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  • आकाशवाणी, रेडियो

    मेरे दादाजी ने अपने समय के बारे में कहते थे कि उनके समय में टीवी घर- घर नहीं थी तो कैसे उन्हें सूचना मिलती थी ,मौसम की ,अपने देश की, अपने गांव की खेल मैदान की, राजनीति की ऐसी जाने कितने क्षेत्र थे जहां की जानकारी उन्हें रेडियो यानी आकाशवाणी से मिलती थी। यह भी एक दौर था।

    रेडियो उस समय की सबसे बड़ी चीज थी जो कि सबके पास नहीं था और जिस किसी व्यक्ति के पास वीडियो होता तो बो उसे अपने कानों से लगाए रखते थे समाचार सुनते वक्त या फिर संगीत का आनंद लेते हुए ऐसा लगता था मानो कीआंखों के सामने यह सब कुछ हो रहा हो।

    उस दौर में हर व्यक्ति के पास रेडियो भी नहीं होता था तो काफी लोग इकट्ठे होकर रेडियो पर सुनकर आनंद लिया करते थे और फिर अपने-अपने विचार-विमर्श किया करते थे यह वह समय था जब हमारे देश को आजादी भी नहीं मिली थी और आजादी के कुछ समय बाद तक भी यही स्थिति थी एक तरह से देखा जाए तो लोगों में रेडियो की वजह से आपस‌ मैं काफी प्रेम था।

    लेकिन क्या कभी सोचा है की रेडियो और आकाश वाणी का सफर कितना पुराना है यह सफर कहां से शुरू हुआ और क्या-क्या इतिहास है इस सफर का।

    8 जून 1936 को आकाशवाणी के सफर की शुरुआत उसके ‘ऑल इंडिया रेडियो के रूप’ में हुई थी । दिल्ली के अलीपुर के पांच कमरों के एक अस्थाई दफ्तर से आकाशवाणी का प्रसारण शुरू हुआ तब से लेकर 3 मई 2023 तक ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाता रहा। इसके बाद आधिकारिक रूप से इसका नाम आकाशवाणी कर दिया गया।

    ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी महान गीतकार पं नरेंद्र शर्मा ने 1956 दिया था रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग 1939 में रविंद्रनाथ टैगोर ने भी किया था। पहले आकाशवाणी पर गीत-संगीत के शास्त्रीय कलाकार नहीं आते थे। केसकर ने आकाशवाणी पर शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के प्रयास किये ।रेडियो से हर भाषा के लेखकों को जोड़ा गया।

    3 जून 1947 की शाम आकाशवाणी पर ही देश के वटवारे की सूचना दी गई स्वाधीनता के समय नौ रेडियो केंद्र थे बंटवारे के बाद तीन केंद्र पकिस्तान को मिले देश के पहले प्रसारण और सूचना मंत्री सरदार पटेल रहे जिन्होंने रेडियो का महत्व समझा और उसके विकास को प्रोत्साहन दिया।

    इस तरह धीरे-धीरे आकाशवाणी में सुधार हुआ और यह हर परिवार की आवश्यकता बन गया ।

  • दिल्ली अग्निकांड हादसा या लापरवाही

    अभी हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल में भड़की अग्निकांड में अब तक का सबसे खौफनाक सब सामने आया है 21 लोगों की मृत्यु हुई जिसमें 12 विदेशी नागरिक थे।

    होटल घनी आबादी वाले इलाके में था। होटल बिना फायर एन ओ सी के चल रहा था 5 मंजिला होटल से बाहर निकलने का एक ही रास्ता था ।और बताया गया कि उस वक्त गेट पर ताला लगा हुआ था।

    एक ही सीढ़ी होने की वजह से गर्मी तुरंत ऊपर मंजिल तक पहुंच गई और आग की लपट और धुआं भी फैल गया। ऐसे में अंदर लोग आग और धुआं से तड़प रहे थे। जान बचाने के लिए कई लोग ऊपर की मंजिल से ही कूदने लगे स्थानीय लोगों ने सड़क पर गद्दे विछा दिए जिस से कई लोग गददौ के ऊपर गिर कर अपनी जान बचा सके। परन्तु काफी लोगों ने जान‌ गंवा दी

    इसी‌ अग्निकांड की आग में फंसी एक महिला अपने बच्चे को सीने से लगाकर नीचे कूद गई और सड़क पर विछे गददे पर जा गिरी जिस मां और बेटे दोनों की जान बच गई ।

    इस अग्निकांड में कई लोग घायल भी हुए कइ मरे लेकिन सवाल यह है ये हादसा या लापरवाही हुई कैसे ।

    लापरवाही

    दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित होटल में आग लगी वह किसकी लापरवाही मानी जाए होटल मालिक की या फिर होटल में ठहरे लोगों की ।

    होटल के मालिक लवकेश बजाज को गिरफ्तार कर लिया गया है । क्योंकि इस अग्निकांड में उन्हीं की लापरवाही सबसे ज्यादा है ।प्रवेश द्वार और निकास द्वार एक होने की वजह से आग के वक्त लोग होटल में फंसे गए और वहां से निकल कर जान नहीं बचा सके।

    होटल में 6 कमरे बनाने कीअनुमति मिली थीं वहां 25 कमरे थे और फायर सेफ्टी भी नहीं थी। यह भी एक बहुत बड़ा कारण है इस हालत का।

    दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़ों के अनुसार राजधानी में तक आग लगने से करीब 65 लोग जल कर मर चुके हैं इस स्थिति के लिए भवन मालिकों को कोई ही दोषी ठहराकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता जांच समिति अगर प्रभावित ढंग से निरीक्षण करता है घटना के लिए नियमों की उल्लंघन पर करवाई हो तो ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सकता है।

    ये पहला हादसा नहीं है बल्कि समय समय पर ऐसे हादसे होते आए हैं ।पर हर बार कि तरह इस हादसे से ‌भी कोई समझ नहीं लेगा और ना ही समझदार वनेगा आखिर क्यों नहीं हम समझने कि कोशिश करते ।

  • Digital aur AI Yug

    आज हम डिजिटल और AI युग में जी रहे हैं जहां हमारी रोजमर्रा के छोटे छोटे कार्यों में भी‌ हमें डिजिटल मदद मिलने लगी है जैसे कि बैंकिंग क्षेत्र में ही इंटरनेट बैंकिंग ,मोबाइल बैंकिंग यूटीआई पेमेंट्स इत्यादि उपयोग में डिजिटल बैंकिंग का विस्तार हुआ है जो की काफी सुविधा जनक है ।जिससे वित्तिय लेन-देन में सुविधा मिली है।

    इसी तरह AI के आने से हमारे जीवन के काफी क्षेत्र मे सुविधा मिली है जैसे कि घर बैठे आपको देश-विदेश की सूचनाएं मिलती है और यहां तक कि डिजिटल एजेंट भी है जो आपकी रोजमर्रा के कामकाज को व्यवस्थित करने में मदद करता है यह थोड़ा अजीब लगता है पर हम शायद कुछ ऐसे ही युग में जी रहे हैं।

    डिजिटल और एआई के नुकसान

    डिजिटल और एआई के आने से हमारे जीवन को सरलता मिली है इसमें कोई शक नहीं है परंतु डिजिटल और एआई के कुछ नुकसान हो सकते हैं जैसे की डिजिटल के क्षेत्र में धोखाधड़ी भी बड़ी है

    साईबर धोखा-धड़ी जैसे की फोन कॉल पर किसी अनजान व्यक्ति का धोखे से हमारा पासवर्ड याओटपी लेना और हमारे खाते से वित्तीय धोखा-धड़ी करना या फिर हमसे अंजाने में जानकारी हासिल करके हमारी निजता को हानि पहुंचाना। इसी तरह कई धोखाधड़ी शामिल है।

    सोचने वाली बात है एआइ के आ जाने से इंसान हर छोटे बड़े कामों के लिए एआइ पर निर्भर रहने लगा है तो उसका मानसिक विकास किस तरह होगा इसके लिए आपको स्वयं पर भी निर्भर रहने की आदतों को थोड़ा बहुत बनाए रखना चाहिए।हालांकि अभी इसमें ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला है परंतु भविष्य को देखते हुए एसे विचारों का आना स्वाभाविक है।

    इंसान को जीवन के हर क्षेत्र में एआई पर ही निर्भर रहना अच्छा नहीं है कुछ विशेषज्ञ कहते हैं एआई का इस्तेमाल विचारों के लिए करते हैं पर किसी को यह पता चले कि उसे क्या करना है क्या लिखना है यह सब सोचने का कार्य व्यक्ति को स्वयं करना चाहिए ना कि एआई पर डालना चाहिए।

    डिजिटल और एआइ के आने से हमारे जीवन को सरलता मिली है यह सच बात है पर हमें इसके साथ-साथ खुद को भी समझदारी के साथ चलने के नियम समझने होंगे जैसे की हमेंअपनी निजी जानकारी के बारे में किसी और को नहीं बताना चहिए और बड़ी सतर्कता के साथ समझदारी दिखानी चाहिए समय के साथ समझदार वनना सीखना होगा।

  • गौ माता और गोरक्षा

    अभी हाल ही में कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बकरा ईद पर गोवंश की बलि ना चढ़ाने का फैसला किया और यही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना आंध्र प्रदेश के मुस्लिम संगठनों ने केंद्र सरकार से गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की है साथ ही गौमांस का निर्यात करने वालों को सख्त सजा दी जाए इस कानून की भी मांग की है।

    समय-समय पर गौ हत्या और गोमांस को लेकर जगह-जगह आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है और इसी सिलसिले में आकोर्षित जनता ने संधेह में आकर मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए है।

    यह मुद्दा धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और देश का मुद्दा है गौ माता की रक्षा को लेकर। सरकार को भी कुछ बड़े कदम उठाने चाहिए।

    हमारे धार्मिक रीति -रिवाज के अनुसार गाय को मां का सम्मान दिया गया है और करोड़ों देवी- देवता का गाय में निवास है ऐसा माना जाता है

    समय -समय पर इतिहास में भी गाय का सम्मान होता रहा है। भगवान श्री कृष्ण भी गाय को प्रेम करते थे।

    अंग्रेज शासन काल से ही गोमांस को महत्व दिया गया और गोवंश को खत्म करने की कोशिश की गई जोकि आज भी जारी है।

    प्राचीन समय से ही गाय हमारे घर आंगन की शोभा रही है ।हर घर के आगे एक गाय मिलती थी और उसके दूध दही और घी से हमारे परिवार का पालन पोषण होता था। इस तरह सदियों से गाय हमारे परिवार का हिस्सा बनकर रही है। खेतों में भी गाय किसान लोगों ने प्रयोग मे ली है। गाय को पूजनिय माना गया है।

    गाय को राष्ट्रपशु घोषित करने के लिए मुसलमान संगठन यह कहकर चाहते हैं कि उनके और हिंदू भाइयों के बीच भाईचारा बड़े और गौ हत्या करने वालों और वह मांस खाने वालों पर कड़ी कार्यवाही हो।

    गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से गौ हत्या करने वालों पर कड़ा कानून बने मुस्लिम समुदाय के नेता क्या कहना है भारतीयों में गाय के प्रति श्रद्धा है और गाय को मां का स्थान दिया गया है तो गाय की सुरक्षा के लिए नियम बनाए जाए।

    भारतीय गोवंश की विशेषता बनाए रखने के लिए हमें फिर से अपने घर -आंगन में गाय को स्थान देना होगा हालांकि किसानों के लिए बहुत ही आसान होगा अगर हम गोवंश को बढ़ावा देना चाहते हैं तो उसके लए फिर से हर घर में एक गाय रखनी होगी हालांकि यह व्यवस्था शहर में मुश्किल है पर गांव में हर घर में एक गाय रख सकते हैं । शहरों में गौशालाओं की व्यवस्था होनी चाहिए जहां गाय को अच्छी देख में रखाजए और इस वंश की विशेषता बढ़ेगी।

    औद्योगिकरण और वीफ निर्यात से प्रगति हो सकती है परंतु भारत सनातन सस्कृति और सादा जीवन उच्च विचारों को अपनाने की प्रेरणा लेनी होगी।

  • विश्व पर्यावरण दिवस

    आज विश्व पर्यावरण दिवस है और सोशल मीडिया न्यूज़चैनल, अखबार हर जगह वृक्षारोपण करने की सलाह दी जाएगी।यह बहुत ही अच्छी बात है हमें जागरूक होना चाहिए और समझना चाहिए।

    लगातार पड़ों की कटाई से पर्यावरण पर काफी असर पड़ता है और इससे काफी नुकसान होता हैं।

    वायु प्रदूषण

    पेड़ों की कटाई से सबसे बड़ा नुकसान वायु प्रदूषण होता है। सोच कर देखिए पेड़ नहीं रहेंगे तो हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन नही मिलेगी क्योंकि हम सब जानते हैं कि सांस लेने के लिए ऑक्सीजन हमें पेड़ों से ही मिलती है और जब यह शुद्ध नहीं होगी तो कई तरह की बीमारी फैलेंगी जो हमारी सेहत के लिए भी नुकसानदायक है और इससे वायु प्रदूषण बढ़ने का खतरा रहेगा ।

    बारिश की कमी

    कई शोधों से पता चलता है कि बारिश पेड़ों की वजह से होती है अगर लगतार पेड़ कटते रहेंगे तो बारिश कम होगी और इससे सुखा पढने के आसार बढ़ेंगे। खेत खलिहान सुखे रह जाएगे। यह समस्याकाफी बड़ी है।

    कीट पतंगों के लिए खतरा

    पेड़ों की कटाई होने की वजह से इसका खतरा इंसानी जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि इसके अलावा कीट पतंगों पर भी पड़ता है जैसे की पेड़ों केआस- पास और खेत खलिहानों में जुगनू टिमटिमाते हुए दिखाई देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरण दुषित होने की वजह से जुगनू की तादाद पर असर पड़ा है और हो सकता है ऐसे कई कीट पतंगों को‌हम हमेशा के लिए खो देंगे। इसलिए हमें सावधान होने की जरूरत है ।

    तापमान बढ़ता जा रहा है और मार्च -अप्रैल जैसे महीने किसान भाइयों के लिए जोखिम भरे बनते जा रहे हैं क्योंकि समय पर बारिश नहीं होती और बे मौसम बारिश हो जाती है जिसका असर खेती पर पड़ता है और फसल को नुकसान होता है। यह सब पर्यावरण दूषित का ही नतीजा है और यह संकेत है मनुष्य जाति के लिए जिसका समाधान अभी नहीं ढूंढा तो शायद आगे पछताना पड़े।

    पर्यावरण सुधार

    पर्यावरण को हमे दूषित होने से बचाने के लिए कोशिश करते रहना चहिए और इसमें हर इंसान को अपना योगदान देना चाहिए। अगर हर व्यक्ति अपने आसपास साफ सफाई और हरियाली बढ़ाने के कार्यम में योगदान‌ दे तो हम पर्यावरण दूषित होने से रोकने में कुछ मदद कर सकते हैं । और ये बहुत अच्छी कोशिश होगी ।

    स्वच्छता

    हमें अपने आसपास स्वच्छता को अपनाना होगा जैसे कि कूड़ा कूड़ेदान में ही डालें इधर उधर ना फिलाएं। सब्जी और फल के छिलके जैसे कूड़े का खाद बनाने में प्रयोग करें। प्लास्टिक और थर्मोकोल जैसी कुड़े को अलग से रखें । शोच खुले में ना करें। इसके अलावा अपने आसपास के लोगों से भी प्रदूषण ना‌ फैलाने का अनुरोध करें और उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाएं।

    विश्व पर्यावरण दिवस में हम सबको अपना योगदान देना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं हम सभी देशवासियों का कार्य है हम सबको अपने आसपास की स्वच्छता पर ध्यान देकर और गंदगी फैलाने पर रोक लगाकर हम जरा सा भी योगदान करते हैं तो यह भी हमारे लिए काफी है।

  • विश्व तंबाकू निषेध दिवस

    अभी हाल ही में कुछ दिन पहले 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया गया। हम अच्छीतरह से जानते हैं तंबाकू हमारी सेहत पर कितना बुरा असर डालती है और तंबाकू के सेवन से शरीर में दुष्प्रभाव पड़ता है। धीरे-धीरे यह हमारी जीवन को खत्म करते जाती है

    जागरूकता

    तंबाकू से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति प्रति व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए ।तंबाकू से होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए बल्कि समझना होगा कि यह कितनी बड़ी समस्या है ।हर साल तंबाकू की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु होती है। जोकि काफी दुखदाई है

    तंबाकू के दुष्प्रभाव

    तंबाकू के सेवन से हमारे शरीर में दुष्प्रभाव होते हैं और कई नई बीमारियों की भी वजह बनती है जैसे उच्च रक्तचाप ,दमा रोग बीमारी और इसके अलावा गले और फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां होती है। सबसे ज्यादा तंबाकू सेवन युवा वर्ग करते हैं।

    ला इलाज बीमारी

    तंबाकू सेवन से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी भी हो जाती है जिसमें व्यक्ति को काफी पीड़ा सहन करनी पड़ती है इस बीमारी का अभी कोई पक्का इलाज नहीं है। तंबाकू सेवन का शौक धीरे-धीरे लत बन जाता है और फिर आगे चलकर कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी बन जाती है।

    तंबाकू नियंत्रित कानून

    हालांकि सरकार समय-समय पर तंबाकू निषेध कार्यक्रम करती है और इसे नियंत्रित करने के कानून भी बनाए गए हैं जैसे कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध है तंबाकू उत्पादन के विज्ञापन पर रोक है उत्पादों पर भी चेतावनी लिखी होती है और चित्र भी होते हैं

    तंबाकू और धुम्रपान निषेध है पर फिर भी इसका सेवन किया जाता है जो कि पहले एक शोक और फिर एक बुरी लत बन जाता है ।

    तंबाकू और धूम्रपान करने वाले व्यक्ति पर्यावरण को भी दूषित करते हैं ।

    एक इंसान के तंबाकू सेवन से इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। एक इंसान पहले तंबाकू का सेवन शौक के लिए करता है । और धीरे -धीरे ये शौक एक बहुत बुरी लत बन‌ जाती है। पहले ये लत इंसान की सेहत बिगाड़ती हैं बाद में जब इंसान को कैंसर जैसी गंभीर बिमारी हो जाती है फिर उपचार के लिए इलाज की‌ जरूरत होती है । कैंसर जैसी गंभीर बिमारी का इलाज काफी मंहगा पड़ता है ।

    तंबाकू और धूम्रपान पहले शौक वनता है और धीरे-धीरे एक बहुत बुरी लत बन जाता है। उसके बाद इंसान धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ने लगता है और साथ में मंहगे खर्च जिससे घर की आर्थिक स्थिति खराब होती है।

    इसलिए आज हमें तंबाकू निषेध दिवस पर लोगों को जागरूक करना चाहिए और तंबाकू और धुम्रपान से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करना चाहिये।

  • संतोषी व्रत कथा

    संतोषी माता का व्रत रखने से संतोषी मां अपने भक्तों के सारे दुख हर लेती हैं। इस व्रत को रखने के कुछ नियम है जैसे कि यह वृत शुक्रवार के दिन रखा जाता है और इस दिन एक वक्त खाना खाया जाता है पूरे दिन कोई भी खट्टी चीज नहीं खानी चाहिए और ना ही छूनी चाहिए।

    संतोषी व्रतकथा सब ने सुनी है पर यहां पर एक सच्ची कथा बताई जा रही है।

    संतोषी मां का दिन शुक्रवार को होता है और इस दिन भक्त बिना खाए पिए संतोषी मां का विधि द्वारा व्रत रखते हैं और अपनी श्रद्धा संतोषी मां मैं बनाए रखते हैं।

    कहानी

    पुराने समय की बात है एक नगर में एक आमीर साहूकार व्यक्ति अपनी बेटी के साथ रहता था । कुछ समय पहले ही उसे व्यक्ति की पत्नी खत्महो चुकी थी।

    साहूकार की इकलौती बेटी थी ।जोकि अपने पिता की लाडली बेटी थी । पत्नी के गुजर जाने के कुछ समय बाद उसे व्यक्ति ने दूसरी शादी कर ली जिससे कि उसकी लड़की को मां का प्यार मिले। लड़की संतोषी मां की भक्त थी और संतोषी माता का सच्चे मन से व्रत रखती थी।

    दूसरी औरत से उस साहूकार को एक पुत्री हुई । वह औरत अपनी लड़की का ख्याल रखती थी और अपने पति की पहली लड़की को पसंद नहीं करती थी । यह बात लड़की के पिताको पता थी और यह देखकर वह दुखी रहता था ।कुछ समय बाद की बात है, साहूकार को नगर से बाहर किसी काम से एक- दो महीने के लिए बाहर जाना पड़ा ।

    साहूकार ने अपनी पहली बेटी को बाहर जाने की बात बताई और अपना ख्याल रखना यह कहकर चला गया । कुछ दिनों बाद उसके साथ गए व्यक्तियों ने खबर दी एक दुर्घटना में साहूकार की मौत हो गई । अपने पिता की मौत की खबर सुनकर उसकी पहली बेटी बहुत दुखी हुई। परंतु उसकी सौतेली मां और सौतेली बहन पर कोई असर नहीं पड़ा । दोनों साहूकार कीबेटी को दुखी रखती। लड़की घर का सारा काम करती।

    लड़की संतोषी व्रत का पालन करने लगी पूरी श्रद्धा के साथ व्रत का नियम पालन करती ।

    एक बार लड़की के सौतेली मां ने लड़की को खाने में जहर मिलाकर दे दिया जिससे कि वह लड़की मर जाए और सारी दौलत उसे और उसकी लड़की को मिल जाएं ।जैसे ही वह लड़की खाना खाने बैठी कि अचानक दरवाजे पर एक लड़की ने आवाज दी आवाज को सुनकर लड़की खाना छोड़ कर बाहर चली आई ।बाहर आकर जब उसने देखा कि स्वयं संतोषी मां उसके सामने खड़ी थी यह देखकर लड़की बहुत खुश हुई संतोषी मां ने उसको बताया की जो खाना तुम्हारी सौतेली मां ने तुम्हें खाने के लिए दिया है उसमें जहर मिला है इसलिए तुम उस खाने को फेंक दो यह कहकर संतोषी मां चली गई तत्पश्चात लड़की ने जहर मिले खाने को फेंक दिया। लड़की ने संतोषी मां के दर्शन देने की बात और खाने में जहर मिला है यह बात अपनी मां और सौतेली बहन को बताई यह सुनकर सौतेली मां और सौतेली बहनको पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस लड़की से माफी मांगी और कहां कि अब हम भी संतोषी मां का व्रत रखगें और व्रत का पालन पूरी श्रद्धा से किया करेंगे।

  • उदन्त मार्तण्ड

    खबर देने वाला अखबार जो हर रोज हर सुबह ताजी चाय के साथ ताजा खबर लेकर हाजिर हो जाता है । क्या-क्भी सोचा है जो अखवार हम पढ़ रहे है इसकी शुरुआत कब हुई कैसे हुई सबसे पहले अखबार किस शहर से निकला यह हम बहुत कम ही जानते हैं लेकिन अपने भारतक के पहले हिंदी अखबार की पहला सस्करण कब निकला इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है

    कलकत्ता

    कलकत्ता से 30 म ई 1826 को उदत्त मार्तण्ड पहला हिंदी पत्र निकला इस हिंदी पत्र को स्वीकृति दिलाने का श्रेय बंगाल के बृजेंद्र नाथ बंदोपाध्याय को है ।इस पत्रकारिता के प्रकाशक संपादक और मालिक कानपुर निवासी पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे ,जो कि पेशे से वकील थे। जुगल किशोर शुक्ल जी ने जिस साहस के साथ उदंत मार्तंड का प्रकाशन शुरू किया वह सराहनीय है हालांकि उदंत मार्तण्ड की प्रकाशन बहुत कम ही हुए परंतु हिंदी पत्रकारिता यहीं से दिशा मिली थी। और यही से हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी गई।

    हिंदी पत्रकारिता के 200 साल

    हिंदी पत्रकारिता ने 200 साल का संघर्षपूर्ण और गौरवशाली सफर तय किया है ।हालांकि उसे वक्त की पत्रकारिता और अब की पत्रकारिता में कफी बदलाव आया है। हिंदी पत्रकारिता की कहानी हिंदी भाषा के विकास और राष्ट्रीय विकास की गाथा है। हिंदी पत्रकारिता का पहला प्रकाशन कलकत्ता में हुआ था। और 19वींसदी आखिर में बनारस से भी हिंदी पत्रकारिता का प्रकाशन होने लगा था।

    हिंदी पत्रकारिता का अतीत

    हिंदी पत्रकारिता क अतीत काफी सघर्ष में रहा है ।उस वक्त राजा राममोहन राय से लेकर राम मनोहर लोहिया तक उस दौर के बड़े पत्रकार रहे हैं और इन्होंने हिंदी पत्रकारिता में बड़ा योगदान दिया है ।भरतपुर के माखनलाल चतुर्वेदीने पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षण की जरूरत को समझा और हिंदी पत्रकारिता को सुधारनेक लिए जोर दिया।

    आजादी के बाद पत्रकारिता

    देश को आजादी मिलने के बाद हिंदी पतकारिता मैं भी बदलाव आया। इस बात को बाबूराव विष्णु राव पराड़कर ने महसूस कराया सन 1925 में एक सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-धनवान और बड़ी कंपनियों के लिए ही संभव होगा। आजाद भारत की हिंदी पत्रकारिता वास्तव मैं अलग रही और 50 की दशक के बाद हिंदी पतकारिता लक्ष्य से हटकर व्यावसायिक हो गई जिससे पत्रकारिता का आर्थिक पक्ष भी मजबूत हुआ।

    आधुनिकपत्रकारिता

    आज के वक्त में पत्रकारिता आधुनिक तकनीकी से लैस है औरआकर्षक है। परंतु पत्रकारों के लिए आज भी अनिश्चितताओं से भरी है जितनी की 200 साल पहले कोलकाता मैं कोल्हू टोला की अमड़ा तला की गली में थी।

    हिंदी पत्रकारिता का सफर 200 वर्ष पुराना है। हिंदी पत्रकारिता में हजारों लोगों को एक ही राय और संकल्पक साथ जुड़े रहना चहिए। आज हिंदी पत्रकारिता कि देश विदेश में एक बहुत बड़ी पहचान है और यह सफलता हमें एकजुट होकर ही मिली थी और हमेशा मिलेगी।

  • पारले-जी

    आज पारले-जी बिस्किट को हर कोई जानता है इसकी पहचान से सब बाकिफ हैं यह पारले-जी बिस्किट जो की कभी बच्चों के टिफिन में तो कभी चाय के साथ तो कभी सफर में दिख जाता है। पर क्या कभी सोचा है इस पारले-जी बिस्किट की शुरुआत कैसे हुई । हम में से बहुत ही कम लोग इसके बारे में जानते हैं की पारले-जी बिस्कुट की शुरुआत मुनाफे के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रवाद के लिए हुई थी।

    स्वदेशी निर्मित पारले-जी

    1920 के वक्त की बात है जब अंग्रेजों का शासन था और हमारे भारत देश में अंग्रेज लोगों की फैक्ट्री का ही बाजार था और अंग्रेजों का ही दबदबा था ।उस वक्त भारत देश में स्वदेशी आदोलन जोर-शोर से हो रहा था और तब यह तय किया गया की भारतीय ब्रांड का बिस्किट भी होना चाहिए। बिस्किट स्वादिष्ट और सस्ता होना चहिए और विदेशी बिस्किट को टक्कर दे सके इस तरह पारले-जी बिस्किट की शुरुआत हुई और पारले -जी बिस्किट की नींव रखी गईं ।

    मोहनलाल दयाल चहान

    मोहनलाल दयाल चौहान ने उस वक्त जर्मनी जाकर बिस्किट के लिए कन्फेक्शनरी का कार्य सीखा और और बिस्किट बनाने के लिए जरूरत की मशीन को भी जर्मनी से लाए ।

    कारखाने की शुरुआत

    मोहनलाल दयाल चौहान जी ने मुंबई के विले पार्ले मे एक छोटी-सी जगह में पारले-जी बिस्कुट के कारखाने की शुरुआत की इस कार्य में 12 लोगों ने अपना सहयोग दिया।

    बिस्किट का नाम

    मुंबई के विले पार्ले में बिस्किट के ब्रांड की शुरुआत हुई इसलिए बिस्किट का नाम पारले-जी रखा गया। और इस तरह पारले-जी बिस्कुट की नींव रखी गई हालांकि उसे वक्त संसाधन कम थे। और इस तरह पारले-जी बिस्किट की शुरुआत राष्ट्रवाद की वजह से हुई ।

    हालांकि बिस्किट बनने से पहले शुरुआत ऑरेंज कैंडी से हुई थी और 10 साल बाद पारले जी की शुरुआत हुई।

    इस तरह हम कह सकते हैं। पारले-जी बिस्किट की शुरुआत राष्ट्रवाद की वजह से हुई ।शुरुआत में पारले-जी बिस्किट ने काफी संघर्ष दखा और संसाधन भी कम थे ।अंग्रेजों का शासन था और पारले-जी ने फिर भी हार नहीं मानी। सुवाद में वेमिसाल और लजवाब यह है हमारी पारले-जी बिस्किट की कहानी।

  • गर्मी की छुट्टी

    गर्मियों का मौसम है और स्कूलों में गर्मी की छुट्टी चल रही है। गर्मी की छुट्टी स्कूली बच्चों को बहुत पसंद आती हैं हमारी बचपन में भी ऐसा ही होता था । गर्मी की छुट्टियों का इंतजार हुआ करता था।

    गर्मी की छुट्टियां में हमारे वक्त में हम नानी के यहां जाया करते थे और वहीं पर पूरी छुट्टी रहते थे। याद आती है उसे वक्त की पर अब ऐसा नहीं होता ।

    आज के वक्त मैं कुछ ही बच्चे नानी के यहां जाते हैं और वह भी सिर्फ 8 या 10 दिन के लिए । आज के वक्त में गर्मी की छुट्टियों को उपयोगी और बेहतर बनाने का अवसर है। इन छुट्टियों का उपयोग कुछ इस तरह भी कर सकते हैं।

    कंप्यूटर सीखना

    आज का बदलते समय‌ में कंप्यूटर हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा है और यह हम सब अच्छे तरीके से जानते हैं इसलिए गर्मीकी छुट्टियों मे जो बच्चे थोड़े बड़े और समझदार हैं उन्हें अपने उज्जवल भविष्य के लिए कंप्यूटर को सीखना चाहिए जिसके लिए गर्मी की छुट्टी बेहद ही बेहतर अवसर है

    इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स

    गर्मी की छुट्टी में कुछ बच्चे अगर अपनी इंग्लिश स्किल को सुधारना चाहते हैं तो यह छुट्टियां उनके लिए भी एक अच्छा मौका है आज के वक्त में इंग्लिश बोलना आना एक अच्छी और जरूरी बात है ।

    घूमने जाना

    इन गर्मी की छुट्टियों में अगर कोई बाहर घूमने का शौक रखता है तो यह काफी अच्छा शौक है क्योंकि कहते हैं की घूमने से हमें जानकारी मिलती है और घूमना-फिरना मन की शांति के लिए भी अच्छा माना जाता है। अगर बाहर घूमने का अवसर है तो मेरी समझ में गर्मी की छुट्टी ही सबसे अच्छा वक्त है।

    नाना नानी के घर

    बहुत-से बच्चे गर्मी की छुट्टियों मे अपने नाना नानी के घर जाना पसंद करते हैं वैसे कहा जाए तो गर्मी की छुट्टियों का असली मजा नाना- नानी के घर ही मिलता है । नाना नानी के घर पर मामा के बच्चे और मौसी के बच्चे जब इकठे हो जाते हैं तो मजा और बढ़ जाता है गर्मी की पूरी छुट्टी बड़े आराम से निकलती है

    दादा -दादी के घर

    आज के वक्तमे कुछ परिवार नौकरी की वजह से दूर दूसरे शहर में रहते हैं तो गर्मी की छुट्टियों बहुत-से बच्चे अपने दादा-दादी के घर जाना पसंद करते हैं क्योंकि बच्चे अपने दादा दादी के लाडले होते हैं

    गांव मैं जाना

    कुछ परिवार अभी भी गांव से जुड़े हुए हैं इन छुट्टियों में बच्चे अपने गांव जाकर वहां का रहन-सहन और और गांव के सादा जीवन का बहुत मजे से आनंद लेते हैं। शहर की चकाचौंध से निकलकर गांव का सादा जीवन बच्चों को रास आता है ।गांव में शुद्ध भोजन पानी और शुद्ध हवा मिलती है जिससे मन को शांति मिलती है

    यह छुट्टियां एक बहुत अच्छा अवसर होती हैं इसलिए इसे यूं ही व्यर्थ न करें बल्कि अपने हिसाब से इन छुट्टियों का उपयोग करें।