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  • सफलता के नियम

    हर व्यक्ति अपने जीवन में जो वह कार्य कर रहा है उसमें सफल होना चाहता है और सफल होने का यही सपना वह दिन रात देखता रहता है।

    सफलता हर किसी को अच्छी लगती है मनुष्य की पहचान ही सफलता से ही होती है।

    जैसे एक छात्र अच्छे नंबरों से अपनी पूरी क्लास में प्रथम आता है तो यह उस छात्र के लिए सफलता ही कही जाएगी।

    हम सब सफल होने की चाह रखते हैं और सफल होने का सपना हम सब एक दूसरे व्यक्तियों के सफल होने पर ही देखने लगते हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने रोल मॉडल के जैसे ही बनना चाहते हैं और उनके जैसे ही सफल होना चाहते हैं।

    सफलता पाने के लिए न जाने कितने लोग मेहनत करते हैं पर उनमें से कुछ लोग ही सफलता का स्वाद चख पाते हैं।

    क्या कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है कुछ लोग सफल होते जाते हैं तो कुछ ऐसे भी होते हैं जो की असफल हो जाते हैं आखिर इसका क्या कारण होता है।

    सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी कार्य में सफल होने में वक्त लगता है पर यदि आपके पास उस कार्य को देने के लिए वक्त ही नहीं होगा तो आप सफल कैसे हो सकते हैं।

    इसी प्रकार सफल होने के कुछ नियम होते हैं जिन्हें पूरा करने पर हम बहुत कुछ सफल हो भी जाते हैं।

    कोशिश

    किसी भी कार्य में सफल होने में हमको कोशिश करनी होती है यदि हम बातों ही बातों में कार्य करने की सोचते रहेंगे और कोई भी कोशिश नहीं करेंगे तो हमारे कार्य के सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं होगी ।

    मेहनत

    हर कार्य वह चाहे छोटा हो या बड़ा मेहनत मांगता है क्योंकि बिना मेहनत कार्य के होने की उस कार्य के सफल होने की उम्मीद नहीं हो सकती है जब तक व्यक्ति अपने कार्य में जी तोड़ मेहनत नहीं करता और कार्य के सफल होने की झूठी उम्मीद और आस लगाए बैठे रहता है और बहाने बाजी करते रहता है तो ऐसे व्यक्तियों के सफल होने की उम्मीद भी बेकार है।

    तो वही कुछ व्यक्ति कार्य को सफल होने में नसीब और भाग्य की बात करते हैं ऐसे व्यक्तियों को कार्य के असफल होने पर हाथ पर हाथ रखे बैठकर अपनी बर्बादी का तमाशा देखने और रोने की बुरी आदत पड़ चुकी होती है।

    व्यक्ति को समझना होगा कार्य के सफल होने में और असफल होने में नसीब या भाग्य का कुछ लेना-देना नहीं होता बल्कि मेहनत से ही सफल होने के रास्ते पर पहुंचा जा सकता है।

    सही कार्य की सही दिशा

    ज्यादातर व्यक्ति सफलता के सही मार्ग को नहीं समझ पाते । जिस कार्य को आप करना चाहते हैं आपको उस कार्य के दिशा में ही अपने कदम बढ़ाने होंगे होंगे ।

    जिस तरह एक प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं की तलाश करता है जिससे कि उसकी प्यास बुझ सके ।हमें भी समझना चाहिए कि कैसे एक प्यासे ने अपनी प्यास को बुझाने के लिए कुए की दिशा में जाने को ही उचित समझा और अपनी प्यास रूपी कार्य को ‌सफल करने के लिए ‌ कुएं कि दिशा में जाकर पानी रूपी सफलता को प्राप्त कर सका।

    इस तरह हर व्यक्ति को सफल होने से पहले अपने ‌ कार्य को और कार्य की सही दशा को समझना होगा और यह समझकर ही हर व्यक्ति अपने कार्य में सफल हो सकता है।

    असफलता

    सफलता के मार्ग में व्यक्ति को कई बार असफलता का भी सामना करना पड़ता है असफलता का सामना करना भी व्यक्ति को प्रतिभाशाली बना देती हैं इस तरह सफलता हमारे लिए कुछ ना कुछ सबक लेकर आती है।

    जो व्यक्ति असफलताओं को देखते हुए भी अपना रास्ता नहीं बदलते और अडिग होकर सफल होने की ज़िद में खड़े रहते हैं तो ऐसे व्यक्तियों को एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है ।

    आत्मविश्वासी

    किसी भी बड़े या छोटे कार्य को करने से पहले व्यक्ति को उस कार्य में सफल होने की और लक्ष्य को प्राप्त करने का आत्मविश्वास भी होना चाहिए।

    व्यक्ति के अंदर सफलता को प्राप्त करने का आत्मविश्वास स्फूर्ति और साहस देने का कार्य करता है।

    आत्मविश्वासी व्यक्ति सफलता के मार्ग में उठने गिरने से हताश नहीं होते बल्कि अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं।

    सफलता के छोटे-छोटे कदम

    कोई भी सफल व्यक्ति हो उसने अपनी सफलता प्राप्त करने के लिए छोटे-छोटे कदमों से चलना ही उचित माना है ऐसे व्यक्ति लगातार और बिना रुके अपने कार्य में सफल होने के लिए छोटे-छोटे कदम रखते जाते हैं ।

    सफल व्यक्ति जानते-समझते हैं कि कोई भी सफलता एक दो रात के अंदर हासिल नहीं की जा सकती ।सफलता पाने में और कामयाब होने में कुछ वक्त लगता है इसलिए यह सफल व्यक्ति छोटे छोटे कदम रखते हुए आगे बढ़ते जाते हैं और फिर एक दिन सफल हो जाते हैं।

    परिस्थितियां चाहे कैसी भी आ जाएं पर जो व्यक्ति अनुशासित होकर धैर्यवान होकर ईमानदार होकर लगातार कोशिश करते जाता है ऐसे व्यक्तियों के लिए नए-नए अवसर आते हैं और संभावनाओं के नए-नए द्वार खुलते जाते हैं।

    सफलता के मार्ग में कठिनाइयां भी आती हैं और रोज एक नई चुनौती का सामना भी करना पड़ता है ऐसे में व्यक्तियों को अपने सफलता के मार्ग कठिन और जोखिम भरा लगने लगता है बहुत से व्यक्ति ऐसे वक्त में घबरा जाते हैं और अपने सपनों को त्याग देते हैं इस तरह सफलता के मार्ग में व्यक्ति की परीक्षा भी ली जाती है जो व्यक्ति इस परीक्षा को पास कर लेता है वही व्यक्ति सफलता के नए आयाम बनाता है।

  • खुश रखिए अपने बचपन को

    आज के वक्त में बच्चों को भी उनका बचपन खुलकर नसीब नहीं हो रहा जैसा कि हमारा बचपन था पहले के वक्त में बच्चों का बच्चों के साथ घुल-मिल कर खेलना होता था जिससे जिससे बच्चों का मानसिक विकास सही तरीके से होता था।

    आज के वक्त में बच्चे अपने बचपन में ही फोन को लेकर गेम खेलना सीख गए हैं जो कि आगे चलकर एक बुरी आदत बन जाता है जिससे बच्चों में बहुत चिड़चिड़ापन ,गुस्सा करना जैसा व्यवहार करना आ गया है ।

    वैसे कहा जाये तो कि बचपन कभी भी खत्म नहीं होता इंसान के बड़े होने पर भी बचपन इंसान के अंदर हमेशा मोजूद रहता है ।

    हम यहां पर हर इंसान के अंदर के बचपन की बात कर रहे हैं देखा जाए तो हर व्यक्ति उम्र से तो बड़ा हो जाता है पर फिर भी उसके अंदर एक बचपन हमेशा जिंदा रहता है और यह बचपन रहना भी चाहिए।

    क्या कभी देखा है जब व्यक्ति बहुत ज्यादा खुश हो जाता है तो खुशी में वह जोरों से हंसने लगता है और कभी-कभी तो खुशी में आकर तेज आवाज़ में गुनगुनाने भी लगता है यह सब व्यवहार व्यक्ति के अंदर के बचपन का ही होता है।

    हम कब बड़े हो जाते हैं कब हमारा बचपन खत्म हो जाता है हमें पता तक नहीं चलता पर अगर हम चाहे तो अपने बचपन को हमेशा जी सकते हैं।

    घर के बड़े लोगों को अपने से छोटों को खुश रहना और बचपन को जीना सिखाना चाहिएं और उन्हें अपने बच्चों को ये भी बताना चाहिए कि इंसान को अपना बचपन हमेशा जीना चाहिए ।जब घर के बड़े अपने अंदर के बचपन को जिंदा रहते हैं और समय-समय पर बच्चों कि तरह छोटी छोटी खुशियां को भी मनाते हैं तो उस घर के छोटों को भी छोटी बातों पर और बेमतलब की खुशी में खुश रहना आ जाता है ।

    बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के ऊपर कई जिम्मेदारियां आ जाती है और उन जिम्मेवारियों के बीच में फंसकर इंसान हंसना और खुश रहना लगभग भूल सा जाता है पर अगर हम चाहे तो जिम्मेदारियां को निभाते हुए भी अपने बचपन को आजाद रख सकते हैं ।

    जिस तरह एक छोटा बच्चा किसी छोटी और असाधारण चीज के प्रति उतावलापन दिखाता है अगर हम भी जरा जरा सी और फालतू की लगनेवाली चीज के प्रति उतावलापन दिखाएं तो हमारा बचपन उस उतावलेपन को देखकर बहुत खुशी महसूस करेगा और इस कारण हम अपने आप ही खुश रहने लगेंगे। इस तरह यहां कहने का मतलब यह हुआ की असली खुशी छोटी-छोटी बातों में मिलती है।

    खुश रहने का मतलब यह कतई नहीं होता कि आपके पास महंगे संसाधन ‌हों और। बहुत सारा रुपए पैसा हो बल्कि अपने अंदर के बचपन को समय-समय पर खिल -खिलाने देने से हमारे मस्तिष्क को बहुत बड़ी खुशी मिलती है।

    कुछ व्यक्ति यह समझना चाहते हैं कि अपने अंदर के बचपन को कैसे जिया जाए या अपने अंदर की बचपन को कैसे दोबारा से जागृत किया जाए इसके लिए आप अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए कि अपने बचपन में आप किन चीजों से या किन कार्यों से बहुत ज्यादा खुश हो जाया करते थे।

    अपने बचपन में किए गए कार्यों को जब आप उसी उतावलेपन से फिर से दोहराते हैं तो आपको असीम खुशी बढ़ाने के कारण भी मिल जाएंगे आप समझ जाओगे की खुशियां किसी भी चीज को खरीदने से नहीं बल्कि कुछ कार्यों से मिलती है।

    बड़े होने का मतलब यह नहीं होता कि आप अपने बचपन को हमेशा के लिए भूल जाएं बल्कि बड़े होने का मतलब अपने से छोटों को खुश रहने की वजह सिखाई जायें ।

    आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में इंसान चैन से ना खा रहा है और ना ही चैन से सो पा रहा है। हम इंसान अपनी दिनचर्या में ऐसे व्यस्त हो चुके हैं जिस तरह एक मशीन जो बिना रुके कार्य करती रहती है ठीक वैसे ही इंसानों‌‌ की हालत हो चुकी है।

    क्या याद है बचपन के दिनों में कैसे एक साधारण पत्थर भी हमारे खेल का बहुत बड़ी वजह बन जाता था लेकिन अब महंगे खिलौनों से भी ‌बच्चा खेलने नहीं चाहता ।

    इसलिए हमें समझना होगा की बचपन को हमारे अंदर हमेशा बनाए रखने के लिए बच्चों की तरह बनना होगा और छोटी-छोटी चीजों से खुश रहना सीखना होगा।

    खुश रहने के लिए व्यक्ति जिस दिन अपने बचपन को जिंदा रखना सीख जाएगा उसके लिए खुश रहना कोई मुश्किल काम नहीं रहेगा।

    हमें यह भी समझना होगा बड़े होने का मतलब जिम्मेदारियां संभालना ही नहीं होता बल्की खुश रहना भी होता है जितना मनुष्य खुश रहता है उतनी ही उसे कम थकान महसूस होगी और इससे जीवन भी खुशियों से भरा लगने लगेगा।

  • इंसान की इंसानियत

    समाज में रहने वाले व्यक्तियों की सोच अलग-अलग प्रकार की होती है कुछ झगड़ालू प्रवृत्ति के तो कुछ ईर्ष्यालु प्रवृत्ति तो कुछ दयालु प्रवृत्ति के होते हैं समाज कई तरह के व्यक्तियों से मिलजुल कर बना होता है।

    हर वो एक इंसान अपने व्यवहार की वजह से समाज में पहचाना जाता है और इसके अलावा इंसान द्वारा किए गए कर्म उसकी पहचान बनाते हैं।

    हर व्यक्ति की मानसिक सोच भिन्न प्रकार की होती है मानसिक सोच से ही मनुष्य का व्यवहार निश्चित होता है परंतु हर व्यक्ति के अंदर इंसानियत भी होती है यह इंसानियत ही एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़े रखने का कार्य करती है।

    बदलते वक्त में इंसान के अंदर की इंसानियत भी खत्म सी होती जा रही है ।पहले के वक्त में एक इंसान किसी दूसरे इंसान के दुख के वक्त में उसके काम आता था और उसके दुख को खत्म करने के उपाय ढूंढने में मदद करता था परंतु आजकल व्यक्ति को किसी भी दुखी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता ।इस प्रकार इंसान के अंदर निस्वार्थ भाव बढ़ता सा प्रतीत हो रहा है।

    इंसानियत खत्म होने की कई वजह है

    भाई-चारा

    एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़े रखने के लिए भाई-चारा होना अति आवश्यक है यह भाईचारा हमें बचपन से ही सिखाया जाता है पर आजकल की भाग दौड़ जैसी जिंदगी में बचपन खत्म सा हो गया है जिस कारण भाईचारा समझने और समझाने का किसी पर वक्त नहीं है और शायद भाईचारा ना समझ पाने की वजह से एक इंसान दूसरे इंसान के लिए अजनबी बनता जा रहा है

    छोटा परिवार

    नगरी करण हो जाने के बाद से छोटे परिवारों को अहमियत मिलने लगी छोटे परिवारों की एक वजह जनसंख्या कम करने का भी विचार था।

    छोटा परिवार सुखी परिवार का मंत्र लोगों को इतना रास आया कि उन्होंने अपनी खुशियों को भी सिर्फ अपने छोटे परिवार तक ही सीमित रखा ।आज के वक्त में इंसान अपनी छोटी या बड़ी खुशी को बांटना जरूरी नहीं समझता है ।बच्चे भी उस परिवार में रहकर यही सीखते हैं जिस वजह से बच्चों को और बड़ों को सिर्फ खुद से ही मतलब रखना जरूरी लगता है तो ऐसे में उसके पास पड़ोस में क्या हो रहा है इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहता किस कारण हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है।

    स्वार्थी व्यवहार

    व्यक्ति के अंदर स्वार्थी व्यवहार आ जाने से उसका स्वार्थी व्यक्तित्व बनता जा रहा है ।स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपनी भलाई के बारे में सोचता है ऐसे व्यक्तियों को किसी के दुख से कोई लेना देना नहीं होता। समाज में स्वार्थी व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है और भले मानुष की संख्या कम होती दिख रही है इंसानियत खत्म होने में स्वार्थी व्यक्तित्व एक बहुत बड़ी समस्या है।

    मां-बाप दोनों का काम करना

    महंगाई की वजह से घर को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी एक व्यक्ति पर बहुत भारी पड़ जाती है इस कारण अब घर को सही तरीके से चलाने के लिए मम्मी-पापा दोनों का काम पर जाना जरूरी सा हो गया है।

    मां बाप दोनों के काम पर जाने की वजह से बच्चों को बचपन में घर से मिलने वाली सदाचार की शिक्षा अब नहीं मिल पा रही इससे बच्चों का व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पा रहा है।

    बचपन में घर पर मां के द्वारा बच्चों को सदाचार की शिक्षा मिलने से बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होता था जिससे बच्चे अपने बचपन में ही अच्छा इंसान बनने का पाठ सीखते थे।

    सदाचार की शिक्षा न मिल पाने की वजह से बच्चों में सदाचार का विकास ठीक प्रकार से नहीं होता है।

    ऐसे कई कारण है जो इंसान के अंदर की इंसानियत को खत्म होने की वजह बन रहे हैं यदि समय रहते हमने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो स्थिति और खराब हो सकती है।

    देश की तरक्की हो या परिवार की तरक्की की बात हो जब तक इंसानियत हमारे अंदर नहीं होगी तब तक हम ठीक प्रकार से तरक्की नहीं कर सकते इसलिए हमें एक सभ्य इंसान बनने के लिए इंसानियत को अपनाना होगा ।

    इंसानियत बढ़ाने का सबसे एक अच्छा तरीका यह भी है कि हम औरों की निस्वार्थ मदद करें निस्वार्थ मदद करने से हमें बहुत-सी खुशी मिलेगी।

    मां-बाप को भी अपने बच्चों को वक्त देना सीखना चाहिए बच्चों को मां-बाप का साथ मिल जाने से बच्चों का मानसिक विकास सही ढंग से होता है बचपन में ही बच्चे भाई बहनों के साथ मिलजुल कर रहना सीखते हैं मिलजुल कर रहने का भाव इंसान के अंदर की इंसानियत बढ़ाने में सहायक बनता है।

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  • जीवन की मूलभूत जरूरतें

    हम सभी मनुष्य अपने जीवन को सरल और सुगम बनाना चाहते हैं इसके लिए निरंतर प्रयास भी करते रहते हैं।

    हर व्यक्ति अपने जीवन को खुशहाल बनाकर खुश रहना चाहता है।

    हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं भी होती है और समस्याओं का होना भी जरूरी होता है यदि हमारे जीवन में समस्या ना होती तो शायद मनुष्य जीवन की महत्व को समझ ना सके।

    इसी तरह मनुष्य की अपने जीवन में कुछ मूलभूत जरूरत है भी होती है जैसे कि एक छोटे बच्चे का अच्छी शिक्षा प्राप्त करना उसके जीवन की महत्वपूर्ण अपेक्षा है शिक्षा मनुष्य को जीवन का आधार देती है। शिक्षा से ही मनुष्य समाज में रहने के तौर तरीके सीखता है शिक्षा ही मनुष्य का सही मायने में निर्माण करती है तो इस तरह शिक्षा मनुष्य जीवन की महत्वपूर्ण अपेक्षा माना गया है ।

    मूलभूत आवश्यकता

    इसके अलावा मनुष्य के जीवन की मूलभूत आवश्यकता है में से तीन महत्वपूर्ण और जरूरी आवश्यकता भी हैं। इन तीन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से पहली आवश्यकता भोजन माना गया है।

    भोजन (रोटी)

    मनुष्य के जीवन का आधार भोजन पर भी टिका हुआ है मनुष्य बच्चे रूप में जब जन्म लेता है उसकी पहली आवश्यकता भोजन ही होता है ।

    जीवन को सुचारू रूप से चलने के लिए मनुष्य को भोजन की जरूरत पड़ती है यदि मनुष्य के पास भोजन नहीं होगा तो उसका जीवन से सुचारू रूप से नहीं चल पाएगा।

    यदि व्यक्ति अच्छा भोजन करता है तो उसने सोचने समझने की शक्ति आती है और कार्य को करने की समर्थ होती है पर बिना भोजन के मनुष्य के जीवन की कल्पना करना भी असंभव होगा।

    कपड़ा(वस्त्र)

    कपड़ा भी मनुष्य के जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं मैं से एक माना गया है। आदिमानव के समय से ही मनुष्य ने कपड़ा पहनना सीख लिया था आदिमानव के समय में मनुष्य जानवरों की खाल को अपने शरीर को ढकने के काम मेलेने लगा था ।

    समय के साथ-साथ मनुष्य ने तरक्की की है परंतु आज भी वस्त्र हमारे शरीर को ढकने यह काम में आता है सर्दी के दिनों में सर्दी से बचाव के लिए हम उन्हीं कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं।

    मकान

    प्राचीन समय से ही मनुष्य गुफाओं में रहते आया है मनुष्य को खुले में रहने से जंगली जानवरों से डर लगता था इसलिए अपने बचाव के लिए मनुष्य मैं गुफाओं में रहना शुरू कर दिया था

    आज के वक्त में इंसान ईंट पत्थरों से मकान बनाकर उसमें रहने लगा है मकान में रहने से व्यक्ति सुरक्षित रहता है सर्दी गर्मी और बरसात इन मौसम से बचने के लिए मकान एक महत्वपूर्ण आवश्यकता हो चुकी है।

    अतः मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक माना गया है और जो की बहुत जरूरी भी है।

    शिक्षा

    मूलभूत आवश्यकताओं के अलावा शिक्षा भी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं का अंग माना गया है शिक्षित व्यक्ति अपने अच्छे आचरण से समाज की भलाई कर सकता है।

    शिक्षा मनुष्य के जीवन कोई एक नया आधार देती है और मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाने में सहायक भी होती है।

    बिना मूलभूत आवश्यकताओं के मनुष्य जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है ।

  • खुद को पहचानिये

    कभी-कभी हम इंसान जरा सी बात को बहुत बड़ा मान बैठते हैं और कई दिनों तक उन्हीं बातों में उलझे रह जाते हैं ।

    कुछ लोग बहुत ही भावुक प्रवृत्ति के होते हैं अगर उनसे कोई मजाक में भी कोई बात कह दे तो । भावुक प्रवृत्ति के ऐसे व्यक्ति जरा सी बात को भी बहुत ही गंभीरता से ले बेठते हैं और खुद में कमियों को देखने लग जाते है ।

    वक्त है हमें अपने आपको पहचानने का और समझने का हमें समझना होगा कि हम जैसे भी हों हम बेहतर हैं और किसी और के कुछ कहने पर हमें उसके जैसा सोचना नहीं है। हमें इसका भी ध्यान रखना होगा और साथ में खुद को उदास नहीं करना बल्कि सकारात्मक रवैया अपनाना चाहिए।

    हमें दूसरों के द्वारा हम पर किए गए मजाक को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए बल्कि ऐसी बातों को भूल जाना चाहिए और सब कुछ भूलकर आगे बढ़ना होगा क्योंकि यही जीवन है।

    कुछ लोग खुद से ही खुद को औरों के मुकाबले कम समझते हैं और किसी दूसरे के बताए हुए मार्ग पर चलना ही उनका जीवन बन जाता है ऐसे व्यक्ति कभी भी अपने बारे में भला बुरा समझने की कोशिश भी नहीं करते हैं। ऐसे लोगों के अंदर खुद पर विश्वास करने की बहुत बड़ी कमी होती है इसलिए वह खुद को औरों से कमतर ही समझते रहते हैं।

    और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कि बहुत काबिल और होशियार होते हैं पर इसके बावजूद उनके अंदर भी विश्वास की भारी कमी होने कारण औरों से बातचीत करने में भी घबराते हैं हिचकते हैं।

    इस प्रकार समाज में हमें कई प्रकार के व्यक्ति दिखाई देते हैं जो की श्रेष्ठ होते हुए भी खुद को कम ही समझते हैं जिस वजह से वह कभी भी अपने अंदर के प्रतिभा को पहचान भी नहीं पाते और अपने जीवन में दुखी रहते हैं व समाज के दबंग व्यक्तियों द्वारा सताए जाते रहते हैं।

    संसार के हर व्यक्ति में कुछ कमियां और कुछ अच्छाइयां होती ही हैं अगर व्यक्ति अपने अंदर की अच्छाइयों को पहचाने और अपनी अच्छाइयों को बढ़ावा दे तो वे भी किसी से काम नहीं होंगे। इस तरह हर व्यक्ति अपने आप को प्रतिभाशाली बना सकता है।

    इसलिए व्यक्ति को खुद को पहचानना होगा और समाज में अपनी स्थिति को सुधार कर जीवन के एक नए शिखर पर आगे बढ़कर खुदको साबित भी करना चाहिए

    हमें अपनी पहचान को स्वयं के आधार पर बनानी होगी ना कि दूसरों की राय पर अपनी पहचान बनायें । आप क्या हो और आप कौन हो इसका पता आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता तो फिर स्वयं की पहचान बनाने में दूसरों की राय की क्या जरूरत यह समझना होगा और समझाना भी होगा ।

  • व्यवस्था और प्रशासन में कितनी जरूरी है पारदर्शिता

    कोई भी बड़ा कार्य हो या किसी बड़े कार्य के लिए की गई घोषणायें जब होती है ।तो उसमें सबसे पहले उस कार्य में हुए हर वक्त की व्यवस्था ,विश्वास और पारदर्शिता को लेकर मन में कई सवाल उठते रहते हैं और इन सवालों का उठना मानवीय क्रिया है।

    हम बात कर रहे हैं बीते वक्त में हुए छात्रों द्वारा आंदोलन, नीट पेपर लीक होना, संसद के मानसून सत्र का बार-बार रद्द होना और इसके अलावा बारिश के मौसम में नई सड़कों का धंसना यह सब समस्त समस्या है जो मिलजुल कर हमारे देश की व्यवस्था और प्रशासन की नितियों पर सवाल उठाती हुई दिख रही है। साथ में इन सब कार्यों मे पारदर्शिता का हो ना क्या जरूरी नहीं है।

    इन सब में जनता का भरोसा भी होता है और जब देश की व्यवस्था और प्रशासन पर से विश्वास उठ जाता है तो फिर इस सबकी जवाबदेही किस से मिलेगी ।

    भ्रष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए केवल आर्थिक क्षति का विषय नहीं होता बल्कि न्याय ,विश्वास, व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन जाता है। जब उसमें मनमानी चलती है।

    पर क्या व्यवस्था और विश्वास की सारी जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन का ही दायित्व है क्या इसमें देश के नागरिक का कोई दायित्व नहीं हमें यह भी समझना होगा।

    किसी भी देश के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने में उस देश की सरकार जिम्मेदार मानी जाती है। जब सरकार अपनी दायित्व को भली भांति ना निभाकर अपनी मर्जी से चलाती है । तो जनता भी क्रोधित होकर जवाब देने के अभियान में जुट जाती है और इसका ताजा उदाहरण पूरा देश अभी बीते दिनों मे देख चुका है।

    जब निर्णयों , व्यवस्था और विश्वास में पारदर्शिता ना होकर पक्षपात किया जाता है तब विकास की गति तेज नहीं बल्कि धीमी पड़ जाती है यह समझना होगा हमारे देश को चलाने वालों को ।व्यवस्था या निर्माण कार्य में जब भ्रष्टाचार होने पर इसे कानून से जोड़ा जाता है जो कि प्रयाप्त या पूर्ण नहीं कहलाता है बल्कि यह शासन का भी दायित्व है कि हर कार्य को पारदर्शिता के साथ करे जिससे जनता के विश्वास को कायम रख सके ।

    आचरण और अनुशासन में रहकर लोकतंत्र के मूल्यों का सम्मान किया जाना चाहिए प्रशासन का अर्थ केवल भ्रष्टाचार पर कार्रवाई नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें अनियमितता की संभावना ना रहे ।

  • रांची में छात्र आंदोलन

    बीते दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए छात्रों द्वारा आंदोलन जिसमें देश के जेन जी ने विरोध प्रदर्शन किया ।इस आंदोलन में युवाओं और सोशल मीडिया की ताकत का एक नया पैमाना भी स्थापित हुआ । इस विरोध प्रदर्शन में जेन जी ने सफलता प्राप्त की और साथ में अपनी शर्त भी मनवाई।

    इससे हमें यह तो पता चलता है कि एक आम नागरिक अपनी आवाज को उठाना जानता है और एक साथ मिलकर आंदोलन के भागीदारी बन कर सत्ता पक्ष को झुकाना भी जानता है

    पेपर लीक की घटना में छात्रों के विश्वास को गहरी चोट लगी जब छात्रों ने ईमानदारी और कड़ी मेहनत से तैयार किए गए परिश्रम को व्यर्थ होते देखा तो उनका गुस्सा जवाब दे गया और आंदोलन के रूप में गुस्सा फूटा।

    दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन को अभी शांत हुए कुछ दिन ही हुए थे कि एक नया छात्र आंदोलन शुरू हो गया।

    झारखंड की राजधानी रांची में जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक ओएमआर सीट से छेड़छाड़ और धांधली के खिलाफ कर रहे छात्रों का आन्दोलन लोगों के ध्यान और चर्चा का विषय बन चुका है।

    रांची छात्र आंदोलन में पिछले कुछ दिनों से रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में कुछ छात्र अनिश्चितकालीन धरने और आमरण अनशन पर बैठ गए हैं और छात्रों ने अपनी मांगी रखी है छात्रों के मुताबिक प्रतियोगी परीक्षा में लगातार हो रहे पेपर लीक एवं भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिए।

    रांची छात्र आंदोलन को 22 23 दिन हो चुके हैं पर अभी तक इस आंदोलन को खत्म करने का ठोस कदम झारखंड सरकार नहीं उठा सकी है।

    हालांकि की इस मामले को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों से निष्पक्ष जांच न्याय का भरोसा दिलाया है और छात्र प्रतिनिधियों को बातचीत करने के लिए आमंत्रित भी किया गया इस आंदोलन को सोनम वांगचुक से भी समर्थन मिलने लगा है जिस वजह से हेमंत सोरेन की सरकार पर दबाव बन गया है।

    रांची छात्र आंदोलन में छात्र सड़कों पर उतर कर सरकार के खिलाफ नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं और अभी तक इस आंदोलन को सरकार की तरफ से संतुष्टि पूर्ण जवाब नहीं मिला है और यह आंदोलन अब किस दिशा में बढ़ेगा या इस आंदोलन में छात्रों की सहमति में सरकार भी सहमत होगी यह देखना बाकी है।

  • सवाल संसद के स्थगित होने का

    इस बार के पूरे मानसून सत्र में संसद अभी तक ना के बराबर ही चली है। दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्रों द्वारा हुए आंदोलन के बाद से ही संसद का लगातार स्थगित होना एक गंभीर और चिंताजनक विषय है। संसद राष्ट्रीय संपत्ति है और लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच भी है।

    संसद एक ऐसा मंच है जहां पर सरकार और विपक्ष के बीच सुनवाई होती है मतभेदों का समाधान किया जाता है पक्ष विपक्ष में सहमति संवाद और तकरार भी होती है ।पर जब संसद में जब यह कार्यवाही शालीनता के साथ ना हो कर एक हंगामे में तब्दील हो जाती है और परिणाम संसद का रद्द होना होता है ।

    इस बार के मानसून सत्र में विपक्ष सरकार से संसद में मार्च के दौरान छात्रों पर हुई कार्रवाई पर चर्चा करना चाहता है और साथ में गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर जवाब दें ऐसा भी विपक्ष चाहता है ।

    मानसून सत्र में विपक्ष राम मंदिर चंदा चोरी के मामले पर भी चर्चा करना चाहता है और चर्चा को करने के लिए काफी वक्त से अड़ा हुआ है। पर क्या संसद की कार्रवाई को रोकना कहां तक उचित है इस बात को भी पक्ष और विपक्ष को समझना होगा।

    संसद का बार-बार स्थगित होना । संसद की कार्यवाही को नियमितरूप से ना चलने देना आखिर कब तक होगा और कब यह गतिरोध टूटेगा ।

    सदन का सुचारू रूप से संचालन होना विपक्ष और सरकार दोनों की जिम्मेदारी और सहमति से ही हो सकता है।

    दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देने पर विपक्ष की मांग को मानकर सरकार ने सहमति जता तो दी है। पर सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते मतभेदों से एक अलग ही माहौल और चिंता जनक विषय बन गया है ।

    पर एक बात तय है कि संसद में गृहमंत्री का आना और विपक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही को संयमित तरीके से चलने देना संसद के बार-बार स्थगित होने की गतिरोध से बाहर निकालने की शुरुआत हो सकता है।

  • लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस-वे

    हमारे भारत देश में हो रही विकास की लहर हमें चारों तरफ दिखाई देती है और इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम भी उन्नति की दिशा में कदम आगे बढ़ा रहे हैं और चाहते हैं कि दुनिया के मानचित्र मे विकसित देशों में भारत भी अनूठा स्थान बनाने में सफल रहे ।

    पर जब देश के विकास में धांधली शामिल होती है तो स्थिति बेहतर बनने के बजाय बिगड़ती ही नजर आती है ।इसी का एक नया उदाहरण है लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस-वे जिसका निर्माण होने में हजारों-करोड़ों रुपए लगे जिसका उद्घाटन होने के कुछ समय बाद ही कई जगह से धंसने के कारण चर्चा में आ गया है । जिसको लेकर सोशल मीडिया पर भी सरकार के कार्य की खोचड़ी हो रही है।

    पिछले कुछ सालों से देश में हाईवे ,एक्सप्रेसवे, मेट्रो ,रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और पुल के निर्माण ने गति पकड़ रखी है लेकिन सवाल यह है यह सब निर्माण मानव जाति के हित में जीवन की सुगमता के लिए हो रहे हैं पर क्या इन निर्माणों में गुणवत्ता का भी ख्याल रखा गया है ।

    क्या यह निर्माण देश की जनता के विश्वास पर खरे उतरेंगे इसलिए हमें समझना होगा यह समस्या केवल एक एक्सप्रेसवे की नहीं है बल्कि यह निर्माण मनुष्य जाति को कोई जोखिम न दें इसका भी है।

    मानसून का समय है तो ऐसे में देश के कई राज्यों और कई शहरों से सड़कों की टूटने पुलों के क्षतिग्रस्त होने की खबरें आती हैं पर सोचने वाली बात ये है कि कुछ समय पहले ही हुए लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस के उद्घाटन के बाद का पहले ही मानसून में क्षतिग्रस्त होना बेहद शर्मनाक है।

    हमारे भारत देश में कई शहरों में कोई 100 साल पहले बनी इमारत ,पुल ,सड़क जो आज भी खड़ी हुई है और रोजाना लाखों लोगों का जिन पर आवागमन भी होता रहता है। इनका निर्माण उस वक्त हुआ जब संसाधन और तकनीक आज के मुकाबले बहुत कम था ।ऐसे में दोष किसका है मैं पता करना भी जरूरी है।

    डिजिटल डिजाइन है डिजिटल युग है संसाधन भी भरपूर हैं उसके बाद भी कानपुर लखनऊ एक्सप्रेस के निर्माण में हुई लापरवाही जिसकी वजह से कानपुर लखनऊ एक्सप्रेसवे पर आवागमन कर रहे मुसाफिरों के लिए समस्या का विषय बनी हुई है।

    कानपुर से लखनऊ तक 63 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस की हर एक किलोमीटर सड़क बनने पर 66 करोड रुपए खर्च हुए हैं ।इस प्रकार कुल लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस 4200 करोड रुपए की लागत से बना है । जिसके लगातार धंसने की वजह से गुणवत्ता और तकनीक पर उठते सवालों को लेकर चर्चा से घिरा हुआ है।

    कानपुर लखनऊ एक्सप्रेसवे जिसका अभी कुछ दिन पहले ही लोकार्पण हुआ था और लेकिन कुछ समय बाद से ही लगातार जगह-जगह सड़क की धंसने की आती खबरे निर्माण में हुई लापरवाही एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता और तकनीक पर भी संदेह होने लगा है। आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा और कहां त्रुटि हुई है यह कैसे पता चलेगा इस तरह के कई सवालों से घिरा हुआ कानपुर लखनऊ एक्सप्रेसवे।

  • युवा की निजता और बच्चों के बचपन में घुसती सोशल मीडिया

    आज के वक्त में लगभग हर व्यक्ति सोशल मीडिया पर है ऐसा लगता है मानो सोशल मीडिया हमारी जिंदगी में अभिन्न अंग बन गया है

    युवा वर्ग और बच्चे सोशल मीडिया पर ही अपना अधिकतर समय बिताते हैं और अपनी निजी जीवन के निजिकरण को काफी हद तक सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं इस सबसे अनजान कि आनेवाले समय में अपना निजिकरण शेयर करना उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

    बदलते समय में सोशल मीडिया का हमारे जीवन में जरूरत से ज्यादा दखल देना और कभी-कभी एआई द्वारा हमारी तस्वीरों का बिना हमारी अनुमति के उपयोग करना भी हमारे लिए घातक हो सकता है और धोखाधड़ी जैसी घटनाएं भी हो सकती है । इसलिए पारदर्शिता होना बहुत जरूरी है।

    ठीक इसी प्रकार बच्चों के बचपन के साथ भी सोशल मीडिया खिलवाड़ करती नजर आती है सोशल मीडिया का प्रभाव बच्चों के व्यक्तित्व व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित भी कर रहा है ।सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से अवसाद ,चिंता ,अनिद्रा, आत्मसम्मान में कभी ऐसी गंभीर समस्याएं भी देखने को मिल रही है।

    जैसे-जैसे डिजिटल कम्युनिकेशन बढ़ रहा है ।साथ में जटिल और गहरी समस्या भी देखने को मिल रही हैं । सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा अत्यंत जरूरी है हालांकि सोशल मीडिया पर 18 साल से कम उम्र के बच्चे अपना अकाउंट नहीं बना सकते जो कि उनकी सुरक्षा को देखते हुए अच्छा है ।

    सोशल मीडिया में बच्चो के यौन शोषण और पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्री दूसरा बेहद गंभीर मामला है और चिंता जनक भी है ।इंस्टाग्राम और टेलीग्राम के माध्यम से बच्चों के यौन शोषण को बढ़ावा देना आईटी कानून बीएनएस और पोक्सो कानून के तहत गंभीर अपराध है।

    संविधान के अनुच्छेद 15 और 39 के अनुसार बच्चों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए अमेरिका और दुनिया के दूसरे देशों में भी सख्त कानून है। अमेरिका चिल्ड्रन ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट के तहत 13 साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया जॉइन नहीं कर सकते हैं।

    बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए सोशल मीडिया पर भारत में दिल्ली उच्च न्यालय फैसले और दूसरे कानूनों के अनुसार मजबूत नियामक और उचित क्रियान्वयन के माध्यम से नाबालिक बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकती है।