अहम् से बाहर निकलो

भगवान की बनाई हुई यह दुनिया बहुत सुंदर है परंतु इस सुंदरता को देखने का नजरिया भी व्यक्ति के पास होना चहिए। अहम और घमंड से भरा व्यक्ति कभी-भी सृष्टि की सुंदरता को ना देख सकेगा और ना समझ सकेगा क्योंकि घमंड उसकी बुद्धि पर कब्जा जमाए हुए बैठा है।

मनुष्य का जीवन सिर्फ एक प्रक्रिया ही नहीं होता बल्कि एक अनुभव और एहसास भी होता है यदि हम मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीते हैं तो व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान के साथ संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर सकता है।

अक्सर लोग अपने जीवन को समस्या सुख दुख परेशानी ईर्ष्या असंतोष नफरत संकट जैसे भाव में ही जीता रहता है और इन्ही भाव में घिरकर जीवन को काटता है क्योंकि मनुष्य की चाह ऐसी होती है किसी और के जीवन जैसा उसका जीवन हो और यही सोच उसके जीवन में शांति और ईर्ष्या भर देती है जो कि अहम् के ही रूप होते हैं।

अहम् से भरा मनुष्य अपने जीवन में एक प्यास रखता है यह प्यास भी उसकी अलग-अलग तरह की होती है जैसे किसी को पैसे की प्यास है किसी को अच्छी नौकरी की प्यास है किसी को सम्मान की प्यास है तो कोई जीवन की भागदौड़ में आगे रहने की प्यास रखता है।

इसके अलावा अहम् से भरे मनुष्य को दूसरे व्यक्ति के सुखों को देखकर ईर्ष्या होती है जैसे किसी के पास रूपए पैसे की अधिकता को देखकर ईर्ष्या होती है तो किसी व्यक्ति की सुंदरता को देखकर ईर्षा होती है ।ये सब प्रकार के अहम् दुख का सबसे बड़ा कारण होता है इसके अलावा आज के वक्तमें मनुष्य का सबसे बड़ा दुख स्वयं का दुख न होकर उसके पड़ोसी व्यक्ति का सुखी होना दुख का बड़ा कारण है।

हमारे मस्तिष्क में हर वक्त एक शोर सा मचा रहता है जिसका जवाब व्यक्ति के अंदर ही छुपा होता है जब व्यक्ति केवल अपने ही सुख-दुख इच्छाओं और समस्याओं में उलझा रहता है तो उसका मस्तिष्क सिकुड़कर संकुचित हो जाता है ऐसे व्यक्तियों को अपनी ही समस्या सबसे बड़ी समस्या लगती है और जिस कारण धीरे-धीरे तनाव असंतोष और तुलना की भावना को बढ़ावा मिलने लगता है।

व्यक्ति जरा दूसरी तरफ भी विचार करके देखें कि अहम् से भरे व्यक्ति कभी भी अपनी दुनिया से बाहर नहीं निकलते अपने ही अहम् में घिरा रहना ही इनका जीवन हो जाता है।

व्यक्ति अपने अंदर सूक्ष्म बदलाव लाकर भी स्वयं को बदलने में कोशिश करता है तो इसका बहुत गहरा प्रभाव होता है यह स्थिति वह स्थिति होती है जब जीवन केवल मेरे लिए क्या है ही नहीं रह जाता बल्कि इस सोच से ऊपर होकर मैं जीवन में क्या जोड़ सकता हूं का प्रश्न बन जाता है।

मनुष्य जीवन में रुचियों का विस्तार भी होना जरूरी है यदि मनुष्य केवल एक ही जैसे विषय में या सोच में उलझा रहता है तो जीवन में कभी भी असफलता की स्थिति आने पर वह बहुत आसानी से टूट सकता है इसलिए मनुष्य को अपनी रुचियां व्यापक करनी चाहिए जैसे कला साहित्य प्रकृति समाज या फिर विज्ञान वह हर स्थिति में कुछ ना कुछ प्राप्त कर सकता है ।

ऐसा करने से मनुष्य असफलता होने पर एक नई राह को भी तलाश सकता है जो कि उसे खुशी देता है और आगे बढ़ने के नए रास्ते भी देता है। लेकिन जब हम दूसरों के जीवन को समझते हैं तो हमें एहसास होता है कि जीवन में संघर्ष होना तो सामान्य बात है।

इससे हमारे भीतर धैर्य और स्वीकार्यता विकसित होती है अच्छा जीवन कोई बाहरी उपलब्धि का नाम नहीं है बल्कि है तो एक मानसिक सोच होती है। हमारी सोच इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन को कैसे देखते हैं और क्या हम अपने आप को समझते हैं यदि हम अपने छोटे से अहंकार से ऊपर उठकर जीवन की व्यापक गमों में रुचि लेना सीख जाए तो खुशी अपने आप हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है

जब मनुष्य अपने संकुचित स्वार्थ और अहंकार की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन की व्यापक दृष्टि से देखना शुरु करता है दूसरों की सुख-दुख में सहभागी बनता है तब उसके भीतर संतोष शांति और आनंद का स्वाभाविक संचार होने लगता है और यही अवस्था उसे एक सार्थक संतुलित और सचमुच खुशहाल जीवन की ओर ले जाती है

हर वक्त दूसरों की दुनिया में तांक झांक करते रहना भी मनुष्य के लिए दुख का सबक बन जाती है ऐसे में व्यक्ति की मानसिकता दूसरों के जैसा बनाना है सुख को समझने लगता है हमें समझना होगा कि हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं तो होती हैं परंतु जो व्यक्ति समझदारी के साथ अपनी समस्याओं से निजात पाना जानता है वही व्यक्ति सफल और सच्चा सुखी इंसान बन जाता है।

इसके अलावा किसी और व्यक्ति के ख़िलाफ़ बदला लेने की भावना भी हमको कमजोर करती है गुस्सा और बदले की भावना को खत्म करके हमें माफ करना और आगे बढ़ जाना जैसी भावनाओं को समझना होगा जो कि हमारे मस्तिष्क को शांति देने का कार्य करती हैं यह सब कुछ करने से हमारे मस्तिष्क को शांति महसूस होने लगती है और इस तरह हम अपने हम से बाहर निकाल कर

किसी भी व्यक्ति के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं एक रास्ता उसका उसे अपने अहम् से मिलता है दूसरा रास्ता उसे अपने अहम् से बाहर निकलकर ही दिखाई देता है।

जिस वक्त मनुष्य अपने लिए अहम से बाहर निकलने का निर्णय लेता है उसी वक्त से उसे अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस होने लगती है यह ऊर्जा मनुष्य को जीवन के कई अभिज्ञ ज्ञान के द्वार खोल देती है।

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