग और विद्यार्थियों को मिलेगी तो वह अपना पक्ष किसे देंगे और सोशल मीडिया से मिली सामग्री से युवाओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इस बात को भी समझना होगा।

    कोचिंग संस्थान के संचालक अपनी लोकप्रियता को बढ़ावा देने के लिए ,प्रभाव डालने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से भड़काऊ भाषण देते हैं और कभी-कभी गलत भाषा का प्रयोग करते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह भी समझना होगा।

    जो व्यक्ति विद्यार्थियों के लिए आदर्श होते हैं और मार्गदर्शक होते हैं जब वही अपनी जिम्मेदारी को छोड़ कर।शिक्षा के मंच का उपयोग राजनीति का अखाड़ा बनाकर करते हैं तो क्या होगा जबकि ऐसे व्यक्तियों की जिम्मेदारी सामान्य नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक होती है क्योंकि यही व्यक्ति विद्यार्थियों के और युवा वर्ग के बौद्धिक विकास के कारक होते हैं।

    एक व्यक्ति को कुशल नागरिक बनाने की जिम्मेदारी शिक्षक की ही होती है यह शिक्षक भली भांति जानते हैं इसलिए शिक्षकों को सामाजिक तनाव वैचारिक संघर्ष पर राजनीति करने का हकदार नहीं बनना चाहिए।

  • आकाशवाणी, रेडियो

    मेरे दादाजी ने अपने समय के बारे में कहते थे कि उनके समय में टीवी घर- घर नहीं थी तो कैसे उन्हें सूचना मिलती थी ,मौसम की ,अपने देश की, अपने गांव की खेल मैदान की, राजनीति की ऐसी जाने कितने क्षेत्र थे जहां की जानकारी उन्हें रेडियो यानी आकाशवाणी से मिलती थी। यह भी एक दौर था।

    रेडियो उस समय की सबसे बड़ी चीज थी जो कि सबके पास नहीं था और जिस किसी व्यक्ति के पास वीडियो होता तो बो उसे अपने कानों से लगाए रखते थे समाचार सुनते वक्त या फिर संगीत का आनंद लेते हुए ऐसा लगता था मानो कीआंखों के सामने यह सब कुछ हो रहा हो।

    उस दौर में हर व्यक्ति के पास रेडियो भी नहीं होता था तो काफी लोग इकट्ठे होकर रेडियो पर सुनकर आनंद लिया करते थे और फिर अपने-अपने विचार-विमर्श किया करते थे यह वह समय था जब हमारे देश को आजादी भी नहीं मिली थी और आजादी के कुछ समय बाद तक भी यही स्थिति थी एक तरह से देखा जाए तो लोगों में रेडियो की वजह से आपस‌ मैं काफी प्रेम था।

    लेकिन क्या कभी सोचा है की रेडियो और आकाश वाणी का सफर कितना पुराना है यह सफर कहां से शुरू हुआ और क्या-क्या इतिहास है इस सफर का।

    8 जून 1936 को आकाशवाणी के सफर की शुरुआत उसके ‘ऑल इंडिया रेडियो के रूप’ में हुई थी । दिल्ली के अलीपुर के पांच कमरों के एक अस्थाई दफ्तर से आकाशवाणी का प्रसारण शुरू हुआ तब से लेकर 3 मई 2023 तक ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाता रहा। इसके बाद आधिकारिक रूप से इसका नाम आकाशवाणी कर दिया गया।

    ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी महान गीतकार पं नरेंद्र शर्मा ने 1956 दिया था रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग 1939 में रविंद्रनाथ टैगोर ने भी किया था। पहले आकाशवाणी पर गीत-संगीत के शास्त्रीय कलाकार नहीं आते थे। केसकर ने आकाशवाणी पर शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के प्रयास किये ।रेडियो से हर भाषा के लेखकों को जोड़ा गया।

    3 जून 1947 की शाम आकाशवाणी पर ही देश के वटवारे की सूचना दी गई स्वाधीनता के समय नौ रेडियो केंद्र थे बंटवारे के बाद तीन केंद्र पकिस्तान को मिले देश के पहले प्रसारण और सूचना मंत्री सरदार पटेल रहे जिन्होंने रेडियो का महत्व समझा और उसके विकास को प्रोत्साहन दिया।

    इस तरह धीरे-धीरे आकाशवाणी में सुधार हुआ और यह हर परिवार की आवश्यकता बन गया ।

  • दिल्ली अग्निकांड हादसा या लापरवाही

    अभी हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल में भड़की अग्निकांड में अब तक का सबसे खौफनाक सब सामने आया है 21 लोगों की मृत्यु हुई जिसमें 12 विदेशी नागरिक थे।

    होटल घनी आबादी वाले इलाके में था। होटल बिना फायर एन ओ सी के चल रहा था 5 मंजिला होटल से बाहर निकलने का एक ही रास्ता था ।और बताया गया कि उस वक्त गेट पर ताला लगा हुआ था।

    एक ही सीढ़ी होने की वजह से गर्मी तुरंत ऊपर मंजिल तक पहुंच गई और आग की लपट और धुआं भी फैल गया। ऐसे में अंदर लोग आग और धुआं से तड़प रहे थे। जान बचाने के लिए कई लोग ऊपर की मंजिल से ही कूदने लगे स्थानीय लोगों ने सड़क पर गद्दे विछा दिए जिस से कई लोग गददौ के ऊपर गिर कर अपनी जान बचा सके। परन्तु काफी लोगों ने जान‌ गंवा दी

    इसी‌ अग्निकांड की आग में फंसी एक महिला अपने बच्चे को सीने से लगाकर नीचे कूद गई और सड़क पर विछे गददे पर जा गिरी जिस मां और बेटे दोनों की जान बच गई ।

    इस अग्निकांड में कई लोग घायल भी हुए कइ मरे लेकिन सवाल यह है ये हादसा या लापरवाही हुई कैसे ।

    लापरवाही

    दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित होटल में आग लगी वह किसकी लापरवाही मानी जाए होटल मालिक की या फिर होटल में ठहरे लोगों की ।

    होटल के मालिक लवकेश बजाज को गिरफ्तार कर लिया गया है । क्योंकि इस अग्निकांड में उन्हीं की लापरवाही सबसे ज्यादा है ।प्रवेश द्वार और निकास द्वार एक होने की वजह से आग के वक्त लोग होटल में फंसे गए और वहां से निकल कर जान नहीं बचा सके।

    होटल में 6 कमरे बनाने कीअनुमति मिली थीं वहां 25 कमरे थे और फायर सेफ्टी भी नहीं थी। यह भी एक बहुत बड़ा कारण है इस हालत का।

    दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़ों के अनुसार राजधानी में तक आग लगने से करीब 65 लोग जल कर मर चुके हैं इस स्थिति के लिए भवन मालिकों को कोई ही दोषी ठहराकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता जांच समिति अगर प्रभावित ढंग से निरीक्षण करता है घटना के लिए नियमों की उल्लंघन पर करवाई हो तो ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सकता है।

    ये पहला हादसा नहीं है बल्कि समय समय पर ऐसे हादसे होते आए हैं ।पर हर बार कि तरह इस हादसे से ‌भी कोई समझ नहीं लेगा और ना ही समझदार वनेगा आखिर क्यों नहीं हम समझने कि कोशिश करते ।

  • Digital aur AI Yug

    आज हम डिजिटल और AI युग में जी रहे हैं जहां हमारी रोजमर्रा के छोटे छोटे कार्यों में भी‌ हमें डिजिटल मदद मिलने लगी है जैसे कि बैंकिंग क्षेत्र में ही इंटरनेट बैंकिंग ,मोबाइल बैंकिंग यूटीआई पेमेंट्स इत्यादि उपयोग में डिजिटल बैंकिंग का विस्तार हुआ है जो की काफी सुविधा जनक है ।जिससे वित्तिय लेन-देन में सुविधा मिली है।

    इसी तरह AI के आने से हमारे जीवन के काफी क्षेत्र मे सुविधा मिली है जैसे कि घर बैठे आपको देश-विदेश की सूचनाएं मिलती है और यहां तक कि डिजिटल एजेंट भी है जो आपकी रोजमर्रा के कामकाज को व्यवस्थित करने में मदद करता है यह थोड़ा अजीब लगता है पर हम शायद कुछ ऐसे ही युग में जी रहे हैं।

    डिजिटल और एआई के नुकसान

    डिजिटल और एआई के आने से हमारे जीवन को सरलता मिली है इसमें कोई शक नहीं है परंतु डिजिटल और एआई के कुछ नुकसान हो सकते हैं जैसे की डिजिटल के क्षेत्र में धोखाधड़ी भी बड़ी है

    साईबर धोखा-धड़ी जैसे की फोन कॉल पर किसी अनजान व्यक्ति का धोखे से हमारा पासवर्ड याओटपी लेना और हमारे खाते से वित्तीय धोखा-धड़ी करना या फिर हमसे अंजाने में जानकारी हासिल करके हमारी निजता को हानि पहुंचाना। इसी तरह कई धोखाधड़ी शामिल है।

    सोचने वाली बात है एआइ के आ जाने से इंसान हर छोटे बड़े कामों के लिए एआइ पर निर्भर रहने लगा है तो उसका मानसिक विकास किस तरह होगा इसके लिए आपको स्वयं पर भी निर्भर रहने की आदतों को थोड़ा बहुत बनाए रखना चाहिए।हालांकि अभी इसमें ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला है परंतु भविष्य को देखते हुए एसे विचारों का आना स्वाभाविक है।

    इंसान को जीवन के हर क्षेत्र में एआई पर ही निर्भर रहना अच्छा नहीं है कुछ विशेषज्ञ कहते हैं एआई का इस्तेमाल विचारों के लिए करते हैं पर किसी को यह पता चले कि उसे क्या करना है क्या लिखना है यह सब सोचने का कार्य व्यक्ति को स्वयं करना चाहिए ना कि एआई पर डालना चाहिए।

    डिजिटल और एआइ के आने से हमारे जीवन को सरलता मिली है यह सच बात है पर हमें इसके साथ-साथ खुद को भी समझदारी के साथ चलने के नियम समझने होंगे जैसे की हमेंअपनी निजी जानकारी के बारे में किसी और को नहीं बताना चहिए और बड़ी सतर्कता के साथ समझदारी दिखानी चाहिए समय के साथ समझदार वनना सीखना होगा।