Blog

  • सच के रास्ते पर भगवान की प्राप्ति

    हम सभी मनुष्य अपने अच्छे बुरे कार्य में भगवान को याद करते हैं। जब कोई व्यक्ति तरक्की के रास्ते पर उपलब्धियों को प्राप्त करता है तो अपने भगवान को ही अपनी उपलब्धियां का श्रेय देकर धन्यवाद कहता है ।इसी प्रकार जब व्यक्ति दुखों में घिर जाता है तो समाधान के लिए दुखों से बाहर निकलने का उपाय भी‌ सुलझाने में भगवान से मदद की गुहार लगाता है ।

    मनुष्य के अंदर का विश्वास ही भगवान होने का सबूत बताता है और फिर हम मनुष्य भगवान के दर्शन की चाह में बहुत कुछ करने की हिम्मत भी रखते हैं।

    किसी न किसी बहाने मनुष्य ईश्वर को खोजता है यह मनुष्य का विश्वास ही होता है कि वह अपने भगवान को खोजते हुए मंदिर में तीर्थ में जाकर जो संतुष्टि पाता है वह संतुष्टि मनुष्य को कहीं भी नहीं मिलती ।।

    धार्मिक स्थलों पर मनुष्य की आस्था की भीड़ होती है और इस भीड़ में भी मनुष्य शांति बनाए रखता है क्योंकि उसका विश्वास होता है कि भगवान कहीं ना कहीं से अपने भक्त को देख रहा है। ऐसे में कोई भी कार्य अचानक हो जाता है तो उसे ‌हम मनुष्य भगवान की ही शक्ति समझ लेते हैं।

    यहां तक कि मनुष्य शक्तियों के पीछे भगवान की कोई योजना समझता है इसलिए उसका विश्वास और भी गहरा होता जाता है कि भगवान नाम की कोई तो शक्ति है मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन व्रत रखता है और विधि-पूर्वक पूजा पालन भी करता है ।

    कुछ लोगों के जीवन में सुख शांति की वजह भी भगवान को ही माना जाता है यहां तक कि इंसानों का विश्वास है की बुरे कर्मों की सजा भी भगवान ही देते हैं। इस प्रकार मनुष्य का विश्वास मानता है कि इस सृष्टि की रचना भगवान ने ही की है।

    पर क्या कभी सोचा है कि भगवान को प्राप्त कर लेने से इंसान के जीवन का उद्धार हो जाएगा यह सोचना हमारा शायद गलत ही होगा क्योंकि हमें समझना होगा कि जब तक हम सच्चे इंसान नहीं बन जाते तब तक हमें ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती ।

    भगवान की प्राप्ति करने वाला इंसान कोई साधारण इंसान नहीं होता बल्कि एक ऐसा इंसान जो दया भाव से भरा हो जिस इंसान का हृदय दूसरे के दुखों को देखकर करुणा से भर जाए जिस इंसान के मन मस्तिष्क में अहंकार नाम की चीज ना हो सत्य हो और धर्म-कर्म के प्रति दायित्व निभाने का साहस हो ऐसा मनुष्य ही अपने भगवान को प्राप्त कर सकता है।

    परंतु एक ऐसा इंसान जो कि घमंड से भरा हो ‌इंसानियत का ज्ञान ना रखता हो जिस इंसान के मन में झूठ और कपट भरा हुआ हो जिस इंसान को दूसरे इंसानों के दुख से कोई लेना-देना ना हो ऐसे इंसान को भगवान की प्राप्ति होना असंभव और मुश्किल है।

    ऐसा व्यक्ति कितना ही पाठ पूजा करने का ढोंग रच ले परंतु भगवान की प्राप्ति असंभव ही रहती है।

    यदि मनुष्य सच्चे मन से बिना दिखावे के इंसान के सुख-दुख में काम आने लगे गरीबों की सेवा करने लगे तो धीरे-धीरे मनुष्य को भगवान की आस्था में विश्वास होने लगता है और भगवान प्राप्ति के मार्ग दिखाई देने लगते हैं।

    हमें समझना होगा मनुष्य जीवन जितना स्वार्थ से दूर रहेगा जितना दूसरों की भलाई के लिए नेक काम करेगा उतना ही उसका मानसिक संतुलन अच्छा रहेगा मानसिक संतुलन अच्छा होने से मनुष्य अच्छे कार्यों की तरफ झुकाव रखने लगता है और दूसरों लिए भी जीना सीखने लगता है।

    मनुष्य जीवन जब दूसरों के लिए जीने लगता है तब वास्तविक सुख की अनुभूति होने लगती है और जीवन के अर्थ को समझने लगता है।

    भगवान प्राप्ति से तात्पर्य मनुष्य को दूसरों के सुख-दुख में काम आना दया भाव को रखना और हर वक्त स्वयं के लिए ना जीकर गरीब इंसानों की मदद के लिए अपने जीवन को लगा देना भी भगवान की प्राप्ति ही होता है।

    सच्चे और नेक काम करने से मनुष्य को जीवन का सच्चा अर्थ समझने आने लगता है इस तरह ईश्वर को प्राप्त करने से पहले मनुष्य को स्वयं को एक सच्चा इंसान बनाना सीखना होगा।

    सच्चा इंसान बनने के लिए मनुष्य को कठिन परीक्षा देनी पड़ती है मनुष्य को अपने सुखों से ऊपर सोचना पड़ता है अपने अहम् से बाहर निकलकर ही मनुष्य भगवान प्राप्ति मार्ग को देख सकता है।

  • इंसान की इंसानियत

    समाज में रहने वाले व्यक्तियों की सोच अलग-अलग प्रकार की होती है कुछ झगड़ालू प्रवृत्ति के तो कुछ ईर्ष्यालु प्रवृत्ति तो कुछ दयालु प्रवृत्ति के होते हैं समाज कई तरह के व्यक्तियों से मिलजुल कर बना होता है।

    हर वो एक इंसान अपने व्यवहार की वजह से समाज में पहचाना जाता है और इसके अलावा इंसान द्वारा किए गए कर्म उसकी पहचान बनाते हैं।

    हर व्यक्ति की मानसिक सोच भिन्न प्रकार की होती है मानसिक सोच से ही मनुष्य का व्यवहार निश्चित होता है परंतु हर व्यक्ति के अंदर इंसानियत भी होती है यह इंसानियत ही एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़े रखने का कार्य करती है।

    बदलते वक्त में इंसान के अंदर की इंसानियत भी खत्म सी होती जा रही है ।पहले के वक्त में एक इंसान किसी दूसरे इंसान के दुख के वक्त में उसके काम आता था और उसके दुख को खत्म करने के उपाय ढूंढने में मदद करता था परंतु आजकल व्यक्ति को किसी भी दुखी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता ।इस प्रकार इंसान के अंदर निस्वार्थ भाव बढ़ता सा प्रतीत हो रहा है।

    इंसानियत खत्म होने की कई वजह है

    भाई-चारा

    एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़े रखने के लिए भाई-चारा होना अति आवश्यक है यह भाईचारा हमें बचपन से ही सिखाया जाता है पर आजकल की भाग दौड़ जैसी जिंदगी में बचपन खत्म सा हो गया है जिस कारण भाईचारा समझने और समझाने का किसी पर वक्त नहीं है और शायद भाईचारा ना समझ पाने की वजह से एक इंसान दूसरे इंसान के लिए अजनबी बनता जा रहा है

    छोटा परिवार

    नगरी करण हो जाने के बाद से छोटे परिवारों को अहमियत मिलने लगी छोटे परिवारों की एक वजह जनसंख्या कम करने का भी विचार था।

    छोटा परिवार सुखी परिवार का मंत्र लोगों को इतना रास आया कि उन्होंने अपनी खुशियों को भी सिर्फ अपने छोटे परिवार तक ही सीमित रखा ।आज के वक्त में इंसान अपनी छोटी या बड़ी खुशी को बांटना जरूरी नहीं समझता है ।बच्चे भी उस परिवार में रहकर यही सीखते हैं जिस वजह से बच्चों को और बड़ों को सिर्फ खुद से ही मतलब रखना जरूरी लगता है तो ऐसे में उसके पास पड़ोस में क्या हो रहा है इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहता किस कारण हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है।

    स्वार्थी व्यवहार

    व्यक्ति के अंदर स्वार्थी व्यवहार आ जाने से उसका स्वार्थी व्यक्तित्व बनता जा रहा है ।स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपनी भलाई के बारे में सोचता है ऐसे व्यक्तियों को किसी के दुख से कोई लेना देना नहीं होता। समाज में स्वार्थी व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है और भले मानुष की संख्या कम होती दिख रही है इंसानियत खत्म होने में स्वार्थी व्यक्तित्व एक बहुत बड़ी समस्या है।

    मां-बाप दोनों का काम करना

    महंगाई की वजह से घर को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी एक व्यक्ति पर बहुत भारी पड़ जाती है इस कारण अब घर को सही तरीके से चलाने के लिए मम्मी-पापा दोनों का काम पर जाना जरूरी सा हो गया है।

    मां बाप दोनों के काम पर जाने की वजह से बच्चों को बचपन में घर से मिलने वाली सदाचार की शिक्षा अब नहीं मिल पा रही इससे बच्चों का व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पा रहा है।

    बचपन में घर पर मां के द्वारा बच्चों को सदाचार की शिक्षा मिलने से बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होता था जिससे बच्चे अपने बचपन में ही अच्छा इंसान बनने का पाठ सीखते थे।

    सदाचार की शिक्षा न मिल पाने की वजह से बच्चों में सदाचार का विकास ठीक प्रकार से नहीं होता है।

    ऐसे कई कारण है जो इंसान के अंदर की इंसानियत को खत्म होने की वजह बन रहे हैं यदि समय रहते हमने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो स्थिति और खराब हो सकती है।

    देश की तरक्की हो या परिवार की तरक्की की बात हो जब तक इंसानियत हमारे अंदर नहीं होगी तब तक हम ठीक प्रकार से तरक्की नहीं कर सकते इसलिए हमें एक सभ्य इंसान बनने के लिए इंसानियत को अपनाना होगा ।

    इंसानियत बढ़ाने का सबसे एक अच्छा तरीका यह भी है कि हम औरों की निस्वार्थ मदद करें निस्वार्थ मदद करने से हमें बहुत-सी खुशी मिलेगी।

    मां-बाप को भी अपने बच्चों को वक्त देना सीखना चाहिए बच्चों को मां-बाप का साथ मिल जाने से बच्चों का मानसिक विकास सही ढंग से होता है बचपन में ही बच्चे भाई बहनों के साथ मिलजुल कर रहना सीखते हैं मिलजुल कर रहने का भाव इंसान के अंदर की इंसानियत बढ़ाने में सहायक बनता है।

    ‌

  • ऋषि पंचमी

    ऋषि पंचमी का व्रत हिंदू धर्म में मुख्य माना गया है इस उपवास को रखने के नियम और आचरण है जो की अति आवश्यक हैं।

    व्रत के नियम

    संकल्प और समय अवधि

    ऋषि पंचमी का व्रत सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त तक रहता है इस व्रत में सुबह स्नान करते समय संकल्प लेकर व्रत को शुरू करना चाहिए।

    व्रत का खान पान

    ऋषि पंचमी व्रत में फलाहार करके या फिर सिर्फ पानी पीकर रखा जाता है इस व्रत में नमक और प्याज अनाज प्रयोग नहीं करना चहिए ।

    मन और शरीर को साफ रखें

    इस व्रत में अपने मन मे अच्छा ही सोचें कोई भी बुरा विचार सोचने से बचें इसके अलावा अपने शरीर को भी साफ रखना इस व्रत का नियम है।

    सप्त ऋषि पूजन

    इस व्रत में चौकी पर कपड़ा बिछाकर और सातों ऋषियों की तस्वीर रखकर पूजन करना चाहिए और ऋषि पंचमी की कथा को सुनना चाहिए।

    ऋषि पंचमी हिंदी के महीने भादो महीने के अनुसार शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सप्तऋषियों जो की कश्यप, अति, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम ने जमदग्नि और वशिष्ठ तथा माता अरुंधति की पूजा अर्चना करने का व्रत रखने की परंपरा है।

    ऋषि पंचमी का व्रत रखने से भूल चूक या फिर अनजाने में हुए पाप और दोष से प्रायश्चित करने के लिए किया जाता है।

    ऋषि पंचमी व्रत कथा

    ऋषि पंचमी की पुराणों में एक कथा है। प्राचीन काल में उंत्तक नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ व अपनी दो संतानों के साथ रहते थे। ब्राह्मण की पुत्री का विवाह एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था पर विवाह के कुछ समय बाद पुत्री के पति की मृत्यु हो गई तो वह पुत्री अपने माता-पिता के पास रहने के लिए लौट आई।

    एक रात की बात है ब्राह्मण की पत्नी सुशीला ने देखा कि उनकी पुत्री के शरीर पर बहुत सारे कीड़े रेंग रहे थे यह देखकर पत्नी सुशीला ने अपने पति उंत्तक से इसका कारण पूछा तो ब्राह्मण उंत्तक ने बताया कि उनकी पुत्री ने पूर्व जन्म में अशुद्ध अवस्था में पूजा के बर्तनों खाद्य-सामग्री व देवस्थान को स्पर्श किया था।

    इतने सारे दोष होने के बाद भी हमारी पुत्री ने अपने पूर्व जन्म में दोष निवारण के लिए ऋषि पंचमी का व्रत तक नहीं रखा इस कारण हमारी पुत्री को यह कष्ट भोगना पड़ रहा है।

    इसके पश्चात् पत्नी सुशीला के कहने पर उंत्तक ने अपनी पुत्री को उसके पुनर्जन्म के दोष से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि पंचमी का विधिपूर्वक व्रत रखने को कहा।

    पुत्री ने भी अपने पिता द्वारा बताए गए नियम से ऋषि पंचमी का विधिपूर्वक व्रत रखा पूजा अर्चना की और अपने पुनर्जन्म किए गए दोष को दूर करने के लिए क्षमा मांगी और इस प्रकार उंत्तक और सुशीला की पुत्री के दोष दूर हो गए।

  • भगवान विश्वकर्मा

    हिंदू धर्म में माना जाता है भगवान विश्वकर्मा ने ही इस सृष्टि का वास्तु किया था। ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा जी को सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी दी थी भगवान विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के ही बंशज माने जाते हैं।

    भगवान ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि का निर्माण किया गया उस वक्त सृष्टि एक अंडे के आकर के जैसे थी। सृष्टि का निर्माण तो हो चुका था लेकिन सृष्टि को संवारने की भी आवश्यकता थी इसलिए ब्रह्मा जी ने सृष्टि की जिम्मेदारी भगवान विश्वकर्मा जी को दे दी इस प्रकार से एक तरह यह भी कहा जा सकता है कि भगवान विश्वकर्मा जी सृष्टि के वास्तुकार हैं।

    भगवान विश्वकर्मा के पुराणों और शास्त्रों के अनुसार पांचस्वरूप अर्थात अवतारों का वर्णन है। इन पांच अवतारों के नाम इस प्रकार हैं

    विराट विश्वकर्मा, धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरा वंशी विश्वकर्मा, सुधन्वा विश्वकर्मा ,मृग वंशी विश्वकर्मा।

    ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म थे तथा धर्म के पुत्र वास्तु देव थे। धर्म की वस्तु नामक स्त्री से शादी हुई धर्म और वस्तु के वास्तु सातवें पुत्र माने जाते हैं । वास्तु शिल्प शास्त्र के प्रेमी थे वास्तु देव की शादी अंगिरसी नामक युवती से हुई।वास्तु देव और अंगिरसी के पुत्र विश्वकर्मा थे ।

    भगवान विश्वकर्मा जी ने ही पृथ्वी पर शस्त्र ,अस्त्र और औजारों का निर्माण किया था ।

    भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर मशीन, पुर्जे ,हथियार , कारखानों में जो भी कार्य करने के समान होते हैं उन सभी का भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर पूजने का नियम होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है जितने भी काम करने के औजार कारखाने में होते हैं उन औजारों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी ने किया था।

    कोई भी छोटी दुकान , कारखाना या कोई भी छोटा कारीगर हो विश्वकर्मा जयंती पर अपने औजार अपने कार्य करने मशीन पुर्ज़ों का पूजन जरूर करता है।

    ै पुराणों में भगवान विश्वकर्मा जी की एक कथा प्रचलित है भगवान विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य का ताप इतना असहनीय था कि विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा को भगवान सूर्यदेव के समीप रहने में असमर्थता होती थी ।परेशान होकर संज्ञा अपने पिता की शरण में पहुंची और अपनी व्यथा अपनेपताजी विश्वकर्मा को सुनाई।

    भगवान विश्वकर्मा जी ने पुत्री संज्ञा के संकट को दूर करने के लिए सूर्य देव की सहमति से सूर्य देव को अपने शिल्प पहिए पर चढ़ाया और उनके अतिरिक्त तेज के आठवें भाग को तराश कर कम कर दिया जिससे सूर्य का रूप सौम्य और सहन करने योग्य हो गया।

    सूर्य देव के अलग किए गए उसी दिव्य तेज के अंशों से भगवान विश्वकर्मा जी ने ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली शस्त्रों का निर्माण किया इन शस्त्रों में भगवान विष्णु जी का सुदर्शन चक्र भगवान शिव जी का त्रिशूल और कार्तिकेय जी को शक्ति शामिल है।

    ऐसा माना जाता है लंका द्वारिका इंद्रपुरी और जगन्नाथपुरी की मूर्तियों का निर्माण भी स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने किया है।

  • दश लक्षण महापर्व

    दश लक्षण महापर्व जैन धर्म में मनाए जाने वाला आत्म चिंतन और आत्म शुद्धि का त्यौहार है।

    इस पर्व में आत्मा के दश उत्तम गुणों और उत्तम प्राप्ति के लिए मार्ग दिखाया जाता है। दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई व्रत, पूजा, संयम और वेद शास्त्रों का अध्ययन करते हैं दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाईयों का उद्देश्य मन, वचन काया को पवित्र करना और अपने कर्मों का पवित्र करना होता है।

    दश धर्म के नाम

    दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई प्रतिदिन हर धर्म की एक-एक दिन विशेष आराधना करते हैं। इन दश लक्षण धर्म के नाम इस प्रकार हैं।

    उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव , उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य।

    दश लक्षण महापर्व की शुरुआत दिगंबर जैन परंपरा में इसे आत्म शुद्धि संयम आत्म शुद्धि और आत्म अनुभूति का पर्व माना जाता है। भादो महीने के शुक्ल पक्ष में पढ़ने वाली पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक यह पर्व मनाया जाता है।

    पुराणों में कथा के अनुसार भगवान ऋगभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती जब अपनी विजय यात्रा पूरी करके अयोध्या लौटे तो उनका चक्र रत्न नगर में प्रवेश नहीं कर पा रहा था ।इसका कारण था उनके छोटे भाई बाहुबली का उनकी अधीनता स्वीकार ना करना ।इस वजह से दोनों भाइयों में युद्ध हुआ इस युद्ध में बाहुबली विजयि रहे उन्होंने भरत को अपने हाथों पर उठा लिया पर अचानक उन्हें संसार की क्षणभंगुर ता अहंकार के दुष्परिणाम और भाई प्रेम का भान हो गया।

    वाहुबली‌ ने भरत को नीचे धरती पर उतार दिया और राज पाट पद त्याग कर दिगंबर दीक्षा ले ली। कठोर तपस्या करने के बाद भी बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पा रही थी । बाहुबली के मन में सूक्ष्म रूप से यह मान शेष था कि उन्होंने अपने बड़े भाई को यद्ध में हराया है।

    जब बड़े भाई भारत को इसका आभास हुआ तो वह बाहुबली के पास पहुंचे और उन्होंने बाहुबली के चरण स्पर्श किए। अपने छोटे भाई को स्वयं के चरण स्पर्श करते देख बाहुबली का अहंकार समाप्त हो गया और उसके बाद बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई।

  • जीवन की मूलभूत जरूरतें

    हम सभी मनुष्य अपने जीवन को सरल और सुगम बनाना चाहते हैं इसके लिए निरंतर प्रयास भी करते रहते हैं।

    हर व्यक्ति अपने जीवन को खुशहाल बनाकर खुश रहना चाहता है।

    हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं भी होती है और समस्याओं का होना भी जरूरी होता है यदि हमारे जीवन में समस्या ना होती तो शायद मनुष्य जीवन की महत्व को समझ ना सके।

    इसी तरह मनुष्य की अपने जीवन में कुछ मूलभूत जरूरत है भी होती है जैसे कि एक छोटे बच्चे का अच्छी शिक्षा प्राप्त करना उसके जीवन की महत्वपूर्ण अपेक्षा है शिक्षा मनुष्य को जीवन का आधार देती है। शिक्षा से ही मनुष्य समाज में रहने के तौर तरीके सीखता है शिक्षा ही मनुष्य का सही मायने में निर्माण करती है तो इस तरह शिक्षा मनुष्य जीवन की महत्वपूर्ण अपेक्षा माना गया है ।

    मूलभूत आवश्यकता

    इसके अलावा मनुष्य के जीवन की मूलभूत आवश्यकता है में से तीन महत्वपूर्ण और जरूरी आवश्यकता भी हैं। इन तीन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से पहली आवश्यकता भोजन माना गया है।

    भोजन (रोटी)

    मनुष्य के जीवन का आधार भोजन पर भी टिका हुआ है मनुष्य बच्चे रूप में जब जन्म लेता है उसकी पहली आवश्यकता भोजन ही होता है ।

    जीवन को सुचारू रूप से चलने के लिए मनुष्य को भोजन की जरूरत पड़ती है यदि मनुष्य के पास भोजन नहीं होगा तो उसका जीवन से सुचारू रूप से नहीं चल पाएगा।

    यदि व्यक्ति अच्छा भोजन करता है तो उसने सोचने समझने की शक्ति आती है और कार्य को करने की समर्थ होती है पर बिना भोजन के मनुष्य के जीवन की कल्पना करना भी असंभव होगा।

    कपड़ा(वस्त्र)

    कपड़ा भी मनुष्य के जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं मैं से एक माना गया है। आदिमानव के समय से ही मनुष्य ने कपड़ा पहनना सीख लिया था आदिमानव के समय में मनुष्य जानवरों की खाल को अपने शरीर को ढकने के काम मेलेने लगा था ।

    समय के साथ-साथ मनुष्य ने तरक्की की है परंतु आज भी वस्त्र हमारे शरीर को ढकने यह काम में आता है सर्दी के दिनों में सर्दी से बचाव के लिए हम उन्हीं कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं।

    मकान

    प्राचीन समय से ही मनुष्य गुफाओं में रहते आया है मनुष्य को खुले में रहने से जंगली जानवरों से डर लगता था इसलिए अपने बचाव के लिए मनुष्य मैं गुफाओं में रहना शुरू कर दिया था

    आज के वक्त में इंसान ईंट पत्थरों से मकान बनाकर उसमें रहने लगा है मकान में रहने से व्यक्ति सुरक्षित रहता है सर्दी गर्मी और बरसात इन मौसम से बचने के लिए मकान एक महत्वपूर्ण आवश्यकता हो चुकी है।

    अतः मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक माना गया है और जो की बहुत जरूरी भी है।

    शिक्षा

    मूलभूत आवश्यकताओं के अलावा शिक्षा भी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं का अंग माना गया है शिक्षित व्यक्ति अपने अच्छे आचरण से समाज की भलाई कर सकता है।

    शिक्षा मनुष्य के जीवन कोई एक नया आधार देती है और मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाने में सहायक भी होती है।

    बिना मूलभूत आवश्यकताओं के मनुष्य जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है ।

  • लक्ष्य प्राप्त करना सिखिए

    हर व्यक्ति कुछ बड़ा करना चाहता है पर हममें से कई व्यक्ति सिर्फ सोचते ही रहते हैं और आजकल आजकल करते हुए समय बर्बाद करने में लगे रहते हैं।

    हममें से कुछ व्यक्ति अपने जीवन में कुछ बड़ा करने की चाहत रखते हैं ।कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसके बारे में सोचते हैं वैसे भी कहा। गया है सोचो तो कुछ बड़ा ही सोचो।

    एक व्यक्ति है जो कि कुछ बड़ा करना चाहता है कुछ बड़ा करने की सोचते हुए अपने जीवन में आने वाली छोटी बड़ी समस्याओं से जूझता है पर क्या उसके जीवन में सिर्फ वही एक काम है ऐसा बिल्कुल नहीं है हर किसी के जीवन में कुछ समस्याएं भी होती हैं जिससे लड़ते हुए जो व्यक्ति आगे निकल जाता है वहीं अपने जीवन में कुछ बड़ा कर जाता है और कुछ लोग जीवन भर समस्याओं मे घिरे रह जाते हैं ।

    सबसे पहले हमें यह समझना होगा कुछ बड़ा करने के लिए हमें बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। हमने जो अपना लक्ष्य बनाया है वह लक्ष्य एक या दो रातों में नहीं मिल जाएगा बल्कि लंबे समय तक अपने लक्ष्य के लिए कठिन प्रयास करना होगा और उसके लिए सबसे पहले हमें अपने आरामदायक जीवन को त्यागना पड़ेगा।

    कभी-कभी हम किसी को देखकर उसके जैसा बनना चाहते हैं । हमें बेहतर तरीके से समझना होगा क्या वाकई में हम कुछ करना चाहते हैं या हमारे अंदर की सिर्फ एक ज़िद करने की आदत है।

    लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें कुछ नियम बनाने होंगे और नियमों को लगातार जारी रखना होगा इनमें से कुछ नियम

    consistency (लगातार कोशिश करना)

    कंसिस्टेंसी क्या होती है सबसे पहले हमें समझना होगा जब किसी काम को लगातार करते हैं तो यही कंसिस्टेंसी कहलाता है । किसी भी बड़े काम को करने के लिए उस कार्य को लगातार करते रहना चाहिए ।कंसिस्टेंसी की वजह से हम किसी कार्य को करने में बेहतर होते चले जाते हैं।

    लेकिन कंसिस्टेंसी में कभी-कभी इंसान ऊपर उठता है और नीचे गिरता भी है पर जो व्यक्ति सही मायनों में कुछ बड़ा करना चाहते हैं वह इस सबसे डरते नहीं बल्कि उठते गिरते आगे बढ़ते जाते हैं। इस प्रकार हमें यह भी समझना होगा किसी भी बड़े काम करने में इंसान एक बार में ही सक्सेस नहीं हो सकते।

    patience

    आज के युवाओं को कुछ भी बड़ा काम करने के लिए सबसे पहले पेशेंस रखना सीखना होगा जितना पेशेंस व्यक्ति के अंदर होगा वह उसको काम करने में उतना ही सहायता देगा।

    कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके अंदर पेशेंस की भारी कमी होती है इसकी वजह से वह अपने काम के बीच में आने वाली रुकावटों को देखकर ही घबरा जाता है और अपने बड़े काम को करने के सपने को पूरा नहीं कर पाता।

    इसलिए बड़े काम को करने की सबसे दूसरी महत्वपूर्ण चीज पेशेंस होना जरूरी है क्योंकि बिना पेशेंस के हम कुछ ही समय में अपने कुछ बड़ा करने की चाहत को खत्म कर देंगे।

    Failure

    किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने में समय लगता है लक्ष्य प्राप्त करने के दौरान कभी-कभी फेलियर का सामना भी करना पड़ता है फेलियर का सामना करते वक्त जो व्यक्ति घबराते नहीं बल्कि फेलियर का डटकर सामना करते हैं।

    लक्ष्य को हासिल करने के दौरान फेलियर का सामना करना भी व्यक्ति को दिमागी तौर पर मजबूत बनाता है जोकि उसके लिए फायदेमंद साबित होता है क्योंकि फैलियर होने पर भी हमें अनुभव मिलते हैं और यही अनुभव हमारे जीवन में हमें आगे बढ़ने का मौक़ा भी देते हैं।

    positive soch

    लक्ष्य प्राप्त करने के वक्त में व्यक्ति को अपने दिमाग में नकारात्मकता को निकालना होगा क्योंकि एक नकारात्मक सोच ही हमारे पूरे दिमाग को खराब कर देती है और इस तरह हम अपने बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने में रुचि नहीं लेते ।

    दिमाग को पॉजिटिव रखना सीखना होगा क्योंकि हमारा दिमाग जितना सकारात्मक रवैया रखेगा उतना ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में उत्साहित रहेंगे।

    लक्ष्य प्राप्त करने में छोटी बड़ी बाधाएं आती हैं अगर व्यक्ति की सोच सकारात्मक होगी तो वह हर बड़ी से बड़ी बाधा में भी अच्छा प्रर्दशन कर सकता है और मुश्किलों में भी अवसर ढूंढ निकालेगा और सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कभी भी हताश नहीं होता क्योंकि सकारात्मक सोच से व्यक्ति को साहस मिलता है।

    अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में व्यक्ति को दृढ़ निश्चयि होना चाहिए क्योंकि इंसान को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के दौरान अच्छे बुरे समय को भी देखना पड़ता है

    लोगों द्वारा उपहास भी उड़ाया जाता है ऐसे में व्यक्ति का साहसी सकारात्मक होना और दृढ़ निश्चयि होना जरूरी होता है।

    लक्ष्य प्राप्त करने में व्यक्ति को बहुत-कुछ अच्छे बुरे अनुभव मिलते हैं कभी-कभी व्यक्ति हार मान लेता है हतास हो जाता है इस तरह की रुकावटें आती हैं लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में और जो व्यक्ति इन सब रूकावटों से ऊपर उठ जाता है वही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

  • क्रोधित स्वभाव और हंसमुख स्वभाव।

    मनुष्य फितरत ही ऐसी है कि वह नकारात्मक बातों पर जल्दी क्रोधित होकर अपना आपा खो देता है। हमारे दिमाग में एक नकारात्मक बात हर अच्छी बात पर शक करने लगती है।

    अचानक कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति के क्रोधित स्वभाव के कारण हमारा भी दिमाग खराब होता जाता है।

    कुछ व्यक्ति झगड़ालू प्रवृत्ति के ईर्षा प्रवृत्ति के और कुछ शक्की मिजाज के होते हैं ऐसे व्यक्तियों की सोच नकारात्मक होती है ऐसे व्यक्तियों का पूरे दिन बात बात पर लड़ाई करना इनकी आदत बन चुका होता है।

    नकारात्मक व्यक्तियों को किसी अन्य व्यक्ति का हंसना बोलना और उसका जरा सा भी सफल होना अच्छा नहीं लगता। नकारात्मक व्यक्तियों की सोच हर वक्त दूसरों के बारे में बुरा सोचना आदत बन जाता है और दूसरों की बुराई करना इन्हें बहुत अच्छा लगता है।

    अपने क्रोधित स्वभाव के कारण यह स्वयं अपने जीवन में औरों से बहुत पीछे रह जाते हैं। इस कारण इनके व्यवहार में नकारात्मकता साफ झलकती है।

    नकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपने जीवन की हर असफलता को दूसरों के सर मढ़ता है और अपनी नाकामियों को छुपाता भी है।

    नकारात्मक होना कमजोर मानसिकता की पहचान है नकारात्मक व्यक्ति अपने जीवन में समस्याओं से लड़ना ना चाह कर आलस को अपनाने लगते हैं।

    दूसरी तरफ हंसमुख स्वभाव का सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हमेशा दूसरों का भला सोचता है और दूसरों की मदद करने में आगे रहता है।

    सकारात्मक सोच के कारण ऐसे व्यक्तियों की समाज में अलग ही पहचान होती है और इनके सामाजिक संबंध अच्छे रहते हैं।

    हंसमुख स्वभाव के कारण व्यक्ति की सफलता भी निश्चित होती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर समस्या से निपटने का हौसला रखते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव और हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति नकारात्मक स्वभाव के व्यक्ति से दूर रहने में ही अपनी भलाई जानता है और इसी वजह से हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति क्रोधित स्वभाव के व्यक्तियों की बातों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते।

    हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति जानता है शांति पाने के लिए बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शांत रहना वह जानता है की हर बात का जवाब नहीं दिया जाता कुछ फालतू की बातों को जाने दो।

    बहस में ना पड़कर अपने समय को व्यर्थ ना करके ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए एक नई सोच को अपनाते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को नहीं देखता बल्कि साहस के साथ अपनी हर परेशानी में एक अवसर ढूंढता है।

    हसमुख स्वभाव के व्यक्ति की मानसिक स्थिति मजबूत होने की वजह से वह अपने पूरे जीवन में हर वक्त खुश और शांति महसूस करता है।

    इसलिए हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपना रवैया सकारात्मक बनाएं या नकारात्मक।

    सकारात्मक व्यवहार मनुष्य को नए नए अवसर प्रदान करता है।

  • कण कण में भगवान

    आस्था से और विश्वास से भरा हुआ व्यक्ति अपने चारों भगवान की बनाई हुई इस दुनिया के हर कण में प्रभु को पाता है और ऐसे व्यक्ति का विश्वास कहता है की संसार के हर कण मे भगवान हैं।

    ऐसी कई कथाएं प्रचलित हैं जब भक्त को भगवान के हर कण मे दर्शन हुए हैं।

    प्राचीन काल में एक समय की बात है धर्मकेतु नाम के राजा थे राजा को अपने राजा होने का उनके वैभव और शक्ति का बहुत ही अभिमान था इस कारण राजा धर्मकेतु गरीबों को हेय दृष्टि से देखते थे और गरीबों की दुर्दशा का मज़ाक़ बनाते।

    एक बार की बात है राजा धर्मकेतु के महल में एक तपस्वी साधु आए। साधु को देखकर राजा धर्मकेतु ने पहले तो क्रोध में देखा और फिर क्रोधित स्वर में साधु महाराज से कहा कि हे साधु तुम्हारे पास मुझे देने के लिए ऐसा क्या खास है जो तुम मेरे महल में आ गए।

    तपस्वी साधु राजा द्वारा उड़ाए गए उपहास को सहन करके और चुपचाप राजा के महल से वापस लौट गए।

    रात्रि के वक्त राजा ने स्वप्न देखा स्वप्न में राजा ने अपने महल को खाक होते देखा। महल के धूल में बदलने के बाद तपस्वी साधु को भी देखा तपस्वी साधु के पीछे भगवान विष्णु भी खड़े दिखाई दिए ।साधु मौन रूप में खड़े खड़े भगवान के चरणों की तरफ संकेत कर रहे थे की तभी राजा की आंख खुल गई। अजीब सा सपना देखने के कारण राजा धर्मकेतु भयभीत होकर कांप रहा था ।

    राजा को पिछले दिन की बात याद आ गई जब उसने तपस्वी साधु को बेइज्जत किया और साधु का उपहास उड़ाया था। राजा धर्मकेतु समझ गया कि वह तपस्वी साधु कोई साधारण साधु नहीं था बल्कि उस साधु के अंदर स्वयं भगवान विष्णु जी का निवास है । यह सोच समझ कर और अपने किए हुए व्यवहार पर अफसोस करते हुए राजा धर्म केतु नंगे पैर उस तपस्वी साधु की कुटिया की तरफ भागने लगा और कुटिया पहुंचकर तपस्वी साधु के चरणों में सर रख दिया ।

    राजा धर्मकेतु तपस्वी साधु से अपने किए गए बुरे व्यवहार के लिए माफी मांगने लगा और तपस्वी साधु से कहने लगा साधु महाराज मैं आपके दिव्य रूप को देख चुका हूं और मुझे आपके अंदर श्री विष्णु जी के दर्शन हुए।

    इस पर तपस्वी साधु ने कहा हे राजा तुम जिस दिन हर जीव जंतु में हर प्राणी में और संसार के हर कण में प्रभु के दर्शन देखना सीख जाओगे उस दिन तुम एक सच्चे इंसान बन जाओगे और मानव कल्याण के,जीव कल्याण के हित के बारे में भी भला सोचने लगोगे और इस तरह तुम्हारा भी कल्याण होगा।

    तपस्वी साधु से यह वचन सुनकर राजा धर्मकेतु का उस दिन के बाद से जीवन बदल गया और जीवन के प्रति नजरिया भी बदल गया ।

    अब धर्मकेतू राजा गरीबों के कल्याण की सोचने लगे ,अपने राज्य के विकास के बारे में भी अच्छा सोचने लगा।

    इस कहानी से हमें यह समझ आता है कि मनुष्य को हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए बल्कि अपने अलावा सभी जीव जंतुओं के प्रति इंसानों के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।

    हर कण में भगवान है यह सोचकर हमें इस प्रकृति का भी धन्यवाद कहना चाहिए जो हमारे जीवन को सरलता और सुगमता से जीने में सहायक है ।

  • इंसान के दो चेहरे

    हमारे सामने देखने में एक इंसान होता है पर असल में उस इंसान की दो चेहरे होते हैं और हर व्यक्ति दो चेहरे रखता है।

    हम देखते हैं कुछ इंसान हर वक्त खुशमिजाज रहते हैं ।उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो जैसे की उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है।

    पर सच तो यह होता है कि व्यक्ति अपने चेहरे को हंसमुख बनाए रखता है जिस कारण हम उसके चेहरे के पीछे छुपी हुई सच्चाई को समझ नहीं पाते।

    कुछ मनुष्य के कर्मों से हम उनके बारे में कई प्रतिक्रिया बना लेते हैं और इसी आधार पर हम उसके बारे में अपने दिमाग में उसके रूप को भी समझने लगते हैं पर जब कभी भी वह इंसान अपने कर्मों से कुछ अलग करने लगता हैं तो दूसरे व्यक्तियों के मन मे उस व्यक्ति की बनाईं हुई शख्सियत को देखकर हम उस व्यक्ति से नफ़रत करने लगते हैं ।

    हम यह भूल जाते हैं कि शायद उस व्यक्ति की भी कुछ समस्याएं होंगी जिस कारण उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना पड़ा।

    वहीं कुछ व्यक्ति अपने दूसरे रूप को समाज से छुपाते हैं ।जैसे की कुछ व्यक्ति समाज में दयालु भाव को रखते हैं पर असल जीवन में वह काफी क्रोधित स्वभाव के होते हैं और समाज में अपने क्रोधित स्वभाव को इसलिए छुपाते हैं ताकि उनके दयालु भाव को देखकर जो उनकी समाज में प्रतिष्ठा है वह कहीं धूमिल ना पड़ जाए।

    इसी तरह कुछ व्यक्ति कम बातचीत करने वाले समाज से कम मिलने जुलने वाले होते हैं । ऐसे व्यक्ति हमें घमंडी और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के लगते हैं जबकि वह बहुत ही दयालु प्रवृत्ति के होते हैं।

    इसलिए हमें हर इंसान को उसके द्वारा किए गए व्यवहार से उसके प्रति धारणाएं नहीं बनानी चाहिए बल्कि हमें हर इंसान के चेहरे के पीछे छुपे दूसरे चेहरे को भी देखने की कशिश करनी चाहिए।

    इसी पर आधारित एक छोटी सी कहानी है।

    एक साहूकार था जिसके पास बहुत जमीन थी। वह साहूकार स्वभाव से कम बोलता था और लोगों से बात भी तभी करता जब उसको कोई काम पड़ता उसके इस व्यवहार की वजह से आसपास के व्यक्ति उसको घमंडी और मतलबी समझते थे।

    घमंडी और मतलबी समझने के कारण उस साहूकार से कोई व्यक्ति ज्यादा नहीं बोलता था।

    एक बार की बात है साहूकार की जमीन पर आम के बहुत सारे वृक्ष लगे थे और उन वृक्षों पर बहुत सारे आम के फल भी थे ।वृक्षों पर लगे आम के फलो को देखकर एक दिन कुछ बच्चे वृक्षों पर चढ़कर आम तोड़ने लगे की तभी साहूकार वहां आ गया ।साहूकार को आते देख बच्चे डर गए और इस कारण बच्चे वृक्ष पर से नीचे गिर पड़े बच्चों को नीचे गिरने की वजह से चोट भी आईं।

    साहूकार ने जल्दी से बच्चों के लिए इलाज मुहैया करवाया और बच्चों की सही से देखभाल भी की ।जब यह बात बच्चों के परिवारजन को पता चली तो सभी उस साहूकार के प्रति मन में बनाई घमंडी और मतलबी साहूकार के रूप को गलत मानने लगे और उसे दिन उन्हें समझ में आया जिस साहूकार को वे घमंडी और मतलबी समझते थे वह साहूकार तो बहुत दयालु निकला।

    यह कहानी हमें समझाने के लिए है कि हमें किसी भी व्यक्ति को उसके व्यवहार से नहीं समझना चाहिए बल्कि हमें उसके असल रूप को देखने की कोशिश करनी चाहिए।

    अगर हम केवल सफल लोगों के प्रति सम्मान रखते हैं और गरीब लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं तो इसमें हमारी ही गलती है।

    समाज में एक पुरानी धारणा है कि जो व्यक्ति सफल है वह व्यक्ति सब की नजरों में होशियार और समझदार है और अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में असफल है तो उसका सभी मजाक उड़ाते हैं।

    समाज की पुरानी धारणाओं से बाहर निकल कर हमें असली सच को समझना होगा। जब हम सच को देखने की कोशिश करने लगते हैं तब हमें हर व्यक्ति के दो चेहरे साफ साफ दिखाई देगा।