इस बार के पूरे मानसून सत्र में संसद अभी तक ना के बराबर ही चली है। दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्रों द्वारा हुए आंदोलन के बाद से ही संसद का लगातार स्थगित होना एक गंभीर और चिंताजनक विषय है। संसद राष्ट्रीय संपत्ति है और लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच भी है।
संसद एक ऐसा मंच है जहां पर सरकार और विपक्ष के बीच सुनवाई होती है मतभेदों का समाधान किया जाता है पक्ष विपक्ष में सहमति संवाद और तकरार भी होती है ।पर जब संसद में जब यह कार्यवाही शालीनता के साथ ना हो कर एक हंगामे में तब्दील हो जाती है और परिणाम संसद का रद्द होना होता है ।
इस बार के मानसून सत्र में विपक्ष सरकार से संसद में मार्च के दौरान छात्रों पर हुई कार्रवाई पर चर्चा करना चाहता है और साथ में गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर जवाब दें ऐसा भी विपक्ष चाहता है ।
मानसून सत्र में विपक्ष राम मंदिर चंदा चोरी के मामले पर भी चर्चा करना चाहता है और चर्चा को करने के लिए काफी वक्त से अड़ा हुआ है। पर क्या संसद की कार्रवाई को रोकना कहां तक उचित है इस बात को भी पक्ष और विपक्ष को समझना होगा।
संसद का बार-बार स्थगित होना । संसद की कार्यवाही को नियमितरूप से ना चलने देना आखिर कब तक होगा और कब यह गतिरोध टूटेगा ।
सदन का सुचारू रूप से संचालन होना विपक्ष और सरकार दोनों की जिम्मेदारी और सहमति से ही हो सकता है।
दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देने पर विपक्ष की मांग को मानकर सरकार ने सहमति जता तो दी है। पर सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते मतभेदों से एक अलग ही माहौल और चिंता जनक विषय बन गया है ।
पर एक बात तय है कि संसद में गृहमंत्री का आना और विपक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही को संयमित तरीके से चलने देना संसद के बार-बार स्थगित होने की गतिरोध से बाहर निकालने की शुरुआत हो सकता है।
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