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  • लक्ष्य प्राप्त करना सिखिए

    हर व्यक्ति कुछ बड़ा करना चाहता है पर हममें से कई व्यक्ति सिर्फ सोचते ही रहते हैं और आजकल आजकल करते हुए समय बर्बाद करने में लगे रहते हैं।

    हममें से कुछ व्यक्ति अपने जीवन में कुछ बड़ा करने की चाहत रखते हैं ।कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसके बारे में सोचते हैं वैसे भी कहा। गया है सोचो तो कुछ बड़ा ही सोचो।

    एक व्यक्ति है जो कि कुछ बड़ा करना चाहता है कुछ बड़ा करने की सोचते हुए अपने जीवन में आने वाली छोटी बड़ी समस्याओं से जूझता है पर क्या उसके जीवन में सिर्फ वही एक काम है ऐसा बिल्कुल नहीं है हर किसी के जीवन में कुछ समस्याएं भी होती हैं जिससे लड़ते हुए जो व्यक्ति आगे निकल जाता है वहीं अपने जीवन में कुछ बड़ा कर जाता है और कुछ लोग जीवन भर समस्याओं मे घिरे रह जाते हैं ।

    सबसे पहले हमें यह समझना होगा कुछ बड़ा करने के लिए हमें बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। हमने जो अपना लक्ष्य बनाया है वह लक्ष्य एक या दो रातों में नहीं मिल जाएगा बल्कि लंबे समय तक अपने लक्ष्य के लिए कठिन प्रयास करना होगा और उसके लिए सबसे पहले हमें अपने आरामदायक जीवन को त्यागना पड़ेगा।

    कभी-कभी हम किसी को देखकर उसके जैसा बनना चाहते हैं । हमें बेहतर तरीके से समझना होगा क्या वाकई में हम कुछ करना चाहते हैं या हमारे अंदर की सिर्फ एक ज़िद करने की आदत है।

    लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें कुछ नियम बनाने होंगे और नियमों को लगातार जारी रखना होगा इनमें से कुछ नियम

    consistency (लगातार कोशिश करना)

    कंसिस्टेंसी क्या होती है सबसे पहले हमें समझना होगा जब किसी काम को लगातार करते हैं तो यही कंसिस्टेंसी कहलाता है । किसी भी बड़े काम को करने के लिए उस कार्य को लगातार करते रहना चाहिए ।कंसिस्टेंसी की वजह से हम किसी कार्य को करने में बेहतर होते चले जाते हैं।

    लेकिन कंसिस्टेंसी में कभी-कभी इंसान ऊपर उठता है और नीचे गिरता भी है पर जो व्यक्ति सही मायनों में कुछ बड़ा करना चाहते हैं वह इस सबसे डरते नहीं बल्कि उठते गिरते आगे बढ़ते जाते हैं। इस प्रकार हमें यह भी समझना होगा किसी भी बड़े काम करने में इंसान एक बार में ही सक्सेस नहीं हो सकते।

    patience

    आज के युवाओं को कुछ भी बड़ा काम करने के लिए सबसे पहले पेशेंस रखना सीखना होगा जितना पेशेंस व्यक्ति के अंदर होगा वह उसको काम करने में उतना ही सहायता देगा।

    कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके अंदर पेशेंस की भारी कमी होती है इसकी वजह से वह अपने काम के बीच में आने वाली रुकावटों को देखकर ही घबरा जाता है और अपने बड़े काम को करने के सपने को पूरा नहीं कर पाता।

    इसलिए बड़े काम को करने की सबसे दूसरी महत्वपूर्ण चीज पेशेंस होना जरूरी है क्योंकि बिना पेशेंस के हम कुछ ही समय में अपने कुछ बड़ा करने की चाहत को खत्म कर देंगे।

    Failure

    किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने में समय लगता है लक्ष्य प्राप्त करने के दौरान कभी-कभी फेलियर का सामना भी करना पड़ता है फेलियर का सामना करते वक्त जो व्यक्ति घबराते नहीं बल्कि फेलियर का डटकर सामना करते हैं।

    लक्ष्य को हासिल करने के दौरान फेलियर का सामना करना भी व्यक्ति को दिमागी तौर पर मजबूत बनाता है जोकि उसके लिए फायदेमंद साबित होता है क्योंकि फैलियर होने पर भी हमें अनुभव मिलते हैं और यही अनुभव हमारे जीवन में हमें आगे बढ़ने का मौक़ा भी देते हैं।

    positive soch

    लक्ष्य प्राप्त करने के वक्त में व्यक्ति को अपने दिमाग में नकारात्मकता को निकालना होगा क्योंकि एक नकारात्मक सोच ही हमारे पूरे दिमाग को खराब कर देती है और इस तरह हम अपने बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने में रुचि नहीं लेते ।

    दिमाग को पॉजिटिव रखना सीखना होगा क्योंकि हमारा दिमाग जितना सकारात्मक रवैया रखेगा उतना ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में उत्साहित रहेंगे।

    लक्ष्य प्राप्त करने में छोटी बड़ी बाधाएं आती हैं अगर व्यक्ति की सोच सकारात्मक होगी तो वह हर बड़ी से बड़ी बाधा में भी अच्छा प्रर्दशन कर सकता है और मुश्किलों में भी अवसर ढूंढ निकालेगा और सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कभी भी हताश नहीं होता क्योंकि सकारात्मक सोच से व्यक्ति को साहस मिलता है।

    अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में व्यक्ति को दृढ़ निश्चयि होना चाहिए क्योंकि इंसान को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के दौरान अच्छे बुरे समय को भी देखना पड़ता है

    लोगों द्वारा उपहास भी उड़ाया जाता है ऐसे में व्यक्ति का साहसी सकारात्मक होना और दृढ़ निश्चयि होना जरूरी होता है।

    लक्ष्य प्राप्त करने में व्यक्ति को बहुत-कुछ अच्छे बुरे अनुभव मिलते हैं कभी-कभी व्यक्ति हार मान लेता है हतास हो जाता है इस तरह की रुकावटें आती हैं लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में और जो व्यक्ति इन सब रूकावटों से ऊपर उठ जाता है वही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

  • क्रोधित स्वभाव और हंसमुख स्वभाव।

    मनुष्य फितरत ही ऐसी है कि वह नकारात्मक बातों पर जल्दी क्रोधित होकर अपना आपा खो देता है। हमारे दिमाग में एक नकारात्मक बात हर अच्छी बात पर शक करने लगती है।

    अचानक कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति के क्रोधित स्वभाव के कारण हमारा भी दिमाग खराब होता जाता है।

    कुछ व्यक्ति झगड़ालू प्रवृत्ति के ईर्षा प्रवृत्ति के और कुछ शक्की मिजाज के होते हैं ऐसे व्यक्तियों की सोच नकारात्मक होती है ऐसे व्यक्तियों का पूरे दिन बात बात पर लड़ाई करना इनकी आदत बन चुका होता है।

    नकारात्मक व्यक्तियों को किसी अन्य व्यक्ति का हंसना बोलना और उसका जरा सा भी सफल होना अच्छा नहीं लगता। नकारात्मक व्यक्तियों की सोच हर वक्त दूसरों के बारे में बुरा सोचना आदत बन जाता है और दूसरों की बुराई करना इन्हें बहुत अच्छा लगता है।

    अपने क्रोधित स्वभाव के कारण यह स्वयं अपने जीवन में औरों से बहुत पीछे रह जाते हैं। इस कारण इनके व्यवहार में नकारात्मकता साफ झलकती है।

    नकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपने जीवन की हर असफलता को दूसरों के सर मढ़ता है और अपनी नाकामियों को छुपाता भी है।

    नकारात्मक होना कमजोर मानसिकता की पहचान है नकारात्मक व्यक्ति अपने जीवन में समस्याओं से लड़ना ना चाह कर आलस को अपनाने लगते हैं।

    दूसरी तरफ हंसमुख स्वभाव का सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हमेशा दूसरों का भला सोचता है और दूसरों की मदद करने में आगे रहता है।

    सकारात्मक सोच के कारण ऐसे व्यक्तियों की समाज में अलग ही पहचान होती है और इनके सामाजिक संबंध अच्छे रहते हैं।

    हंसमुख स्वभाव के कारण व्यक्ति की सफलता भी निश्चित होती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर समस्या से निपटने का हौसला रखते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव और हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति नकारात्मक स्वभाव के व्यक्ति से दूर रहने में ही अपनी भलाई जानता है और इसी वजह से हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति क्रोधित स्वभाव के व्यक्तियों की बातों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते।

    हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति जानता है शांति पाने के लिए बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शांत रहना वह जानता है की हर बात का जवाब नहीं दिया जाता कुछ फालतू की बातों को जाने दो।

    बहस में ना पड़कर अपने समय को व्यर्थ ना करके ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए एक नई सोच को अपनाते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को नहीं देखता बल्कि साहस के साथ अपनी हर परेशानी में एक अवसर ढूंढता है।

    हसमुख स्वभाव के व्यक्ति की मानसिक स्थिति मजबूत होने की वजह से वह अपने पूरे जीवन में हर वक्त खुश और शांति महसूस करता है।

    इसलिए हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपना रवैया सकारात्मक बनाएं या नकारात्मक।

    सकारात्मक व्यवहार मनुष्य को नए नए अवसर प्रदान करता है।

  • कण कण में भगवान

    आस्था से और विश्वास से भरा हुआ व्यक्ति अपने चारों भगवान की बनाई हुई इस दुनिया के हर कण में प्रभु को पाता है और ऐसे व्यक्ति का विश्वास कहता है की संसार के हर कण मे भगवान हैं।

    ऐसी कई कथाएं प्रचलित हैं जब भक्त को भगवान के हर कण मे दर्शन हुए हैं।

    प्राचीन काल में एक समय की बात है धर्मकेतु नाम के राजा थे राजा को अपने राजा होने का उनके वैभव और शक्ति का बहुत ही अभिमान था इस कारण राजा धर्मकेतु गरीबों को हेय दृष्टि से देखते थे और गरीबों की दुर्दशा का मज़ाक़ बनाते।

    एक बार की बात है राजा धर्मकेतु के महल में एक तपस्वी साधु आए। साधु को देखकर राजा धर्मकेतु ने पहले तो क्रोध में देखा और फिर क्रोधित स्वर में साधु महाराज से कहा कि हे साधु तुम्हारे पास मुझे देने के लिए ऐसा क्या खास है जो तुम मेरे महल में आ गए।

    तपस्वी साधु राजा द्वारा उड़ाए गए उपहास को सहन करके और चुपचाप राजा के महल से वापस लौट गए।

    रात्रि के वक्त राजा ने स्वप्न देखा स्वप्न में राजा ने अपने महल को खाक होते देखा। महल के धूल में बदलने के बाद तपस्वी साधु को भी देखा तपस्वी साधु के पीछे भगवान विष्णु भी खड़े दिखाई दिए ।साधु मौन रूप में खड़े खड़े भगवान के चरणों की तरफ संकेत कर रहे थे की तभी राजा की आंख खुल गई। अजीब सा सपना देखने के कारण राजा धर्मकेतु भयभीत होकर कांप रहा था ।

    राजा को पिछले दिन की बात याद आ गई जब उसने तपस्वी साधु को बेइज्जत किया और साधु का उपहास उड़ाया था। राजा धर्मकेतु समझ गया कि वह तपस्वी साधु कोई साधारण साधु नहीं था बल्कि उस साधु के अंदर स्वयं भगवान विष्णु जी का निवास है । यह सोच समझ कर और अपने किए हुए व्यवहार पर अफसोस करते हुए राजा धर्म केतु नंगे पैर उस तपस्वी साधु की कुटिया की तरफ भागने लगा और कुटिया पहुंचकर तपस्वी साधु के चरणों में सर रख दिया ।

    राजा धर्मकेतु तपस्वी साधु से अपने किए गए बुरे व्यवहार के लिए माफी मांगने लगा और तपस्वी साधु से कहने लगा साधु महाराज मैं आपके दिव्य रूप को देख चुका हूं और मुझे आपके अंदर श्री विष्णु जी के दर्शन हुए।

    इस पर तपस्वी साधु ने कहा हे राजा तुम जिस दिन हर जीव जंतु में हर प्राणी में और संसार के हर कण में प्रभु के दर्शन देखना सीख जाओगे उस दिन तुम एक सच्चे इंसान बन जाओगे और मानव कल्याण के,जीव कल्याण के हित के बारे में भी भला सोचने लगोगे और इस तरह तुम्हारा भी कल्याण होगा।

    तपस्वी साधु से यह वचन सुनकर राजा धर्मकेतु का उस दिन के बाद से जीवन बदल गया और जीवन के प्रति नजरिया भी बदल गया ।

    अब धर्मकेतू राजा गरीबों के कल्याण की सोचने लगे ,अपने राज्य के विकास के बारे में भी अच्छा सोचने लगा।

    इस कहानी से हमें यह समझ आता है कि मनुष्य को हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए बल्कि अपने अलावा सभी जीव जंतुओं के प्रति इंसानों के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।

    हर कण में भगवान है यह सोचकर हमें इस प्रकृति का भी धन्यवाद कहना चाहिए जो हमारे जीवन को सरलता और सुगमता से जीने में सहायक है ।

  • इंसान के दो चेहरे

    हमारे सामने देखने में एक इंसान होता है पर असल में उस इंसान की दो चेहरे होते हैं और हर व्यक्ति दो चेहरे रखता है।

    हम देखते हैं कुछ इंसान हर वक्त खुशमिजाज रहते हैं ।उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो जैसे की उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है।

    पर सच तो यह होता है कि व्यक्ति अपने चेहरे को हंसमुख बनाए रखता है जिस कारण हम उसके चेहरे के पीछे छुपी हुई सच्चाई को समझ नहीं पाते।

    कुछ मनुष्य के कर्मों से हम उनके बारे में कई प्रतिक्रिया बना लेते हैं और इसी आधार पर हम उसके बारे में अपने दिमाग में उसके रूप को भी समझने लगते हैं पर जब कभी भी वह इंसान अपने कर्मों से कुछ अलग करने लगता हैं तो दूसरे व्यक्तियों के मन मे उस व्यक्ति की बनाईं हुई शख्सियत को देखकर हम उस व्यक्ति से नफ़रत करने लगते हैं ।

    हम यह भूल जाते हैं कि शायद उस व्यक्ति की भी कुछ समस्याएं होंगी जिस कारण उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना पड़ा।

    वहीं कुछ व्यक्ति अपने दूसरे रूप को समाज से छुपाते हैं ।जैसे की कुछ व्यक्ति समाज में दयालु भाव को रखते हैं पर असल जीवन में वह काफी क्रोधित स्वभाव के होते हैं और समाज में अपने क्रोधित स्वभाव को इसलिए छुपाते हैं ताकि उनके दयालु भाव को देखकर जो उनकी समाज में प्रतिष्ठा है वह कहीं धूमिल ना पड़ जाए।

    इसी तरह कुछ व्यक्ति कम बातचीत करने वाले समाज से कम मिलने जुलने वाले होते हैं । ऐसे व्यक्ति हमें घमंडी और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के लगते हैं जबकि वह बहुत ही दयालु प्रवृत्ति के होते हैं।

    इसलिए हमें हर इंसान को उसके द्वारा किए गए व्यवहार से उसके प्रति धारणाएं नहीं बनानी चाहिए बल्कि हमें हर इंसान के चेहरे के पीछे छुपे दूसरे चेहरे को भी देखने की कशिश करनी चाहिए।

    इसी पर आधारित एक छोटी सी कहानी है।

    एक साहूकार था जिसके पास बहुत जमीन थी। वह साहूकार स्वभाव से कम बोलता था और लोगों से बात भी तभी करता जब उसको कोई काम पड़ता उसके इस व्यवहार की वजह से आसपास के व्यक्ति उसको घमंडी और मतलबी समझते थे।

    घमंडी और मतलबी समझने के कारण उस साहूकार से कोई व्यक्ति ज्यादा नहीं बोलता था।

    एक बार की बात है साहूकार की जमीन पर आम के बहुत सारे वृक्ष लगे थे और उन वृक्षों पर बहुत सारे आम के फल भी थे ।वृक्षों पर लगे आम के फलो को देखकर एक दिन कुछ बच्चे वृक्षों पर चढ़कर आम तोड़ने लगे की तभी साहूकार वहां आ गया ।साहूकार को आते देख बच्चे डर गए और इस कारण बच्चे वृक्ष पर से नीचे गिर पड़े बच्चों को नीचे गिरने की वजह से चोट भी आईं।

    साहूकार ने जल्दी से बच्चों के लिए इलाज मुहैया करवाया और बच्चों की सही से देखभाल भी की ।जब यह बात बच्चों के परिवारजन को पता चली तो सभी उस साहूकार के प्रति मन में बनाई घमंडी और मतलबी साहूकार के रूप को गलत मानने लगे और उसे दिन उन्हें समझ में आया जिस साहूकार को वे घमंडी और मतलबी समझते थे वह साहूकार तो बहुत दयालु निकला।

    यह कहानी हमें समझाने के लिए है कि हमें किसी भी व्यक्ति को उसके व्यवहार से नहीं समझना चाहिए बल्कि हमें उसके असल रूप को देखने की कोशिश करनी चाहिए।

    अगर हम केवल सफल लोगों के प्रति सम्मान रखते हैं और गरीब लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं तो इसमें हमारी ही गलती है।

    समाज में एक पुरानी धारणा है कि जो व्यक्ति सफल है वह व्यक्ति सब की नजरों में होशियार और समझदार है और अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में असफल है तो उसका सभी मजाक उड़ाते हैं।

    समाज की पुरानी धारणाओं से बाहर निकल कर हमें असली सच को समझना होगा। जब हम सच को देखने की कोशिश करने लगते हैं तब हमें हर व्यक्ति के दो चेहरे साफ साफ दिखाई देगा।

  • बहुला चतुर्थी

    बहुला चतुर्थी हिन्दी महीनों के अनुसार भादो महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ती है। बहुला चतुर्थी का व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र ,अच्छी सेहत और सुरक्षा के लिए रखतीं हैं।

    इस व्रत में भगवान गणेशजी की पूजा होती है और साथ में बहुला गाय और बछड़े की भी पूजा की जाती है।

    गोधूलि बेला(शाम का समय)

    बहुला व्रत में पूजा कर ने का समय गोधूलि बेला होता है शाम के लगभग 4से5 बजे के वक्त में इस पूजा को कर लेना चाहिए ।

    पूजा का भोग

    बहुला व्रत में गाय और गाय के बछड़े को गुड और चना खिलाना चाहिए और व्रत रखने वाली महिलाएं भी गुड और चना के भोग से ही अपना व्रत खोलतीं हैं।

    दूध और दूध से बने पदार्थ का त्याग।

    बहुला चतुर्थी के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को दूध और दूध से बने पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए व्रत की मान्यता है कि इस दिन गाय का दूध नहीं लेना चाहिए बल्कि गाय का दूध गाय के बछड़े को ही पिलाना चाहिए।

    बहुला चतुर्थी व्रत कथा

    भादो महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है ।बहुला चतुर्थी पर माताएं अपनी संतान की सेहत ,सुरक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। व्रत पूजन के समय कथा भी सुनी जाती है।

    पुराणों में कथा के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान विष्णु जी ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया तब स्वर्ग लोक से देवी-देवता भगवान् विष्णु रूप में श्री कृष्ण जी की लीला देखने की चाह रखते थे।

    श्री कृष्ण के सलोने रूप और नटखट लीलाओं को देखने के लिए अनेकों देवी देवताओं का मन करता और गोपियों, ग्वालों का रूप धारण करके रासलीला में आ जाते ।

    इसी प्रकार स्वर्ग की कामधेनु के मन में भी प्रभु श्री कृष्ण के अद्भुत रूप और लीला को देखने की और प्रभु की सेवा करने की प्रबल इच्छा हुई। अपनी इस प्रबल इच्छा को पूरी करने के लिए कामधेनु ने बहुला नाम की गाय का रूप धारण करके नंदबाबा की गौशाला में आ गई।

    श्री कृष्ण जी का बहुला गाय से अधिक स्नेह और मोह जुड़ गया था।

    एक दिन की बात है श्री कृष्ण जी ने सत्य निष्ठा बाद धर्म पालन की परीक्षा लेने का विचार बनाया और वह गौशाला में बंधी सभी गायों को लेकर वन में घास चराने ले गए।

    वन में घास चरते-चरते बहुला गाय बहुत दूर निकल गई और वह अपने झुंड से बिछड़ गई भगवान श्री कृष्ण जी ने यह देखकर हिंसक सिंह का रूप धारण कर लिया और बहुला गाय के आगे जाकर रास्ता रोक लिया ।

    बहुला गाय अपने रास्ते में हिंसक सिंह को देख कर घबरा गई और घबराते हुए बोली की वनराज सिंह मेरा बछड़ा घर पर है मुझे एक बार अपने बछड़े से भेंट करके आने दो और मै आपको वचन देती हूं बछड़े से मिलकर वापस आपके पास आ जाऊंगी।

    श्री कृष्ण रूप में सिंह ने उसे बहुला गाय को जाने दिया और बहुला गाय की सत्य निष्ठा को देखकर श्री कृष्ण जी अपने रूप में आ गए और प्रसन्न होकर बहुला गाय को आशीर्वाद दिया।

    तभी से बहुला गाय और बछड़े के लिए व्रत रखने की शुरुआत हुई ।

  • बुरे वक्त में भी अच्छा सोचो।

    मनुष्य जीवन में समय का एक जैसे रहना मुश्किल है ।जैसे मनुष्य बचपन से बाहर निकल कर युवावस्था में कदम रखता है युवावस्था से व्यक्ति वयस्क आयु में बढ़ता है तो जैसे मनुष्य का रूप बदलता है ठीक उसी प्रकार समय भी सदा एक सा नहीं रहता ।

    हम मनुष्य सदा समय को अपनी परिस्थितियों के मुताबिक बनाना चाहते हैं परंतु ऐसा नहीं हो सकता। मनुष्य के जीवन में परेशानियां दुख देती है। कभी-कभी उन परेशानियों में हम घिर जाते हैं और फिर समय को ही दोष देने लगते हैं।

    अच्छा समय आने की उम्मीद में इंसान हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है कि जब समय अच्छा आएगा तभी उस फलाने काम को करूंगा और इसी सोच में बहुत समय व्यर्थ कर देता है ।

    पर क्या कभी हमने सोचा है परेशानियों का आना जाना लगा रहता है और इसी वक्त में अगर हम कुछ अच्छा सोच कर आगे बढ़े तो शायद हम अपने इस बुरे समय को अच्छे समय में बदल सकें।

    यह पुरानी सोच है कि हमारा बुरा हाल होने की वजह किसी की बुरी नजर लगना है जबकि इस तरह की सोच अंधविश्वास की पहचान मानी गई है।

    अगर हम अपने पूरे विश्वास के साथ और सच्ची लगन और मेहनत के साथ अपने बुरे समय में भी कार्य को लगातार करते रहे और लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करने से ना रुके तो हम बदलाव ला सकते हैं।

    परिस्थितियां कभी भी मनुष्य के अनुकूल नहीं रहती बल्कि हमें परिस्थितियों के अनुकूल रहना सीखना चाहिए और जिस अच्छे समय के बारे में सोचते हैं वह अच्छा समय कभी नहीं आता । वह अच्छा समय हमेशा सपनों में ही रहता है।

    मनुष्य को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा और इसी अच्छी सोच के बदलाव के साथ सर्वप्रथम स्वयं को बदलना होगा इसलिए अपनी सोच को बदलना होगा।

    बदलते समय के साथ आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति को अपने जीवन में तरक्की पाने के लिए खुद से शुरूवात करनी होगी ना कि किसी भी तरह की मदद कीउम्मीद रखनी चाहिए ।

    बुरे समय में इंसान को साथ देने वाला भी कोई नहीं होता इस कारण मनुष्य का सोचने का तरीका भी नकारात्मक हो जाता है। और वह अपने बुरे समय में असहाय महसूस करने लगता है।

    बुरे समय में व्यक्ति की भविष्य को लेकर जो भी योजनाऐं होती हैं वह भी विफल होते हुए दिखने लगतीं हैं। ऐसे में व्यक्ति को समझदारी के साथ अपने हर कदम को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा ।

    समाज भी हमें पुरानी समझ सिखाता है कि जब आपका समय खराब चल रहा हो तो कोई भी नया काम ना करो लेकिन अब हमें इस रूढ़िवादी सोच से आगे निकल कर खुद को समझाना होगा और समाज को भी अग्रसर करने में सहयोग देना होगा।

    क्योंकि समाज की नकारात्मक सोच का फर्क हर व्यक्ति की मानसिकता पर पड़ता है ।

    सोचो जरा अगर स्वतंत्रता सेनानी देश के आजाद होने से पहले के हालातो से ना लड़ते तो क्या स्वतंत्रता सैनानी देश को अंग्रेजों से आजादी दिला पाते।

    देश को आजादी मिलना एक सबसे बड़ा उदाहरण है कि समय कितना ही खराब क्यों ना हो इंसान अगर अपने बुरे वक्त से साहस के साथ लड़ता है तो वहअपने लिए एक अच्छा समय लाने की हिम्मत रखता है और खुद को आजादी दिला सकता है।

    समय हमेशा एक जैसा ही होता है जब मनुष्य का कोई भी काम नहीं बनता है तब ऐसे में समय को ही दोष देना इंसानी फितरत होती है और हमारा दिमाग भी समय को अच्छा और बुरा समझ ने लगता है।

    अतः हमें समझना होगा हमारी अच्छी सोच ही हमें बुरे वक्त से निकलकर हमें अच्छा समय दे सकती है। इसलिए अपने बुरे समय में घबराना नहीं चाहिए बल्कि साहस के साथ अच्छे समय के लिए लगातार कोशिश करनी चाहिए और मन में विश्वास रखना चाहिए कि एक दिन हम अपनी कोशिशें से अच्छा समय ला सकते हैं।

  • सच्चा सुख संसाधनों में नहीं स्वयं में है

    मनुष्य अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सुख संसाधनों की पूर्ति करने में नष्ट कर देता है क्योंकि उसको लगता है महंगे संसाधनों से सुख मिलता है जबकि यह बिल्कुल गलत सोच है ।

    मनुष्य जीवन भर सुख के पीछे भागता है और सुख से संबंधित हर उस चीज को पाना चाहता है जो उसे सुख दे सके पर जब मनुष्य उस चीज को पा लेने के बाद भी सुख महसूस नहीं करता तो और चीजों को पाने की अभिलाषा मनुष्य के अंदर बढ़ती जाती है।

    सुख की चाहत में मनुष्य आलीशान घर बनाता है, महंगे महंगे जेवर, महंगे महंगे कपड़े और विदेशों में घूमने जाना ।यह सब कुछ सुख हासिल करने की चाहत में इंसान करता है मगर फिर भी उसे सुख महसूस नहीं होता बल्कि समस्या टेंशन और सोच विचार में मनुष्य दब जाता है ।

    समाज में ऐसे कई लोग देखे हैं जो की रईस होते हैं ऐसे व्यक्तियों के बड़े-बड़े लोगों से मिलना जुलना रहता है। यहां तक कि अमीरी दिखाने के लिए लोग सोने चांदी की बर्तनों में खाना खाते हैं जबकि उनके असल जीवन में सुकून और शांति नहीं होती।

    मनुष्य अपने जीवन में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा को भी हासिल कर लेता है और समाज में एक प्रतिष्ठित आदमी बन जाता है इतना सब होने के बाद भी इंसान खुश नहीं होता।

    यहां तक कि मनुष्य अपने बच्चों को जान पहचान के जरिए उनके पैरों पर खड़ा करने में मदद करता है और बहुत हद तक अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कर भी लेता है जीवन में सुख की कमी नहीं रहती और दुख दूर-दूर तक नहीं दिखता इस सब के बाद भी मनुष्य को सच्ची खुशी हासिल नहीं होती।

    मनुष्य को सच्ची खुशी न मिलने का एक मुख्य कारण यह भी है कि मनुष्य हमेशा सुख को अपने बाहरी दुनिया में तलाशता है जबकि सच्चा सुख तो मनुष्य के अंदर ही छुपा हुआ होता है ।

    मनुष्य जिस सच्चे सुख की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है वह सच्चा सुख महंगी से महंगी गाड़ी वेश कीमती संसाधनों में नहीं मिलता यह सच्चा सुख मनुष्य को अपने अंदर खोजना पड़ता है।

    हमने ऐसे कई मनुष्य देखे होंगे जिनके पास अपार धन दौलत होती है फिर भी उनके जीवन में शांति नहीं मिलती और हमने ऐसे भी व्यक्ति देखे हैं जिनके पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसे व्यक्ति मस्त रहते हैं क्योंकि उनके पास वास्तविक शांति होती है ।

    मनुष्य को जब वास्तविक शांति का ज्ञान हो जाता है तब वह बेहतर तरीके से समझ जाता है की सच्ची खुशी मंहगे संसाधनों में नहीं बल्कि हमारे अंदर ही छुपी होती है।

    संसाधनों में पड़कर व्यक्ति एक ऐसी दुनिया में जीने लगता है जिस बनावटी दुनिया का निर्माण सिर्फ दिखावे के लिए इंसानों ने किया है।

    दिखावे की दुनिया का निर्माण करके इंसान उसमें स्वयं फंस चुका है इस कारण व्यक्ति प्राकृतिक दुनिया जोकि भगवान की बनाई दुनिया है उसका स्वाद लेना भूल जाता है और इस कारण वह व्यक्ति सच्चे सुख को भी समझने में देर करता है।

    मनुष्य को किसी कार्य को करने से पहले दिखावे की दुनिया से पूछना नहीं पड़े और कोई भी कदम उठाने से पहले उसके मन में किसी भी तरह का डर नहीं होगा उस दिन मनुष्य को सच्चे सुख की अनुभूति होती है।

    जब व्यक्ति आजाद मन से कोई भी कार्य करता है तब उसे जो खुशी मिलती है वहीं खुशी व्यक्ति के लिए सच्चा सुख साबित होती है।

    सही मायने में सच्चा सुख परिवार के साथ रहने और एक साथ खाना खाने में जो है वह किसी महंगे संसाधन में नहीं मिलेगा।

    सच्चे सुखी कोई कीमत नहीं होती और यह हर किसी को ना मिले ऐसा भी नहीं है । सच्चे सुख की तलाश करने वालों को अपने अंदर ही सच्चे सुख को टटोलना होगा।

  • अपनी पहचान बनाना सीखें

    धरती पर इंसान जीवन की सारी प्रक्रियाओं को पूरा करके मृत्यु की तरफ बढ़ता है और एक दिन उसके जीवन की कहानी का अंत भी हो जाता है।

    पर कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है क्या जो मरणोपरांत भी जीवित मनुष्य के दिमाग में हमेशा के लिए जीवित रहे । तो इस सवाल का जवाब जवाब होगा‌ हां।

    कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जो अपने महान कार्यों की वजह से या फिर किसी खास महानता के कारण मरने के हजारों सालों तक हमारे दिमाग में जिंदा रहते हैं ।

    इसी प्रकार कुछ खास लोग जो कि देखने में साधारण शक्ल सूरत वाले होते हैं परंतु फिर भी अपनी अमिट पहचान की वजह से हर व्यक्ति पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

    ऐसे लोगों के जीवन में भी समस्याएं होती हैं परंतु फिर भी ऐसे व्यक्ति हमेशा हंसमुख स्वभाव के ही लगते हैं ऐसे व्यक्तियों को देखने पर ऐसा लगता है जैसे कि इनके जीवन में कोई समस्या है ही नहीं।

    हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति औरों पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में माहिर होते हैं।

    हम में से ज़्यादातर लोग अगर चाहे तो ऐसे लोगों की तरह बन सकते हैं ऐसे लोगों की तरह बनने के लिए हमें कुछ विशेषताएं अपने अंदर बनानी होगी और उसके लिए कोशिश लगातार करनी होती है।

    अपने काम से काम रखें

    जो व्यक्ति समाज में अपनी अलग पहचान बनाते हैं ऐसे व्यक्ति अपने काम से ही काम रखते हैं इन्हें किसी दूसरे के कार्यों में दखल देने की आदत नहीं होती।

    ऐसे व्यक्ति अपने काम पर ही फोकस रखते हैं और अपने काम की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के अंदर अपने काम को सुचारू रूप से और समय पर करने की आदत रहती है। दूसरे व्यक्तियों के काम में दखलअंदाजी न करने के कारण इनका समाज में अपना अलग ही रुतबा होता है।

    ना कहना सीखना

    ऐसे व्यक्ति जो ना कहना जानते हैं ऐसे व्यक्ति दिमागी तौर पर मजबूत होते हैं। इन्हें हर काम को हां कहने की आदत नहीं होती ।ऐसे व्यक्ति हर काम को बेहतर तरीके से समझते हैं और उसके बाद ही हां या ना कहते हैं।

    इसके अलावा यह खुद को अच्छा साबित करने की चाह में हर काम को हां नहीं कहते बल्कि ऐसे व्यक्ति सबसे पहले अपने आप की सुनते हैं इस वजह से यह बहुत से काम को ना कहना भी जरूरी समझते हैं ।

    मौन रहना सबकी सुनना

    अपनी खास पहचान बनाना और अपनी छाप लोगों के मन में छोड़ देना ऐसी विशेषता रखने वाले व्यक्ति ज्यादातर समय मौन ही रहते हैं ऐसे व्यक्तियों को हर वक्त बक-बक करने की आदत नहीं होती ।

    कम बोलने वाले और मौन रहने वाले व्यक्ति एक अच्छे श्रोता होते हैं और यह किसी भी समस्या की बारीकियों को समझने में माहिर होते हैं।

    समय की अहमियत समझना

    जो व्यक्ति सब पर अपनी छाप छोड़ने में माहिर होते हैं उनकी एक सबसे अच्छी आदत यह होती है कि ऐसे व्यक्ति समय की अहमियत को समझते हैं और समय की अहमियत को समझते हुए यह जरूरी काम सबसे पहले करना सही समझते हैं।

    फालतू में समय को बर्बाद करना ऐसे व्यक्ति की आदत नहीं होती । ऐसे व्यक्ति समय की अहमियत समझते हैं । समय की अहमियत समझने वाले व्यक्ति अपने खुद के लिए और समाज की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करते हैं।

    खुद को महत्व देना

    सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं का महत्व समझना होगा जब व्यक्ति खुद के प्रति महत्व को समझने लगता है। इसके बाद महत्व ही आप अपने बारे में अच्छे-बुरे का अर्थ समझ सकेंगे।

    खुद का महत्व समझने वाले व्यक्ति दूसरों की भी इज्जत का ख्याल रखते हैं और खुद की इज्जत को भी जरूरी समझते हैं ।

    ऐसे व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को खुद का उपहास नहीं उड़ाने देते।

    ऐसे व्यक्ति अपनी कमजोरी को भी हर किसी को नहीं बताते । बल्कि अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाते हैं ।

    कम दोस्त रखना

    जो व्यक्ति व्यावहारिक तौर पर अपनी छाप दूसरों पर छोड़ जाने में माहिर होते हैं ऐसे व्यक्तियों के दोस्त भी ज्यादा नहीं होते बस कुछ गिने-चुने ही दोस्त ही इनकी पूरी दुनिया होते हैं।

    ऐसे व्यक्ति अपने दोस्तों को भी अग्रसर होने में मदद करते हैं। अपने दोस्तों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना इनका व्यवहार होता है।

    निष्कर्ष

    अपनी छाप दूसरे व्यक्तियों पर छोड़ने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को हर वक्त खुश रहना सीखना चाहिए चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आपका दोस्ताना रवैया बनाने में मदद करता है। व्यक्ति को स्वयं अपने बारे में हमेशा अच्छा ही सोचना चाहिए और दूसरा से मदद की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए।हर किसी को खुश करने में इंसान खुद को दुखी रखता है इसलिए अपनी वैल्यू बनायें और सबसे पहले खुद को प्राथमिकता देना सीखे ऐसे व्यक्तियों को दोस्त भी बहुत ज्यादा नहीं बनाना अच्छा लगता है बल्कि कुछ गिने चुनें दोस्त जो की अच्छी आदतों से पूर्ण हो ऐसे चुनाव करते हैं ।

    अगर व्यक्ति खुद पर ध्यान देना शुरू कर दे और अपनी बुरी आदतों को खत्म करके स्वयं के अंदर अच्छी आदतों का निर्माण करें तो व्यक्ति सबसे अलग अपनी पहचान बनाने में सफल हो सकता है अपने जीवन में एक दिन कामयाब भी होता है।

  • भक्ति रस में -सूर्य कथा

    भारत देश में लोगों की सुबह अपने भगवान के नाम को लेकर होती है क्योंकि भारत देश में अधिकतर व्यक्ति देवी देवताओं में अपनी गहरी आस्था रखते हैं।

    भगवान सूर्यदेव

    रविवार के दिन भगवान सूर्य देव का दिन माना जाता है। और भगवान सूर्य को जल अर्पण करके अपने जीवन के दुखों को खत्म करने और जीवन मे आए अंधियारे को मिटाने की विनती करते हैं।

    भगवान सूर्य देव से संतान पाने की कामना और संतान की दीर्घायु के लिए भी प्रार्थना की जाती है।

    जो पति-पत्नी अपने जीवन में संतान सुख से वंचित हैं या पुत्र रूप की कामना रखते हैं वे पति पत्नी भी रविवार के दिन भगवान सूर्य देव की उपासना करते हैं और व्रत भी रखते हैं।

    सूर्य देव को प्रिय

    सूर्यदेव को गुड, खिचड़ी और तिल अत्यंत प्रिय हैं अतः भक्तलोग सूर्यदेव को भोग में गुड खिचड़ी और तिल देते हैं।

    सूर्यदेव का प्रिय रंग नारंगी और लाल है। सूर्य देव को गुलाब और गुड़हल के पुष्प अत्यधिक प्रिय हैं।

    भगवान सूर्य देव की कथा

    प्राचीन काल की बात है एक गरीब बुढ़िया सूर्य देव भगवान की भक्त थीं। बुढ़िया अपने घर की साफ सफाई करती और अपने घर के आंगन को गोबर से लीपकर शुद्ध करती ।

    बुढ़िया को बहुत शांति से जीवन यापन करते देख उसकी पड़ोसन उससे हमेशा जलती रहती।

    बुढ़िया उसी पड़ोसन की गाय के गोबर से अपने घर के आंगन को लीपती । एक बार रविवार के दिन पड़ोसन ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया जिस वजह से बुढ़िया को गोबर नहीं मिला और वह अपने आंगन को भी नहीं लीप पाई।

    उस रविवार के दिन बुढ़िया ने उपवास नहीं रखा और न ही सूर्य देव को भोग लगाया।

    रात के वक्त भगवान् सूर्यदेव ने बुढ़िया से सपने में आकर पूछा तुम तो मेरी प्रिय भक्त हो और तुम नियम से मेरे व्रत को रखती हो और मुझे भोग भी लगाती हो परन्तु आज ये नियम कैसे टूटा ।जब सपने में भगवान सूर्य देव ने व्रत ना रखने और भोग न लगाने का कारण पूछा तो इस पर बुढ़िया ने कहा हे प्रभु सूर्य देव मेरी पड़ोसन ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया था जिस कारण मुझे गोबर नहीं मिला और मैं अपने घर के आंगन को लीप नहीं पाई इस वजह से मैं आपका व्रत रखने में और आपका भोग लगाने में असमर्थ थी।

    भगवान सूर्य देव को जब अपनी भक्त के व्रत ना रख पाने का कारण पता चला तो उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें आशीर्वाद से एक गाय देता हूं और यह कहकर भगवान सूर्य देव अंतर्ध्यान हो गए।

    सुबह उठकर बुढ़िया को सपने में भगवान सूर्य देव द्वारा बोले गए कथन की याद आई तो उसने अपने घर के आंगन में जाकर देखा। घर के आंगन में वाकई में एक गाय बंधी हुई थी बुढ़िया गाय को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई।

    भगवान सूर्य देव के आशीर्वाद से प्राप्त गाय एक चमत्कारी गाय थी । वह गाय प्रतिदिन सुबह के वक्त सोने का गोबर करती थी बुढ़िया की पड़ोसन ने जब यह देखा तो वह चुपचाप से जाकर सोने के गोबर को उठा लाई और उस जगह अपनी गाय के गोबर को रख आई ।वह पड़ोसन प्रतिदिन ऐसा ही करने लगी और इस तरह पड़ोसन अमीर होती गई।

    बुढ़िया को गाय के सोने के गोबर वाली बात नहीं पता थीं। सूर्यदेव ने जब प्रतिदिन पड़ोसन को सोने के गोबर की चोरी करते हुए देखा तो उन्होंने एक दिन बहुत तेज आंधी चलाई जिस कारण बुढ़िया ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया और अगली सुबह बुढ़िया ने गाय के सोने के गोबर को देखा तो वह चकित रह गई।

    गाय के सोने के गोबर की वजह से बुढ़िया के घर धन-धान्य बढ़ने लगा यह देख पड़ोसन उससे और अधिक जलने लगी। पड़ोसन ने जाकर अपने राज्य के राजा को यह बात बता दी जिससे राजा ने अपने सैनिकों को भेजकर बुढ़िया के यहां से गाय और गाय के बछड़े को लाने को कहा और बुढ़िया को बंदी बनाकर लाने को कह दिया।

    जब राजा ने दूसरे दिन अपने महल में सुबह गाय को सोने का गोबर करते हुए देखा तो राजा अचंभित हो गया। राजा के पास उस गाय के गोबर से धन-धान्य बढ़ता गया और बुढ़िया कैद में दुखी होकर रहने लगी ।

    भगवान सूर्य देव ने अपनी भक्त बुढ़िया को कैद में देखा और गाय को राजा के पास देखा तो सूर्य देव ने राजा से रात्रि में सपने में आकर कहा कि इस गाय को और बुढ़िया को छोड़ देना अन्यथा तुम्हारा सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

    सुबह होने पर राजा को सपने में भगवान सूर्य देव द्वारा कही गई बातें याद आई तो राजा ने बुढ़िया को और उसकी गाय को छोड़ दिया । राजा के आदेश से सैनिकों ने बुढ़िया को उसके घर तक छोड़ दिया।

    इसके बाद राजा ने बुढ़िया की पड़ोसन को दंड दिया और पड़ोसन से बुढ़िया को फिर कभी ना परेशान करने को भी कहा।

    इस तरह बुढ़िया को उसकी गाय प्राप्त हो गई और सूर्य देव जी ने अपनी भक्त बुढ़िया के दुख दूर किये।

  • भक्ति को भगवान का आशीर्वाद

    भक्त और भगवान का रिश्ता बड़ा ही अद्भुत और चमत्कारों से भरा हुआ है। प्राचीन काल से ही भक्त अपने भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कठिन से कठिन तपस्या करता और फलस्वरूप अपने आराध्य को मनाकर अपनी मनोकामनाओं का वरदान प्राप्त करता है ।

    भगवान भी अपने भक्त की कठिन से कठिन तपस्या को देखकर और उसके मन में अपने प्रति आदर भाव को देख कर प्रसन्न हो जाते हैं ।

    भक्त और भगवान से जुड़ी हुई अनंत कथाएं हैं।

    प्राचीन काल में असुर भी देवताओं की कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त करते थे।

    कहानी

    एक बार एक असुर महादेव जी की कठोर तपस्या करने घने जंगलों में गया और और वहां जाकर महादेव जी की तपस्या करने में तल्लीन हो गया।

    तपस्या करते-करते असुर को कई वर्ष बीत गए इस बीच भीषण आपदाएं आईं पर उस असुर की तपस्या मे कोई वाधा नहीं पड़ती।

    समय बीतता गया और असुर ने अपनी तपस्या को खत्म नहीं किया और आखिर में महादेव जी उस असुर की कठोर तपस्या को देखकर प्रसन्न हुए।

    महादेव जी ने असुर से वरदान मांगने को कहा तो इस पर असुर ने निर्भीक और निडरता का वरदान मांगा।

    महादेव जी से असुर निर्भिक और निडरता का वरदान पाकर बहुत ही प्रसन्न हुआ। असुर के अंदर अंहकार और घमंड भी बढ़ता गया असुर तपस्या द्वारा महादेव से मिले वरदान का दुरुपयोग करता गया। असुर गरीब और असहाय लोगों को पीड़ा देने लगा और उनको पीड़ित देखकर असुर बहुत प्रसन्न होता ।जब देवता और ऋषि मुनि भी उसके अत्याचारों से परेशान रहने लगे तब उन्होंने भगवान गणेश जी के पास जाना उचित समझा।

    असुर से लड़ने का और उसको रोकने का जब कोई उपाय नहीं रहा तो सभी देवताओं और ऋषि मुनियों ने भगवान गणेश जी की शरण में जाकर असुर से बचने का उपाय खोजा।

    भगवान गणेश जी ने देवताओं और ऋषि मुनियों की दुःख की व्यथा सुनी। गणेश भगवान ने अपने दिव्य और शक्तिशाली रूप को धारण किया और वक्रतुंड रूप में प्रकट हुए।

    वक्रतुंड रूप में गणेश जी ने शक्तिशाली असुर से युद्ध किया। यह युद्ध काफी वक्त चला युद्ध के दौरान गणेशजी ने अपने वक्रतुंड रूप में असुर के घमंड और अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दिया दिया।

    फल स्वरुप गणेश जी ने असुर को उसकी गलतियों का एहसास दिलाया और उसके अहंकार को बाहर निकाल दिया ।

    असुर में भगवान गणेश जी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगी और स्वयं का आत्मसमर्पण कर दिया।

    वक्रतुंड रूप में भगवान गणेश जी ने असुर की आत्मसमर्पित भावना से खुश होकर असुर को भक्त होने का वरदान दिया और इसी के साथ असुर की भक्ति को भी वरदान मिला।