वृद्धावस्था

वृद्धावस्था उस पेड़ की तरह होती है जिसकी लंबी लंबी-चौड़ी घनी शाखाएं जो हर आने जाने वालों को छांव देती हैं पेड़ के विशाल होने पर भी उसकी उपयोगिता कम नहीं होती ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति की बढ़ती उम्र के साथ-साथ व्यक्ति को जो अनुभव , ज्ञान , शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है वह अपने इस ज्ञान को अपनी पीढ़ी को देता है जिससे उसकी पीढ़ी को आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है।

बुढ़ापा वृद्धावस्था यह एक ऐसी उम्र होती है जिस उम्र में आकर हर व्यक्ति अपने जीवन के हर रंग को देख चुका होता है और बहुत सारे अच्छे बुरे अनुभव भी ले चुका होता है वृद्धावस्था उम्र के पड़ाव पर आते-आते व्यक्ति काफी संतुष्ट और शांत रहना भी सीख जाता है।

वृद्धावस्था की उम्र के व्यक्ति को परिवार और समाज के व्यक्ति कमजोर और असहाय समझने लगते हैं और यह रूढ़िवादी सोच है जबकि कोई भी वृद्ध व्यक्ति कमजोर या अक्षम नहीं होता हालांकि शारीरिक दृष्टि से वृद्धावस्था में व्यक्ति निर्बल हो जाता है।

परंतु वृद्धावस्था की उम्र में भी कुछ वृद्ध कुछ नया करना करना चाहते हैं उनके लिए उम्र उनके कामों में रुकावट की वजह नहीं है ऐसे व्यक्ति नए दोस्त बनाना चाहते हैं कुछ नया सीखना चाहते हैं अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी को देकर उन्हें आगे बढ़ने का हौसला देना चाहते हैं।

हमारे समाज में बढ़ती उम्र के व्यक्तियों को कमजोर समझ कर उनकी उपयोगिता कम कर दी जाती है जिस कारण काफी वृद्ध व्यक्ति कुछ चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते क्योंकि ऐसे वृद्ध व्यक्तियों की सोच भी इस प्रकार की होती है वे सोचते हैं कि वृद्धावस्था की उम्र कुछ करने के लिए नहीं होती है।

वृद्धावस्था तो जीवन का वह पड़ाव है जो की बहुत सुंदर और अनुभवों से भरा हुआ है इस पड़ाव पर मनुष्य अनावश्यक समस्याओं से मुक्त होने लगता है वृद्धावस्था की उम्र में व्यक्ति को कोई दौड़ जिसमें आगे निकलने होने वाली बेचैनी नहीं रहती इस उम्र में व्यक्ति अपने हकीकत के चेहरे से नकाब उतार के लोगों से मिलने लगता है

हकीकत यह होती है वृद्धावस्था की उम्र में भी व्यक्ति बहुत-कुछ कर सकता है जैसे कि नए दोस्त बनाना कुछ छोटा नया अनुभव प्राप्त करना जो कि जानकारी को बढ़ाकर बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए नई उम्मीद की किरण बन सकता है।

हमने ऐसे कई घरों में वृद्ध व्यक्तियों को देखा है जोकि घर के एक कोने में चुपचाप बैठे मिलते हैं जब कभी उनसे कोई बातचीत करता है तो यह वृद्ध व्यक्ति हंस हंस कर बातचीत करने लगते हैं इससे पता चलता है कि उनके अंदर बातचीत करने की बहुत अभिलाषा होती है परंतु हम लोगों द्वारा उनके अकेले पन को ना समझना और उन्हें कमजोर महसूस कराना हमारी बहुत बड़ी गलती होती है यदि हम थोड़ा सा भी प्रयास करते हैं तो वृद्ध व्यक्ति भी खुद को आगे बढ़ाने को प्रेरित होंगे।

वृद्धावस्था की उम्र में पांव रखने पर व्यक्ति को अकेला पन महसूस होने लगता है परंतु उस वृद्ध व्यक्ति को समझना होगा वृद्धावस्था कोई रुकावट नहीं होती उसे किसी नए कार्य को सीखने या समझने में।

वृद्धावस्था तक आते-आते व्यक्ति कई अनुभवों को सीख जाता है उसने अपने जीवन में सफलता असफलताओं को कठिन परिस्थितियों में देखा होता है

वृद्धावस्था के व्यक्ति ने कभी अपने जीवन के बड़े बड़े कार्य को किया था उसके उस वक्त में जब कोई सीमा या किसी भी प्रकार की रोक नहीं थी तो फिर आज क्यों है यह उसको भलीभांति समझना होगा और अपने जीवनकाल के हर पहलू पर मैं कुछ भी करने में सक्षम है इस तरह की सकारात्मक सोच रखने से भी व्यक्ति के अंदर रहता है।

कुछ घरों में यह भी देखने को मिलता है की वृद्धावस्था में आते ही बुजुर्गों को उनकी संतानों द्वारा वृद्ध आश्रम में छोड़ दिया जाता है क्योंकि ऐसे लोगों को अपने ही माता-पिता बोझ लगने लगते हैं ।

यह वक्त सोशल मीडिया का समय है इस वक्त में व्यक्तियों की सोच पर भी बहुत प्रभाव पड़ा है आज के वक्त में व्यक्ति स्वयं पर ही ध्यान देना जरूरी समझता है इसके अलावा उसे अपने घर के वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने में कोई रुचि नहीं रही है हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें हमारी संस्कृति समझने की भी बहुत जरूरी है जो कि घर के बड़े बूढ़े लोगों के पास ही बैठकर मिल सकती है।

उसके साथ ही हमें समझना होगा कि घर के बुजुर्गों को भी अहमियत देना जरूरी है और बुजुर्गों को भी कुछ करने देने से ना रोक कर आजादी देना होगा जिससे कि बुजुर्ग व्यक्ति भी अपने जीवन की इस अवस्था पर स्वयं को कमजोर ना समझे।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *