हम सभी मनुष्य अपने अच्छे बुरे कार्य में भगवान को याद करते हैं। जब कोई व्यक्ति तरक्की के रास्ते पर उपलब्धियों को प्राप्त करता है तो अपने भगवान को ही अपनी उपलब्धियां का श्रेय देकर धन्यवाद कहता है ।इसी प्रकार जब व्यक्ति दुखों में घिर जाता है तो समाधान के लिए दुखों से बाहर निकलने का उपाय भी सुलझाने में भगवान से मदद की गुहार लगाता है ।
मनुष्य के अंदर का विश्वास ही भगवान होने का सबूत बताता है और फिर हम मनुष्य भगवान के दर्शन की चाह में बहुत कुछ करने की हिम्मत भी रखते हैं।
किसी न किसी बहाने मनुष्य ईश्वर को खोजता है यह मनुष्य का विश्वास ही होता है कि वह अपने भगवान को खोजते हुए मंदिर में तीर्थ में जाकर जो संतुष्टि पाता है वह संतुष्टि मनुष्य को कहीं भी नहीं मिलती ।।
धार्मिक स्थलों पर मनुष्य की आस्था की भीड़ होती है और इस भीड़ में भी मनुष्य शांति बनाए रखता है क्योंकि उसका विश्वास होता है कि भगवान कहीं ना कहीं से अपने भक्त को देख रहा है। ऐसे में कोई भी कार्य अचानक हो जाता है तो उसे हम मनुष्य भगवान की ही शक्ति समझ लेते हैं।
यहां तक कि मनुष्य शक्तियों के पीछे भगवान की कोई योजना समझता है इसलिए उसका विश्वास और भी गहरा होता जाता है कि भगवान नाम की कोई तो शक्ति है मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन व्रत रखता है और विधि-पूर्वक पूजा पालन भी करता है ।
कुछ लोगों के जीवन में सुख शांति की वजह भी भगवान को ही माना जाता है यहां तक कि इंसानों का विश्वास है की बुरे कर्मों की सजा भी भगवान ही देते हैं। इस प्रकार मनुष्य का विश्वास मानता है कि इस सृष्टि की रचना भगवान ने ही की है।
पर क्या कभी सोचा है कि भगवान को प्राप्त कर लेने से इंसान के जीवन का उद्धार हो जाएगा यह सोचना हमारा शायद गलत ही होगा क्योंकि हमें समझना होगा कि जब तक हम सच्चे इंसान नहीं बन जाते तब तक हमें ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती ।
भगवान की प्राप्ति करने वाला इंसान कोई साधारण इंसान नहीं होता बल्कि एक ऐसा इंसान जो दया भाव से भरा हो जिस इंसान का हृदय दूसरे के दुखों को देखकर करुणा से भर जाए जिस इंसान के मन मस्तिष्क में अहंकार नाम की चीज ना हो सत्य हो और धर्म-कर्म के प्रति दायित्व निभाने का साहस हो ऐसा मनुष्य ही अपने भगवान को प्राप्त कर सकता है।
परंतु एक ऐसा इंसान जो कि घमंड से भरा हो इंसानियत का ज्ञान ना रखता हो जिस इंसान के मन में झूठ और कपट भरा हुआ हो जिस इंसान को दूसरे इंसानों के दुख से कोई लेना-देना ना हो ऐसे इंसान को भगवान की प्राप्ति होना असंभव और मुश्किल है।
ऐसा व्यक्ति कितना ही पाठ पूजा करने का ढोंग रच ले परंतु भगवान की प्राप्ति असंभव ही रहती है।
यदि मनुष्य सच्चे मन से बिना दिखावे के इंसान के सुख-दुख में काम आने लगे गरीबों की सेवा करने लगे तो धीरे-धीरे मनुष्य को भगवान की आस्था में विश्वास होने लगता है और भगवान प्राप्ति के मार्ग दिखाई देने लगते हैं।
हमें समझना होगा मनुष्य जीवन जितना स्वार्थ से दूर रहेगा जितना दूसरों की भलाई के लिए नेक काम करेगा उतना ही उसका मानसिक संतुलन अच्छा रहेगा मानसिक संतुलन अच्छा होने से मनुष्य अच्छे कार्यों की तरफ झुकाव रखने लगता है और दूसरों लिए भी जीना सीखने लगता है।
मनुष्य जीवन जब दूसरों के लिए जीने लगता है तब वास्तविक सुख की अनुभूति होने लगती है और जीवन के अर्थ को समझने लगता है।
भगवान प्राप्ति से तात्पर्य मनुष्य को दूसरों के सुख-दुख में काम आना दया भाव को रखना और हर वक्त स्वयं के लिए ना जीकर गरीब इंसानों की मदद के लिए अपने जीवन को लगा देना भी भगवान की प्राप्ति ही होता है।
सच्चे और नेक काम करने से मनुष्य को जीवन का सच्चा अर्थ समझने आने लगता है इस तरह ईश्वर को प्राप्त करने से पहले मनुष्य को स्वयं को एक सच्चा इंसान बनाना सीखना होगा।
सच्चा इंसान बनने के लिए मनुष्य को कठिन परीक्षा देनी पड़ती है मनुष्य को अपने सुखों से ऊपर सोचना पड़ता है अपने अहम् से बाहर निकलकर ही मनुष्य भगवान प्राप्ति मार्ग को देख सकता है।