अभी हाल ही में जंतर मंतर पर छात्रों और सीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा हुए आंदोलन में हमें बहुत कुछ देखने को और सीखने को मिला और काफी अनुभव भी मिला साथी ही एक बहुत बड़ा सबक भी मिला है।
संसद भवन के बाहर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव और जिसकी वजह से मानसून सत्र का पहला दिन हंगामे की वजह से संसद का स्थगित होना राजधानी में लोकतंत्र के दो दृश्य और दोनों ही चिंताजनक स्थिति में दर्शाते हुए दिखाई दिए ।
यह समझने में समस्या है कि नीट पेपर लीक मामले में धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफे को लेकर छात्रों की व्यापक आक्रोश और उस पर सवार विपक्ष राजनीतिक दबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा देना राजनीतिक मजबूरी का परिणाम है या राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हो गया है।
आवश्यकता है परीक्षा सुरक्षा को लेकर सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए और नीट पेपर लीक मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठन किया उसमें पारदर्शिता भी जरूरी क्योंकि प्रश्नप्रत्र की रक्षा करोड़ों युवा छात्रों के विश्वास की रक्षा है।
नीट प्रश्न पत्र लीक मामले को लेकर छात्र और युवाओं में बढ़ता आक्रोश और विरोध-प्रदर्शन सरकार द्वारा तनाव कम करने की दिशा में पहल करना और सरकार की कोशिश नाकाम होना भी स्वयं में एक बड़ा प्रश्न है क्या जेन जी और छात्रों की बीजेपी सरकार से उम्मीद खत्म हो चुकी है।
संसद के अंदर भी स्थिति निराशाजनक ही है जब सदन में सार्थक बहसों के स्थान पर नारेबाजी होने लगे और हंगामे की वजह से सदन का स्थगन की भेंट चढ़ना ऐसे में लोकतंत्र कमजोर सा दिखाई दे रहा है ।
बीते समय में यह सब कुछ हमने देखा और साथ में हमने देखा कि जब सरकार अपनी मनमानी करें तो विपक्ष, छात्र और गुस्साए लोगों द्वारा साथ मिलकर आंदोलन करना, संसद को न चलने देना इस प्रकार के अनैतिक कार्यों की वजह से संतुलन बिगड़ा है।
ऐसे में सरकार को संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए और विपक्ष को भी विरोध करने की भूमिका में न रहकर सरकार के साथ सदन के सफल संचालन की जिम्मेदारी में दायित्व निभाना चाहिए।
दूसरी तरफ ऐसी परीक्षा व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए जहां परीक्षा से जुड़े किसी भी अव्यवहारिक तत्व का पकड़ा जाना निश्चित हो जिस देश की परीक्षा प्रणाली पर युवा छात्रों को भरोसा मिले।