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  • खाली मन और खाली खेत

    इंसान के मन मे हर वक्त कोई न कोई विचार चलता ही रहता है कभी-भी खाली नहीं रहता और यह दुनिया के हर इंसान के साथ होता है। जैसे मनुष्य दुनिया में रहता है समाज में रहता है अपने परिवार में रहता है ठीक उसी प्रकार उसके दिमाग में बातें रहती है व्यक्ति अपने दिमाग में ही हर स्थिति और हर व्यक्ति को अपने दिमाग में फिट कर लेता है और उसके साथ बातचीत करने लगता है देखने में मनुष्य ऊपर शांत लगेगा लेकिन उसके दिमाग में जाने किस से बातचीत हो रही होती है।

    जब कभी मनुष्य की बेवजह तबियत खराब होती है और वह व्यक्ति डॉक्टर को दिखाने जाता है तो डॉक्टर कहते हैं चिंता कम किया करो डॉक्टर के नजरिए से देखा जाए तो हमारी बेवजह तबीयत बिगड़ने की वज़ह हमारा दिमाग में नकारात्मक बातों का सोचना होता है ऐसे में हर व्यक्ति क्या कहना होता है की दिमाग के ऊपर उसका क्या अधिकार है मतलब की दिमाग को सोचने से कैसे रोकाजा सकता है।

    इंसान अगर चाहे तो सब कुछ कर सकता है इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए की दिमाग उसके शरीर का एक हिस्सा है ना कि वह दिमाग के कंट्रोल में है। व्यक्ति अगर चाहे तो अपने दिमाग को अपने कंट्रोल में कर सकता है और चिंता और अशांति जैसी स्थिति से बाहर निकल सकता है।

    जिस तरह एक किसान अपने खाली खेत में नए बीज बोकर नई फसल को तैयार करता है और अच्छी फसल प्राप्त करता है तो यहां हमें यह समझना होगा कि जब मनुष्य अपनी मेहनत से खाली खेतों को हरा भरा कर सकता है तो क्या वह अपने दिमाग में नए और सकारात्मक विचारों को नकारात्मक विचारों से बदलकर नहीं भर सकता क्या।

    अब आप सोचोगे कि यह कैसे हो सकता है कैसे एक व्यक्ति अपने दिमाग से नकारात्मक विचार खत्म करके सकारात्मक विचारों को अपने दिमाग में भर सकता है।

    इसके लिए आपको कुछ उपाय करने होंगे जो बहुत ही सरल और आसान है

    सोते समय पर

    सबसे पहला उपाय यह होगा कि आप जब सोने के लिए अपने बिस्तर पर पहुंच जाते है तो थोड़ी देर आपके दिमाग में जो भी चलता है उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है उस वक्त दिमाग में चलने वाली बातचीत को रोक कर कुछ अच्छी बातचीत शुरू करनी होगी यह बातचीत आप से ही जुड़ी होनी चहिए या फिर बीते हुए वक्त की कोई हंसी मजाक से संबंधित बातचीत को दिमाग में जाना होगा और जैसे ही आपको नींद आना महसूस होने लगे तो भी कुछ अच्छा सोचते हुए ही आप सोने की कोशिश करें।

    सुबह होने पर

    सुबह होने पर हमारा दिमाग अक्सर खाली होता है या अभिषेक सुन्न भी कह सकते हैं ऐसे में अगर आप सुबह सबसे पहले शीशे के सामने खड़े होकर 5 मिनट के लिए खुद को देखते हुए मुस्कुराते रहें और साथ में अपने दिमाग में फिर से बीते समय की अच्छी और हंसी की यादों को याद करें और महसूस करें कि अभी हो रहा है यह बहुत अच्छा तरीका है अपने दिमाग से नकारात्मक विचारों को खत्म करके इसकी जगह सकारात्मक विचारों को जन्म देना।

    खान-पान

    मनुष्य के दिमाग में नकारात्मक विचारों की वजह व्यक्ति का खान-पान भी होता है यदि कोई भी व्यक्ति अपने सही समय पर खाना नहीं खाता है या फिर उसके खाने में प्रोटीन विटामिन की कमी होती है तो ऐसा खानपान मनुष्य की नकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। कुछ घरों में महिलाएं स्वयं के खान पान पर कोई ध्यान नहीं देती समय पर खाने पीने की आदत ना होने की वजह से स्वभाव की चिड़चिड़ी हो जाती हैं इसलिए मनुष्य को अपने सकारात्मक विचारों को बढ़ाने के लिए समय पर खाने-पीने स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक भोजन खाना खाना चाहिए।

    इसी प्रकार और भी छोटे-छोटे उपाय हैं जैसे कि सही समय पर सोने उठना बैठना भी हमारे नकारात्मक विचारों को खत्म करने में सहायक होते हैं इसके अलावा हमें अपनी खुशियों के लिए भी समय निकालना सीखना होगा।

    इस प्रकार छोटी-छोटी लगने वाली साधारण सी खुशियां भी हमें बहुत बड़ी खुशी की तरह लगने लगती है और हम अपने खाली दिमाग को खाली खेत की तरह मन चाहे सकारात्मक विचारों से भर सकते हैं और कुछ समय बाद हमारे दिमाग में सकारात्मक विचार स्वयं से निर्मित होने लगेंगे ।

  • कल नहीं अपने आज को जीना सीखो

    मनुष्य अपना जीवन बीते कल को याद करने और आने वाले कल को संवारने में ही सोच कर गुजार देता है यह स्थिति किसी एक व्यक्ति कि नहीं है बल्कि हम सभी की यही स्थिति है।

    वर्तमान को बेहतर तरीके से जीना ही सही मायनों में जीवन कहलाता है पर हम यह बात नहीं समझ सकते क्योंकि मनुष्य की आदत बीते कल और आने वाले कल सोचने में गुजारना ही बन चुका है।

    ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसने अपने जीवन में कोई गलती ना कि हो। मनुष्य द्वारा की गई गलती होने के बाद यह गलती पछतावे के रूप में मनुष्य को कई वर्षों तक महसूस होती रहती है और यह सब हमारे मानसिक क्रियाएं होती हैं परंतु अगर हम चाहे तो इन क्रियाओं को बदल कर उसकी जगह अपने बीते समय में कुछ अच्छा और हंसी के पलों से भरदे तो शायद हमें हमारा पछतावा फिर याद नहीं आयेगा ।

    आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए सोचने से अच्छा होगा कि मनुष्य को रोज अपने छोटे-छोटे कार्यों से अपने अंदर अच्छी आदतों का निर्माण करना सीखना होगा हर रोज एक नई अच्छी आदत आपके आने वाले कल को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती है

    जब हम अपनी गलतियों के रूप में याद आने वाली पुरानी यादों को अपने पुराने समय की अच्छी यादों से बदल देते हैं और यह आदत बना लेने से हमारे लिए हमारे बीते कल से निकलने में हमारी मदद कर सकता है और आने वाले भविष्य को संवारने के लिए अपने अंदर रोज एक नई अच्छी आदत का निर्माण करना हमारे अच्छे भविष्य की ओर ले जाता है तो इस तरह हम अपने बीते कल से और आने वाले भविष्य की चिंता से बाहर निकलकर अपने वर्तमान जीवन को आनंद लेकर और बेहतर तरीके से जीना शुरू कर सकते हैं।

    यह करने के बाद मनुष्य संपूर्णरूप से अपने वर्तमान को जीने लगता है और जीवन के नए अर्थ को समझता है यह सबकुछ करने के बाद मनुष्य जब जीवन के अर्थ को बेहतरी से समझ चुका होता है तो उसे सृष्टि की सुंदरता भी समझ आने लगती है और जीवन के सुख-दुख से बाहर निकलने का जरिया भी दिखने लगता है।

    वर्तमान में जीने से व्यक्ति को अपार सुख की प्राप्ति होती है क्योंकि व्यक्ति अपने अहम् से बाहर निकलने का रास्ता समझ चुका होता है और अपने आसपास के लोगों के साथ गल मिलकर रहना पसंद करने लगता है।

    इस तरह देखा जाए तो अपने बीते कल और आने वाले कल को संवारने की सोच की वजह से व्यक्ति को वर्तमान ज़ीने का अनुभव ही नहीं हो पता और जब यह अनुभव हो जाता है व्यक्ति की बहुत सारी चिंताएं उसे बेवजह की लगने लगते हैं इसलिए अपने वर्तमान को जीना बहुत महत्वपूर्ण हैं।

    वर्तमान को जीने वाला व्यक्ति अपने सामने आने बाली समस्याओं से घबराता नहीं है बल्कि शांत मन से समस्याओं का समाधान ढूंढने लगता है और कुछ ही समय में वह व्यक्ति‌ अपनी समस्याओं के समाधान को ढूंढ लेता है।

    वर्तमान को जीने वाला व्यक्ति अपने जीवन के हर कार्य को भाग्य के भरोसे छोड़कर नहीं बैठता बल्कि अपनी नई छोटी-छोटी आदतों से स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है इससे हमें यह भी समझना होगा की भाग्य भरोसे बैठने से व्यक्ति अपने आनेवाले समय को तो खराब करता है साथ में वर्तमान में भी चिंतित रहने लगता है इसलिए किसी भी कार्य को भाग्य भरोसे छोड़कर बैठने से आप अपना वर्तमान भी खराब कर लेंगे और उसकी वजह से आने वाला कल भी खराब हो जाएगा।

    वर्तमान को आनंद और शांति से जीने में जरूरी नहीं है कि आपके पास महंगे महंगे संसाधन हों या फिर आप एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हों। शांतिपूर्ण वर्तमान जीने के लिए असाधारण होना जरूरी नहीं होता एक साधारण सा व्यक्ति भी इन छोटे-छोटे उपाय को करके शांत और खुशहाल वर्तमान को जी सकता है।

    याद रखिए जीवन सबका कठोर है जीवन एक कोरे पन्ने की तरह होता है जिस पर आप जो भी लिखेंगे वही आपका जीवन बन जाएगा ऐसे ही वर्तमान रूपी कागज पर आप अपने बीते कल के पछतावे को लिखते हैं या फिर अपने बीते कल मैं से कुछ अच्छे पलों को लिखते हैं ऐसे ही वर्तमान रूपी कोरे पन्ने पर अपने भविष्य की चिंता को लिखते हैं या फिर अपने अंदर रोज एक नई आदत का निर्माण करके अपनी भविष्य की सुंदर और उज्जवल परिभाषा लिखते हैं कल बीत चुका है और आने वाला कल आने में अभी वक्त है इसलिए अपने वर्तमान को जीना सीखें वर्तमान में जीने से व्यक्ति को जीवन के अर्थ से संबंधित अनभिज्ञ ज्ञान भी प्राप्त होने लगते हैं।

  • अहम् से बाहर निकलो

    भगवान की बनाई हुई यह दुनिया बहुत सुंदर है परंतु इस सुंदरता को देखने का नजरिया भी व्यक्ति के पास होना चहिए। अहम और घमंड से भरा व्यक्ति कभी-भी सृष्टि की सुंदरता को ना देख सकेगा और ना समझ सकेगा क्योंकि घमंड उसकी बुद्धि पर कब्जा जमाए हुए बैठा है।

    मनुष्य का जीवन सिर्फ एक प्रक्रिया ही नहीं होता बल्कि एक अनुभव और एहसास भी होता है यदि हम मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीते हैं तो व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान के साथ संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर सकता है।

    अक्सर लोग अपने जीवन को समस्या सुख दुख परेशानी ईर्ष्या असंतोष नफरत संकट जैसे भाव में ही जीता रहता है और इन्ही भाव में घिरकर जीवन को काटता है क्योंकि मनुष्य की चाह ऐसी होती है किसी और के जीवन जैसा उसका जीवन हो और यही सोच उसके जीवन में शांति और ईर्ष्या भर देती है जो कि अहम् के ही रूप होते हैं।

    अहम् से भरा मनुष्य अपने जीवन में एक प्यास रखता है यह प्यास भी उसकी अलग-अलग तरह की होती है जैसे किसी को पैसे की प्यास है किसी को अच्छी नौकरी की प्यास है किसी को सम्मान की प्यास है तो कोई जीवन की भागदौड़ में आगे रहने की प्यास रखता है।

    इसके अलावा अहम् से भरे मनुष्य को दूसरे व्यक्ति के सुखों को देखकर ईर्ष्या होती है जैसे किसी के पास रूपए पैसे की अधिकता को देखकर ईर्ष्या होती है तो किसी व्यक्ति की सुंदरता को देखकर ईर्षा होती है ।ये सब प्रकार के अहम् दुख का सबसे बड़ा कारण होता है इसके अलावा आज के वक्तमें मनुष्य का सबसे बड़ा दुख स्वयं का दुख न होकर उसके पड़ोसी व्यक्ति का सुखी होना दुख का बड़ा कारण है।

    हमारे मस्तिष्क में हर वक्त एक शोर सा मचा रहता है जिसका जवाब व्यक्ति के अंदर ही छुपा होता है जब व्यक्ति केवल अपने ही सुख-दुख इच्छाओं और समस्याओं में उलझा रहता है तो उसका मस्तिष्क सिकुड़कर संकुचित हो जाता है ऐसे व्यक्तियों को अपनी ही समस्या सबसे बड़ी समस्या लगती है और जिस कारण धीरे-धीरे तनाव असंतोष और तुलना की भावना को बढ़ावा मिलने लगता है।

    व्यक्ति जरा दूसरी तरफ भी विचार करके देखें कि अहम् से भरे व्यक्ति कभी भी अपनी दुनिया से बाहर नहीं निकलते अपने ही अहम् में घिरा रहना ही इनका जीवन हो जाता है।

    व्यक्ति अपने अंदर सूक्ष्म बदलाव लाकर भी स्वयं को बदलने में कोशिश करता है तो इसका बहुत गहरा प्रभाव होता है यह स्थिति वह स्थिति होती है जब जीवन केवल मेरे लिए क्या है ही नहीं रह जाता बल्कि इस सोच से ऊपर होकर मैं जीवन में क्या जोड़ सकता हूं का प्रश्न बन जाता है।

    मनुष्य जीवन में रुचियों का विस्तार भी होना जरूरी है यदि मनुष्य केवल एक ही जैसे विषय में या सोच में उलझा रहता है तो जीवन में कभी भी असफलता की स्थिति आने पर वह बहुत आसानी से टूट सकता है इसलिए मनुष्य को अपनी रुचियां व्यापक करनी चाहिए जैसे कला साहित्य प्रकृति समाज या फिर विज्ञान वह हर स्थिति में कुछ ना कुछ प्राप्त कर सकता है ।

    ऐसा करने से मनुष्य असफलता होने पर एक नई राह को भी तलाश सकता है जो कि उसे खुशी देता है और आगे बढ़ने के नए रास्ते भी देता है। लेकिन जब हम दूसरों के जीवन को समझते हैं तो हमें एहसास होता है कि जीवन में संघर्ष होना तो सामान्य बात है।

    इससे हमारे भीतर धैर्य और स्वीकार्यता विकसित होती है अच्छा जीवन कोई बाहरी उपलब्धि का नाम नहीं है बल्कि है तो एक मानसिक सोच होती है। हमारी सोच इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन को कैसे देखते हैं और क्या हम अपने आप को समझते हैं यदि हम अपने छोटे से अहंकार से ऊपर उठकर जीवन की व्यापक गमों में रुचि लेना सीख जाए तो खुशी अपने आप हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है

    जब मनुष्य अपने संकुचित स्वार्थ और अहंकार की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन की व्यापक दृष्टि से देखना शुरु करता है दूसरों की सुख-दुख में सहभागी बनता है तब उसके भीतर संतोष शांति और आनंद का स्वाभाविक संचार होने लगता है और यही अवस्था उसे एक सार्थक संतुलित और सचमुच खुशहाल जीवन की ओर ले जाती है

    हर वक्त दूसरों की दुनिया में तांक झांक करते रहना भी मनुष्य के लिए दुख का सबक बन जाती है ऐसे में व्यक्ति की मानसिकता दूसरों के जैसा बनाना है सुख को समझने लगता है हमें समझना होगा कि हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं तो होती हैं परंतु जो व्यक्ति समझदारी के साथ अपनी समस्याओं से निजात पाना जानता है वही व्यक्ति सफल और सच्चा सुखी इंसान बन जाता है।

    इसके अलावा किसी और व्यक्ति के ख़िलाफ़ बदला लेने की भावना भी हमको कमजोर करती है गुस्सा और बदले की भावना को खत्म करके हमें माफ करना और आगे बढ़ जाना जैसी भावनाओं को समझना होगा जो कि हमारे मस्तिष्क को शांति देने का कार्य करती हैं यह सब कुछ करने से हमारे मस्तिष्क को शांति महसूस होने लगती है और इस तरह हम अपने हम से बाहर निकाल कर

    किसी भी व्यक्ति के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं एक रास्ता उसका उसे अपने अहम् से मिलता है दूसरा रास्ता उसे अपने अहम् से बाहर निकलकर ही दिखाई देता है।

    जिस वक्त मनुष्य अपने लिए अहम से बाहर निकलने का निर्णय लेता है उसी वक्त से उसे अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस होने लगती है यह ऊर्जा मनुष्य को जीवन के कई अभिज्ञ ज्ञान के द्वार खोल देती है।

  • प्रेम मनुष्य की ताकत

    यश, धन ,सत्ता ,ज्ञान जैसी आकांक्षाएं आखिरकार हृदय की एक मोन भूख के आगे छोटी पड़ जाती है और यह इस बात को जानने की भूख की कोई हमें चाहता है।

    कोई हमारे प्रेम में हमारे अस्तित्व को महत्वपूर्ण समझता है तो कोई किसी के प्रेम में अपने प्रेमी की मौजूदगी हो महत्वपूर्ण मानता है।

    मनुष्य को जीवित रहने के लिए कुछ महत्वपूर्ण चीजों की आवश्यकता होती है परंतु इसके अलावा मनुष्य को जीवित रहने के लिए प्रेम की भी जरूरत होती है।

    प्रेम मनुष्य के लिए जरूरत से ज्यादा जीवन के अर्थ को समझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि प्रेम में ही मनुष्य अपनापन समझ पाता है और प्रेम ही मनुष्य को संवारता सुधारता है प्रेम ही मनुष्य को जीवन की गहराइयों को जानने में सहायक होता है। इसके अलावा मनुष्य के जन्म को भी एक वजह मिलती है।

    प्रेम मनुष्य के लिए सूर्य की तरह है जैसे सूर्य निकलता है तो उसके साथ धरती पर भी असंख्य जीव-जंतु मनुष्य और पेड़पौधे भी जीवन की अभिलाषा को आगे बढ़ाते हैं ठीक उसी प्रकार प्रेम मनुष्य के अंदर कई अभिलाषाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।

    एक व्यक्ति के अंदर की अच्छाई और बुराई भी प्रेम ही तय करता है समाज के विरूद्ध हो जाने पर प्रेम ही व्यक्ति को अकेलेपन से लड़ने की ताकत देता है और स्वयं को समाज के सामने खड़े होने का व सामना करने का विश्वास भी देता है।

    परंतु जब कभी प्रेम के विछड़ जाने से स्थिति भयानक भी हो जाती है तो ऐसे में व्यक्ति प्रेम की यादों में रहकर वही की वही रुक रह जाता है समय निकलता जाता है परन्तु वह मनुष्य अपनी पुरानी यादों से नहीं निकल पाता एक तरह से उसके लिए विनाश का वक्त होता है।

    प्रेम में पुनर्जीवित करने की शक्ति होती है सबसे दुखद जीवन वह नहीं जिसमें गरीबी हो बल्कि वह है जिसमें कोई अपना नाम हो जो आपकी लौटने की प्रतीक्षा करें । मनुष्य अक्सर प्रेम को अधिकार समझ लेता है मनुष्य समझता है कि प्रेम में बांध लेना होता है जबकि प्रेम में तो सिर्फ मुक्ति होती है किसी भी प्रकार का बंधन नहीं होता

    सच्चा प्रेम मनुष्य को स्वतंत्रता देता हैं क्योंकि प्रेम में व्यक्ति स्वतंत्रता को ही प्रेम की असली सुन्दरता मानता है प्रेम का रूप एक एक युवक और युवती के बीच में ही नहीं होता बल्कि एक मां का अपने बच्चों से, एक मित्र का अपने सच्चे मित्र से, बूढ़े मां बाप का अपने बच्चों के प्रति चिंता रखना यह सब प्रेम का ही तो रूप होता है कहीं ना कहीं हम सब मनुष्य इन्हीं प्रेम के धागों से बंधे हुए हैं।

    जिनका कोई नहीं होता उन्हें भी इस दुनिया में किसी न किसी के द्वारा प्रेम मिल जाता है जैसे किसी बूढ़े मां-बाप को संतान का प्यार किसी और की संतान से मिलता है तो जैसे अनाथालयों में रहने वाले आपस में प्रेम की वजह से एक दूसरे से जुड़ जाते हैं और फिर एक दूसरे के भले की चिंता भी करने लगते हैं तो यह प्रेम भी विचित्र और जीवन को एक नई परिभाषा देने वाला होता है।

    किसी अनजान व्यक्ति का विदेश में जाने पर वहां की संस्कृति और समाज से जुड़ाव हो जाना भी प्रेम की ही परिभाषा मानी जाती है।

    पर कभी-कभी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो खुद पीड़ा सहकर दूसरों को प्रेम देकर भी अकेले रह जाते हैं पर महान व्यक्तियों की यही पहचान होती है जो निस्वार्थ होकर मनुष्य जाति को प्रेम देते हैं और बदले में कुछ मिलने की भी उम्मीद नहीं रखते हैं।

    मनुष्य जब स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रेम में विरक्त हो जाता है तो वह सही मायनों में मानवता से जुड़ जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी वृद्धावस्था में स्वयं को अकेला नहीं देखते बल्कि वह बहुत सारे अनुभव और यादों के साथ खुद को घिरा हुआ देखते हैं।

    एक घमंडी व्यक्ति को भी प्रेम बदलने की क्षमता रखता है एक आवारा व्यक्ति को भी गलत रास्ते से सही रास्ते पर लाने की हिम्मत प्रेम में ही होती है फिर वह प्रेम चाहें व्यक्ति को दोस्त के रूप में मिलता हो या फिर अपने सगे-संबंधियों संबंधियों द्वारा प्रेम का मिलना मनुष्य के जीवन में चमत्कार से कम नहीं होता।

    मनुष्य की सबसे बड़ी उत्पत्ति धन ,यश या किसी प्रकार की सत्ता नहीं होती बल्कि प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति मानी जाती है ।इस पूरी दुनिया में आपके पास किसी के होने से वह खुशी मिलती है जो आपको जीवन जीने प्रेरणा देता है उस शक्ति को प्रेम कहा जाता है जो एक अकेले व्यक्ति को अकेलेपन की कमी से दूर रखकर एक नए प्रकाश को दिखलाता है।

  • पछतावे से सीख लेना सीखो

    जब कभी हम अपनी गलतियों के कारण किसी कार्य के असफल हो जाने पर पछतावा करते हैं और काफी समय तक इस पछतावे में ही रहते हैं और सोचते हैं कि काश हमने गलती ना की होती।

    कार्य के बिगड़ जाने पर पछतावा करना ही रह जाता है मनुष्य के पास । लेकिन देखा जाए तो गलतियां करना भी मनुष्य की आदत में है और फिर अपनी गलतियों से सीखना भी मनुष्य के व्यवहार में है।

    पछतावा अक्सर काम के बिगड़ जाने के बाद ही होता है तो यहां यह कहने से तात्पर्य यह है कि अतीत में हुई गलतियों का वर्तमान में उनके बारे में सोचना ही पछतावा कहलाता है।

    पछतावा एक दरवाजे के जैसे है जो की कार्य खत्म होने के बाद प्राप्त निष्कर्ष से मिलता है यदि मनुष्य पछतावे रूपी दरवाजे को खोलकर और हो चुके कार्य से मनुष्य द्वारा की गई गलतियों से सीखे तो होगा यह कि आने वाले समय में किन गलतियों को नहीं दोहराना चाहिए इसलिए व्यक्ति को पछतावे को दुख के रूप में ना लेकर उसको सीख के रूप में लेना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के लिए आने वाले समय में फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

    कभी-कभी कुछ व्यक्ति पछतावे में ऐसा डूब जाते हैं कभी-भी उभर नहीं पाते और हमेशा पछतावे में ही रह जाते हैं।यदि ऐसे व्यक्तियों को कोई मार्गदर्शन करनेवाला व्यक्ति मिल जाता है और मार्गदर्शन करता है तो ऐसे व्यक्तियों को पछतावे से बाहर निकलने में मदद मिल सकती है।

    हम मनुष्य जाति में पछतावे के नुकसान को एक बहुत बड़ी गलती के रूप में याद करते हैं और कभी न भूलने वाली घटना बना लेते हैं पर हम मनुष्य जाति को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि हमने हमेशा अपने पछतावे से ही सीखा है।

    अतीत में हुई गलतियों को हम बदल तो नहीं सकते परंतु हम उन गलतियों से सीख ले सकते हैं इस तरह हम पछतावे को एक बोझ ना बनाकर बल्कि एक सीखने का जरिया बनाकर आगे बढ़ सकते हैं।

    पछतावे को दो रूप होते है पहला किसी इंसान से मेरे धोखे को भी पछतावा ही कहा जाता है ऐसा पछतावा मिलने के बाद मनुष्य को काफी गहरा आघात लगता है पर किसी के द्वारा धोखा दिए जाने पर मनुष्य आगे के लिए समझदार हो जाता है तो कहने का मतलब यह है इस तरह के पछतावे से मनुष्य दुखी ना होकर समझदार हो जोता है और आगे किसी और इंसान से विश्वास करते समय समझदारी दिखता है और पहले की हुई गलतियों को दोहराता नहीं है।

    इसी तरह पछतावे का दूसरा रूप किसी काम में गलतियों की वजह से नफा-नुकसान हो जाने पर इंसान को जो पछतावा होता है ऐसे पछतावे में अक्सर इंसान का दीवाला भी निकल जाता है और इनका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता स्थिति खराब हो जाती है ऐसे में कोई अपना ही हमें पछतावे को सीख के तौर पर लेना सीख सकता है।

    पछतावे से बचने के लिए हमें अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना सीखना होगा और इसके अलावा जब भी हम कोई कार्य करें तो उसे कार्य के लिए पहले से योजना बनाकर चलना ही हमें पछतावे से दूर रख सकता है।

    इसी तरह हमें किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करने से पहले कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए अन्यथा पछतावा मिलना तय होता है ।

    पछतावा कभी ना भूलने वाला एक सबक लेकर भी आता है और हमें बहुत कुछ सीखा कर जाता है।

    अधिकतर व्यक्ति पछतावे को एक ऐसी समस्या समझते हैं जिससे बचना ही एक मात्र विकल्प है यह सोचकर आगे कभी-भी किसी भी प्रकार का जोखिम लेने से डरते हैं और जोखिम न लेने में ही अपनी भलाई भी समझते हैं।

    हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए इस धरती पर जितने भी बड़े से बड़े कार्य या फिर खोज हुईं उस समय में कभी ना कभी कोई गलती भी हुई होगी लेकिन गलतियों की वजह से क्या वे व्यक्ति उस कार्य करने से रूके अगर वह व्यक्ति अपने कार्य को गलतियों की वजह से पछतावे में आकर बीच में ही छोड़ देते तो क्या वह कार्य संभव हो सकते।

    इसलिए गलतियां और पछ्तावा कार्य के दौरान होने वालीं क्रियाएं हैं पछतावे में आकर हम अपने कार्यों को बीच में छोड़ देने से डरपोक प्रवृत्ति के भी बन जाते हैं।

    पछतावा इस बात का प्रमाण नहीं नहीं होता कि आपने जो कुछ किया वह गलत किया बल्कि पछतावा इस बात का प्रमाण होता है कि आपके अंदर कुछ करने की हिम्मत है इसलिए पछतावे में फंसकर खुद को सजा न दें।

    अतीत में हुई गलतियों को बदला नहीं जा सकता पर उन गलतियों की वजह से मिले पछतावे से आने वाले भविष्य को सुधारा जा सकता है।

    बीते समय में जो जा चुका है उसके लिए पछतावा करने से अच्छा है कि आप अपने बीते हुए समय के पछतावे से गलतियां स्वीकार करके आगे बढ़े और स्वयं को फिर से आगे बढ़ने का मौका दें और पछतावे को सबक के रूप में खुद को समझदार होना सिखाएं।

    समय निकल जाने के बाद अक्सर हम उस समय को पछतावे के रूप में याद करते हैं क्योंकि वह समय हमारे लिए एक सुनहरा अवसर बनकर आया था इसलिए यह पछतावा होना स्भाविक है परंतु अगर हम इस पछतावे को इस सीख में बदल लें की आने वाले समय में मैं किसी भी अवसर को छोडूंगा नहीं तो यह सीख आपके लिए आने वाले वक्त में फायदेमंद साबित हो सकती है।

    पछतावे के प्रति अपना नजरिया बदलकर हम स्वयं को आगे बढ़ा

  • आत्मज्ञान

    धरती पर सभी जीव-जंतु और प्राणियों में मनुष्य का जीवन संसार में एक ऐसा जीवन है जो जीवन ही नहीं जीता बल्कि अपने आस्तित्व के होने और न होने पर भी सवाल जवाब करता है और इस पर चर्चाएं भी करता है ।मनुष्य मन कभी-कभी अपने दिमाग में भी अपने जीवन से जुड़े कई सवालों का जवाब ढूंढने की तलाश में रहता है।

    इस धरती पर लाखों करोड़ों किस्म के जीव-जंतु है जिनमें से मनुष्य ही अपने जीवन के जन्म और मरण के बारे में जानता है इसलिए शायद मनुष्य जीवन जीव जंतुओं के जीवन से अलग जीवन है।

    मनुष्य और जीव-जंतुओं की तरह सिर्फ खाने को ही अपना जीवन नहीं समझता बल्कि अपने जीवन को बेहतर तरीके से जी सके इसके लिए योजना बनाता है व्यवस्थाएं करता है।

    और शायद जीवन मरण को जानने के तत्पश्चात् ही मनुष्य ने आगे के भविष्य को बेहतर करने के लिए नई-नई खोज करना सीखा। इन खोजों में मनुष्यों ने स्वयं के जीवन में अचानक आई आपदाओं से लड़ना भी सीखा और इसके साथ जीवन की हर घटना से सबक भी लिया।

    मनुष्य के पास सब कुछ होने के बावजूद मनुष्य खुश रहना नहीं सीख पाया हर वक्त भागते रहना ही जीवन बन चुका है।

    जीवन क्षणभंगुर है यह जानने के बाद भी मनुष्य अपने जीवन को नहीं जीता बल्कि दूसरे के जीवन में हो रही घटनाओं में शामिल होकर अपने समय को बर्बाद करता रहता है ।

    मनुष्य हर वक्त भविष्य की बेहतर योजनाओं में ही फंसा रहता है तो कभी बीते कल में हुई घटनाओं में खो जाता है इस तरह मनुष्य वर्तमान को जीना समझ नहीं पता।

    कुछ पल के लिए अगर मनुष्य यह सोचे कि वाकई में वह वही जीवन जी रहा है जो कि उसे जीना चाहिए तो शायद उसके अंतर मन से जवाब असंतुष्टि का मिलेगा क्योंकि हम अपने जीवन को दूसरों को खुश करने के लिए या दिखावे के लिए जी रहे होते हैं जबकि इस सत्य से मनुष्य भली भांति परिचित है कि हर व्यक्ति के पास जीवन की सीमा तय है तो क्यों न व्यक्ति को अपना जीवन जीने में ही आनंद लेना सीखना होगा।

    जिस तरह से हर सुबह सूरज निकलता है और शाम होने पर अस्त भी हो जाता है ठीक उसी प्रकार इंसान का जीवन भी जन्म लेकर धीरे-धीरे मरण की और बढ़ता है इस जीवन मरण की सीमा को समझकर व्यक्ति अपने जीवन को मूल्यवान बन सकता है ।

    मृत्यु सत्य को स्वीकार कर लेने से मनुष्य का जीवन के प्रति नजरिया बदलने में भी आसानी होगी और यहीं से मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति भी मिलने लगती है।

    आत्मज्ञान प्राप्त करने का एक और साधारण सा तरीका है रोज सुबह यदि व्यक्ति कुछ क्षणों के लिए आंख बंद करके और मौन होकर ध्यान करता है तो भी उसे धीरे-धीरे आत्मज्ञान मिलने लगता है

    मनुष्य को जब आत्मज्ञान धीरे-धीरे प्राप्त होता है तो वह मनुष्य जाति और जीव जंतुओं के प्रति निस्वार्थ सेवाभाव रखने लगता है और सच्ची शांति महसूस करने लगता है।

    आत्मज्ञान का मतलब मनुष्य के स्वयं के जीवन को लेकर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति और जीव जंतुओं को प्रति है। आत्मज्ञानी व्यक्ति मनुष्य के बीच ऊंच नीच, उच्चजाति निम्न जाति जैसे भेदभाव को नहीं रखता मैं मनुष्य को सिर्फ मनुष्य ही समझता है ना कि किसी विशेष धर्म का।

    आजकल के वक्त में मनुष्य स्वार्थ से भरा जीवन जीने लगा है जिसमें वह सिर्फ अपने ही भलाई का अवसर ढूंढता रहता है और साथ में अपने सगे संबंधियों का बुरा सोचता रहता है।

    मनुष्य के पास महंगे से महंगे संसाधन होने के बाद भी मनुष्य अपने अंतर मन से शांति महसूस नहीं कर पाता हर वक्त कोई न कोई चिंता उसे सताती ही रहती है।

    खुद को खोज लेना भी मनुष्य के लिए आत्मज्ञान कहलाता है खुद को खोज लेने वाला व्यक्ति कभी भी किसी जीत के प्रति प्यास महसूस नहीं करता और अगर उसके पास कुछ ना हो तो भी वह व्यक्ति परेशानी या चिंता महसूस नहीं करता ऐसा व्यक्ति अपने जीवन के हर पल में आनंद ही आनंद लेता है।

    सही मायने में सच्चा आत्मज्ञानी व्यक्ति या स्वयं को खोज लेने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन को बेहतर तरीके से समझकर कृत्रिम दुनिया के सुख और सच्चे सुख में अंतर को समझ लेते हैं।

    यदि मनुष्य के अंदर कोई जीत प्राप्त करने की चाहत होती है और उस जीत को हासिल करने के बाद मनुष्य एक दूसरी मंजिल को हासिल करने की दौड़ में लग जाता है एक प्रकार से मनुष्य इस दौड़ से कभी संतुष्ट नहीं होता और इस वजह से वह जीवन की सच्ची शांति महसूस नहीं कर पाता।

    मनुष्य अपनी मेहनत और लगन से सब कुछ हासिल कर लेता है परंतु इस सब के बाद भी अंदर से खालीपन महसूस होता रहता है जो की साधारण मनुष्य इस खालीपन की वजह को नहीं समझ पाते।

    जीवन के अर्थ को समझने वाले व्यक्ति अपनी हर स्थिति में संतुष्ट रहना जानते हैं ऐसे लोगों को फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने लोगों से पीछे है या उनके पास कोई भी बड़ी उपलब्धि नहीं है।

    जिस दिन मनुष्य यह समझ जाएगा की मन की शांति के लिए महंगे संसाधन की जरूरत नहीं होती बल्कि सच्चा सुख दूसरों की मदद करने में व जीव-जंतुओं की रक्षा करने में है तो वह व्यक्ति व्यर्थ की परेशानियों से बाहर निकल आयेगा ।

  • अपने निर्णय खुद लेना सीखें

    जब भी मनुष्य कोई निर्णय लेना चाहता है अपने किसी जरूरी काम के लिए। निर्णय लेते वक्त व्यक्ति कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है।

    असमंजस की स्थिति हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो आती है पर क्या ऐसे में हमें अपने जीवन के छोटे बड़े निर्णय लेना दूसरों से पूछ कर लेना होगा जब आप निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं तो आपका परिवार आपका समाज आपके दोस्त जैसा चाहते हैं अगर आप भी उनकी खुशी में अपने निर्णय को लेते हैं तो क्या यह आपके जीवन के लिए धोखा नहीं कहलाता । यहां यह सब कहने का मतलब ऐसा नहीं है कि हमें अपने परिवार की और समाज की बातों को सुनना समझना नहीं चाहिए समय-समय पर हमें अपने परिवार और समाज की बातों को सुनकर भी निर्णय लेने चाहिए।

    व्यक्ति माने या ना माने परंतु जब आप अपने छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए सहारा ढूंढते हैं तो आपको आदत पड़ जाती है इस सहारे की ।आपके जीवन के हर निर्णय को स्वयं से लेने में आप असहाय सा महसूस करने लगते हैं आपको अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर संदेह रहने लगता है जो कि आपके स्वयं के विश्वास के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।

    जब व्यक्ति अपने जीवन के भी छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए भी सहारे पर निर्भर रहता है तो एक तरह से वह अपने मानसिक विकास और स्वयं की तरक्की मे स्वयं से धोखा भी कर रहा होता है क्योंकि जब तक कोई भी व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना नहीं सीखेगा वह जीवन भर अज्ञानी बनकर रह जाएगा।

    कोई भी अपने कार्यों के निर्णय दूसरों से पूछ कर लेता है तो वह व्यक्ति अंदर से डरा और सहमा हुआ भी रहने लगता है और खुद पर पूरी तरह से विश्वास भी नहीं कर पाता ऐसे व्यक्तियों की छवि समाज में भी अविश्वसनीय लोगों में गिनी जाती है ।

    स्वयं पर विश्वास न करके मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धोखा खुद से ही करता है यदि व्यक्ति अपने डर से बाहर निकलकर खुद पर विश्वास रखते हुए अपने छोटे-छोटे निर्णयों को खुद से लेना सीखता है तो उसे अच्छे हो बुरे की समझ होने लगती हैऔर बिना यह सोचे कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय सही साबित होंगे या ग़लत तो उसके अंदर विश्वास बनता जाएगा और वह खुद पर विश्वास भी करने लगेगा।

    जब व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखता है तो ऐसे व्यक्ति का जीवन के प्रति नजरिया भी बदल जाता है और वह छोटे-छोटे जोखिम लेना भी शुरू कर देता है।

    व्यक्ति को अपना अच्छा बुरा स्वयं से सोचना सीखना होगा तभी व्यक्ति अपने जीवन का भरपूर आनंद ले सकेगा।

    मनुष्य जब भी दूसरों के निर्णयों में अपनी हां मिला देता है तो कहीं ना कहीं अंदर से वह व्यक्ति दुख महसूस करने लगता है दूसरे व्यक्ति आपके जीवन के निर्णय को लेने में अपना नजरिया लगाते हैं जबकि वे लोग कभी यह नहीं जान पाएंगे कि आपकी खुशी कैसे निर्णयों में होगी।

    इस पृथ्वी पर हर व्यक्ति को अपने निर्णय लेने का पूरा अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है तो ऐसे में कोई व्यक्ति अपने जीवन के खास निर्णय को लेना दूसरों पर क्यों डाल देता है व्यक्ति को समझना होगा की जीवन उसका है तो निर्णय लेने का हक भी उसका ही होना चाहिए ।

    व्यक्ति अपने जीवनकाल में बहुत कुछ हासिल कर लेता है यदि वह अपने निर्णय को लेना सीख जाता है निर्णय लेने से व्यक्ति सही गलत की पहचान करना सीखता है और आत्म विश्वासी बन जाता है।

    अगर आप भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हो तो अपने निर्णय दूसरों कि कहने पर लीजिए । पर क्या कभी सोचा है कि क्या दूसरों के आपके जीवन के निर्णय लेने से आप वही बनेंगे जो आप चाहते थे तो उसका जवाब होगा नहीं आप वह नहीं बन पाएंगे जो जो छवि आपने लिए अपने मन में बनाई है आप भी उस भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे जिसमें व्यक्ति जीवन भर अपनी समस्याओं में घिरे रहता है वह व्यक्ति हर पल हर दिन अपनी खुशियों का गला घोंटता है और नसीब का रोना रोता रहता है।

    ऐसे व्यक्तियों को कभी पता नहीं चल पाता कि उनके जीवन के दुख का वास्तविक कारण क्या है वह हमेशा दुख को अपना नसीब समझकर पूरा जीवन जी लेते हैं।

    यह विडंबना एक व्यक्ति कि नहीं बल्कि पूरे समाज की है व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं से न लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और अपनी इस घटिया सोच की आदत को अपने बच्चों को भी सिखा देता है।

    इस प्रकार एक व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय को स्वयं से न लेकर खुद को तो दुखी रखता है साथ में अपनी आने वाली पीढ़ी को भी आगे न बढ़ने के रास्ते नहीं समझा पाता है।

    अपनी पुरानी और घटिया सोच से बाहर निकलने का रास्ता शुरुआत में थोड़ा कठिन लगता है और मुश्किल भी लगता है हो सकता है स्वयं से निर्णय लेने से आपको कुछ नुकसान भी हो परंतु स्वयं से निर्णय लेने से एक बात तो तय है कि आप अपने जीवन के बारे में सही ढंग से समझने लगते हैं और कभी ना कभी आप अपने निर्णय लेने से वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे जो आपके मन में सपने की तरह हर पल रहा होता है।

    मनुष्य को अपने निर्णय लेना सीखकर एक नया मुकाम हासिल करना चाहिए और खुद को भीड़ का हिस्सा बनने से रोकना होगा।

    जो व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीख जाता है तो ऐसे व्यक्ति और व्यक्तियों की निगाह में सम्मान जनक जगह बना लेते हैं और ऐसे व्यक्तियों की वजह से समाज भी तरक्की करने लगता है।

    अतः हमें अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखना होगा और साथ ही दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिए गए निर्णयों का भी सम्मान करना सीखना होगा।

    अपने से छोटों और परिवार में बच्चों के द्वारा लिए गए सही निर्णय लेने की हिम्मत को सराहना भी चाहिए और इसके अलावा बच्चों और छोटों को सही और बूरे निर्णय लेने में फर्क भी बताना होगा क्योंकि बुरे निर्णय लेने से हम कहीं ना कहीं अपना और अपने से जुड़े व्यक्तियों का बुरा भी कर रहे होते हैं इसलिए हमें निर्णय लेते वक्त समझदारी से काम लेना होगा।

  • जीवन का आत्मज्ञान

    यह जीवन हमारे लिए एक यात्रा के समान है और हम मनुष्य जीवन यात्रा के यात्री हैं। हम सब यह तो अच्छे तरीक़े से जानते हैं की जो ‌ मनुष्य इस यात्रा पर आया है एक न एक दिन अपनी यात्रा खत्म करके जाएगा तो फिर क्यों ना हम इस यात्रा को आनंद के साथ पूरी करें और जीवन में आत्मज्ञान भी लेना सीखें।

    हर मनुष्य में किसी भी कार्य व वस्तु के प्रति जानने की इच्छा होती है। कभी-कभी किसी चीज को जानने के प्रति उत्सुकता ही व्यक्ति को उसके अंदर की अपने अंदर की क्षमता और सामर्थ्य की पहचान कराती है और फिर व्यक्ति सामर्थ्य के अनुसार अपनी प्रतिभा को पहचानने की कोशिश करके अपनी उपलब्धियां को बढ़ाना भी चाहता है।

    मनुष्य के अंदर आत्मज्ञान की शुरुआत यही से होती है जब मनुष्य की प्रतिभाओं की प्रशंसा होने लगती है तो ऐसे में वह व्यक्ति‌ घमंड और जोश में ना पड़कर स्वयं को आगे बढ़ा कर सर्वप्रथम स्वयं की प्रतिभाओं का निरीक्षण करने लगता है और अपनी कमियों पर भी ध्यान देता है व्यक्ति समझ चुका होता है खुद को बेहतर बनाने का अर्थ । इसके बाद व्यक्ति खुद को और भी विशेष बनाते हुए आगे बढ़ता है और आत्मज्ञान की नई परिभाषाओं को गढ़ता है। मनुष्य का अपने गुणों को पहचानना अच्छी बात है पर इससे अच्छा मनुष्य को अपनी कमियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए और अपनी कमियों को सुधारने की निरंतर कोशिश भी करते रहना चाहिए।

    मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानकर और अपनी कमियों को सुधार कर एक नया और बेहतर इंसान बनते जाता है ।कभी-कभी कुछ व्यक्ति अपने गुणों का बखान स्वयं से करने लगते हैं और अपनी कमियों को समाज से छुपा कर रखते हैं ऐसे व्यक्ति समाज के साथ धोखा कर रहे होते हैं।

    यदि मनुष्य अपनी कमियों को लगातार छुपाए रखेगा और अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश नहीं करेगा तो ऐसे व्यक्तियों का आत्मज्ञान का अर्थ समझना अत्यंत कठिन होगा।

    हम जिस समाज में रहते हैं या फिर कहे कि हम जिन लोगों के साथ रहते हैं यह व्यक्ति हमारी उन कमियों को देखने में बेहतर होते हैं जिन कमियों को कभी हम देख और समझ नहीं पाते आमतौर पर आलोचक इन्हीं बातों के लिए जाने जाते हैं यदि व्यक्ति दूसरों के द्वारा बताई गलतियों को स्वीकार करते हुए और अपनी कमियों को सुधारता है तो यह उस व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा हो जाता है।

    कभी-कभी मनुष्य अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से न तो किसी की सुनता है और नाही अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश करता है पर जब कभी जिद्दी स्वभाव वाले व्यक्ति असफलता को देखते हैं तब उन्हें अपनी हार और असफलता के साथ अपने अंदर का यह गलत और जिद्दी रूप देखने को मिलता है और यह असफलता उनके जीवन में उन्हें सुधारने की वजह बन जाती है।

    यदि मनुष्य अपने द्वारा किए गए कार्यों का निरीक्षण बेहतर तरीके से करे और किये गए कार्यों के निरीक्षण के दौरान व्यक्ति अपने कार्य की कमियों को सुधारने की कोशिश करता है और अगली बार अपने कार्यों में यह गलती ना हो इसकी भी कोशिश करता है तो वह व्यक्ति बेहतर होते चले जाता है और उसके अंदर की प्रतिभाएं बढ़ती जाती हैं।

    जीवन को जीने का आनंद बढ़ाने के लिए व्यक्ति जितना स्वयं के कार्यों पर ध्यान देगा और दूसरों की जीवन में क्या हो रहा है इससे मतलब नहीं रखेगा तो शत प्रतिशत अपने जीवन में आगे बढ़ता ही जाएगा।

    यदि व्यक्ति आलोचकों से अपनी दोस्ती कर ले और आलोचकों की बात को गंभीरता से लेकर अपनी बुराइयों को खत्म करने लगता है तो उसका एक नया रूप बनता है यह रूप भी आत्मज्ञान की जरूरत है ।

    जीवन का मतलब सफल होना ही नही होता बल्कि जीवन तो एक यात्रा है और हमको इस जीवन के हर पल का आनंद लेना सीखना होगा

    जब हम यह समझ जाएंगे की जीवन में सफल होने से भी अलग और भी बहुत कुछ होता है जैसे की गरीब और असहाय लोगों के काम आना जरूरतमंदों की मदद करना समाज के सभी व्यक्तियों को एक नजर से देखना यह सभी मनुष्य के अंदर व्यवहार होना चहिए तभी मनुष्य जीवन की अर्थ को समझ सकता है और आत्मज्ञान के प्राप्त करने के मार्ग को समझेगा।

    जब व्यक्ति अपने अंदर की कमियों पर ध्यान देने लगता है तो वह अपने हर पल को बेहतर बनाते जाता है और इस तरह व्यक्ति अपने जीवन को भी बेहतर बना लेता है।

    बेहतर जीवन बेहतर व्यक्ति की प्रतिभाएं देख कर समाज के व्यक्ति भी उनसे जुड़ने लगते हैं । बेहतर व्यक्ति से जुड़े व्यक्तियों में भी अपनी प्रतिभाओं को पहचान की अपनी कमियों पर ध्यान देने की आदत बन जाती है और यह आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी होती है।

    आत्मज्ञान जीवन के अर्थ को समझने के बाद ही ही शुरू होता है इसका मतलब यह नहीं है की हर मनुष्य प्रतिभाशाली हो, खूबियों से भरा हो या सफल हो। एक साधारण व्यक्ति भी अगर अपने अंदर से स्वार्थ अधीरता और अपनी कमियों को खत्म करने लगता है तो वह व्यक्ति भी जीवन के आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

  • जय गणेश देवा

    हमारे देश में हर त्योहार को जोरदार और बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है गणेश भगवान के त्यौहार को भी भारतीय लोग धूमधाम से मनाते हैं।

    गणेश भगवान जो की बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। गणेश त्योहार महाराष्ट्र सहित पूरे देश में 12 दिनों तक मनाया जाता है यह त्यौहार गणेश चतुर्थी से प्रारंभ होकर गणेश चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

    हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है गणेश जी मूर्ति की स्थापना गणेश चौथ के दिन स्थापना करने से लेकर गणेश चतुर्दशी तक भगवान गणेश अपने भक्तोंके सारे दुःखों को हर लेते हैं साथ ही भक्तजन की विनती को भी स्वीकार करते हैं।

    गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मिट्टी की बनी हुई मूर्ति का भक्तों द्वारा गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। भगवान गणेश जी की मूर्ति की स्थापना से लेकर विसर्जन तक भक्त अपने गणेश जी का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करते हैं और उनकी सेवा भी करते हैं।

    12 दिन के गणेशोत्सव में भक्त और भगवान का गहरा रिश्ता बन जाता है और अपनापन जुड़ने की वजह से जब गणेश मूर्ति का विसर्जन किया जाता है तो कई भक्त की आंखें नम हो जाती है।

    गणेश चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है गणेश प्रतिमा के विसर्जन के समय अपने भगवान को विदाई देते वक्त भक्तों की आंखों में आंसू भी दिखाई पड़ते हैं।

    अगले बरस फिर से आना ऐसे जयकारे बोलते हुए भक्त ढोल नगाड़ों के साथ विधि विधान से पूजा अर्चना और आरती के बाद अपने भगवान गणेश जी का विसर्जन करने ले जाते हैं।

    भगवान गणेश जी की मूर्ति विसर्जन के वक्त पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा जाता है इसके लिए कृत्रिम कुंड भी बनाए जाते हैं जिससे कि पर्यावरण से बचा जा सके और भक्तों की आस्था को भी ठेस ना पहुंचे।

    भगवान गणेश से जुड़ी हुई एक कथा है जो कि इस प्रकार है।

    भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है जब भक्तों के जीवन से दुखों को हर लेते हैं इस वजह से भगवान गणेश जी विघ्नहर्ता नाम से पहचाने गया।

    कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है नरांतक और देवांतक नाम के दो असुर थे। दोनों असुरों ने देवताओं और ऋषि मुनियों के जीवन से शांति खत्म कर दी ।असुरों के आतंक से ऋषि मुनि अपने तप और साधना भी नहीं कर पा रहे थे और देवताओं को भी दोनों असुरों का संकट खत्म करने का और उनसे छुटकारा मिलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था । असुरों ने अपनी शक्ति और बल के आधार पर देवताओं ऋषि मुनियों को और साधुओं को अपने आतंक से भयभीत कर दिया था इस कारण तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मच गई थी अशांति फैल गई थी देवताओं साधुओं और ऋषि-मुनियों के मन मे डर का माहौल बन गया था।

    असुरों से निपटने और शांति चाहने के लिए जब देवताओं को कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वे सब भगवान गणेश जी की शरण में पहुंच गए और गणेश जी से मदद की गुहार लगाने लगे देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा असुरों से संकट मुक्त कराइए ।

    भगवान गणेश जी ने अपने भक्तों की पुकार सुनकर दिव्य रूप धारण कर लिया भगवान गणेश जी के दिव्य तेज को देख कर देवता और ऋषि मुनि भी नतमस्तक हो गए भगवान गणेश जी ने अपने दिव्य पराक्रम से दोनों असुरों को युद्ध में हरा दिया और दोनों असुरों का नाश करके धर्म और सत्य को विजय दिलाई।

    असुरों का अंत होने के बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा कि हे प्रभु अब आप ही हम सभी के विध्नों को हरने वाले हैं अतः आप ही अब विघ्नहर्ता कहलायेंगे।

    भगवान गणेश जी अपने भक्तों के संकट को हरने में जरा भी देर नहीं लगाते।

    भगवान गणेश जी को शुभ कार्यों में प्रथम निमंत्रण दिया जाता है जिससे कार्यों के अच्छे-से पूर्ण हो सकें ऐसी भावना रखी जाती है।

    भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है जिससे पता चलता है कि हमारे गणेश भगवान छोटे जीव को भी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक मानते हैं।

  • हर उम्र सीखने की होती है

    हमारे समाज में हर व्यक्ति को उम्र के हिसाब से कार्य करना चाहिए ऐसी सोच और मानसिकता है इस तरह की सोच पुरानी सोच और रूढ़िवादी सोच कहलाई जाती है ।

    ऐसे कायदे होने से समाज ने हर व्यक्ति को एक तरह की वेड़ियों में बांध दिया है जिस कारण हर व्यक्ति का दम घुट रहा है। मान लीजिए कोई महिला पढ़ना चाहती है जो की अपने बचपन में किसी कारणवश अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी जब यह महिला अपने परिवार को बताती है कि वह अपनी पढ़ाई के सपने को पूरा करना चाहती है तो सर्वप्रथम परिवार के व्यक्ति उसकी हंसी उड़ाते हैं और समाज परंपरा पास पड़ोसी ऐसे बहानों को बनाकर उस महिला को सपना पूरा करने से रोक देते हैं।

    यह रूढ़िवादी सोच व्यक्ति के अंदर घर कर जाती है की वह चाह कर भी अपने सपनों को अपने सीखने की उम्र पर ना सीखने की वजह से छोड़ देता है समाज में बुजुर्ग व्यक्ति इसका सबसे बड़ा उदाहरण होता है बुजुर्ग व्यक्ति चाहतें हैं कि वह भी कुछ करें परंतु समाज और परिवार वाले बुजुर्ग व्यक्तियों को बूढ़ा कहकर उन्हें कमजोर महसूस कराते हैं जिस वजह से बुजुर्ग व्यक्ति चाह कर भी अपने मन की जिंदगी को अपनी पसंद के कार्य न कर पाने की वजह से बहुत दुखी हो जाते हैं ऐसे व्यक्तियों को अपना जीवन बोझ लगने लगता है।

    यदि मनुष्य इस बात को सही तरीके से समझ जाए कि किसी भी कार्य को करने या सीखने की कोई उम्र नहीं होती है तो व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर तरीके से जीने लगेगा और शायद हम अपने जीवन में विकास कर जायेंगे ।

    एक तरह से व्यक्ति जब समझ जाएगा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती तो व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य भी पूरा कर सकेगा।

    मनुष्य इस रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलकर अंदर से मज़बूत और आत्मविश्वासी बन जाता है कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती यह कथन ही व्यक्ति के अंदर ऊर्जा भर देता है।

    जीवन का अर्थ भी यही है की हमें जीवन के हर पल में और उम्र के हर पड़ाव पर नई-नई चीज सीखनी चाहिए। चीजों को सीखने की आदत इंसान के बौद्धिक विकास को बढ़ावा भी देती है इस तरह हम सीखने के नए मायने भी समझ सकेंगे और जीवन का अर्थ सुख से नहीं बल्कि नई तकनीक को सीखने से है।

    बदलती तकनीक हमारे जीवन के नजरिए को भी बदल रही है तो फिर इन्सानों को भी सीखने की उम्र क्यों होती है। इस नजरिए को समझना होगा और खुद को समाज द्वारा और परिवार द्वारा बनाए दायरों से बाहर निकल कर एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा।

    आज के वक्त में नई चीज या तकनीक के बारे में जानना भी महत्वपूर्ण हो चुका है तो ऐसे में व्यक्ति स्वयं के पास मौजूद तकनीक से भी बहुत कुछ सीख सकता है।

    सीखने की कोई उम्र नहीं होती इसका मतलब बहुत से लोग गलत सोच से भी अंदाजा लगा बैठते हैं और स्वयं को नुक्सान भी पहुंचा देते हैं इसलिए व्यक्ति को सतर्क रहना भी. सीखना होगा ।

    अगर किसी भी उम्र में है हम कुछ भी नया सीख सकते हैं कार्य कर सकते हैं तो इससे व्यक्ति को मानसिक मजबूती भी मिलती है और आजादी अनुभव होने लगती है जब व्यक्ति को अपने सपनों को पूरा करने का उद्देश्य मिलता है कठिनाइयां आने पर भी वह इंसान आगे की तरफ बढ़ता रहता है।

    हर व्यक्ति के सीखने की उम्र का मापदंड न होने पर व्यक्ति रचनात्मक कार्यों में सफलता प्राप्त कर लेता है और अपनी जिम्मेदारियां को भी समझने लगता है।

    आपने ऐसे व्यक्ति भी देखे होंगे जो हर वक्त चिड़चिड़े स्वभाव में रहते हैं दरअसल ऐसे व्यक्तियों की मानसिक दशा समाज और परिवार के बनाए गए नियमों की वजह से बिगड़ चुकी होती है ऐसे व्यक्तियों को क्या अच्छा लगता है किस कार्य को करने से ख़ुशी मिलती है यह कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की यदि ऐसे व्यक्तियों को कुछ भी सीखने की आजादी दे दी जाए तो वह व्यक्ति भी शांत और संतुष्ट होकर रहना सीख जाएंगे।

    हमारे समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिन्हें एक दूसरे के कार्यों को देखने की और व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्यों में कमी निकालने की बुरी आदत होती हैं

    समाज और परिवार की सोच व्यक्ति को नए कार्य सीखने की उम्र से नहीं होता बल्कि हमारी निम्न स्तर मानसिकता की वजह से होता है।

    अतः बदलते समय के साथ मनुष्य को अपनी सोच भी बदलनी होगी और स्वयं से सवाल जवाब भी करना होगा क्या हमारे जीवन का उद्देश्य है केबल सुख पाना और झूठी शान दिखाना ही होता है तो जवाब होगा नहीं।

    मनुष्य के अंदर असीम शक्तियां हैं यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार अपनी शक्तियों के आधार पर नई चीजों को सीखता है तो वह जीवन के अर्थ को समझ कर नई खोज भी कर सकता है जो कि मनुष्य जाति के लिए फायदेमंद ही साबित हो सकती है।

    इसलिए हर उम्र सीखने की होती है मनुष्य को यह बात समझते हुए दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए और व्यक्तियों को आगे बढ़ने में प्रेरित करना चहिए एक व्यक्ति अपनी सोच से पहचाना जाता है व्यक्ति अपने कार्यों के पहचान जाता है हमें समझना होगा इंसान की बढ़ती उम्र सिर्फ एक नंबर है उसके अलावा कुछ नहीं।