Category: Motivational

  • वृद्धावस्था

    वृद्धावस्था उस पेड़ की तरह होती है जिसकी लंबी लंबी-चौड़ी घनी शाखाएं जो हर आने जाने वालों को छांव देती हैं पेड़ के विशाल होने पर भी उसकी उपयोगिता कम नहीं होती ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति की बढ़ती उम्र के साथ-साथ व्यक्ति को जो अनुभव , ज्ञान , शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है वह अपने इस ज्ञान को अपनी पीढ़ी को देता है जिससे उसकी पीढ़ी को आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है।

    बुढ़ापा वृद्धावस्था यह एक ऐसी उम्र होती है जिस उम्र में आकर हर व्यक्ति अपने जीवन के हर रंग को देख चुका होता है और बहुत सारे अच्छे बुरे अनुभव भी ले चुका होता है वृद्धावस्था उम्र के पड़ाव पर आते-आते व्यक्ति काफी संतुष्ट और शांत रहना भी सीख जाता है।

    वृद्धावस्था की उम्र के व्यक्ति को परिवार और समाज के व्यक्ति कमजोर और असहाय समझने लगते हैं और यह रूढ़िवादी सोच है जबकि कोई भी वृद्ध व्यक्ति कमजोर या अक्षम नहीं होता हालांकि शारीरिक दृष्टि से वृद्धावस्था में व्यक्ति निर्बल हो जाता है।

    परंतु वृद्धावस्था की उम्र में भी कुछ वृद्ध कुछ नया करना करना चाहते हैं उनके लिए उम्र उनके कामों में रुकावट की वजह नहीं है ऐसे व्यक्ति नए दोस्त बनाना चाहते हैं कुछ नया सीखना चाहते हैं अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी को देकर उन्हें आगे बढ़ने का हौसला देना चाहते हैं।

    हमारे समाज में बढ़ती उम्र के व्यक्तियों को कमजोर समझ कर उनकी उपयोगिता कम कर दी जाती है जिस कारण काफी वृद्ध व्यक्ति कुछ चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते क्योंकि ऐसे वृद्ध व्यक्तियों की सोच भी इस प्रकार की होती है वे सोचते हैं कि वृद्धावस्था की उम्र कुछ करने के लिए नहीं होती है।

    वृद्धावस्था तो जीवन का वह पड़ाव है जो की बहुत सुंदर और अनुभवों से भरा हुआ है इस पड़ाव पर मनुष्य अनावश्यक समस्याओं से मुक्त होने लगता है वृद्धावस्था की उम्र में व्यक्ति को कोई दौड़ जिसमें आगे निकलने होने वाली बेचैनी नहीं रहती इस उम्र में व्यक्ति अपने हकीकत के चेहरे से नकाब उतार के लोगों से मिलने लगता है

    हकीकत यह होती है वृद्धावस्था की उम्र में भी व्यक्ति बहुत-कुछ कर सकता है जैसे कि नए दोस्त बनाना कुछ छोटा नया अनुभव प्राप्त करना जो कि जानकारी को बढ़ाकर बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए नई उम्मीद की किरण बन सकता है।

    हमने ऐसे कई घरों में वृद्ध व्यक्तियों को देखा है जोकि घर के एक कोने में चुपचाप बैठे मिलते हैं जब कभी उनसे कोई बातचीत करता है तो यह वृद्ध व्यक्ति हंस हंस कर बातचीत करने लगते हैं इससे पता चलता है कि उनके अंदर बातचीत करने की बहुत अभिलाषा होती है परंतु हम लोगों द्वारा उनके अकेले पन को ना समझना और उन्हें कमजोर महसूस कराना हमारी बहुत बड़ी गलती होती है यदि हम थोड़ा सा भी प्रयास करते हैं तो वृद्ध व्यक्ति भी खुद को आगे बढ़ाने को प्रेरित होंगे।

    वृद्धावस्था की उम्र में पांव रखने पर व्यक्ति को अकेला पन महसूस होने लगता है परंतु उस वृद्ध व्यक्ति को समझना होगा वृद्धावस्था कोई रुकावट नहीं होती उसे किसी नए कार्य को सीखने या समझने में।

    वृद्धावस्था तक आते-आते व्यक्ति कई अनुभवों को सीख जाता है उसने अपने जीवन में सफलता असफलताओं को कठिन परिस्थितियों में देखा होता है

    वृद्धावस्था के व्यक्ति ने कभी अपने जीवन के बड़े बड़े कार्य को किया था उसके उस वक्त में जब कोई सीमा या किसी भी प्रकार की रोक नहीं थी तो फिर आज क्यों है यह उसको भलीभांति समझना होगा और अपने जीवनकाल के हर पहलू पर मैं कुछ भी करने में सक्षम है इस तरह की सकारात्मक सोच रखने से भी व्यक्ति के अंदर रहता है।

    कुछ घरों में यह भी देखने को मिलता है की वृद्धावस्था में आते ही बुजुर्गों को उनकी संतानों द्वारा वृद्ध आश्रम में छोड़ दिया जाता है क्योंकि ऐसे लोगों को अपने ही माता-पिता बोझ लगने लगते हैं ।

    यह वक्त सोशल मीडिया का समय है इस वक्त में व्यक्तियों की सोच पर भी बहुत प्रभाव पड़ा है आज के वक्त में व्यक्ति स्वयं पर ही ध्यान देना जरूरी समझता है इसके अलावा उसे अपने घर के वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने में कोई रुचि नहीं रही है हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें हमारी संस्कृति समझने की भी बहुत जरूरी है जो कि घर के बड़े बूढ़े लोगों के पास ही बैठकर मिल सकती है।

    उसके साथ ही हमें समझना होगा कि घर के बुजुर्गों को भी अहमियत देना जरूरी है और बुजुर्गों को भी कुछ करने देने से ना रोक कर आजादी देना होगा जिससे कि बुजुर्ग व्यक्ति भी अपने जीवन की इस अवस्था पर स्वयं को कमजोर ना समझे।

  • नजरिया बदलें

    कभी देखा होगा ज्यादातर लोग अपने समय को उन समस्याओं के समाधान ढूंढने में लगा देते है जो बेवजह की समस्याएं होती हैं या फिर व्यक्ति कई ऐसी समस्याओं का विकराल रूप बना लेता है जो कि हकीकत में बहुत-ही छोटी होती हैं।

    व्यक्ति अपने बीते कल को बदलना चाहता है लेकिन व्यक्ति यह क्यों भूल जाता है कि बिता कल जा चुका है अगर बदलना है तो हमें आने वाले कल को और आज को बदलना होगा अगर हम यह नजरिया बदल लें कि जो हो चुका है या फिर जिसके बदलने से अब कुछ नहीं हो सकता तो शायद हम एक बहुत बड़ी समस्या से बाहर निकल सकें।

    यहां नजरिया बदलने का मतलब यह नहीं है कि हम किसी समस्या को न देखें या फिर समस्या के लिए समाधान न ढूंढें यहां नजरिया बदलने से मतलब बे मतलब की समस्याओं से दूर होकर ज़रूरी समस्याओं पर ध्यान देने से है।

    हम अगर अपने समय को बीते कल में हो चुकी गलतियों के बारे में ही सोचते रहेंगे तो इस तरह हम अपने आज के समय को भी बर्बाद करने का बहाना बना लेंगे और इस तरह हम कभी भी अपने इस नजरिए से बाहर नहीं निकल पायेंगे।

    मात्र एक नजरिया बदलने से भी मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ करने की उम्मीद जगा सकता है और अपने अंदर सकारात्मक सोच को बढ़ाने का भी यह एक अच्छा तरीका साबित हो सकता है।

    दुनिया का हर व्यक्ति अपने कार्य में अपने नजरिए का भी इस्तेमाल करता है ।उसका नजरिया ही उसको आगे बढ़ाने में मददगार साबित होता है। सकारात्मक और नकारात्मक नजरिया ही व्यक्ति की सोच और उसके कार्यों में दिखाई देती है।

    रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलने में सकारात्मक नजरिया का भी काफी प्रभाव पड़ता है जब कोई व्यक्ति अपने सामने आई समस्या को देखता है तो उस समस्या के समाधान के लिए उसका नजरिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है यदि सकारात्मक नजरिया रखता है व्यक्ति तो उसे समस्या का समाधान ढूंढने की कोई जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि सकारात्मक नजरिया रखने वाले व्यक्ति समस्या को समस्या ना मानकर आगे बढ़ने का मार्ग बना लेते हैं।

    वहीं दूसरी तरफ नकारात्मक नजरिया रखने वाला व्यक्ति समस्याओं को देखते ही रोने लग जाते हैं और थक-हार कर समस्या के नाम पर करने वाले कार्य को छोड़कर बेफिजूल के कार्यों में स्वयं को फंसाकर बहाना बना लेते हैं।

    एक व्यक्ति जो अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने में लगातार आई समस्याओं को नजरअंदाज करता जाता है और बिना रुके चला जाता है तो ऐसे व्यक्तियों को उनकी सफलता और मंजिल एक दिन अवश्य मिल जाती है और इस सब के पीछे उस व्यक्ति का नजरिया ही महत्वपूर्ण बनता है।

    नजरिया मनुष्य को किसी भी कार्य को करने से पहले ही उसे कार्य से प्राप्त निर्णय सकारात्मक और नकारात्मक होगा यह महसूस करा देता है और यह सब नजरिया रखने की वजह से ही होता है क्योंकि व्यक्ति सकारात्मक नजरिया रखकर किसी भी कार्य में मिलने वाली सफलता के प्रति बहुत कुछ जान जाता है।

    जिस तरह कोई व्यक्ति किसी बच्चे को उसके पढ़ने के आधार पर उसके होशियार या कम होशियार होने का पता कर लेता है ठीक वैसे ही कुछ व्यक्ति किसी कार्य के सफल होने या असफल होने पहले से ही निर्णय निकाल लेते हैं यह सब एक अनुभवी नजरिये वाले व्यक्ति का ही एक गुण होता है।

    इसलिए अपने नजरिया को बदलने से ही व्यक्ति अपने आने वाले समय को बेहतर बना सकता है और बेफिजूल के कार्य से बचने का अनुभव भी प्राप्त कर सकता है।

    ऐसे व्यक्ति कभी भी अपने बीते समय में हुई गलतियों का दोष किसी और के सर मढ़ने का काम नहीं करते बल्कि अपने नजरिए से बीते समय की गलतियों से अपने सकारात्मक नजरिया को और प्रभावशाली बनाने में मदद लेते हैं और आगे भविष्य में गलतियों को दोहराने से बच जाते हैं।

    ऐसे व्यक्ति किसी से होड़ नहीं रखते और खुद से आगे चलने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहित करते हैं इसकी वजह से इनके अंदर आत्मविश्वास बढ़ता जाता है और यह छोटी मोटी समस्याओं को स्वयं से ही हल ढूंढ लेते हैं।

    सकारात्मक नजरिया रखते से व्यक्ति समाज के दिखावे से बाहर निकल कर रुढ़िवादी समाज की जड़ों पर प्रहार करते हैं सकारात्मक नजरिया रखते वाला व्यक्ति समाज की रूढ़िवादी सोच को खत्म करके अपने आने वाली पीढ़ी को एक नई सोच और सकारात्मक नजरिया प्रदान करता है जिससे आनेवाली पीढ़ी को आगे बढ़ाने के बहुत से मौके मिलते हैं यह सब कुछ सिर्फ हमारे नजरिया बदलने से ही हो सकता है।

    जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया रखना मनुष्य के जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है ऐसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन में कहां से शुरू करना समस्या नहीं रहता बल्कि ऐसे व्यक्ति की मानसिक सोच पहले से कहीं बेहतर हो जाती है ऐसी स्थिति में उसके पास संसाधन ना होने के बावजूद भी वह अपने जीवन में बहुत कुछ कर पाता है

  • कठिनाइयों का सामना

    मैदान में उतरना उस वक्त कोई बड़ी बात नहीं होती जब खेल आसान होता है। असली खेल तो तब होता है जब व्यक्ति पूरी तरह से थका हुआ हो और खेल का सारा झुकाव दूसरी टीम की तरफ हो ऐसे में आपके साथ कोई खड़ा ना हो दर्शकों की आवाज मध्यम हो जाए इसी समय पर ही ऐसा होता है जब व्यक्ति सबको अपने अदर के होंसले को दिखा सके।

    दशकों से भरे हुए स्टेडियम में ही एक खिलाड़ी अपने हुनर को दिखा सकता है और वही कुछ खिलाड़ी जो अपने खेल को पूरे जोश के साथ नहीं खेलते हैं तो उन्हें आलोचनाओं शिकार भी होना पड़ता है इस तरह एक खिलाड़ी के लिए उसका खेल का मैदान ही उसके भविष्य को संवारता और बिगाड़ता है।

    व्यक्ति अपने सामान्य दिनों में तो पूरे विश्वास से दिखाई देता है परंतु जब कभी उसके सामने जब कोई समस्या कठिनाई आती है तो कठिनाई के वक्त में ही इंसान को अपने अंदर के साहस और जोश बाहर निकालना होगा जिससे व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है और कठिन समय के दिनों मे ही एक साधारण व्यक्ति असाधारण बनता है।

    किसी भी व्यक्ति का अच्छा समय मुश्किल हालातों में बदल जाता है तो उसके सामने उसके अपने और उसका समाज उसके बदलते हालत को देखकर दो हिस्सों में बंट जाते हैं जिसमें से एक हिस्से के व्यक्ति आपकी मदद न करने का कोई ना कोई बहाना बनाकर आपसे छूटना चाहते हैं वहीं दूसरे हिस्से के व्यक्ति आपके बुरे हाल मैं भी आपके साथ खड़े रहते हैं दूसरे हिस्से में व्यक्ति अधिकतर गिने चुने ही होते हैं।

    इसी तरह खिलाड़ी के असफल होने पर उसके सामने भी दो हिस्से हो जाते हैं यह दो हिस्से उसके अन्तर्मन में चल रही दुनिया होती है जिसमें एक हिस्से की दुनिया किस्मत के बहाने बनाने के तरीके सीख रही होती है तो दूसरे हिस्से की दुनिया में वह असफलता से निराश होकर और थका हारा हुआ खिलाड़ी खेल के लिए खुद को तैयार करता है यह सोचते हुए कि मैं मैदान में उतरकर पूरे जोश के साथ खेलूंगा और जीत कर दिखाउंगा।

    यहां खाने का मतलब यह है कि इंसान के पास हमेशा दो रास्ते होते हैं एक रास्ता जो उसको वापस लौट जाने को कहता है और किस्मत जैसे बहाने बनाने को तैयार कर देता है तो वहीं दूसरी तरफ इंसान के सामने का दूसरा रास्ता जो की कठिनाइयों और अंधेरों से भरा हुआ होता है यदि इस रास्ते पर इंसान मेहनत और साहस क साथ चलता है तो आगे चलकर इसी रास्ते पर उसे अपनी जीत भी मिल जाती है।

    जब आपको अपनी स्थिति डगमगाती लगे और आपके सपने धुंधले से पढ़ने लगते हैं तो यह वही स्थिति होती है जब इंसान स्वयं को या तो आगे जीत की ओर कर देता है या फिर वापस उस अंधेरे में लौट जाता है जहां से वह निकला था।

    असाधारण प्रतिभा के व्यक्ति भी साधारण लोगों की तरह ही सामान्य होते हैं साधारण और असाधारण व्यक्तियों में फर्क सिर्फ सोच का होता है असाधारण व्यक्ति कभी भी जोखिम भरे कदम उठाने से नहीं डरते इसलिए असाधारण बन जाते हैं और साधारण व्यक्ति डरपोक प्रवृत्ति के होने के कारण कठिन रास्तों पर चलने का हौसला नहीं बना पाते।

    जीवन सभी का कठोर होता है इसमें पूरी तैयारी करने वाला भी हार जाता है और आपके लाखों की संख्या में समर्थक होने पर भी आपको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ेगा और कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ेगा ऐसे में व्यक्ति का साहस का कदम उठाना ही उसे मजबूत और असाधारण बनाता है।

    आदमी को कठिनाई तोड़ती नहीं बल्कि कठिनाई उसके भीतर की असली ताकत को बाहर लाती है अगर व्यक्ति कठिनाई में अपने मन की आवाज को सुनता है और बाहर के शोर को सुनता है तो ऐसे में उसे सिर्फ अपने मन की आवाज को सुनना चाहिए अगर उसकी मन व्यक्ति को लड़ने के लिए तैयार कर रहा है तो उसे हार नहीं माननी चाहिए बल्कि कठिनाइयों को पार करके आगे बढ़कर विजयी होना चाहिए।

    लोग तुम्हें तुम्हारे साधारण होने की वजह से याद नहीं रखते बल्कि तुम्हारे असाधारण और कठिनाइयों को पार करने के हौसले को देखकर याद रखते हैं इसलिए कभी भी अपने कठिन समय में हर कर मत बैठना बल्कि मजबूत होकर कठिनाइयों का सामना करना और अपने आप असाधारण बनने के मौके को मत छोड़ना।

    जीवन रूपी खेल में जो मनुष्य एक बेहतर खिलाड़ी बनकर अपने जीवन के खेल को खेलता है वही व्यक्ति अपने जीवन के खेल को मनचाही दिशा देना भी जानता है हम सबको अपने इस खेल रुपी जीवन में अच्छा प्रदर्शन करना पड़ता है और जो इस प्रदर्शन से मुंह मोड़ लेता है उसका जीवन भी उसके मनपसंद तरीके से नहीं चलता है।

  • सुख भी अपना दुख भी अपना

    जीवन में सुख तो हर कोई चाहता है और सुख की चाह व्यक्ति को अपने सपनों में भी दिखाई पड़ता है । क्योंकि मनुष्य प्रवृत्ति होती ही ऐसी है।

    सुखी जीवन की कामना मनुष्य की चाहत होती है पर क्या सोचने मात्र से ही जीवन में खुशियां आ जाएंगी तो मैं यहां बता दूं की सुखी जीवन की कामना रखने वालों को पहले मेहनत करना सीखना होगा और उसके बाद सुखी जीवन की कामनाएं पूरी होते दिखने लगेंगी।

    सोचने वाली बात यह है कि हर मनुष्य सुख के पीछे ही क्यों भागते रहता हैं हर आरामदायक लगने वाली वस्तु हमें सुख का एहसास कराती है और उस सुख के एहसास को पाने के लिए हम जी तोड़ मेहनत करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद उस आरामदायक वस्तु को खरीद कर घर ले आते हैं लेकिन कुछ समय बाद फिर से हमें और कोई वस्तु दिखाई पड़ती है जो की सुख का एहसास कराती है और फिर से हम उसे पाने की कोशिश करते हैं और पहले की तरह उस आरामदायक वस्तु को पाने के लिए उसी के सपने देखने लगते हैं जब तक कि हम उसे आरामदायक वस्तु को हासिल ना कर लें और यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है पर क्या कभी सोचा है कि हम इंसानों के अंदर एक होड़ लगी हुई है दिखावे की जिससे हम एक दूसरे को दिखावे के चक्कर में महंगे से महंगे संसाधन देने लग जाते हैं बिना यह सोच की क्या यह हमारे काम का है या नहीं बस और दिखावे में आकर इसी को हम सुख समझ बैठे हैं।

    आज के वक्त में इंसान का जीवन बहुत कठोर हो चुका है और सरल जीवन को कठोर जीवन बनाने का श्रेय इंसान को ही जाता है शुरुआत में तो किसी भी इंसान को पता नहीं चल पाता कि वह सुख के नाम पर एक गहरे दलदल में फंसता जा रहा है जब सुख के नाम पर इंसान दल-दल में धंस चुका होता है उसके बाद उसे महसूस होता है जो सुख दिख रहा था वह सुख न होकर असंतुष्ट जीवन की वजह बन जाता है।

    इसी तरह इंसान दूसरे के जीवन में या अपने जीवन में कड़ी मेहनत को दुख समझ बैठता है यदि किसी इंसान के पास में मंहगे संसाधन नहीं है तो भी हम उस व्यक्ति को दुखी ही समझते हैं हम समझ चुके होते हैं की महंगे संसाधन होना सुख की पहचान होती है जब किसी के पास संसाधन के नाम पर कुछ भी नहीं होता तो ऐसे व्यक्तियों को समाज में सब निम्नवर्ग का समझ लेते हैं

    हमें समझना होगा जिस तरह सुख हमारे जीवन का हिस्सा है उसी तरह दुख भी हमारे ही जीवन का हिस्सा होता है। यदि हम सब समझ जाएं की सुख और दुख जीवन के हिस्से से होते हैं तो शायद हमारा जीने का तरीका बेहतर हो जाएगा और हम चेन और शांति के साथ अपने जीवन को व्यतीत करने लगेंगे।

    इंसान के जीवन में दुख आने से इंसान सतर्क को सावधान रहना सीख जाता है मैं जीवन के बहुमूल्य होने के मतलब को जान जाता है दुखों का जीवन में आना एक तरह से इंसान की पहचान भी होने का तरीका होता है जोकी हर इंसान की बेहतरी का निर्माण करने के लिए होता है।

    इसलिए मनुष्य को कभी घबराना नहीं चाहिए सुख और दुख को अगर जीवन का हिस्सा मान लिया जाए तो हम जीवन में आने वाले अचानकसुख और दुख को देखकर खुद को संभालने में बेहतर होते चले जाते हैं।

    यदि किसी व्यक्ति के पास सुख संसाधन की भरपूर मात्रा है तो ऐसे व्यक्तियों को समाज गरीब और दुखी व्यक्तियों की मदद करनी चाहिए यह करने के बाद मनुष्य को जो सुख प्राप्त होता है उसकी परिभाषा करना कठिन होगा परंतु इतना जरूर कह सकते हैं किसी की मदद के बाद मिलने वाले सुख की अनुभुति संसाधनों के सुख से कहीं बढ़कर होती है।

    दुख भी एक प्रकार का जीवन की प्रक्रिया मात्र होती है और गहराई से समझा जाये तो वह दुख भी एक तरह का छलावा ही होता है जो कि मनुष्य को भ्रमित करने आता है और साथ में मनुष्य की सहनशक्ति को भी भांपना चाहता है यदि मनुष्य यह समझ जाए की सुख और दुख जीवन के समय के नाम है जो कि इंसान ने ही दिए हैं तो वह दुख के होने पर भी विचलित नहीं होगा।

    जितना ज्यादा मनुष्य सुख के नाम पर संसाधन रूपी भोगों में पड़ेगा वह उतना ही खुद को भाग दौड़ जैसे जीवन में फंसा पाएगा और जो मनुष्य जितना भी सुख और दुख के ऊपर होकर सोचना शुरू करेगा तब उसको अपने विचलित होने की वजह पता चल जाएगी।

    सुख और दुख के ऊपर के जीवन की समझ आने पर मनुष्य को सुख भी अपना और दुख भी अपना लगने लगता है वे अपने दुख से भी उतना ही मोह करता है जितना की सुख से ऐसे व्यक्तियों की नजर में सुख और दुख के कोई मायने नहीं होते मैं अपने जीवन के हर पल को आनंद के साथ जीने लगते हैं।

    इसलिए सुख और दुख हमारे ही द्वारा बनाए गए जीवन का छलावा मात्र होता है और इन छलावों में फंसकर जीवन जीने की आदत पड़ चुकी है।

    सुख और दुख सिर्फ हमारी सोच का फर्क होता है जितना जल्दी हम इस दिखावे और छलावे की दुनिया से बाहर निकल आएंगे उतना ही हम जीवन को सही तरीक़े से सीख सकेंगे।

  • जीवन खुशियों से भरा रहे

    इंसान रोजमर्रा की भाग दौड़ में अक्सर छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करने लगता है ।यह छोटी-छोटी खुशियां जो कि हमें खुश कर सकती है लेकिन भाग दौड़ की वजह से हम अपने जीवन में इन छोटे-छोटे खुशी के पलों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते और किसी बड़ी खुशी को पाने के इंतजार में हम शायद खुश रहना भूल भी जाते हैं।

    जीवन की असली खुशी और सुकून इन्हीं साधारण सी लगने वाली छोटी-छोटी खुशियों मे ही छुपा होता है जैसे जब आपका मन पसंदीदा गाना बज रहा है और आपका मन झूमने को करता है पर आप कुछ बड़ा करने की चाहत में उस समय को नजरअंदाज कर देते हो यह वही समय होता है जो आपको थोड़ा सा झूम लेने पर दिन भर की खुशी दे सकता था।

    ऐसे कई पल आते हैं जिन्हें हम साधारण समझ कर आगे बढ़ जाते हैं इन साधारण पलों में हमारी असली खुशी छुपी होती है कभी-कभी किसी के साथ बैठकर अपनी छोटी सी खुशी को भी किसी को बताना हमें बहुत खुश कर देता है।

    आज स्मार्टफोन पर इंटरनेट के माध्यम से हम कई छोटे-छोटे खेलों के जरिए लोगों से जुड़ सकते हैं जो कि हमारी खुशी का कारण बन सकता है।

    कुछ लोग परिवार से दूर रहने की वजह से भी जीवन में खुशियों का आनंद लेना भूल सा जाते हैं ऐसे लोग अगर अपने आस-पास के व्यक्तियों के साथ दोस्ताना व्यवहार बनाते हैं तो यह दोस्ताना व्यवहार उन्हें बहुत खुशनुमा कर सकता है और अकेलापन भी महसूस नहीं होने देता।

    दोस्तों परिवार के साथ मिलकर रहना खाना और खुशियां बांटना भी एक प्रकार की खुद को खुश रखने की व्यवहारिक प्रक्रिया है जो स्वयं के साथ-साथ और व्यक्तियों को भी खुशनुमा जीवन देने लगता है।

    खुशनुमा जीवन बनाने के लिए हमें बहुत कुछ नहीं करना होता यह सिर्फ हमारी सोच है की जीवन में खुश रहने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है अगर हम अपने पसंदीदा गाने पर नाचने लगे या मनपसंद गाने को गुनगुनाने लगे ऐसे ही हमें अगर चित्रकारी करने का शौक है तो चित्रकारी करने से हमें उस वक्त बहुत खुशी महसूस होती है ।छोटे-छोटे से साधारण कार्य जो आपको खुशी महसूस कराते हैं इन्हें हमें अपने जीवन में हमेशा करतें रहना होगा और हमें समझना होगा कि यह छोटी-छोटी खुशियां ही हमें खुशनुमा होने का मतलब समझाती हैं।

    जब कभी हमसफर कर रहे होते हैं तो खिड़की पर बैठकर बाहर के दृश्य को देखकर हमें जो आनंद और सकून मिलता है उसके सामने उस वक्त की परेशानियां हमें बहुत छोटी लगने लगती है इसी तरह जीवन को खुशनुमा बनाकर हम अपने जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को सहेजना सीख जाएंगे और साधारण-से लगने वाले हर पल को बेहतरी से जीने लगेंगे।

    इंटरनेट पर कुछ खेल जैसे कि सांप सीढी, ताश के पत्तों का खेल यह सब हमें एकजुट होने का समय भी देती हैं और खेल के माध्यम से एक दूसरे व्यक्ति से जुड़ने का मौका भी देती है इसके अलावा इंटरनेट पर हम अपने छोटे-छोटे पलों को साझा करके बहुत कुछ सीख सकते हैं और जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।

    जीवन को खुशनुमा बनाना कोई बड़ी बात नहीं है बस अपने जीवन के प्रति नजरिए को बदलने का तरीका है। बचपन के दिनों मे जैसे हम छोटी-छोटी बातों पर ही हंस जाया करते थे क्योंकि बचपन में हम कभी बातों को छोटा या बड़ा नहीं माना करते थे परंतु बड़े होने पर व्यक्ति हंसने की वजह छोटी है या बड़ी यह पहले सोचता है उसके बाद ही अपनी प्रतिक्रिया देता है अगर हम पहले की तरह हर बात पर खुद को खुश रहना सीखा दें तो जीवन में खुशनुमा होना कोई बड़ी बात नहीं है यह बेहतर तरीके से समझ जाएंगे।

  • खाली मन और खाली खेत

    इंसान के मन मे हर वक्त कोई न कोई विचार चलता ही रहता है कभी-भी खाली नहीं रहता और यह दुनिया के हर इंसान के साथ होता है। जैसे मनुष्य दुनिया में रहता है समाज में रहता है अपने परिवार में रहता है ठीक उसी प्रकार उसके दिमाग में बातें रहती है व्यक्ति अपने दिमाग में ही हर स्थिति और हर व्यक्ति को अपने दिमाग में फिट कर लेता है और उसके साथ बातचीत करने लगता है देखने में मनुष्य ऊपर शांत लगेगा लेकिन उसके दिमाग में जाने किस से बातचीत हो रही होती है।

    जब कभी मनुष्य की बेवजह तबियत खराब होती है और वह व्यक्ति डॉक्टर को दिखाने जाता है तो डॉक्टर कहते हैं चिंता कम किया करो डॉक्टर के नजरिए से देखा जाए तो हमारी बेवजह तबीयत बिगड़ने की वज़ह हमारा दिमाग में नकारात्मक बातों का सोचना होता है ऐसे में हर व्यक्ति क्या कहना होता है की दिमाग के ऊपर उसका क्या अधिकार है मतलब की दिमाग को सोचने से कैसे रोकाजा सकता है।

    इंसान अगर चाहे तो सब कुछ कर सकता है इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए की दिमाग उसके शरीर का एक हिस्सा है ना कि वह दिमाग के कंट्रोल में है। व्यक्ति अगर चाहे तो अपने दिमाग को अपने कंट्रोल में कर सकता है और चिंता और अशांति जैसी स्थिति से बाहर निकल सकता है।

    जिस तरह एक किसान अपने खाली खेत में नए बीज बोकर नई फसल को तैयार करता है और अच्छी फसल प्राप्त करता है तो यहां हमें यह समझना होगा कि जब मनुष्य अपनी मेहनत से खाली खेतों को हरा भरा कर सकता है तो क्या वह अपने दिमाग में नए और सकारात्मक विचारों को नकारात्मक विचारों से बदलकर नहीं भर सकता क्या।

    अब आप सोचोगे कि यह कैसे हो सकता है कैसे एक व्यक्ति अपने दिमाग से नकारात्मक विचार खत्म करके सकारात्मक विचारों को अपने दिमाग में भर सकता है।

    इसके लिए आपको कुछ उपाय करने होंगे जो बहुत ही सरल और आसान है

    सोते समय पर

    सबसे पहला उपाय यह होगा कि आप जब सोने के लिए अपने बिस्तर पर पहुंच जाते है तो थोड़ी देर आपके दिमाग में जो भी चलता है उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है उस वक्त दिमाग में चलने वाली बातचीत को रोक कर कुछ अच्छी बातचीत शुरू करनी होगी यह बातचीत आप से ही जुड़ी होनी चहिए या फिर बीते हुए वक्त की कोई हंसी मजाक से संबंधित बातचीत को दिमाग में जाना होगा और जैसे ही आपको नींद आना महसूस होने लगे तो भी कुछ अच्छा सोचते हुए ही आप सोने की कोशिश करें।

    सुबह होने पर

    सुबह होने पर हमारा दिमाग अक्सर खाली होता है या अभिषेक सुन्न भी कह सकते हैं ऐसे में अगर आप सुबह सबसे पहले शीशे के सामने खड़े होकर 5 मिनट के लिए खुद को देखते हुए मुस्कुराते रहें और साथ में अपने दिमाग में फिर से बीते समय की अच्छी और हंसी की यादों को याद करें और महसूस करें कि अभी हो रहा है यह बहुत अच्छा तरीका है अपने दिमाग से नकारात्मक विचारों को खत्म करके इसकी जगह सकारात्मक विचारों को जन्म देना।

    खान-पान

    मनुष्य के दिमाग में नकारात्मक विचारों की वजह व्यक्ति का खान-पान भी होता है यदि कोई भी व्यक्ति अपने सही समय पर खाना नहीं खाता है या फिर उसके खाने में प्रोटीन विटामिन की कमी होती है तो ऐसा खानपान मनुष्य की नकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। कुछ घरों में महिलाएं स्वयं के खान पान पर कोई ध्यान नहीं देती समय पर खाने पीने की आदत ना होने की वजह से स्वभाव की चिड़चिड़ी हो जाती हैं इसलिए मनुष्य को अपने सकारात्मक विचारों को बढ़ाने के लिए समय पर खाने-पीने स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक भोजन खाना खाना चाहिए।

    इसी प्रकार और भी छोटे-छोटे उपाय हैं जैसे कि सही समय पर सोने उठना बैठना भी हमारे नकारात्मक विचारों को खत्म करने में सहायक होते हैं इसके अलावा हमें अपनी खुशियों के लिए भी समय निकालना सीखना होगा।

    इस प्रकार छोटी-छोटी लगने वाली साधारण सी खुशियां भी हमें बहुत बड़ी खुशी की तरह लगने लगती है और हम अपने खाली दिमाग को खाली खेत की तरह मन चाहे सकारात्मक विचारों से भर सकते हैं और कुछ समय बाद हमारे दिमाग में सकारात्मक विचार स्वयं से निर्मित होने लगेंगे ।

  • कल नहीं अपने आज को जीना सीखो

    मनुष्य अपना जीवन बीते कल को याद करने और आने वाले कल को संवारने में ही सोच कर गुजार देता है यह स्थिति किसी एक व्यक्ति कि नहीं है बल्कि हम सभी की यही स्थिति है।

    वर्तमान को बेहतर तरीके से जीना ही सही मायनों में जीवन कहलाता है पर हम यह बात नहीं समझ सकते क्योंकि मनुष्य की आदत बीते कल और आने वाले कल सोचने में गुजारना ही बन चुका है।

    ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसने अपने जीवन में कोई गलती ना कि हो। मनुष्य द्वारा की गई गलती होने के बाद यह गलती पछतावे के रूप में मनुष्य को कई वर्षों तक महसूस होती रहती है और यह सब हमारे मानसिक क्रियाएं होती हैं परंतु अगर हम चाहे तो इन क्रियाओं को बदल कर उसकी जगह अपने बीते समय में कुछ अच्छा और हंसी के पलों से भरदे तो शायद हमें हमारा पछतावा फिर याद नहीं आयेगा ।

    आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए सोचने से अच्छा होगा कि मनुष्य को रोज अपने छोटे-छोटे कार्यों से अपने अंदर अच्छी आदतों का निर्माण करना सीखना होगा हर रोज एक नई अच्छी आदत आपके आने वाले कल को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती है

    जब हम अपनी गलतियों के रूप में याद आने वाली पुरानी यादों को अपने पुराने समय की अच्छी यादों से बदल देते हैं और यह आदत बना लेने से हमारे लिए हमारे बीते कल से निकलने में हमारी मदद कर सकता है और आने वाले भविष्य को संवारने के लिए अपने अंदर रोज एक नई अच्छी आदत का निर्माण करना हमारे अच्छे भविष्य की ओर ले जाता है तो इस तरह हम अपने बीते कल से और आने वाले भविष्य की चिंता से बाहर निकलकर अपने वर्तमान जीवन को आनंद लेकर और बेहतर तरीके से जीना शुरू कर सकते हैं।

    यह करने के बाद मनुष्य संपूर्णरूप से अपने वर्तमान को जीने लगता है और जीवन के नए अर्थ को समझता है यह सबकुछ करने के बाद मनुष्य जब जीवन के अर्थ को बेहतरी से समझ चुका होता है तो उसे सृष्टि की सुंदरता भी समझ आने लगती है और जीवन के सुख-दुख से बाहर निकलने का जरिया भी दिखने लगता है।

    वर्तमान में जीने से व्यक्ति को अपार सुख की प्राप्ति होती है क्योंकि व्यक्ति अपने अहम् से बाहर निकलने का रास्ता समझ चुका होता है और अपने आसपास के लोगों के साथ गल मिलकर रहना पसंद करने लगता है।

    इस तरह देखा जाए तो अपने बीते कल और आने वाले कल को संवारने की सोच की वजह से व्यक्ति को वर्तमान ज़ीने का अनुभव ही नहीं हो पता और जब यह अनुभव हो जाता है व्यक्ति की बहुत सारी चिंताएं उसे बेवजह की लगने लगते हैं इसलिए अपने वर्तमान को जीना बहुत महत्वपूर्ण हैं।

    वर्तमान को जीने वाला व्यक्ति अपने सामने आने बाली समस्याओं से घबराता नहीं है बल्कि शांत मन से समस्याओं का समाधान ढूंढने लगता है और कुछ ही समय में वह व्यक्ति‌ अपनी समस्याओं के समाधान को ढूंढ लेता है।

    वर्तमान को जीने वाला व्यक्ति अपने जीवन के हर कार्य को भाग्य के भरोसे छोड़कर नहीं बैठता बल्कि अपनी नई छोटी-छोटी आदतों से स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है इससे हमें यह भी समझना होगा की भाग्य भरोसे बैठने से व्यक्ति अपने आनेवाले समय को तो खराब करता है साथ में वर्तमान में भी चिंतित रहने लगता है इसलिए किसी भी कार्य को भाग्य भरोसे छोड़कर बैठने से आप अपना वर्तमान भी खराब कर लेंगे और उसकी वजह से आने वाला कल भी खराब हो जाएगा।

    वर्तमान को आनंद और शांति से जीने में जरूरी नहीं है कि आपके पास महंगे महंगे संसाधन हों या फिर आप एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हों। शांतिपूर्ण वर्तमान जीने के लिए असाधारण होना जरूरी नहीं होता एक साधारण सा व्यक्ति भी इन छोटे-छोटे उपाय को करके शांत और खुशहाल वर्तमान को जी सकता है।

    याद रखिए जीवन सबका कठोर है जीवन एक कोरे पन्ने की तरह होता है जिस पर आप जो भी लिखेंगे वही आपका जीवन बन जाएगा ऐसे ही वर्तमान रूपी कागज पर आप अपने बीते कल के पछतावे को लिखते हैं या फिर अपने बीते कल मैं से कुछ अच्छे पलों को लिखते हैं ऐसे ही वर्तमान रूपी कोरे पन्ने पर अपने भविष्य की चिंता को लिखते हैं या फिर अपने अंदर रोज एक नई आदत का निर्माण करके अपनी भविष्य की सुंदर और उज्जवल परिभाषा लिखते हैं कल बीत चुका है और आने वाला कल आने में अभी वक्त है इसलिए अपने वर्तमान को जीना सीखें वर्तमान में जीने से व्यक्ति को जीवन के अर्थ से संबंधित अनभिज्ञ ज्ञान भी प्राप्त होने लगते हैं।

  • अहम् से बाहर निकलो

    भगवान की बनाई हुई यह दुनिया बहुत सुंदर है परंतु इस सुंदरता को देखने का नजरिया भी व्यक्ति के पास होना चहिए। अहम और घमंड से भरा व्यक्ति कभी-भी सृष्टि की सुंदरता को ना देख सकेगा और ना समझ सकेगा क्योंकि घमंड उसकी बुद्धि पर कब्जा जमाए हुए बैठा है।

    मनुष्य का जीवन सिर्फ एक प्रक्रिया ही नहीं होता बल्कि एक अनुभव और एहसास भी होता है यदि हम मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीते हैं तो व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान के साथ संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर सकता है।

    अक्सर लोग अपने जीवन को समस्या सुख दुख परेशानी ईर्ष्या असंतोष नफरत संकट जैसे भाव में ही जीता रहता है और इन्ही भाव में घिरकर जीवन को काटता है क्योंकि मनुष्य की चाह ऐसी होती है किसी और के जीवन जैसा उसका जीवन हो और यही सोच उसके जीवन में शांति और ईर्ष्या भर देती है जो कि अहम् के ही रूप होते हैं।

    अहम् से भरा मनुष्य अपने जीवन में एक प्यास रखता है यह प्यास भी उसकी अलग-अलग तरह की होती है जैसे किसी को पैसे की प्यास है किसी को अच्छी नौकरी की प्यास है किसी को सम्मान की प्यास है तो कोई जीवन की भागदौड़ में आगे रहने की प्यास रखता है।

    इसके अलावा अहम् से भरे मनुष्य को दूसरे व्यक्ति के सुखों को देखकर ईर्ष्या होती है जैसे किसी के पास रूपए पैसे की अधिकता को देखकर ईर्ष्या होती है तो किसी व्यक्ति की सुंदरता को देखकर ईर्षा होती है ।ये सब प्रकार के अहम् दुख का सबसे बड़ा कारण होता है इसके अलावा आज के वक्तमें मनुष्य का सबसे बड़ा दुख स्वयं का दुख न होकर उसके पड़ोसी व्यक्ति का सुखी होना दुख का बड़ा कारण है।

    हमारे मस्तिष्क में हर वक्त एक शोर सा मचा रहता है जिसका जवाब व्यक्ति के अंदर ही छुपा होता है जब व्यक्ति केवल अपने ही सुख-दुख इच्छाओं और समस्याओं में उलझा रहता है तो उसका मस्तिष्क सिकुड़कर संकुचित हो जाता है ऐसे व्यक्तियों को अपनी ही समस्या सबसे बड़ी समस्या लगती है और जिस कारण धीरे-धीरे तनाव असंतोष और तुलना की भावना को बढ़ावा मिलने लगता है।

    व्यक्ति जरा दूसरी तरफ भी विचार करके देखें कि अहम् से भरे व्यक्ति कभी भी अपनी दुनिया से बाहर नहीं निकलते अपने ही अहम् में घिरा रहना ही इनका जीवन हो जाता है।

    व्यक्ति अपने अंदर सूक्ष्म बदलाव लाकर भी स्वयं को बदलने में कोशिश करता है तो इसका बहुत गहरा प्रभाव होता है यह स्थिति वह स्थिति होती है जब जीवन केवल मेरे लिए क्या है ही नहीं रह जाता बल्कि इस सोच से ऊपर होकर मैं जीवन में क्या जोड़ सकता हूं का प्रश्न बन जाता है।

    मनुष्य जीवन में रुचियों का विस्तार भी होना जरूरी है यदि मनुष्य केवल एक ही जैसे विषय में या सोच में उलझा रहता है तो जीवन में कभी भी असफलता की स्थिति आने पर वह बहुत आसानी से टूट सकता है इसलिए मनुष्य को अपनी रुचियां व्यापक करनी चाहिए जैसे कला साहित्य प्रकृति समाज या फिर विज्ञान वह हर स्थिति में कुछ ना कुछ प्राप्त कर सकता है ।

    ऐसा करने से मनुष्य असफलता होने पर एक नई राह को भी तलाश सकता है जो कि उसे खुशी देता है और आगे बढ़ने के नए रास्ते भी देता है। लेकिन जब हम दूसरों के जीवन को समझते हैं तो हमें एहसास होता है कि जीवन में संघर्ष होना तो सामान्य बात है।

    इससे हमारे भीतर धैर्य और स्वीकार्यता विकसित होती है अच्छा जीवन कोई बाहरी उपलब्धि का नाम नहीं है बल्कि है तो एक मानसिक सोच होती है। हमारी सोच इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन को कैसे देखते हैं और क्या हम अपने आप को समझते हैं यदि हम अपने छोटे से अहंकार से ऊपर उठकर जीवन की व्यापक गमों में रुचि लेना सीख जाए तो खुशी अपने आप हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है

    जब मनुष्य अपने संकुचित स्वार्थ और अहंकार की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन की व्यापक दृष्टि से देखना शुरु करता है दूसरों की सुख-दुख में सहभागी बनता है तब उसके भीतर संतोष शांति और आनंद का स्वाभाविक संचार होने लगता है और यही अवस्था उसे एक सार्थक संतुलित और सचमुच खुशहाल जीवन की ओर ले जाती है

    हर वक्त दूसरों की दुनिया में तांक झांक करते रहना भी मनुष्य के लिए दुख का सबक बन जाती है ऐसे में व्यक्ति की मानसिकता दूसरों के जैसा बनाना है सुख को समझने लगता है हमें समझना होगा कि हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं तो होती हैं परंतु जो व्यक्ति समझदारी के साथ अपनी समस्याओं से निजात पाना जानता है वही व्यक्ति सफल और सच्चा सुखी इंसान बन जाता है।

    इसके अलावा किसी और व्यक्ति के ख़िलाफ़ बदला लेने की भावना भी हमको कमजोर करती है गुस्सा और बदले की भावना को खत्म करके हमें माफ करना और आगे बढ़ जाना जैसी भावनाओं को समझना होगा जो कि हमारे मस्तिष्क को शांति देने का कार्य करती हैं यह सब कुछ करने से हमारे मस्तिष्क को शांति महसूस होने लगती है और इस तरह हम अपने हम से बाहर निकाल कर

    किसी भी व्यक्ति के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं एक रास्ता उसका उसे अपने अहम् से मिलता है दूसरा रास्ता उसे अपने अहम् से बाहर निकलकर ही दिखाई देता है।

    जिस वक्त मनुष्य अपने लिए अहम से बाहर निकलने का निर्णय लेता है उसी वक्त से उसे अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस होने लगती है यह ऊर्जा मनुष्य को जीवन के कई अभिज्ञ ज्ञान के द्वार खोल देती है।

  • प्रेम मनुष्य की ताकत

    यश, धन ,सत्ता ,ज्ञान जैसी आकांक्षाएं आखिरकार हृदय की एक मोन भूख के आगे छोटी पड़ जाती है और यह इस बात को जानने की भूख की कोई हमें चाहता है।

    कोई हमारे प्रेम में हमारे अस्तित्व को महत्वपूर्ण समझता है तो कोई किसी के प्रेम में अपने प्रेमी की मौजूदगी हो महत्वपूर्ण मानता है।

    मनुष्य को जीवित रहने के लिए कुछ महत्वपूर्ण चीजों की आवश्यकता होती है परंतु इसके अलावा मनुष्य को जीवित रहने के लिए प्रेम की भी जरूरत होती है।

    प्रेम मनुष्य के लिए जरूरत से ज्यादा जीवन के अर्थ को समझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि प्रेम में ही मनुष्य अपनापन समझ पाता है और प्रेम ही मनुष्य को संवारता सुधारता है प्रेम ही मनुष्य को जीवन की गहराइयों को जानने में सहायक होता है। इसके अलावा मनुष्य के जन्म को भी एक वजह मिलती है।

    प्रेम मनुष्य के लिए सूर्य की तरह है जैसे सूर्य निकलता है तो उसके साथ धरती पर भी असंख्य जीव-जंतु मनुष्य और पेड़पौधे भी जीवन की अभिलाषा को आगे बढ़ाते हैं ठीक उसी प्रकार प्रेम मनुष्य के अंदर कई अभिलाषाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।

    एक व्यक्ति के अंदर की अच्छाई और बुराई भी प्रेम ही तय करता है समाज के विरूद्ध हो जाने पर प्रेम ही व्यक्ति को अकेलेपन से लड़ने की ताकत देता है और स्वयं को समाज के सामने खड़े होने का व सामना करने का विश्वास भी देता है।

    परंतु जब कभी प्रेम के विछड़ जाने से स्थिति भयानक भी हो जाती है तो ऐसे में व्यक्ति प्रेम की यादों में रहकर वही की वही रुक रह जाता है समय निकलता जाता है परन्तु वह मनुष्य अपनी पुरानी यादों से नहीं निकल पाता एक तरह से उसके लिए विनाश का वक्त होता है।

    प्रेम में पुनर्जीवित करने की शक्ति होती है सबसे दुखद जीवन वह नहीं जिसमें गरीबी हो बल्कि वह है जिसमें कोई अपना नाम हो जो आपकी लौटने की प्रतीक्षा करें । मनुष्य अक्सर प्रेम को अधिकार समझ लेता है मनुष्य समझता है कि प्रेम में बांध लेना होता है जबकि प्रेम में तो सिर्फ मुक्ति होती है किसी भी प्रकार का बंधन नहीं होता

    सच्चा प्रेम मनुष्य को स्वतंत्रता देता हैं क्योंकि प्रेम में व्यक्ति स्वतंत्रता को ही प्रेम की असली सुन्दरता मानता है प्रेम का रूप एक एक युवक और युवती के बीच में ही नहीं होता बल्कि एक मां का अपने बच्चों से, एक मित्र का अपने सच्चे मित्र से, बूढ़े मां बाप का अपने बच्चों के प्रति चिंता रखना यह सब प्रेम का ही तो रूप होता है कहीं ना कहीं हम सब मनुष्य इन्हीं प्रेम के धागों से बंधे हुए हैं।

    जिनका कोई नहीं होता उन्हें भी इस दुनिया में किसी न किसी के द्वारा प्रेम मिल जाता है जैसे किसी बूढ़े मां-बाप को संतान का प्यार किसी और की संतान से मिलता है तो जैसे अनाथालयों में रहने वाले आपस में प्रेम की वजह से एक दूसरे से जुड़ जाते हैं और फिर एक दूसरे के भले की चिंता भी करने लगते हैं तो यह प्रेम भी विचित्र और जीवन को एक नई परिभाषा देने वाला होता है।

    किसी अनजान व्यक्ति का विदेश में जाने पर वहां की संस्कृति और समाज से जुड़ाव हो जाना भी प्रेम की ही परिभाषा मानी जाती है।

    पर कभी-कभी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो खुद पीड़ा सहकर दूसरों को प्रेम देकर भी अकेले रह जाते हैं पर महान व्यक्तियों की यही पहचान होती है जो निस्वार्थ होकर मनुष्य जाति को प्रेम देते हैं और बदले में कुछ मिलने की भी उम्मीद नहीं रखते हैं।

    मनुष्य जब स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रेम में विरक्त हो जाता है तो वह सही मायनों में मानवता से जुड़ जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी वृद्धावस्था में स्वयं को अकेला नहीं देखते बल्कि वह बहुत सारे अनुभव और यादों के साथ खुद को घिरा हुआ देखते हैं।

    एक घमंडी व्यक्ति को भी प्रेम बदलने की क्षमता रखता है एक आवारा व्यक्ति को भी गलत रास्ते से सही रास्ते पर लाने की हिम्मत प्रेम में ही होती है फिर वह प्रेम चाहें व्यक्ति को दोस्त के रूप में मिलता हो या फिर अपने सगे-संबंधियों संबंधियों द्वारा प्रेम का मिलना मनुष्य के जीवन में चमत्कार से कम नहीं होता।

    मनुष्य की सबसे बड़ी उत्पत्ति धन ,यश या किसी प्रकार की सत्ता नहीं होती बल्कि प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति मानी जाती है ।इस पूरी दुनिया में आपके पास किसी के होने से वह खुशी मिलती है जो आपको जीवन जीने प्रेरणा देता है उस शक्ति को प्रेम कहा जाता है जो एक अकेले व्यक्ति को अकेलेपन की कमी से दूर रखकर एक नए प्रकाश को दिखलाता है।

  • पछतावे से सीख लेना सीखो

    जब कभी हम अपनी गलतियों के कारण किसी कार्य के असफल हो जाने पर पछतावा करते हैं और काफी समय तक इस पछतावे में ही रहते हैं और सोचते हैं कि काश हमने गलती ना की होती।

    कार्य के बिगड़ जाने पर पछतावा करना ही रह जाता है मनुष्य के पास । लेकिन देखा जाए तो गलतियां करना भी मनुष्य की आदत में है और फिर अपनी गलतियों से सीखना भी मनुष्य के व्यवहार में है।

    पछतावा अक्सर काम के बिगड़ जाने के बाद ही होता है तो यहां यह कहने से तात्पर्य यह है कि अतीत में हुई गलतियों का वर्तमान में उनके बारे में सोचना ही पछतावा कहलाता है।

    पछतावा एक दरवाजे के जैसे है जो की कार्य खत्म होने के बाद प्राप्त निष्कर्ष से मिलता है यदि मनुष्य पछतावे रूपी दरवाजे को खोलकर और हो चुके कार्य से मनुष्य द्वारा की गई गलतियों से सीखे तो होगा यह कि आने वाले समय में किन गलतियों को नहीं दोहराना चाहिए इसलिए व्यक्ति को पछतावे को दुख के रूप में ना लेकर उसको सीख के रूप में लेना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के लिए आने वाले समय में फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

    कभी-कभी कुछ व्यक्ति पछतावे में ऐसा डूब जाते हैं कभी-भी उभर नहीं पाते और हमेशा पछतावे में ही रह जाते हैं।यदि ऐसे व्यक्तियों को कोई मार्गदर्शन करनेवाला व्यक्ति मिल जाता है और मार्गदर्शन करता है तो ऐसे व्यक्तियों को पछतावे से बाहर निकलने में मदद मिल सकती है।

    हम मनुष्य जाति में पछतावे के नुकसान को एक बहुत बड़ी गलती के रूप में याद करते हैं और कभी न भूलने वाली घटना बना लेते हैं पर हम मनुष्य जाति को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि हमने हमेशा अपने पछतावे से ही सीखा है।

    अतीत में हुई गलतियों को हम बदल तो नहीं सकते परंतु हम उन गलतियों से सीख ले सकते हैं इस तरह हम पछतावे को एक बोझ ना बनाकर बल्कि एक सीखने का जरिया बनाकर आगे बढ़ सकते हैं।

    पछतावे को दो रूप होते है पहला किसी इंसान से मेरे धोखे को भी पछतावा ही कहा जाता है ऐसा पछतावा मिलने के बाद मनुष्य को काफी गहरा आघात लगता है पर किसी के द्वारा धोखा दिए जाने पर मनुष्य आगे के लिए समझदार हो जाता है तो कहने का मतलब यह है इस तरह के पछतावे से मनुष्य दुखी ना होकर समझदार हो जोता है और आगे किसी और इंसान से विश्वास करते समय समझदारी दिखता है और पहले की हुई गलतियों को दोहराता नहीं है।

    इसी तरह पछतावे का दूसरा रूप किसी काम में गलतियों की वजह से नफा-नुकसान हो जाने पर इंसान को जो पछतावा होता है ऐसे पछतावे में अक्सर इंसान का दीवाला भी निकल जाता है और इनका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता स्थिति खराब हो जाती है ऐसे में कोई अपना ही हमें पछतावे को सीख के तौर पर लेना सीख सकता है।

    पछतावे से बचने के लिए हमें अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना सीखना होगा और इसके अलावा जब भी हम कोई कार्य करें तो उसे कार्य के लिए पहले से योजना बनाकर चलना ही हमें पछतावे से दूर रख सकता है।

    इसी तरह हमें किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करने से पहले कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए अन्यथा पछतावा मिलना तय होता है ।

    पछतावा कभी ना भूलने वाला एक सबक लेकर भी आता है और हमें बहुत कुछ सीखा कर जाता है।

    अधिकतर व्यक्ति पछतावे को एक ऐसी समस्या समझते हैं जिससे बचना ही एक मात्र विकल्प है यह सोचकर आगे कभी-भी किसी भी प्रकार का जोखिम लेने से डरते हैं और जोखिम न लेने में ही अपनी भलाई भी समझते हैं।

    हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए इस धरती पर जितने भी बड़े से बड़े कार्य या फिर खोज हुईं उस समय में कभी ना कभी कोई गलती भी हुई होगी लेकिन गलतियों की वजह से क्या वे व्यक्ति उस कार्य करने से रूके अगर वह व्यक्ति अपने कार्य को गलतियों की वजह से पछतावे में आकर बीच में ही छोड़ देते तो क्या वह कार्य संभव हो सकते।

    इसलिए गलतियां और पछ्तावा कार्य के दौरान होने वालीं क्रियाएं हैं पछतावे में आकर हम अपने कार्यों को बीच में छोड़ देने से डरपोक प्रवृत्ति के भी बन जाते हैं।

    पछतावा इस बात का प्रमाण नहीं नहीं होता कि आपने जो कुछ किया वह गलत किया बल्कि पछतावा इस बात का प्रमाण होता है कि आपके अंदर कुछ करने की हिम्मत है इसलिए पछतावे में फंसकर खुद को सजा न दें।

    अतीत में हुई गलतियों को बदला नहीं जा सकता पर उन गलतियों की वजह से मिले पछतावे से आने वाले भविष्य को सुधारा जा सकता है।

    बीते समय में जो जा चुका है उसके लिए पछतावा करने से अच्छा है कि आप अपने बीते हुए समय के पछतावे से गलतियां स्वीकार करके आगे बढ़े और स्वयं को फिर से आगे बढ़ने का मौका दें और पछतावे को सबक के रूप में खुद को समझदार होना सिखाएं।

    समय निकल जाने के बाद अक्सर हम उस समय को पछतावे के रूप में याद करते हैं क्योंकि वह समय हमारे लिए एक सुनहरा अवसर बनकर आया था इसलिए यह पछतावा होना स्भाविक है परंतु अगर हम इस पछतावे को इस सीख में बदल लें की आने वाले समय में मैं किसी भी अवसर को छोडूंगा नहीं तो यह सीख आपके लिए आने वाले वक्त में फायदेमंद साबित हो सकती है।

    पछतावे के प्रति अपना नजरिया बदलकर हम स्वयं को आगे बढ़ा