समाज में रहने वाले व्यक्तियों की सोच अलग-अलग प्रकार की होती है कुछ झगड़ालू प्रवृत्ति के तो कुछ ईर्ष्यालु प्रवृत्ति तो कुछ दयालु प्रवृत्ति के होते हैं समाज कई तरह के व्यक्तियों से मिलजुल कर बना होता है।
हर वो एक इंसान अपने व्यवहार की वजह से समाज में पहचाना जाता है और इसके अलावा इंसान द्वारा किए गए कर्म उसकी पहचान बनाते हैं।
हर व्यक्ति की मानसिक सोच भिन्न प्रकार की होती है मानसिक सोच से ही मनुष्य का व्यवहार निश्चित होता है परंतु हर व्यक्ति के अंदर इंसानियत भी होती है यह इंसानियत ही एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़े रखने का कार्य करती है।
बदलते वक्त में इंसान के अंदर की इंसानियत भी खत्म सी होती जा रही है ।पहले के वक्त में एक इंसान किसी दूसरे इंसान के दुख के वक्त में उसके काम आता था और उसके दुख को खत्म करने के उपाय ढूंढने में मदद करता था परंतु आजकल व्यक्ति को किसी भी दुखी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता ।इस प्रकार इंसान के अंदर निस्वार्थ भाव बढ़ता सा प्रतीत हो रहा है।
इंसानियत खत्म होने की कई वजह है
भाई-चारा
एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़े रखने के लिए भाई-चारा होना अति आवश्यक है यह भाईचारा हमें बचपन से ही सिखाया जाता है पर आजकल की भाग दौड़ जैसी जिंदगी में बचपन खत्म सा हो गया है जिस कारण भाईचारा समझने और समझाने का किसी पर वक्त नहीं है और शायद भाईचारा ना समझ पाने की वजह से एक इंसान दूसरे इंसान के लिए अजनबी बनता जा रहा है
छोटा परिवार
नगरी करण हो जाने के बाद से छोटे परिवारों को अहमियत मिलने लगी छोटे परिवारों की एक वजह जनसंख्या कम करने का भी विचार था।
छोटा परिवार सुखी परिवार का मंत्र लोगों को इतना रास आया कि उन्होंने अपनी खुशियों को भी सिर्फ अपने छोटे परिवार तक ही सीमित रखा ।आज के वक्त में इंसान अपनी छोटी या बड़ी खुशी को बांटना जरूरी नहीं समझता है ।बच्चे भी उस परिवार में रहकर यही सीखते हैं जिस वजह से बच्चों को और बड़ों को सिर्फ खुद से ही मतलब रखना जरूरी लगता है तो ऐसे में उसके पास पड़ोस में क्या हो रहा है इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहता किस कारण हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है।
स्वार्थी व्यवहार
व्यक्ति के अंदर स्वार्थी व्यवहार आ जाने से उसका स्वार्थी व्यक्तित्व बनता जा रहा है ।स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपनी भलाई के बारे में सोचता है ऐसे व्यक्तियों को किसी के दुख से कोई लेना देना नहीं होता। समाज में स्वार्थी व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है और भले मानुष की संख्या कम होती दिख रही है इंसानियत खत्म होने में स्वार्थी व्यक्तित्व एक बहुत बड़ी समस्या है।
मां-बाप दोनों का काम करना
महंगाई की वजह से घर को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी एक व्यक्ति पर बहुत भारी पड़ जाती है इस कारण अब घर को सही तरीके से चलाने के लिए मम्मी-पापा दोनों का काम पर जाना जरूरी सा हो गया है।
मां बाप दोनों के काम पर जाने की वजह से बच्चों को बचपन में घर से मिलने वाली सदाचार की शिक्षा अब नहीं मिल पा रही इससे बच्चों का व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पा रहा है।
बचपन में घर पर मां के द्वारा बच्चों को सदाचार की शिक्षा मिलने से बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होता था जिससे बच्चे अपने बचपन में ही अच्छा इंसान बनने का पाठ सीखते थे।
सदाचार की शिक्षा न मिल पाने की वजह से बच्चों में सदाचार का विकास ठीक प्रकार से नहीं होता है।
ऐसे कई कारण है जो इंसान के अंदर की इंसानियत को खत्म होने की वजह बन रहे हैं यदि समय रहते हमने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो स्थिति और खराब हो सकती है।
देश की तरक्की हो या परिवार की तरक्की की बात हो जब तक इंसानियत हमारे अंदर नहीं होगी तब तक हम ठीक प्रकार से तरक्की नहीं कर सकते इसलिए हमें एक सभ्य इंसान बनने के लिए इंसानियत को अपनाना होगा ।
इंसानियत बढ़ाने का सबसे एक अच्छा तरीका यह भी है कि हम औरों की निस्वार्थ मदद करें निस्वार्थ मदद करने से हमें बहुत-सी खुशी मिलेगी।
मां-बाप को भी अपने बच्चों को वक्त देना सीखना चाहिए बच्चों को मां-बाप का साथ मिल जाने से बच्चों का मानसिक विकास सही ढंग से होता है बचपन में ही बच्चे भाई बहनों के साथ मिलजुल कर रहना सीखते हैं मिलजुल कर रहने का भाव इंसान के अंदर की इंसानियत बढ़ाने में सहायक बनता है।
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