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  • आत्मज्ञान

    धरती पर सभी जीव-जंतु और प्राणियों में मनुष्य का जीवन संसार में एक ऐसा जीवन है जो जीवन ही नहीं जीता बल्कि अपने आस्तित्व के होने और न होने पर भी सवाल जवाब करता है और इस पर चर्चाएं भी करता है ।मनुष्य मन कभी-कभी अपने दिमाग में भी अपने जीवन से जुड़े कई सवालों का जवाब ढूंढने की तलाश में रहता है।

    इस धरती पर लाखों करोड़ों किस्म के जीव-जंतु है जिनमें से मनुष्य ही अपने जीवन के जन्म और मरण के बारे में जानता है इसलिए शायद मनुष्य जीवन जीव जंतुओं के जीवन से अलग जीवन है।

    मनुष्य और जीव-जंतुओं की तरह सिर्फ खाने को ही अपना जीवन नहीं समझता बल्कि अपने जीवन को बेहतर तरीके से जी सके इसके लिए योजना बनाता है व्यवस्थाएं करता है।

    और शायद जीवन मरण को जानने के तत्पश्चात् ही मनुष्य ने आगे के भविष्य को बेहतर करने के लिए नई-नई खोज करना सीखा। इन खोजों में मनुष्यों ने स्वयं के जीवन में अचानक आई आपदाओं से लड़ना भी सीखा और इसके साथ जीवन की हर घटना से सबक भी लिया।

    मनुष्य के पास सब कुछ होने के बावजूद मनुष्य खुश रहना नहीं सीख पाया हर वक्त भागते रहना ही जीवन बन चुका है।

    जीवन क्षणभंगुर है यह जानने के बाद भी मनुष्य अपने जीवन को नहीं जीता बल्कि दूसरे के जीवन में हो रही घटनाओं में शामिल होकर अपने समय को बर्बाद करता रहता है ।

    मनुष्य हर वक्त भविष्य की बेहतर योजनाओं में ही फंसा रहता है तो कभी बीते कल में हुई घटनाओं में खो जाता है इस तरह मनुष्य वर्तमान को जीना समझ नहीं पता।

    कुछ पल के लिए अगर मनुष्य यह सोचे कि वाकई में वह वही जीवन जी रहा है जो कि उसे जीना चाहिए तो शायद उसके अंतर मन से जवाब असंतुष्टि का मिलेगा क्योंकि हम अपने जीवन को दूसरों को खुश करने के लिए या दिखावे के लिए जी रहे होते हैं जबकि इस सत्य से मनुष्य भली भांति परिचित है कि हर व्यक्ति के पास जीवन की सीमा तय है तो क्यों न व्यक्ति को अपना जीवन जीने में ही आनंद लेना सीखना होगा।

    जिस तरह से हर सुबह सूरज निकलता है और शाम होने पर अस्त भी हो जाता है ठीक उसी प्रकार इंसान का जीवन भी जन्म लेकर धीरे-धीरे मरण की और बढ़ता है इस जीवन मरण की सीमा को समझकर व्यक्ति अपने जीवन को मूल्यवान बन सकता है ।

    मृत्यु सत्य को स्वीकार कर लेने से मनुष्य का जीवन के प्रति नजरिया बदलने में भी आसानी होगी और यहीं से मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति भी मिलने लगती है।

    आत्मज्ञान प्राप्त करने का एक और साधारण सा तरीका है रोज सुबह यदि व्यक्ति कुछ क्षणों के लिए आंख बंद करके और मौन होकर ध्यान करता है तो भी उसे धीरे-धीरे आत्मज्ञान मिलने लगता है

    मनुष्य को जब आत्मज्ञान धीरे-धीरे प्राप्त होता है तो वह मनुष्य जाति और जीव जंतुओं के प्रति निस्वार्थ सेवाभाव रखने लगता है और सच्ची शांति महसूस करने लगता है।

    आत्मज्ञान का मतलब मनुष्य के स्वयं के जीवन को लेकर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति और जीव जंतुओं को प्रति है। आत्मज्ञानी व्यक्ति मनुष्य के बीच ऊंच नीच, उच्चजाति निम्न जाति जैसे भेदभाव को नहीं रखता मैं मनुष्य को सिर्फ मनुष्य ही समझता है ना कि किसी विशेष धर्म का।

    आजकल के वक्त में मनुष्य स्वार्थ से भरा जीवन जीने लगा है जिसमें वह सिर्फ अपने ही भलाई का अवसर ढूंढता रहता है और साथ में अपने सगे संबंधियों का बुरा सोचता रहता है।

    मनुष्य के पास महंगे से महंगे संसाधन होने के बाद भी मनुष्य अपने अंतर मन से शांति महसूस नहीं कर पाता हर वक्त कोई न कोई चिंता उसे सताती ही रहती है।

    खुद को खोज लेना भी मनुष्य के लिए आत्मज्ञान कहलाता है खुद को खोज लेने वाला व्यक्ति कभी भी किसी जीत के प्रति प्यास महसूस नहीं करता और अगर उसके पास कुछ ना हो तो भी वह व्यक्ति परेशानी या चिंता महसूस नहीं करता ऐसा व्यक्ति अपने जीवन के हर पल में आनंद ही आनंद लेता है।

    सही मायने में सच्चा आत्मज्ञानी व्यक्ति या स्वयं को खोज लेने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन को बेहतर तरीके से समझकर कृत्रिम दुनिया के सुख और सच्चे सुख में अंतर को समझ लेते हैं।

    यदि मनुष्य के अंदर कोई जीत प्राप्त करने की चाहत होती है और उस जीत को हासिल करने के बाद मनुष्य एक दूसरी मंजिल को हासिल करने की दौड़ में लग जाता है एक प्रकार से मनुष्य इस दौड़ से कभी संतुष्ट नहीं होता और इस वजह से वह जीवन की सच्ची शांति महसूस नहीं कर पाता।

    मनुष्य अपनी मेहनत और लगन से सब कुछ हासिल कर लेता है परंतु इस सब के बाद भी अंदर से खालीपन महसूस होता रहता है जो की साधारण मनुष्य इस खालीपन की वजह को नहीं समझ पाते।

    जीवन के अर्थ को समझने वाले व्यक्ति अपनी हर स्थिति में संतुष्ट रहना जानते हैं ऐसे लोगों को फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने लोगों से पीछे है या उनके पास कोई भी बड़ी उपलब्धि नहीं है।

    जिस दिन मनुष्य यह समझ जाएगा की मन की शांति के लिए महंगे संसाधन की जरूरत नहीं होती बल्कि सच्चा सुख दूसरों की मदद करने में व जीव-जंतुओं की रक्षा करने में है तो वह व्यक्ति व्यर्थ की परेशानियों से बाहर निकल आयेगा ।

  • अपने निर्णय खुद लेना सीखें

    जब भी मनुष्य कोई निर्णय लेना चाहता है अपने किसी जरूरी काम के लिए। निर्णय लेते वक्त व्यक्ति कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है।

    असमंजस की स्थिति हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो आती है पर क्या ऐसे में हमें अपने जीवन के छोटे बड़े निर्णय लेना दूसरों से पूछ कर लेना होगा जब आप निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं तो आपका परिवार आपका समाज आपके दोस्त जैसा चाहते हैं अगर आप भी उनकी खुशी में अपने निर्णय को लेते हैं तो क्या यह आपके जीवन के लिए धोखा नहीं कहलाता । यहां यह सब कहने का मतलब ऐसा नहीं है कि हमें अपने परिवार की और समाज की बातों को सुनना समझना नहीं चाहिए समय-समय पर हमें अपने परिवार और समाज की बातों को सुनकर भी निर्णय लेने चाहिए।

    व्यक्ति माने या ना माने परंतु जब आप अपने छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए सहारा ढूंढते हैं तो आपको आदत पड़ जाती है इस सहारे की ।आपके जीवन के हर निर्णय को स्वयं से लेने में आप असहाय सा महसूस करने लगते हैं आपको अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर संदेह रहने लगता है जो कि आपके स्वयं के विश्वास के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।

    जब व्यक्ति अपने जीवन के भी छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए भी सहारे पर निर्भर रहता है तो एक तरह से वह अपने मानसिक विकास और स्वयं की तरक्की मे स्वयं से धोखा भी कर रहा होता है क्योंकि जब तक कोई भी व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना नहीं सीखेगा वह जीवन भर अज्ञानी बनकर रह जाएगा।

    कोई भी अपने कार्यों के निर्णय दूसरों से पूछ कर लेता है तो वह व्यक्ति अंदर से डरा और सहमा हुआ भी रहने लगता है और खुद पर पूरी तरह से विश्वास भी नहीं कर पाता ऐसे व्यक्तियों की छवि समाज में भी अविश्वसनीय लोगों में गिनी जाती है ।

    स्वयं पर विश्वास न करके मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धोखा खुद से ही करता है यदि व्यक्ति अपने डर से बाहर निकलकर खुद पर विश्वास रखते हुए अपने छोटे-छोटे निर्णयों को खुद से लेना सीखता है तो उसे अच्छे हो बुरे की समझ होने लगती हैऔर बिना यह सोचे कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय सही साबित होंगे या ग़लत तो उसके अंदर विश्वास बनता जाएगा और वह खुद पर विश्वास भी करने लगेगा।

    जब व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखता है तो ऐसे व्यक्ति का जीवन के प्रति नजरिया भी बदल जाता है और वह छोटे-छोटे जोखिम लेना भी शुरू कर देता है।

    व्यक्ति को अपना अच्छा बुरा स्वयं से सोचना सीखना होगा तभी व्यक्ति अपने जीवन का भरपूर आनंद ले सकेगा।

    मनुष्य जब भी दूसरों के निर्णयों में अपनी हां मिला देता है तो कहीं ना कहीं अंदर से वह व्यक्ति दुख महसूस करने लगता है दूसरे व्यक्ति आपके जीवन के निर्णय को लेने में अपना नजरिया लगाते हैं जबकि वे लोग कभी यह नहीं जान पाएंगे कि आपकी खुशी कैसे निर्णयों में होगी।

    इस पृथ्वी पर हर व्यक्ति को अपने निर्णय लेने का पूरा अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है तो ऐसे में कोई व्यक्ति अपने जीवन के खास निर्णय को लेना दूसरों पर क्यों डाल देता है व्यक्ति को समझना होगा की जीवन उसका है तो निर्णय लेने का हक भी उसका ही होना चाहिए ।

    व्यक्ति अपने जीवनकाल में बहुत कुछ हासिल कर लेता है यदि वह अपने निर्णय को लेना सीख जाता है निर्णय लेने से व्यक्ति सही गलत की पहचान करना सीखता है और आत्म विश्वासी बन जाता है।

    अगर आप भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हो तो अपने निर्णय दूसरों कि कहने पर लीजिए । पर क्या कभी सोचा है कि क्या दूसरों के आपके जीवन के निर्णय लेने से आप वही बनेंगे जो आप चाहते थे तो उसका जवाब होगा नहीं आप वह नहीं बन पाएंगे जो जो छवि आपने लिए अपने मन में बनाई है आप भी उस भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे जिसमें व्यक्ति जीवन भर अपनी समस्याओं में घिरे रहता है वह व्यक्ति हर पल हर दिन अपनी खुशियों का गला घोंटता है और नसीब का रोना रोता रहता है।

    ऐसे व्यक्तियों को कभी पता नहीं चल पाता कि उनके जीवन के दुख का वास्तविक कारण क्या है वह हमेशा दुख को अपना नसीब समझकर पूरा जीवन जी लेते हैं।

    यह विडंबना एक व्यक्ति कि नहीं बल्कि पूरे समाज की है व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं से न लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और अपनी इस घटिया सोच की आदत को अपने बच्चों को भी सिखा देता है।

    इस प्रकार एक व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय को स्वयं से न लेकर खुद को तो दुखी रखता है साथ में अपनी आने वाली पीढ़ी को भी आगे न बढ़ने के रास्ते नहीं समझा पाता है।

    अपनी पुरानी और घटिया सोच से बाहर निकलने का रास्ता शुरुआत में थोड़ा कठिन लगता है और मुश्किल भी लगता है हो सकता है स्वयं से निर्णय लेने से आपको कुछ नुकसान भी हो परंतु स्वयं से निर्णय लेने से एक बात तो तय है कि आप अपने जीवन के बारे में सही ढंग से समझने लगते हैं और कभी ना कभी आप अपने निर्णय लेने से वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे जो आपके मन में सपने की तरह हर पल रहा होता है।

    मनुष्य को अपने निर्णय लेना सीखकर एक नया मुकाम हासिल करना चाहिए और खुद को भीड़ का हिस्सा बनने से रोकना होगा।

    जो व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीख जाता है तो ऐसे व्यक्ति और व्यक्तियों की निगाह में सम्मान जनक जगह बना लेते हैं और ऐसे व्यक्तियों की वजह से समाज भी तरक्की करने लगता है।

    अतः हमें अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखना होगा और साथ ही दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिए गए निर्णयों का भी सम्मान करना सीखना होगा।

    अपने से छोटों और परिवार में बच्चों के द्वारा लिए गए सही निर्णय लेने की हिम्मत को सराहना भी चाहिए और इसके अलावा बच्चों और छोटों को सही और बूरे निर्णय लेने में फर्क भी बताना होगा क्योंकि बुरे निर्णय लेने से हम कहीं ना कहीं अपना और अपने से जुड़े व्यक्तियों का बुरा भी कर रहे होते हैं इसलिए हमें निर्णय लेते वक्त समझदारी से काम लेना होगा।

  • जीवन का आत्मज्ञान

    यह जीवन हमारे लिए एक यात्रा के समान है और हम मनुष्य जीवन यात्रा के यात्री हैं। हम सब यह तो अच्छे तरीक़े से जानते हैं की जो ‌ मनुष्य इस यात्रा पर आया है एक न एक दिन अपनी यात्रा खत्म करके जाएगा तो फिर क्यों ना हम इस यात्रा को आनंद के साथ पूरी करें और जीवन में आत्मज्ञान भी लेना सीखें।

    हर मनुष्य में किसी भी कार्य व वस्तु के प्रति जानने की इच्छा होती है। कभी-कभी किसी चीज को जानने के प्रति उत्सुकता ही व्यक्ति को उसके अंदर की अपने अंदर की क्षमता और सामर्थ्य की पहचान कराती है और फिर व्यक्ति सामर्थ्य के अनुसार अपनी प्रतिभा को पहचानने की कोशिश करके अपनी उपलब्धियां को बढ़ाना भी चाहता है।

    मनुष्य के अंदर आत्मज्ञान की शुरुआत यही से होती है जब मनुष्य की प्रतिभाओं की प्रशंसा होने लगती है तो ऐसे में वह व्यक्ति‌ घमंड और जोश में ना पड़कर स्वयं को आगे बढ़ा कर सर्वप्रथम स्वयं की प्रतिभाओं का निरीक्षण करने लगता है और अपनी कमियों पर भी ध्यान देता है व्यक्ति समझ चुका होता है खुद को बेहतर बनाने का अर्थ । इसके बाद व्यक्ति खुद को और भी विशेष बनाते हुए आगे बढ़ता है और आत्मज्ञान की नई परिभाषाओं को गढ़ता है। मनुष्य का अपने गुणों को पहचानना अच्छी बात है पर इससे अच्छा मनुष्य को अपनी कमियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए और अपनी कमियों को सुधारने की निरंतर कोशिश भी करते रहना चाहिए।

    मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानकर और अपनी कमियों को सुधार कर एक नया और बेहतर इंसान बनते जाता है ।कभी-कभी कुछ व्यक्ति अपने गुणों का बखान स्वयं से करने लगते हैं और अपनी कमियों को समाज से छुपा कर रखते हैं ऐसे व्यक्ति समाज के साथ धोखा कर रहे होते हैं।

    यदि मनुष्य अपनी कमियों को लगातार छुपाए रखेगा और अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश नहीं करेगा तो ऐसे व्यक्तियों का आत्मज्ञान का अर्थ समझना अत्यंत कठिन होगा।

    हम जिस समाज में रहते हैं या फिर कहे कि हम जिन लोगों के साथ रहते हैं यह व्यक्ति हमारी उन कमियों को देखने में बेहतर होते हैं जिन कमियों को कभी हम देख और समझ नहीं पाते आमतौर पर आलोचक इन्हीं बातों के लिए जाने जाते हैं यदि व्यक्ति दूसरों के द्वारा बताई गलतियों को स्वीकार करते हुए और अपनी कमियों को सुधारता है तो यह उस व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा हो जाता है।

    कभी-कभी मनुष्य अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से न तो किसी की सुनता है और नाही अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश करता है पर जब कभी जिद्दी स्वभाव वाले व्यक्ति असफलता को देखते हैं तब उन्हें अपनी हार और असफलता के साथ अपने अंदर का यह गलत और जिद्दी रूप देखने को मिलता है और यह असफलता उनके जीवन में उन्हें सुधारने की वजह बन जाती है।

    यदि मनुष्य अपने द्वारा किए गए कार्यों का निरीक्षण बेहतर तरीके से करे और किये गए कार्यों के निरीक्षण के दौरान व्यक्ति अपने कार्य की कमियों को सुधारने की कोशिश करता है और अगली बार अपने कार्यों में यह गलती ना हो इसकी भी कोशिश करता है तो वह व्यक्ति बेहतर होते चले जाता है और उसके अंदर की प्रतिभाएं बढ़ती जाती हैं।

    जीवन को जीने का आनंद बढ़ाने के लिए व्यक्ति जितना स्वयं के कार्यों पर ध्यान देगा और दूसरों की जीवन में क्या हो रहा है इससे मतलब नहीं रखेगा तो शत प्रतिशत अपने जीवन में आगे बढ़ता ही जाएगा।

    यदि व्यक्ति आलोचकों से अपनी दोस्ती कर ले और आलोचकों की बात को गंभीरता से लेकर अपनी बुराइयों को खत्म करने लगता है तो उसका एक नया रूप बनता है यह रूप भी आत्मज्ञान की जरूरत है ।

    जीवन का मतलब सफल होना ही नही होता बल्कि जीवन तो एक यात्रा है और हमको इस जीवन के हर पल का आनंद लेना सीखना होगा

    जब हम यह समझ जाएंगे की जीवन में सफल होने से भी अलग और भी बहुत कुछ होता है जैसे की गरीब और असहाय लोगों के काम आना जरूरतमंदों की मदद करना समाज के सभी व्यक्तियों को एक नजर से देखना यह सभी मनुष्य के अंदर व्यवहार होना चहिए तभी मनुष्य जीवन की अर्थ को समझ सकता है और आत्मज्ञान के प्राप्त करने के मार्ग को समझेगा।

    जब व्यक्ति अपने अंदर की कमियों पर ध्यान देने लगता है तो वह अपने हर पल को बेहतर बनाते जाता है और इस तरह व्यक्ति अपने जीवन को भी बेहतर बना लेता है।

    बेहतर जीवन बेहतर व्यक्ति की प्रतिभाएं देख कर समाज के व्यक्ति भी उनसे जुड़ने लगते हैं । बेहतर व्यक्ति से जुड़े व्यक्तियों में भी अपनी प्रतिभाओं को पहचान की अपनी कमियों पर ध्यान देने की आदत बन जाती है और यह आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी होती है।

    आत्मज्ञान जीवन के अर्थ को समझने के बाद ही ही शुरू होता है इसका मतलब यह नहीं है की हर मनुष्य प्रतिभाशाली हो, खूबियों से भरा हो या सफल हो। एक साधारण व्यक्ति भी अगर अपने अंदर से स्वार्थ अधीरता और अपनी कमियों को खत्म करने लगता है तो वह व्यक्ति भी जीवन के आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

  • जय गणेश देवा

    हमारे देश में हर त्योहार को जोरदार और बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है गणेश भगवान के त्यौहार को भी भारतीय लोग धूमधाम से मनाते हैं।

    गणेश भगवान जो की बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। गणेश त्योहार महाराष्ट्र सहित पूरे देश में 12 दिनों तक मनाया जाता है यह त्यौहार गणेश चतुर्थी से प्रारंभ होकर गणेश चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

    हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है गणेश जी मूर्ति की स्थापना गणेश चौथ के दिन स्थापना करने से लेकर गणेश चतुर्दशी तक भगवान गणेश अपने भक्तोंके सारे दुःखों को हर लेते हैं साथ ही भक्तजन की विनती को भी स्वीकार करते हैं।

    गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मिट्टी की बनी हुई मूर्ति का भक्तों द्वारा गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। भगवान गणेश जी की मूर्ति की स्थापना से लेकर विसर्जन तक भक्त अपने गणेश जी का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करते हैं और उनकी सेवा भी करते हैं।

    12 दिन के गणेशोत्सव में भक्त और भगवान का गहरा रिश्ता बन जाता है और अपनापन जुड़ने की वजह से जब गणेश मूर्ति का विसर्जन किया जाता है तो कई भक्त की आंखें नम हो जाती है।

    गणेश चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है गणेश प्रतिमा के विसर्जन के समय अपने भगवान को विदाई देते वक्त भक्तों की आंखों में आंसू भी दिखाई पड़ते हैं।

    अगले बरस फिर से आना ऐसे जयकारे बोलते हुए भक्त ढोल नगाड़ों के साथ विधि विधान से पूजा अर्चना और आरती के बाद अपने भगवान गणेश जी का विसर्जन करने ले जाते हैं।

    भगवान गणेश जी की मूर्ति विसर्जन के वक्त पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा जाता है इसके लिए कृत्रिम कुंड भी बनाए जाते हैं जिससे कि पर्यावरण से बचा जा सके और भक्तों की आस्था को भी ठेस ना पहुंचे।

    भगवान गणेश से जुड़ी हुई एक कथा है जो कि इस प्रकार है।

    भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है जब भक्तों के जीवन से दुखों को हर लेते हैं इस वजह से भगवान गणेश जी विघ्नहर्ता नाम से पहचाने गया।

    कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है नरांतक और देवांतक नाम के दो असुर थे। दोनों असुरों ने देवताओं और ऋषि मुनियों के जीवन से शांति खत्म कर दी ।असुरों के आतंक से ऋषि मुनि अपने तप और साधना भी नहीं कर पा रहे थे और देवताओं को भी दोनों असुरों का संकट खत्म करने का और उनसे छुटकारा मिलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था । असुरों ने अपनी शक्ति और बल के आधार पर देवताओं ऋषि मुनियों को और साधुओं को अपने आतंक से भयभीत कर दिया था इस कारण तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मच गई थी अशांति फैल गई थी देवताओं साधुओं और ऋषि-मुनियों के मन मे डर का माहौल बन गया था।

    असुरों से निपटने और शांति चाहने के लिए जब देवताओं को कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वे सब भगवान गणेश जी की शरण में पहुंच गए और गणेश जी से मदद की गुहार लगाने लगे देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा असुरों से संकट मुक्त कराइए ।

    भगवान गणेश जी ने अपने भक्तों की पुकार सुनकर दिव्य रूप धारण कर लिया भगवान गणेश जी के दिव्य तेज को देख कर देवता और ऋषि मुनि भी नतमस्तक हो गए भगवान गणेश जी ने अपने दिव्य पराक्रम से दोनों असुरों को युद्ध में हरा दिया और दोनों असुरों का नाश करके धर्म और सत्य को विजय दिलाई।

    असुरों का अंत होने के बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा कि हे प्रभु अब आप ही हम सभी के विध्नों को हरने वाले हैं अतः आप ही अब विघ्नहर्ता कहलायेंगे।

    भगवान गणेश जी अपने भक्तों के संकट को हरने में जरा भी देर नहीं लगाते।

    भगवान गणेश जी को शुभ कार्यों में प्रथम निमंत्रण दिया जाता है जिससे कार्यों के अच्छे-से पूर्ण हो सकें ऐसी भावना रखी जाती है।

    भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है जिससे पता चलता है कि हमारे गणेश भगवान छोटे जीव को भी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक मानते हैं।

  • हर उम्र सीखने की होती है

    हमारे समाज में हर व्यक्ति को उम्र के हिसाब से कार्य करना चाहिए ऐसी सोच और मानसिकता है इस तरह की सोच पुरानी सोच और रूढ़िवादी सोच कहलाई जाती है ।

    ऐसे कायदे होने से समाज ने हर व्यक्ति को एक तरह की वेड़ियों में बांध दिया है जिस कारण हर व्यक्ति का दम घुट रहा है। मान लीजिए कोई महिला पढ़ना चाहती है जो की अपने बचपन में किसी कारणवश अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी जब यह महिला अपने परिवार को बताती है कि वह अपनी पढ़ाई के सपने को पूरा करना चाहती है तो सर्वप्रथम परिवार के व्यक्ति उसकी हंसी उड़ाते हैं और समाज परंपरा पास पड़ोसी ऐसे बहानों को बनाकर उस महिला को सपना पूरा करने से रोक देते हैं।

    यह रूढ़िवादी सोच व्यक्ति के अंदर घर कर जाती है की वह चाह कर भी अपने सपनों को अपने सीखने की उम्र पर ना सीखने की वजह से छोड़ देता है समाज में बुजुर्ग व्यक्ति इसका सबसे बड़ा उदाहरण होता है बुजुर्ग व्यक्ति चाहतें हैं कि वह भी कुछ करें परंतु समाज और परिवार वाले बुजुर्ग व्यक्तियों को बूढ़ा कहकर उन्हें कमजोर महसूस कराते हैं जिस वजह से बुजुर्ग व्यक्ति चाह कर भी अपने मन की जिंदगी को अपनी पसंद के कार्य न कर पाने की वजह से बहुत दुखी हो जाते हैं ऐसे व्यक्तियों को अपना जीवन बोझ लगने लगता है।

    यदि मनुष्य इस बात को सही तरीके से समझ जाए कि किसी भी कार्य को करने या सीखने की कोई उम्र नहीं होती है तो व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर तरीके से जीने लगेगा और शायद हम अपने जीवन में विकास कर जायेंगे ।

    एक तरह से व्यक्ति जब समझ जाएगा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती तो व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य भी पूरा कर सकेगा।

    मनुष्य इस रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलकर अंदर से मज़बूत और आत्मविश्वासी बन जाता है कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती यह कथन ही व्यक्ति के अंदर ऊर्जा भर देता है।

    जीवन का अर्थ भी यही है की हमें जीवन के हर पल में और उम्र के हर पड़ाव पर नई-नई चीज सीखनी चाहिए। चीजों को सीखने की आदत इंसान के बौद्धिक विकास को बढ़ावा भी देती है इस तरह हम सीखने के नए मायने भी समझ सकेंगे और जीवन का अर्थ सुख से नहीं बल्कि नई तकनीक को सीखने से है।

    बदलती तकनीक हमारे जीवन के नजरिए को भी बदल रही है तो फिर इन्सानों को भी सीखने की उम्र क्यों होती है। इस नजरिए को समझना होगा और खुद को समाज द्वारा और परिवार द्वारा बनाए दायरों से बाहर निकल कर एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा।

    आज के वक्त में नई चीज या तकनीक के बारे में जानना भी महत्वपूर्ण हो चुका है तो ऐसे में व्यक्ति स्वयं के पास मौजूद तकनीक से भी बहुत कुछ सीख सकता है।

    सीखने की कोई उम्र नहीं होती इसका मतलब बहुत से लोग गलत सोच से भी अंदाजा लगा बैठते हैं और स्वयं को नुक्सान भी पहुंचा देते हैं इसलिए व्यक्ति को सतर्क रहना भी. सीखना होगा ।

    अगर किसी भी उम्र में है हम कुछ भी नया सीख सकते हैं कार्य कर सकते हैं तो इससे व्यक्ति को मानसिक मजबूती भी मिलती है और आजादी अनुभव होने लगती है जब व्यक्ति को अपने सपनों को पूरा करने का उद्देश्य मिलता है कठिनाइयां आने पर भी वह इंसान आगे की तरफ बढ़ता रहता है।

    हर व्यक्ति के सीखने की उम्र का मापदंड न होने पर व्यक्ति रचनात्मक कार्यों में सफलता प्राप्त कर लेता है और अपनी जिम्मेदारियां को भी समझने लगता है।

    आपने ऐसे व्यक्ति भी देखे होंगे जो हर वक्त चिड़चिड़े स्वभाव में रहते हैं दरअसल ऐसे व्यक्तियों की मानसिक दशा समाज और परिवार के बनाए गए नियमों की वजह से बिगड़ चुकी होती है ऐसे व्यक्तियों को क्या अच्छा लगता है किस कार्य को करने से ख़ुशी मिलती है यह कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की यदि ऐसे व्यक्तियों को कुछ भी सीखने की आजादी दे दी जाए तो वह व्यक्ति भी शांत और संतुष्ट होकर रहना सीख जाएंगे।

    हमारे समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिन्हें एक दूसरे के कार्यों को देखने की और व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्यों में कमी निकालने की बुरी आदत होती हैं

    समाज और परिवार की सोच व्यक्ति को नए कार्य सीखने की उम्र से नहीं होता बल्कि हमारी निम्न स्तर मानसिकता की वजह से होता है।

    अतः बदलते समय के साथ मनुष्य को अपनी सोच भी बदलनी होगी और स्वयं से सवाल जवाब भी करना होगा क्या हमारे जीवन का उद्देश्य है केबल सुख पाना और झूठी शान दिखाना ही होता है तो जवाब होगा नहीं।

    मनुष्य के अंदर असीम शक्तियां हैं यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार अपनी शक्तियों के आधार पर नई चीजों को सीखता है तो वह जीवन के अर्थ को समझ कर नई खोज भी कर सकता है जो कि मनुष्य जाति के लिए फायदेमंद ही साबित हो सकती है।

    इसलिए हर उम्र सीखने की होती है मनुष्य को यह बात समझते हुए दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए और व्यक्तियों को आगे बढ़ने में प्रेरित करना चहिए एक व्यक्ति अपनी सोच से पहचाना जाता है व्यक्ति अपने कार्यों के पहचान जाता है हमें समझना होगा इंसान की बढ़ती उम्र सिर्फ एक नंबर है उसके अलावा कुछ नहीं।

  • क्षमा करना ही मनुष्य धर्म है।

    मनुष्य के भीतर हंसना रोना चिल्लाना गुस्सा करना ऐसी कई क्रियाएं होती हैं । जिन्हें व्यवहार का नाम दिया गया है।

    मनुष्य की इन क्रियाओं के द्वारा ही मनुष्य की पहचान होती है। इन क्रियाओं में से कुछ क्रियायें अच्छे व्यवहार को बढावा देती है तो कुछ क्रियाओं से मनुष्य का घमंडी , लालची और क्रोधी स्वभाव का होने का भी पता चलता है।

    मनुष्य की निम्न क्रियाओं में से क्रोधित क्रिया में आकर व्यक्ति हमेशा खुद को ही नुकसान पहुंचाने का कार्य करता है ।

    क्रोधित स्वभाव का व्यक्ति कभी यह नहीं समझ पाता कि उसके द्वारा दूसरे को परेशान करने से वह स्वयं को भी ज्यादा परेशान कर रहा है।

    क्रोधित व्यक्ति हर वक्त क्रोध में रहने की आदत से कभी कभी ऐसा व्यवहार कर जाता है की बाद में उसे पछताना भी पड़ता है ।

    क्रोध में मनुष्य छोटी सी बात को बड़ी बात बना लेता है और लड़ाई पर उतर आता है और कुछ भी अच्छा बुरा समझने की शक्ति भी खो बैठता है ।

    क्रोध मे हम दूसरों को दंड देना सही समझते हैं जबकि हम खुद को ही दंड दे रहे होते हैं । जिस व्यक्ति का स्वभाव क्रोधित बन जाता है उसे जरासा मजाक भी पसंद नहीं आता ।

    वहीं दूसरी तरफ एक दयालु भाव का व्यक्ति जो की क्षमा करना ही उचित समझता है और क्षमा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानता है

    ऐसे व्यक्ति क्रोध में रहना जैसे चिता पर जलाने के समान मानते है इसलिए अपने साथ किसी और के द्वारा रचित अपमान या उपहास व्यवहार को दंड देना उचित नहीं समझते बल्कि औरों को भी क्षमा करने का ज्ञान और महत्व बताते हैं।

    इससे संबंधित एक कथा है

    एक गांव में सहदेव नाम का व्यक्ति रहता था वह अपने गांव का सबसे अमीर व्यक्ति था । वह गरीबों को दान देता था और हर तरह की मदद भी करता।

    सहदेव बहुत ही दयालु प्रवृत्ति का था वह किसी के भी द्वारा उड़ाए गए मजाक को गंभीरता से नहीं लेता था और किसी को भी परेशान करने या दंड देने की नहीं सोचता था।

    परंतु सहदेव की पत्नी चिड़चिड़े और क्रोधित स्वभाव की थी वह सभी से बात-बात पर ही लड़ने लग जाती थी झगड़ा करना उसे बहुत पसंद था ।सहदेव की पत्नी को अपने अमीर होने पर अभिमान था। पति सहदेव उसे बहुत समझाता परन्तु पति के लाख समझाने के बाद भी उसकी समझ में कुछ नहीं आता था।

    एक बार की बात है गर्मियों की दोपहरी में सहदेव की पत्नी अपने बिस्तर पर लेटी हुई आराम कर रही थी की तभी एक वृद्ध व्यक्ति द्वार पर खड़े होकर तेज आवाज में आवाज देने लगा वह वृद्ध व्यक्ति बहुत ही भूखा और कमजोर था।

    वृद्ध व्यक्ति के तेज आवाज़ देने से सहदेव की पत्नी की आंख खुल गई और वह बाहर आ गई उसने गुस्से में वृद्ध व्यक्ति से चिल्लाते हुए पुछा की क्या हो गया क्यों चिल्ला रहे हो क्या तुम्हारे घर में कोई मर गया है क्या इस पर उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा की बेटी में बहुत भूखा हूं और कमजोरी की वजह से मुझे चक्कर भी आ रहे हैं तुम्हारे यहां कुछ खाने को हो तो मुझे दे दो।

    इस पर सहदेव की पत्नी हंसते हुएं बोली कि हमने क्या भूखों का ठेका ले लिया है और यह कहते हुए वृद्ध व्यक्ति को धक्का दे दिया और कहा अब कभी मेरे यहां नहीं आना।

    कुछ समय बीत जाने पर सहदेव की पत्नी बीमार हो गयी पति सहदेव अपनी बीमार पत्नी को लेकर ‌दूसरे गांव के वैध के पास दवा दवा दिलाने ले गया।

    दवा देने वाला वैध वही वृद्ध व्यक्ति था जो एक बार सहदेव की पत्नी से खाना मांग रहा था। सहदेव की पत्नी ने वैध को देखकर ही पहचान लिया वैध ने भी सहदेव की पत्नी को पहचान लिया ओर सहदेव की पत्नी से कहा की चिंता मत करो मैं तुम्हें धक्का देकर भगाऊंगा नहीं बल्कि तुम्हारा इलाज करूंगा ।

    पति सहदेव ने घर आकर बताया कि जिस दिन तुमने वृद्ध को धक्का दिया था मैं गली से खड़ा सब कुछ देख रहा था तुमने उस वृद्ध व्यक्ति के साथ बहुत गलत व्यवहार किया था। वह वृद्ध व्यक्ति एक वैध था परंतु कुछ समय स्थिति खराब हो जाने पर उसके पास खाने पीने के लिए नहीं रहा था इसलिए मांग मांग कर गुजारा करता था।

    मैंने उस वृद्ध वैध व्यक्ति मदद की और दूसरे गांव में दवाखाना खुलवा दिया जिससे वह फिर से लोगों का उपचार करने लगा और कुछ रुपए भी कमाने लगा जिससे उसकी स्थिति सुधर गई । पत्नी यह सुनकर अपने किए गए व्यवहार पर लज्जित हो गई और क्षमा मांगने लगी इस पर पति सहदेव ने कहा कि क्षमा मुझसे नहीं उस वृद्ध व्यक्ति से मांगो इसके बाद सहदेव की पत्नी ने वृद्ध व्यक्ति से क्षमा मांगी।

    इस तरह हमें समझ में आता है जीवन में क्षमा करना सीखना चाहिए।

  • भक्ति की परीक्षा

    जब कोई व्यक्ति अपने हर पल में अपने ईश्वर का ही मनन करते रहता है और उसके हर कार्य की शुरुवात भगवान के नाम से ही होती है तो ऐसे व्यक्तियों को समाज में भक्त के नाम से पुकारा जाने लगता है ।

    भगवान में सच्ची श्रद्धा रखने वाले भक्त अपने जीवन में भगवान की पूजा अर्चना व्रत अनुष्ठान करके जो सुख और आनंद प्राप्त करतें हैं उसकी कोई सीमा नहीं होती है।

    बहुत से ऐसे भी भक्त होते है जो भगवान के मोह में कठोर से कठोर तपस्या भी कर जाते हैं । यहां तक कि अपने जरूरी कामों को भी भगवान की भक्ति के आगे तुच्छ समझते हैं।

    तो कुछ व्यक्ति भगवान की भक्ति में अपना घर संसार भी त्याग देते हैं और बैरागी जीवन जीने लगते हैं।

    कुछ ऐसे व्यक्ति भी भक्ति-भाव में अपनी गहरी आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन हो जाएं और इसी सपने में रहने लगते हैं।

    एक ऐसी ही सच्चे भक्त की इसी प्रकार की एक कहानी है।

    पुराने समय की बात है भगवान की आस्था रखने वाला एक भक्त था वह कठोर से कठोर व्रत अनुष्ठान करके अपने भगवान की पूजा अर्चना करता था वह व्यक्ति अपने भगवान पूजा आसन के कार्य को समय पर और भली भांति पूरे मन से करता था और हर पल अपने भगवान के नाम की माला भी जपता रहता था और भगवान के दर्शन हो जाए यही सोचता रहता था दर्शन मात्र सोचने से ही मन ही मन बहुत खुश रहता था परंतु काफी समय तक भक्त को भगवान की कठोर तपस्या करके भी दर्शन नहीं हुए।

    भक्त होने के साथ उस व्यक्ति के अंदर अपने भगवान की भक्ति करने के प्रति अभिमान भी रहता था ।उस व्यक्ति का ऐसा मानना था कि मैं भगवान की भक्ति सबसे ज्यादा करता हूं और इस संसार में मुझसे बड़ा कोइ भक्त भी नहीं होगा ऐसी सोच के कारण उस व्यक्ति के अंदर घमंड बढ़ता ही जा रहा था।

    एक बार की बात है भगवान ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची और अपने भक्त की परीक्षा लेने के लिए भगवान ने वृद्ध का रूप धारण किया और फिर अपने भक्त के घर के द्वार पर पहुंच गए उस समय वह व्यक्ति अपने भगवान की उपासना में लगा हुआ था वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने भक्त से पूछा कि तुम किस भगवान‌की उपासना कर रहे हो और क्या तुम्हारे भगवान तुम्हारी उपासना से खुश हो जाते हैं।

    वृद्ध के यह कथन सुनकर उस भक्त व्यक्ति ने कहा कि मैं तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए बहुत सालों से तपस्या कर रहा हूं भगवान की तपस्या मेरी तरह कोई कर भी नहीं कर सकता तो फिर मेरे भगवान मुझसे खुश क्यों नहीं होंगे ।

    वृद्ध का भेष धारण किए हुए भगवान ने कहा कि तुम इतने सालों से कठोर तपस्या कर रहे हो तो जरुर तुम्हें पृथ्वी के हर जीव में भगवान के दर्शन प्राप्त होते होंगे यह सुनकर वह व्यक्ति चुप रह गया और कुछ भी नहीं कह सका।

    वृद्ध रुप में भगवान ने भक्त से कहा क्या तुमने सच्चे मन से अपने भगवान की भक्ति नहीं की यह सुनकर भी वह व्यक्ति चुप खड़ा रहा और कुछ नहीं कह सका। उसी वक्त एक भूखा व्यक्ति भक्त के द्वार पर आया और खाने के लिए खाना मांगने लगा पर उस भक्त व्यक्ति ने उस भूखे व्यक्ति को अनदेखा कर दिया परंतु वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने पास से उस भूखे व्यक्ति को भोजन कराया ।

    भक्त व्यक्ति यह सब खड़ा होकर देखता रहा इस पर वृद्ध रूप में भगवान ने कहा की तुमने अपने भगवान की कठोर तपस्या दिखावे के लिए की है । तुम अगर सिर्फ सच्चे मन से भी भगवान का नाम लेते तो तुम्हें आज तुम्हारे द्वार पर आए भूखे व्यक्ति के रूप में भगवान के दर्शन हो जाते परंतु तुम्हारे अंदर अभिमान होने की वजह से तुम्हें अपने भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हुए ।

    यह सुनकर भक्त व्यक्ति को अपने कार्य और कर्मों पर बहुत क्रोध आया और अपनी भूल का एहसास करते हुए वृद्ध रूप में भगवान से विलाप करने लगा और कहने लगा कि शायद घमंड में चूर होकर मैने कभी सच्चे मन से अपने भगवान की पूजा अर्चना नहीं की शाय़द इसलिए आज मेरे द्वार पर जब भगवान् आए तो मैं मूर्ख अपने भगवान को पहचान भी नहीं सका।

    भक्त व्यक्ति को विलाप करते हुए देख कर वृद्ध रूप में भगवान ने अपने दिव्य स्वरूप को प्रकट करके भक्त को दर्शन दिए भक्त व्यक्ति अपने भगवान के दर्शन पाकर बड़ा ही खुश हुआ।

    भगवान ने कहा कि मैं अपने भक्तों से कठोर तपस्या करने पर ही खुश नहीं होता बल्कि जो व्यक्ति सच्ची भक्ति करता है और गरीब और असहायों को मदद देता है ऐसे व्यक्तियों के प्रति मैं अपने भक्तों से सदा खुश रहता हूं।

    जब व्यक्ति विनम्रता, प्रेम, सेवा और दयाभाव का व्यवहार प्रथ्वी पर मोजूद हर जीव और इंसान से रखता है तो ऐसे व्यक्तियों को हर जीव और हर इंसान में मेरे दर्शन होने लगते है।

    भक्त व्यक्ति का उस दिन के बाद से अहंकार मिट गया और उसकी जगह हृदय में सच्ची भक्ति का प्रकाश फैला गया ।

  • सफलता के नियम

    हर व्यक्ति अपने जीवन में जो वह कार्य कर रहा है उसमें सफल होना चाहता है और सफल होने का यही सपना वह दिन रात देखता रहता है।

    सफलता हर किसी को अच्छी लगती है मनुष्य की पहचान ही सफलता से ही होती है।

    जैसे एक छात्र अच्छे नंबरों से अपनी पूरी क्लास में प्रथम आता है तो यह उस छात्र के लिए सफलता ही कही जाएगी।

    हम सब सफल होने की चाह रखते हैं और सफल होने का सपना हम सब एक दूसरे व्यक्तियों के सफल होने पर ही देखने लगते हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने रोल मॉडल के जैसे ही बनना चाहते हैं और उनके जैसे ही सफल होना चाहते हैं।

    सफलता पाने के लिए न जाने कितने लोग मेहनत करते हैं पर उनमें से कुछ लोग ही सफलता का स्वाद चख पाते हैं।

    क्या कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है कुछ लोग सफल होते जाते हैं तो कुछ ऐसे भी होते हैं जो की असफल हो जाते हैं आखिर इसका क्या कारण होता है।

    सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी कार्य में सफल होने में वक्त लगता है पर यदि आपके पास उस कार्य को देने के लिए वक्त ही नहीं होगा तो आप सफल कैसे हो सकते हैं।

    इसी प्रकार सफल होने के कुछ नियम होते हैं जिन्हें पूरा करने पर हम बहुत कुछ सफल हो भी जाते हैं।

    कोशिश

    किसी भी कार्य में सफल होने में हमको कोशिश करनी होती है यदि हम बातों ही बातों में कार्य करने की सोचते रहेंगे और कोई भी कोशिश नहीं करेंगे तो हमारे कार्य के सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं होगी ।

    मेहनत

    हर कार्य वह चाहे छोटा हो या बड़ा मेहनत मांगता है क्योंकि बिना मेहनत कार्य के होने की उस कार्य के सफल होने की उम्मीद नहीं हो सकती है जब तक व्यक्ति अपने कार्य में जी तोड़ मेहनत नहीं करता और कार्य के सफल होने की झूठी उम्मीद और आस लगाए बैठे रहता है और बहाने बाजी करते रहता है तो ऐसे व्यक्तियों के सफल होने की उम्मीद भी बेकार है।

    तो वही कुछ व्यक्ति कार्य को सफल होने में नसीब और भाग्य की बात करते हैं ऐसे व्यक्तियों को कार्य के असफल होने पर हाथ पर हाथ रखे बैठकर अपनी बर्बादी का तमाशा देखने और रोने की बुरी आदत पड़ चुकी होती है।

    व्यक्ति को समझना होगा कार्य के सफल होने में और असफल होने में नसीब या भाग्य का कुछ लेना-देना नहीं होता बल्कि मेहनत से ही सफल होने के रास्ते पर पहुंचा जा सकता है।

    सही कार्य की सही दिशा

    ज्यादातर व्यक्ति सफलता के सही मार्ग को नहीं समझ पाते । जिस कार्य को आप करना चाहते हैं आपको उस कार्य के दिशा में ही अपने कदम बढ़ाने होंगे होंगे ।

    जिस तरह एक प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं की तलाश करता है जिससे कि उसकी प्यास बुझ सके ।हमें भी समझना चाहिए कि कैसे एक प्यासे ने अपनी प्यास को बुझाने के लिए कुए की दिशा में जाने को ही उचित समझा और अपनी प्यास रूपी कार्य को ‌सफल करने के लिए ‌ कुएं कि दिशा में जाकर पानी रूपी सफलता को प्राप्त कर सका।

    इस तरह हर व्यक्ति को सफल होने से पहले अपने ‌ कार्य को और कार्य की सही दशा को समझना होगा और यह समझकर ही हर व्यक्ति अपने कार्य में सफल हो सकता है।

    असफलता

    सफलता के मार्ग में व्यक्ति को कई बार असफलता का भी सामना करना पड़ता है असफलता का सामना करना भी व्यक्ति को प्रतिभाशाली बना देती हैं इस तरह सफलता हमारे लिए कुछ ना कुछ सबक लेकर आती है।

    जो व्यक्ति असफलताओं को देखते हुए भी अपना रास्ता नहीं बदलते और अडिग होकर सफल होने की ज़िद में खड़े रहते हैं तो ऐसे व्यक्तियों को एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है ।

    आत्मविश्वासी

    किसी भी बड़े या छोटे कार्य को करने से पहले व्यक्ति को उस कार्य में सफल होने की और लक्ष्य को प्राप्त करने का आत्मविश्वास भी होना चाहिए।

    व्यक्ति के अंदर सफलता को प्राप्त करने का आत्मविश्वास स्फूर्ति और साहस देने का कार्य करता है।

    आत्मविश्वासी व्यक्ति सफलता के मार्ग में उठने गिरने से हताश नहीं होते बल्कि अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं।

    सफलता के छोटे-छोटे कदम

    कोई भी सफल व्यक्ति हो उसने अपनी सफलता प्राप्त करने के लिए छोटे-छोटे कदमों से चलना ही उचित माना है ऐसे व्यक्ति लगातार और बिना रुके अपने कार्य में सफल होने के लिए छोटे-छोटे कदम रखते जाते हैं ।

    सफल व्यक्ति जानते-समझते हैं कि कोई भी सफलता एक दो रात के अंदर हासिल नहीं की जा सकती ।सफलता पाने में और कामयाब होने में कुछ वक्त लगता है इसलिए यह सफल व्यक्ति छोटे छोटे कदम रखते हुए आगे बढ़ते जाते हैं और फिर एक दिन सफल हो जाते हैं।

    परिस्थितियां चाहे कैसी भी आ जाएं पर जो व्यक्ति अनुशासित होकर धैर्यवान होकर ईमानदार होकर लगातार कोशिश करते जाता है ऐसे व्यक्तियों के लिए नए-नए अवसर आते हैं और संभावनाओं के नए-नए द्वार खुलते जाते हैं।

    सफलता के मार्ग में कठिनाइयां भी आती हैं और रोज एक नई चुनौती का सामना भी करना पड़ता है ऐसे में व्यक्तियों को अपने सफलता के मार्ग कठिन और जोखिम भरा लगने लगता है बहुत से व्यक्ति ऐसे वक्त में घबरा जाते हैं और अपने सपनों को त्याग देते हैं इस तरह सफलता के मार्ग में व्यक्ति की परीक्षा भी ली जाती है जो व्यक्ति इस परीक्षा को पास कर लेता है वही व्यक्ति सफलता के नए आयाम बनाता है।

  • खुश रखिए अपने बचपन को

    आज के वक्त में बच्चों को भी उनका बचपन खुलकर नसीब नहीं हो रहा जैसा कि हमारा बचपन था पहले के वक्त में बच्चों का बच्चों के साथ घुल-मिल कर खेलना होता था जिससे जिससे बच्चों का मानसिक विकास सही तरीके से होता था।

    आज के वक्त में बच्चे अपने बचपन में ही फोन को लेकर गेम खेलना सीख गए हैं जो कि आगे चलकर एक बुरी आदत बन जाता है जिससे बच्चों में बहुत चिड़चिड़ापन ,गुस्सा करना जैसा व्यवहार करना आ गया है ।

    वैसे कहा जाये तो कि बचपन कभी भी खत्म नहीं होता इंसान के बड़े होने पर भी बचपन इंसान के अंदर हमेशा मोजूद रहता है ।

    हम यहां पर हर इंसान के अंदर के बचपन की बात कर रहे हैं देखा जाए तो हर व्यक्ति उम्र से तो बड़ा हो जाता है पर फिर भी उसके अंदर एक बचपन हमेशा जिंदा रहता है और यह बचपन रहना भी चाहिए।

    क्या कभी देखा है जब व्यक्ति बहुत ज्यादा खुश हो जाता है तो खुशी में वह जोरों से हंसने लगता है और कभी-कभी तो खुशी में आकर तेज आवाज़ में गुनगुनाने भी लगता है यह सब व्यवहार व्यक्ति के अंदर के बचपन का ही होता है।

    हम कब बड़े हो जाते हैं कब हमारा बचपन खत्म हो जाता है हमें पता तक नहीं चलता पर अगर हम चाहे तो अपने बचपन को हमेशा जी सकते हैं।

    घर के बड़े लोगों को अपने से छोटों को खुश रहना और बचपन को जीना सिखाना चाहिएं और उन्हें अपने बच्चों को ये भी बताना चाहिए कि इंसान को अपना बचपन हमेशा जीना चाहिए ।जब घर के बड़े अपने अंदर के बचपन को जिंदा रहते हैं और समय-समय पर बच्चों कि तरह छोटी छोटी खुशियां को भी मनाते हैं तो उस घर के छोटों को भी छोटी बातों पर और बेमतलब की खुशी में खुश रहना आ जाता है ।

    बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के ऊपर कई जिम्मेदारियां आ जाती है और उन जिम्मेवारियों के बीच में फंसकर इंसान हंसना और खुश रहना लगभग भूल सा जाता है पर अगर हम चाहे तो जिम्मेदारियां को निभाते हुए भी अपने बचपन को आजाद रख सकते हैं ।

    जिस तरह एक छोटा बच्चा किसी छोटी और असाधारण चीज के प्रति उतावलापन दिखाता है अगर हम भी जरा जरा सी और फालतू की लगनेवाली चीज के प्रति उतावलापन दिखाएं तो हमारा बचपन उस उतावलेपन को देखकर बहुत खुशी महसूस करेगा और इस कारण हम अपने आप ही खुश रहने लगेंगे। इस तरह यहां कहने का मतलब यह हुआ की असली खुशी छोटी-छोटी बातों में मिलती है।

    खुश रहने का मतलब यह कतई नहीं होता कि आपके पास महंगे संसाधन ‌हों और। बहुत सारा रुपए पैसा हो बल्कि अपने अंदर के बचपन को समय-समय पर खिल -खिलाने देने से हमारे मस्तिष्क को बहुत बड़ी खुशी मिलती है।

    कुछ व्यक्ति यह समझना चाहते हैं कि अपने अंदर के बचपन को कैसे जिया जाए या अपने अंदर की बचपन को कैसे दोबारा से जागृत किया जाए इसके लिए आप अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए कि अपने बचपन में आप किन चीजों से या किन कार्यों से बहुत ज्यादा खुश हो जाया करते थे।

    अपने बचपन में किए गए कार्यों को जब आप उसी उतावलेपन से फिर से दोहराते हैं तो आपको असीम खुशी बढ़ाने के कारण भी मिल जाएंगे आप समझ जाओगे की खुशियां किसी भी चीज को खरीदने से नहीं बल्कि कुछ कार्यों से मिलती है।

    बड़े होने का मतलब यह नहीं होता कि आप अपने बचपन को हमेशा के लिए भूल जाएं बल्कि बड़े होने का मतलब अपने से छोटों को खुश रहने की वजह सिखाई जायें ।

    आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में इंसान चैन से ना खा रहा है और ना ही चैन से सो पा रहा है। हम इंसान अपनी दिनचर्या में ऐसे व्यस्त हो चुके हैं जिस तरह एक मशीन जो बिना रुके कार्य करती रहती है ठीक वैसे ही इंसानों‌‌ की हालत हो चुकी है।

    क्या याद है बचपन के दिनों में कैसे एक साधारण पत्थर भी हमारे खेल का बहुत बड़ी वजह बन जाता था लेकिन अब महंगे खिलौनों से भी ‌बच्चा खेलने नहीं चाहता ।

    इसलिए हमें समझना होगा की बचपन को हमारे अंदर हमेशा बनाए रखने के लिए बच्चों की तरह बनना होगा और छोटी-छोटी चीजों से खुश रहना सीखना होगा।

    खुश रहने के लिए व्यक्ति जिस दिन अपने बचपन को जिंदा रखना सीख जाएगा उसके लिए खुश रहना कोई मुश्किल काम नहीं रहेगा।

    हमें यह भी समझना होगा बड़े होने का मतलब जिम्मेदारियां संभालना ही नहीं होता बल्की खुश रहना भी होता है जितना मनुष्य खुश रहता है उतनी ही उसे कम थकान महसूस होगी और इससे जीवन भी खुशियों से भरा लगने लगेगा।

  • ईश्वर की खोज

    हममें से कई व्यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं ऐसे व्यक्तियों में आस्था कूट-कूट कर भरी हुई होती है। ऐसे व्यक्तियों के हर काम प्रभु के नाम से शुरू होते हैं और जीवन की हर छोटी बड़ी उपलब्धि को हासिल करके उसका श्रेय भी प्रभु को ही देते हैं।

    आस्था से भरे व्यक्ति भगवान के प्रति गहरा विश्वास और जुड़ाव रखते हैं ऐसे व्यक्ति भगवान से जुड़े त्यौहारों को भी विधि पूर्वक मनाते हैं।

    आस्था से भरा व्यक्ति जीवन के हर कार्य के पीछे, हर घटना की वजह, हर कर्म को भगवान से जुड़ा समझता हैं।

    पर ऐसे व्यक्तियों को किसी भी कार्य का समय पर न होने पर गुस्सा भी बहुत आता है और अपने आगे अन्य व्यक्तियों को तुच्छ समझने की आदत होती है लेकिन इन्हें अपने कार्य के न बनने पर भी शांति से रहना सीखना होगा और अपने गुस्से पर नियंत्रण करना सीखना होगा ।

    ऐसे व्यक्तियों की सुबह प्रभु के नाम से ही शुरू होती है नहाने से पहले खाना नहीं खाते नहाने के बाद खाना खाने से पहले अपने प्रभु को भोग लगाते हैं और यह अपने परिवार को भी यही शिक्षा सिखाते हैं।

    ऐसे व्यक्तियों में आस्था के साथ-साथ अहंकार भी होता है जिसके कारण यह अज्ञानी भी हो जाते हैं समाज के बहुत से कल्याण कार्यों में स्वार्थ निकालते हैं।

    ऐसे व्यक्ति अपने अंदर का अहंकार संपूर्ण रूप से नष्ट नहीं कर सकते इसी कारण उसकी भक्ति भी अधूरी रह जाती है यदि व्यक्ति अपने अंदर के अहंकार को खत्म कर दे तो उसे अपने प्रभु के दर्शन भी हो जाते हैं।

    भगवान के विश्वास से जुड़ी हुई एक कथा जो कि कुछ इस प्रकार हैं

    सुखदेव नाम से एक व्यक्ति प्रभु में गहरी आस्था रखता था ।सुखदेव को प्रभु के दर्शन के दर्शन की चाह थी।

    सुखदेव अपने प्रभु के दर्शन के लिए जगह-जगह मंदिरों में व तीर्थस्थानों में जाता था परंतु सुखदेव को प्रभु के दर्शन कहीं भी प्राप्त नहीं हुए ।

    सुखदेव इस वजह से अत्यंतदुखी रहता और अपने प्रभु से दर्शन देने को विनती करता। सुखदेव ने प्रभु के दर्शन की चाह में कठोर उपवास रखे साधनाएं भी करीं। इतना करने के बाद भी जब सुखदेव को प्रभु के दर्शन नहीं प्राप्त हुए तो वह निराश रहने लगा था।

    एक बार की बात है सुखदेव को आसमान में दिव्य प्रकाश दिखाई दिया प्रकाश का तेज बहुत ज्यादा होने की वजह से सुखदेव को कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था तभी दिव्य प्रकाश में से एक आवाज आई और कहने लगी सुखदेव तुम मुझे व्यर्थ ही बाहर खोज रहे हो मैं तो तुम्हारे अंदर ही विराजमान हूं।

    दिव्य प्रकाश की आवाज ने कहा कि सुखदेव तुम मुझे देखना चाहते हो तो सर्वप्रथम तुम्हें अपने अंदर के अहंकार को और दिखावे को खत्म करना होगा जब तुम अपने अंहकार और दिखावे से बाहर आ जाओगे उसी समय तुम्हें मेरे दर्शन प्राप्त हो जाएंगे।

    दिव्य प्रकाश से इस तरह का कथन सुनकर सुखदेव को बहुत खुशी मिली कि मेरे प्रभु तो मेरे अंदर ही विराजमान हैं और मैं मूर्ख पता नहीं कहां-कहां प्रभु के दर्शन की चाह में भटकता रहा और इसी के साथ सुखदेव ने उसी पल अपने अंदर के अज्ञान, अंहकार को खत्म होते देखा और इसके बाद सुखदेव ने आंख बंद कर ली इसके बाद सुखदेव को स्वयं में प्रभु के दर्शन प्राप्त हुए।

    जिस तरह सुखदेव भगवान के दर्शन की चाह में दर-दर भटकता रहा और भगवान की दर्शन चाह में कठोर व्रत और साधनाएं करते रहा इसके पश्चात् भी सुखदेव को भगवान के दर्शन नहीं हुए।

    क्योंकि सुखदेव अपने भगवान को अपने चारों तरफ खोजता रहा परंतु भगवान तो सुखदेव के अंदर विराजमान थे लेकिन अंहकार और अज्ञान की वजह से सुखदेव को अपने भीतर भगवान् के दर्शन नहीं मिले।

    इस कहानी से समझ आता है कि भगवान तो कण कण में हैं पर जब तक हम अपने अहंकार को खत्म नहीं कर देते तब तक हमसे हमारे भगवान प्रसन्न नहीं होंगे और दर्शन भी नहीं देंगें।