मेरे दादाजी ने अपने समय के बारे में कहते थे कि उनके समय में टीवी घर- घर नहीं थी तो कैसे उन्हें सूचना मिलती थी ,मौसम की ,अपने देश की, अपने गांव की खेल मैदान की, राजनीति की ऐसी जाने कितने क्षेत्र थे जहां की जानकारी उन्हें रेडियो यानी आकाशवाणी से मिलती थी। यह भी एक दौर था।
रेडियो उस समय की सबसे बड़ी चीज थी जो कि सबके पास नहीं था और जिस किसी व्यक्ति के पास वीडियो होता तो बो उसे अपने कानों से लगाए रखते थे समाचार सुनते वक्त या फिर संगीत का आनंद लेते हुए ऐसा लगता था मानो कीआंखों के सामने यह सब कुछ हो रहा हो।
उस दौर में हर व्यक्ति के पास रेडियो भी नहीं होता था तो काफी लोग इकट्ठे होकर रेडियो पर सुनकर आनंद लिया करते थे और फिर अपने-अपने विचार-विमर्श किया करते थे यह वह समय था जब हमारे देश को आजादी भी नहीं मिली थी और आजादी के कुछ समय बाद तक भी यही स्थिति थी एक तरह से देखा जाए तो लोगों में रेडियो की वजह से आपस मैं काफी प्रेम था।
लेकिन क्या कभी सोचा है की रेडियो और आकाश वाणी का सफर कितना पुराना है यह सफर कहां से शुरू हुआ और क्या-क्या इतिहास है इस सफर का।
8 जून 1936 को आकाशवाणी के सफर की शुरुआत उसके ‘ऑल इंडिया रेडियो के रूप’ में हुई थी । दिल्ली के अलीपुर के पांच कमरों के एक अस्थाई दफ्तर से आकाशवाणी का प्रसारण शुरू हुआ तब से लेकर 3 मई 2023 तक ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाता रहा। इसके बाद आधिकारिक रूप से इसका नाम आकाशवाणी कर दिया गया।
ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी महान गीतकार पं नरेंद्र शर्मा ने 1956 दिया था रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग 1939 में रविंद्रनाथ टैगोर ने भी किया था। पहले आकाशवाणी पर गीत-संगीत के शास्त्रीय कलाकार नहीं आते थे। केसकर ने आकाशवाणी पर शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के प्रयास किये ।रेडियो से हर भाषा के लेखकों को जोड़ा गया।
3 जून 1947 की शाम आकाशवाणी पर ही देश के वटवारे की सूचना दी गई स्वाधीनता के समय नौ रेडियो केंद्र थे बंटवारे के बाद तीन केंद्र पकिस्तान को मिले देश के पहले प्रसारण और सूचना मंत्री सरदार पटेल रहे जिन्होंने रेडियो का महत्व समझा और उसके विकास को प्रोत्साहन दिया।
इस तरह धीरे-धीरे आकाशवाणी में सुधार हुआ और यह हर परिवार की आवश्यकता बन गया ।
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