Category: Motivational

  • आत्मज्ञान

    धरती पर सभी जीव-जंतु और प्राणियों में मनुष्य का जीवन संसार में एक ऐसा जीवन है जो जीवन ही नहीं जीता बल्कि अपने आस्तित्व के होने और न होने पर भी सवाल जवाब करता है और इस पर चर्चाएं भी करता है ।मनुष्य मन कभी-कभी अपने दिमाग में भी अपने जीवन से जुड़े कई सवालों का जवाब ढूंढने की तलाश में रहता है।

    इस धरती पर लाखों करोड़ों किस्म के जीव-जंतु है जिनमें से मनुष्य ही अपने जीवन के जन्म और मरण के बारे में जानता है इसलिए शायद मनुष्य जीवन जीव जंतुओं के जीवन से अलग जीवन है।

    मनुष्य और जीव-जंतुओं की तरह सिर्फ खाने को ही अपना जीवन नहीं समझता बल्कि अपने जीवन को बेहतर तरीके से जी सके इसके लिए योजना बनाता है व्यवस्थाएं करता है।

    और शायद जीवन मरण को जानने के तत्पश्चात् ही मनुष्य ने आगे के भविष्य को बेहतर करने के लिए नई-नई खोज करना सीखा। इन खोजों में मनुष्यों ने स्वयं के जीवन में अचानक आई आपदाओं से लड़ना भी सीखा और इसके साथ जीवन की हर घटना से सबक भी लिया।

    मनुष्य के पास सब कुछ होने के बावजूद मनुष्य खुश रहना नहीं सीख पाया हर वक्त भागते रहना ही जीवन बन चुका है।

    जीवन क्षणभंगुर है यह जानने के बाद भी मनुष्य अपने जीवन को नहीं जीता बल्कि दूसरे के जीवन में हो रही घटनाओं में शामिल होकर अपने समय को बर्बाद करता रहता है ।

    मनुष्य हर वक्त भविष्य की बेहतर योजनाओं में ही फंसा रहता है तो कभी बीते कल में हुई घटनाओं में खो जाता है इस तरह मनुष्य वर्तमान को जीना समझ नहीं पता।

    कुछ पल के लिए अगर मनुष्य यह सोचे कि वाकई में वह वही जीवन जी रहा है जो कि उसे जीना चाहिए तो शायद उसके अंतर मन से जवाब असंतुष्टि का मिलेगा क्योंकि हम अपने जीवन को दूसरों को खुश करने के लिए या दिखावे के लिए जी रहे होते हैं जबकि इस सत्य से मनुष्य भली भांति परिचित है कि हर व्यक्ति के पास जीवन की सीमा तय है तो क्यों न व्यक्ति को अपना जीवन जीने में ही आनंद लेना सीखना होगा।

    जिस तरह से हर सुबह सूरज निकलता है और शाम होने पर अस्त भी हो जाता है ठीक उसी प्रकार इंसान का जीवन भी जन्म लेकर धीरे-धीरे मरण की और बढ़ता है इस जीवन मरण की सीमा को समझकर व्यक्ति अपने जीवन को मूल्यवान बन सकता है ।

    मृत्यु सत्य को स्वीकार कर लेने से मनुष्य का जीवन के प्रति नजरिया बदलने में भी आसानी होगी और यहीं से मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति भी मिलने लगती है।

    आत्मज्ञान प्राप्त करने का एक और साधारण सा तरीका है रोज सुबह यदि व्यक्ति कुछ क्षणों के लिए आंख बंद करके और मौन होकर ध्यान करता है तो भी उसे धीरे-धीरे आत्मज्ञान मिलने लगता है

    मनुष्य को जब आत्मज्ञान धीरे-धीरे प्राप्त होता है तो वह मनुष्य जाति और जीव जंतुओं के प्रति निस्वार्थ सेवाभाव रखने लगता है और सच्ची शांति महसूस करने लगता है।

    आत्मज्ञान का मतलब मनुष्य के स्वयं के जीवन को लेकर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति और जीव जंतुओं को प्रति है। आत्मज्ञानी व्यक्ति मनुष्य के बीच ऊंच नीच, उच्चजाति निम्न जाति जैसे भेदभाव को नहीं रखता मैं मनुष्य को सिर्फ मनुष्य ही समझता है ना कि किसी विशेष धर्म का।

    आजकल के वक्त में मनुष्य स्वार्थ से भरा जीवन जीने लगा है जिसमें वह सिर्फ अपने ही भलाई का अवसर ढूंढता रहता है और साथ में अपने सगे संबंधियों का बुरा सोचता रहता है।

    मनुष्य के पास महंगे से महंगे संसाधन होने के बाद भी मनुष्य अपने अंतर मन से शांति महसूस नहीं कर पाता हर वक्त कोई न कोई चिंता उसे सताती ही रहती है।

    खुद को खोज लेना भी मनुष्य के लिए आत्मज्ञान कहलाता है खुद को खोज लेने वाला व्यक्ति कभी भी किसी जीत के प्रति प्यास महसूस नहीं करता और अगर उसके पास कुछ ना हो तो भी वह व्यक्ति परेशानी या चिंता महसूस नहीं करता ऐसा व्यक्ति अपने जीवन के हर पल में आनंद ही आनंद लेता है।

    सही मायने में सच्चा आत्मज्ञानी व्यक्ति या स्वयं को खोज लेने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन को बेहतर तरीके से समझकर कृत्रिम दुनिया के सुख और सच्चे सुख में अंतर को समझ लेते हैं।

    यदि मनुष्य के अंदर कोई जीत प्राप्त करने की चाहत होती है और उस जीत को हासिल करने के बाद मनुष्य एक दूसरी मंजिल को हासिल करने की दौड़ में लग जाता है एक प्रकार से मनुष्य इस दौड़ से कभी संतुष्ट नहीं होता और इस वजह से वह जीवन की सच्ची शांति महसूस नहीं कर पाता।

    मनुष्य अपनी मेहनत और लगन से सब कुछ हासिल कर लेता है परंतु इस सब के बाद भी अंदर से खालीपन महसूस होता रहता है जो की साधारण मनुष्य इस खालीपन की वजह को नहीं समझ पाते।

    जीवन के अर्थ को समझने वाले व्यक्ति अपनी हर स्थिति में संतुष्ट रहना जानते हैं ऐसे लोगों को फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने लोगों से पीछे है या उनके पास कोई भी बड़ी उपलब्धि नहीं है।

    जिस दिन मनुष्य यह समझ जाएगा की मन की शांति के लिए महंगे संसाधन की जरूरत नहीं होती बल्कि सच्चा सुख दूसरों की मदद करने में व जीव-जंतुओं की रक्षा करने में है तो वह व्यक्ति व्यर्थ की परेशानियों से बाहर निकल आयेगा ।

  • अपने निर्णय खुद लेना सीखें

    जब भी मनुष्य कोई निर्णय लेना चाहता है अपने किसी जरूरी काम के लिए। निर्णय लेते वक्त व्यक्ति कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है।

    असमंजस की स्थिति हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो आती है पर क्या ऐसे में हमें अपने जीवन के छोटे बड़े निर्णय लेना दूसरों से पूछ कर लेना होगा जब आप निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं तो आपका परिवार आपका समाज आपके दोस्त जैसा चाहते हैं अगर आप भी उनकी खुशी में अपने निर्णय को लेते हैं तो क्या यह आपके जीवन के लिए धोखा नहीं कहलाता । यहां यह सब कहने का मतलब ऐसा नहीं है कि हमें अपने परिवार की और समाज की बातों को सुनना समझना नहीं चाहिए समय-समय पर हमें अपने परिवार और समाज की बातों को सुनकर भी निर्णय लेने चाहिए।

    व्यक्ति माने या ना माने परंतु जब आप अपने छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए सहारा ढूंढते हैं तो आपको आदत पड़ जाती है इस सहारे की ।आपके जीवन के हर निर्णय को स्वयं से लेने में आप असहाय सा महसूस करने लगते हैं आपको अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर संदेह रहने लगता है जो कि आपके स्वयं के विश्वास के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।

    जब व्यक्ति अपने जीवन के भी छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए भी सहारे पर निर्भर रहता है तो एक तरह से वह अपने मानसिक विकास और स्वयं की तरक्की मे स्वयं से धोखा भी कर रहा होता है क्योंकि जब तक कोई भी व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना नहीं सीखेगा वह जीवन भर अज्ञानी बनकर रह जाएगा।

    कोई भी अपने कार्यों के निर्णय दूसरों से पूछ कर लेता है तो वह व्यक्ति अंदर से डरा और सहमा हुआ भी रहने लगता है और खुद पर पूरी तरह से विश्वास भी नहीं कर पाता ऐसे व्यक्तियों की छवि समाज में भी अविश्वसनीय लोगों में गिनी जाती है ।

    स्वयं पर विश्वास न करके मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धोखा खुद से ही करता है यदि व्यक्ति अपने डर से बाहर निकलकर खुद पर विश्वास रखते हुए अपने छोटे-छोटे निर्णयों को खुद से लेना सीखता है तो उसे अच्छे हो बुरे की समझ होने लगती हैऔर बिना यह सोचे कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय सही साबित होंगे या ग़लत तो उसके अंदर विश्वास बनता जाएगा और वह खुद पर विश्वास भी करने लगेगा।

    जब व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखता है तो ऐसे व्यक्ति का जीवन के प्रति नजरिया भी बदल जाता है और वह छोटे-छोटे जोखिम लेना भी शुरू कर देता है।

    व्यक्ति को अपना अच्छा बुरा स्वयं से सोचना सीखना होगा तभी व्यक्ति अपने जीवन का भरपूर आनंद ले सकेगा।

    मनुष्य जब भी दूसरों के निर्णयों में अपनी हां मिला देता है तो कहीं ना कहीं अंदर से वह व्यक्ति दुख महसूस करने लगता है दूसरे व्यक्ति आपके जीवन के निर्णय को लेने में अपना नजरिया लगाते हैं जबकि वे लोग कभी यह नहीं जान पाएंगे कि आपकी खुशी कैसे निर्णयों में होगी।

    इस पृथ्वी पर हर व्यक्ति को अपने निर्णय लेने का पूरा अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है तो ऐसे में कोई व्यक्ति अपने जीवन के खास निर्णय को लेना दूसरों पर क्यों डाल देता है व्यक्ति को समझना होगा की जीवन उसका है तो निर्णय लेने का हक भी उसका ही होना चाहिए ।

    व्यक्ति अपने जीवनकाल में बहुत कुछ हासिल कर लेता है यदि वह अपने निर्णय को लेना सीख जाता है निर्णय लेने से व्यक्ति सही गलत की पहचान करना सीखता है और आत्म विश्वासी बन जाता है।

    अगर आप भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हो तो अपने निर्णय दूसरों कि कहने पर लीजिए । पर क्या कभी सोचा है कि क्या दूसरों के आपके जीवन के निर्णय लेने से आप वही बनेंगे जो आप चाहते थे तो उसका जवाब होगा नहीं आप वह नहीं बन पाएंगे जो जो छवि आपने लिए अपने मन में बनाई है आप भी उस भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे जिसमें व्यक्ति जीवन भर अपनी समस्याओं में घिरे रहता है वह व्यक्ति हर पल हर दिन अपनी खुशियों का गला घोंटता है और नसीब का रोना रोता रहता है।

    ऐसे व्यक्तियों को कभी पता नहीं चल पाता कि उनके जीवन के दुख का वास्तविक कारण क्या है वह हमेशा दुख को अपना नसीब समझकर पूरा जीवन जी लेते हैं।

    यह विडंबना एक व्यक्ति कि नहीं बल्कि पूरे समाज की है व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं से न लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और अपनी इस घटिया सोच की आदत को अपने बच्चों को भी सिखा देता है।

    इस प्रकार एक व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय को स्वयं से न लेकर खुद को तो दुखी रखता है साथ में अपनी आने वाली पीढ़ी को भी आगे न बढ़ने के रास्ते नहीं समझा पाता है।

    अपनी पुरानी और घटिया सोच से बाहर निकलने का रास्ता शुरुआत में थोड़ा कठिन लगता है और मुश्किल भी लगता है हो सकता है स्वयं से निर्णय लेने से आपको कुछ नुकसान भी हो परंतु स्वयं से निर्णय लेने से एक बात तो तय है कि आप अपने जीवन के बारे में सही ढंग से समझने लगते हैं और कभी ना कभी आप अपने निर्णय लेने से वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे जो आपके मन में सपने की तरह हर पल रहा होता है।

    मनुष्य को अपने निर्णय लेना सीखकर एक नया मुकाम हासिल करना चाहिए और खुद को भीड़ का हिस्सा बनने से रोकना होगा।

    जो व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीख जाता है तो ऐसे व्यक्ति और व्यक्तियों की निगाह में सम्मान जनक जगह बना लेते हैं और ऐसे व्यक्तियों की वजह से समाज भी तरक्की करने लगता है।

    अतः हमें अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखना होगा और साथ ही दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिए गए निर्णयों का भी सम्मान करना सीखना होगा।

    अपने से छोटों और परिवार में बच्चों के द्वारा लिए गए सही निर्णय लेने की हिम्मत को सराहना भी चाहिए और इसके अलावा बच्चों और छोटों को सही और बूरे निर्णय लेने में फर्क भी बताना होगा क्योंकि बुरे निर्णय लेने से हम कहीं ना कहीं अपना और अपने से जुड़े व्यक्तियों का बुरा भी कर रहे होते हैं इसलिए हमें निर्णय लेते वक्त समझदारी से काम लेना होगा।

  • जीवन का आत्मज्ञान

    यह जीवन हमारे लिए एक यात्रा के समान है और हम मनुष्य जीवन यात्रा के यात्री हैं। हम सब यह तो अच्छे तरीक़े से जानते हैं की जो ‌ मनुष्य इस यात्रा पर आया है एक न एक दिन अपनी यात्रा खत्म करके जाएगा तो फिर क्यों ना हम इस यात्रा को आनंद के साथ पूरी करें और जीवन में आत्मज्ञान भी लेना सीखें।

    हर मनुष्य में किसी भी कार्य व वस्तु के प्रति जानने की इच्छा होती है। कभी-कभी किसी चीज को जानने के प्रति उत्सुकता ही व्यक्ति को उसके अंदर की अपने अंदर की क्षमता और सामर्थ्य की पहचान कराती है और फिर व्यक्ति सामर्थ्य के अनुसार अपनी प्रतिभा को पहचानने की कोशिश करके अपनी उपलब्धियां को बढ़ाना भी चाहता है।

    मनुष्य के अंदर आत्मज्ञान की शुरुआत यही से होती है जब मनुष्य की प्रतिभाओं की प्रशंसा होने लगती है तो ऐसे में वह व्यक्ति‌ घमंड और जोश में ना पड़कर स्वयं को आगे बढ़ा कर सर्वप्रथम स्वयं की प्रतिभाओं का निरीक्षण करने लगता है और अपनी कमियों पर भी ध्यान देता है व्यक्ति समझ चुका होता है खुद को बेहतर बनाने का अर्थ । इसके बाद व्यक्ति खुद को और भी विशेष बनाते हुए आगे बढ़ता है और आत्मज्ञान की नई परिभाषाओं को गढ़ता है। मनुष्य का अपने गुणों को पहचानना अच्छी बात है पर इससे अच्छा मनुष्य को अपनी कमियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए और अपनी कमियों को सुधारने की निरंतर कोशिश भी करते रहना चाहिए।

    मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानकर और अपनी कमियों को सुधार कर एक नया और बेहतर इंसान बनते जाता है ।कभी-कभी कुछ व्यक्ति अपने गुणों का बखान स्वयं से करने लगते हैं और अपनी कमियों को समाज से छुपा कर रखते हैं ऐसे व्यक्ति समाज के साथ धोखा कर रहे होते हैं।

    यदि मनुष्य अपनी कमियों को लगातार छुपाए रखेगा और अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश नहीं करेगा तो ऐसे व्यक्तियों का आत्मज्ञान का अर्थ समझना अत्यंत कठिन होगा।

    हम जिस समाज में रहते हैं या फिर कहे कि हम जिन लोगों के साथ रहते हैं यह व्यक्ति हमारी उन कमियों को देखने में बेहतर होते हैं जिन कमियों को कभी हम देख और समझ नहीं पाते आमतौर पर आलोचक इन्हीं बातों के लिए जाने जाते हैं यदि व्यक्ति दूसरों के द्वारा बताई गलतियों को स्वीकार करते हुए और अपनी कमियों को सुधारता है तो यह उस व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा हो जाता है।

    कभी-कभी मनुष्य अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से न तो किसी की सुनता है और नाही अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश करता है पर जब कभी जिद्दी स्वभाव वाले व्यक्ति असफलता को देखते हैं तब उन्हें अपनी हार और असफलता के साथ अपने अंदर का यह गलत और जिद्दी रूप देखने को मिलता है और यह असफलता उनके जीवन में उन्हें सुधारने की वजह बन जाती है।

    यदि मनुष्य अपने द्वारा किए गए कार्यों का निरीक्षण बेहतर तरीके से करे और किये गए कार्यों के निरीक्षण के दौरान व्यक्ति अपने कार्य की कमियों को सुधारने की कोशिश करता है और अगली बार अपने कार्यों में यह गलती ना हो इसकी भी कोशिश करता है तो वह व्यक्ति बेहतर होते चले जाता है और उसके अंदर की प्रतिभाएं बढ़ती जाती हैं।

    जीवन को जीने का आनंद बढ़ाने के लिए व्यक्ति जितना स्वयं के कार्यों पर ध्यान देगा और दूसरों की जीवन में क्या हो रहा है इससे मतलब नहीं रखेगा तो शत प्रतिशत अपने जीवन में आगे बढ़ता ही जाएगा।

    यदि व्यक्ति आलोचकों से अपनी दोस्ती कर ले और आलोचकों की बात को गंभीरता से लेकर अपनी बुराइयों को खत्म करने लगता है तो उसका एक नया रूप बनता है यह रूप भी आत्मज्ञान की जरूरत है ।

    जीवन का मतलब सफल होना ही नही होता बल्कि जीवन तो एक यात्रा है और हमको इस जीवन के हर पल का आनंद लेना सीखना होगा

    जब हम यह समझ जाएंगे की जीवन में सफल होने से भी अलग और भी बहुत कुछ होता है जैसे की गरीब और असहाय लोगों के काम आना जरूरतमंदों की मदद करना समाज के सभी व्यक्तियों को एक नजर से देखना यह सभी मनुष्य के अंदर व्यवहार होना चहिए तभी मनुष्य जीवन की अर्थ को समझ सकता है और आत्मज्ञान के प्राप्त करने के मार्ग को समझेगा।

    जब व्यक्ति अपने अंदर की कमियों पर ध्यान देने लगता है तो वह अपने हर पल को बेहतर बनाते जाता है और इस तरह व्यक्ति अपने जीवन को भी बेहतर बना लेता है।

    बेहतर जीवन बेहतर व्यक्ति की प्रतिभाएं देख कर समाज के व्यक्ति भी उनसे जुड़ने लगते हैं । बेहतर व्यक्ति से जुड़े व्यक्तियों में भी अपनी प्रतिभाओं को पहचान की अपनी कमियों पर ध्यान देने की आदत बन जाती है और यह आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी होती है।

    आत्मज्ञान जीवन के अर्थ को समझने के बाद ही ही शुरू होता है इसका मतलब यह नहीं है की हर मनुष्य प्रतिभाशाली हो, खूबियों से भरा हो या सफल हो। एक साधारण व्यक्ति भी अगर अपने अंदर से स्वार्थ अधीरता और अपनी कमियों को खत्म करने लगता है तो वह व्यक्ति भी जीवन के आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

  • हर उम्र सीखने की होती है

    हमारे समाज में हर व्यक्ति को उम्र के हिसाब से कार्य करना चाहिए ऐसी सोच और मानसिकता है इस तरह की सोच पुरानी सोच और रूढ़िवादी सोच कहलाई जाती है ।

    ऐसे कायदे होने से समाज ने हर व्यक्ति को एक तरह की वेड़ियों में बांध दिया है जिस कारण हर व्यक्ति का दम घुट रहा है। मान लीजिए कोई महिला पढ़ना चाहती है जो की अपने बचपन में किसी कारणवश अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी जब यह महिला अपने परिवार को बताती है कि वह अपनी पढ़ाई के सपने को पूरा करना चाहती है तो सर्वप्रथम परिवार के व्यक्ति उसकी हंसी उड़ाते हैं और समाज परंपरा पास पड़ोसी ऐसे बहानों को बनाकर उस महिला को सपना पूरा करने से रोक देते हैं।

    यह रूढ़िवादी सोच व्यक्ति के अंदर घर कर जाती है की वह चाह कर भी अपने सपनों को अपने सीखने की उम्र पर ना सीखने की वजह से छोड़ देता है समाज में बुजुर्ग व्यक्ति इसका सबसे बड़ा उदाहरण होता है बुजुर्ग व्यक्ति चाहतें हैं कि वह भी कुछ करें परंतु समाज और परिवार वाले बुजुर्ग व्यक्तियों को बूढ़ा कहकर उन्हें कमजोर महसूस कराते हैं जिस वजह से बुजुर्ग व्यक्ति चाह कर भी अपने मन की जिंदगी को अपनी पसंद के कार्य न कर पाने की वजह से बहुत दुखी हो जाते हैं ऐसे व्यक्तियों को अपना जीवन बोझ लगने लगता है।

    यदि मनुष्य इस बात को सही तरीके से समझ जाए कि किसी भी कार्य को करने या सीखने की कोई उम्र नहीं होती है तो व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर तरीके से जीने लगेगा और शायद हम अपने जीवन में विकास कर जायेंगे ।

    एक तरह से व्यक्ति जब समझ जाएगा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती तो व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य भी पूरा कर सकेगा।

    मनुष्य इस रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलकर अंदर से मज़बूत और आत्मविश्वासी बन जाता है कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती यह कथन ही व्यक्ति के अंदर ऊर्जा भर देता है।

    जीवन का अर्थ भी यही है की हमें जीवन के हर पल में और उम्र के हर पड़ाव पर नई-नई चीज सीखनी चाहिए। चीजों को सीखने की आदत इंसान के बौद्धिक विकास को बढ़ावा भी देती है इस तरह हम सीखने के नए मायने भी समझ सकेंगे और जीवन का अर्थ सुख से नहीं बल्कि नई तकनीक को सीखने से है।

    बदलती तकनीक हमारे जीवन के नजरिए को भी बदल रही है तो फिर इन्सानों को भी सीखने की उम्र क्यों होती है। इस नजरिए को समझना होगा और खुद को समाज द्वारा और परिवार द्वारा बनाए दायरों से बाहर निकल कर एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा।

    आज के वक्त में नई चीज या तकनीक के बारे में जानना भी महत्वपूर्ण हो चुका है तो ऐसे में व्यक्ति स्वयं के पास मौजूद तकनीक से भी बहुत कुछ सीख सकता है।

    सीखने की कोई उम्र नहीं होती इसका मतलब बहुत से लोग गलत सोच से भी अंदाजा लगा बैठते हैं और स्वयं को नुक्सान भी पहुंचा देते हैं इसलिए व्यक्ति को सतर्क रहना भी. सीखना होगा ।

    अगर किसी भी उम्र में है हम कुछ भी नया सीख सकते हैं कार्य कर सकते हैं तो इससे व्यक्ति को मानसिक मजबूती भी मिलती है और आजादी अनुभव होने लगती है जब व्यक्ति को अपने सपनों को पूरा करने का उद्देश्य मिलता है कठिनाइयां आने पर भी वह इंसान आगे की तरफ बढ़ता रहता है।

    हर व्यक्ति के सीखने की उम्र का मापदंड न होने पर व्यक्ति रचनात्मक कार्यों में सफलता प्राप्त कर लेता है और अपनी जिम्मेदारियां को भी समझने लगता है।

    आपने ऐसे व्यक्ति भी देखे होंगे जो हर वक्त चिड़चिड़े स्वभाव में रहते हैं दरअसल ऐसे व्यक्तियों की मानसिक दशा समाज और परिवार के बनाए गए नियमों की वजह से बिगड़ चुकी होती है ऐसे व्यक्तियों को क्या अच्छा लगता है किस कार्य को करने से ख़ुशी मिलती है यह कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की यदि ऐसे व्यक्तियों को कुछ भी सीखने की आजादी दे दी जाए तो वह व्यक्ति भी शांत और संतुष्ट होकर रहना सीख जाएंगे।

    हमारे समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिन्हें एक दूसरे के कार्यों को देखने की और व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्यों में कमी निकालने की बुरी आदत होती हैं

    समाज और परिवार की सोच व्यक्ति को नए कार्य सीखने की उम्र से नहीं होता बल्कि हमारी निम्न स्तर मानसिकता की वजह से होता है।

    अतः बदलते समय के साथ मनुष्य को अपनी सोच भी बदलनी होगी और स्वयं से सवाल जवाब भी करना होगा क्या हमारे जीवन का उद्देश्य है केबल सुख पाना और झूठी शान दिखाना ही होता है तो जवाब होगा नहीं।

    मनुष्य के अंदर असीम शक्तियां हैं यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार अपनी शक्तियों के आधार पर नई चीजों को सीखता है तो वह जीवन के अर्थ को समझ कर नई खोज भी कर सकता है जो कि मनुष्य जाति के लिए फायदेमंद ही साबित हो सकती है।

    इसलिए हर उम्र सीखने की होती है मनुष्य को यह बात समझते हुए दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए और व्यक्तियों को आगे बढ़ने में प्रेरित करना चहिए एक व्यक्ति अपनी सोच से पहचाना जाता है व्यक्ति अपने कार्यों के पहचान जाता है हमें समझना होगा इंसान की बढ़ती उम्र सिर्फ एक नंबर है उसके अलावा कुछ नहीं।

  • क्षमा करना ही मनुष्य धर्म है।

    मनुष्य के भीतर हंसना रोना चिल्लाना गुस्सा करना ऐसी कई क्रियाएं होती हैं । जिन्हें व्यवहार का नाम दिया गया है।

    मनुष्य की इन क्रियाओं के द्वारा ही मनुष्य की पहचान होती है। इन क्रियाओं में से कुछ क्रियायें अच्छे व्यवहार को बढावा देती है तो कुछ क्रियाओं से मनुष्य का घमंडी , लालची और क्रोधी स्वभाव का होने का भी पता चलता है।

    मनुष्य की निम्न क्रियाओं में से क्रोधित क्रिया में आकर व्यक्ति हमेशा खुद को ही नुकसान पहुंचाने का कार्य करता है ।

    क्रोधित स्वभाव का व्यक्ति कभी यह नहीं समझ पाता कि उसके द्वारा दूसरे को परेशान करने से वह स्वयं को भी ज्यादा परेशान कर रहा है।

    क्रोधित व्यक्ति हर वक्त क्रोध में रहने की आदत से कभी कभी ऐसा व्यवहार कर जाता है की बाद में उसे पछताना भी पड़ता है ।

    क्रोध में मनुष्य छोटी सी बात को बड़ी बात बना लेता है और लड़ाई पर उतर आता है और कुछ भी अच्छा बुरा समझने की शक्ति भी खो बैठता है ।

    क्रोध मे हम दूसरों को दंड देना सही समझते हैं जबकि हम खुद को ही दंड दे रहे होते हैं । जिस व्यक्ति का स्वभाव क्रोधित बन जाता है उसे जरासा मजाक भी पसंद नहीं आता ।

    वहीं दूसरी तरफ एक दयालु भाव का व्यक्ति जो की क्षमा करना ही उचित समझता है और क्षमा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानता है

    ऐसे व्यक्ति क्रोध में रहना जैसे चिता पर जलाने के समान मानते है इसलिए अपने साथ किसी और के द्वारा रचित अपमान या उपहास व्यवहार को दंड देना उचित नहीं समझते बल्कि औरों को भी क्षमा करने का ज्ञान और महत्व बताते हैं।

    इससे संबंधित एक कथा है

    एक गांव में सहदेव नाम का व्यक्ति रहता था वह अपने गांव का सबसे अमीर व्यक्ति था । वह गरीबों को दान देता था और हर तरह की मदद भी करता।

    सहदेव बहुत ही दयालु प्रवृत्ति का था वह किसी के भी द्वारा उड़ाए गए मजाक को गंभीरता से नहीं लेता था और किसी को भी परेशान करने या दंड देने की नहीं सोचता था।

    परंतु सहदेव की पत्नी चिड़चिड़े और क्रोधित स्वभाव की थी वह सभी से बात-बात पर ही लड़ने लग जाती थी झगड़ा करना उसे बहुत पसंद था ।सहदेव की पत्नी को अपने अमीर होने पर अभिमान था। पति सहदेव उसे बहुत समझाता परन्तु पति के लाख समझाने के बाद भी उसकी समझ में कुछ नहीं आता था।

    एक बार की बात है गर्मियों की दोपहरी में सहदेव की पत्नी अपने बिस्तर पर लेटी हुई आराम कर रही थी की तभी एक वृद्ध व्यक्ति द्वार पर खड़े होकर तेज आवाज में आवाज देने लगा वह वृद्ध व्यक्ति बहुत ही भूखा और कमजोर था।

    वृद्ध व्यक्ति के तेज आवाज़ देने से सहदेव की पत्नी की आंख खुल गई और वह बाहर आ गई उसने गुस्से में वृद्ध व्यक्ति से चिल्लाते हुए पुछा की क्या हो गया क्यों चिल्ला रहे हो क्या तुम्हारे घर में कोई मर गया है क्या इस पर उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा की बेटी में बहुत भूखा हूं और कमजोरी की वजह से मुझे चक्कर भी आ रहे हैं तुम्हारे यहां कुछ खाने को हो तो मुझे दे दो।

    इस पर सहदेव की पत्नी हंसते हुएं बोली कि हमने क्या भूखों का ठेका ले लिया है और यह कहते हुए वृद्ध व्यक्ति को धक्का दे दिया और कहा अब कभी मेरे यहां नहीं आना।

    कुछ समय बीत जाने पर सहदेव की पत्नी बीमार हो गयी पति सहदेव अपनी बीमार पत्नी को लेकर ‌दूसरे गांव के वैध के पास दवा दवा दिलाने ले गया।

    दवा देने वाला वैध वही वृद्ध व्यक्ति था जो एक बार सहदेव की पत्नी से खाना मांग रहा था। सहदेव की पत्नी ने वैध को देखकर ही पहचान लिया वैध ने भी सहदेव की पत्नी को पहचान लिया ओर सहदेव की पत्नी से कहा की चिंता मत करो मैं तुम्हें धक्का देकर भगाऊंगा नहीं बल्कि तुम्हारा इलाज करूंगा ।

    पति सहदेव ने घर आकर बताया कि जिस दिन तुमने वृद्ध को धक्का दिया था मैं गली से खड़ा सब कुछ देख रहा था तुमने उस वृद्ध व्यक्ति के साथ बहुत गलत व्यवहार किया था। वह वृद्ध व्यक्ति एक वैध था परंतु कुछ समय स्थिति खराब हो जाने पर उसके पास खाने पीने के लिए नहीं रहा था इसलिए मांग मांग कर गुजारा करता था।

    मैंने उस वृद्ध वैध व्यक्ति मदद की और दूसरे गांव में दवाखाना खुलवा दिया जिससे वह फिर से लोगों का उपचार करने लगा और कुछ रुपए भी कमाने लगा जिससे उसकी स्थिति सुधर गई । पत्नी यह सुनकर अपने किए गए व्यवहार पर लज्जित हो गई और क्षमा मांगने लगी इस पर पति सहदेव ने कहा कि क्षमा मुझसे नहीं उस वृद्ध व्यक्ति से मांगो इसके बाद सहदेव की पत्नी ने वृद्ध व्यक्ति से क्षमा मांगी।

    इस तरह हमें समझ में आता है जीवन में क्षमा करना सीखना चाहिए।

  • लक्ष्य प्राप्त करना सिखिए

    हर व्यक्ति कुछ बड़ा करना चाहता है पर हममें से कई व्यक्ति सिर्फ सोचते ही रहते हैं और आजकल आजकल करते हुए समय बर्बाद करने में लगे रहते हैं।

    हममें से कुछ व्यक्ति अपने जीवन में कुछ बड़ा करने की चाहत रखते हैं ।कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसके बारे में सोचते हैं वैसे भी कहा। गया है सोचो तो कुछ बड़ा ही सोचो।

    एक व्यक्ति है जो कि कुछ बड़ा करना चाहता है कुछ बड़ा करने की सोचते हुए अपने जीवन में आने वाली छोटी बड़ी समस्याओं से जूझता है पर क्या उसके जीवन में सिर्फ वही एक काम है ऐसा बिल्कुल नहीं है हर किसी के जीवन में कुछ समस्याएं भी होती हैं जिससे लड़ते हुए जो व्यक्ति आगे निकल जाता है वहीं अपने जीवन में कुछ बड़ा कर जाता है और कुछ लोग जीवन भर समस्याओं मे घिरे रह जाते हैं ।

    सबसे पहले हमें यह समझना होगा कुछ बड़ा करने के लिए हमें बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। हमने जो अपना लक्ष्य बनाया है वह लक्ष्य एक या दो रातों में नहीं मिल जाएगा बल्कि लंबे समय तक अपने लक्ष्य के लिए कठिन प्रयास करना होगा और उसके लिए सबसे पहले हमें अपने आरामदायक जीवन को त्यागना पड़ेगा।

    कभी-कभी हम किसी को देखकर उसके जैसा बनना चाहते हैं । हमें बेहतर तरीके से समझना होगा क्या वाकई में हम कुछ करना चाहते हैं या हमारे अंदर की सिर्फ एक ज़िद करने की आदत है।

    लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें कुछ नियम बनाने होंगे और नियमों को लगातार जारी रखना होगा इनमें से कुछ नियम

    consistency (लगातार कोशिश करना)

    कंसिस्टेंसी क्या होती है सबसे पहले हमें समझना होगा जब किसी काम को लगातार करते हैं तो यही कंसिस्टेंसी कहलाता है । किसी भी बड़े काम को करने के लिए उस कार्य को लगातार करते रहना चाहिए ।कंसिस्टेंसी की वजह से हम किसी कार्य को करने में बेहतर होते चले जाते हैं।

    लेकिन कंसिस्टेंसी में कभी-कभी इंसान ऊपर उठता है और नीचे गिरता भी है पर जो व्यक्ति सही मायनों में कुछ बड़ा करना चाहते हैं वह इस सबसे डरते नहीं बल्कि उठते गिरते आगे बढ़ते जाते हैं। इस प्रकार हमें यह भी समझना होगा किसी भी बड़े काम करने में इंसान एक बार में ही सक्सेस नहीं हो सकते।

    patience

    आज के युवाओं को कुछ भी बड़ा काम करने के लिए सबसे पहले पेशेंस रखना सीखना होगा जितना पेशेंस व्यक्ति के अंदर होगा वह उसको काम करने में उतना ही सहायता देगा।

    कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके अंदर पेशेंस की भारी कमी होती है इसकी वजह से वह अपने काम के बीच में आने वाली रुकावटों को देखकर ही घबरा जाता है और अपने बड़े काम को करने के सपने को पूरा नहीं कर पाता।

    इसलिए बड़े काम को करने की सबसे दूसरी महत्वपूर्ण चीज पेशेंस होना जरूरी है क्योंकि बिना पेशेंस के हम कुछ ही समय में अपने कुछ बड़ा करने की चाहत को खत्म कर देंगे।

    Failure

    किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने में समय लगता है लक्ष्य प्राप्त करने के दौरान कभी-कभी फेलियर का सामना भी करना पड़ता है फेलियर का सामना करते वक्त जो व्यक्ति घबराते नहीं बल्कि फेलियर का डटकर सामना करते हैं।

    लक्ष्य को हासिल करने के दौरान फेलियर का सामना करना भी व्यक्ति को दिमागी तौर पर मजबूत बनाता है जोकि उसके लिए फायदेमंद साबित होता है क्योंकि फैलियर होने पर भी हमें अनुभव मिलते हैं और यही अनुभव हमारे जीवन में हमें आगे बढ़ने का मौक़ा भी देते हैं।

    positive soch

    लक्ष्य प्राप्त करने के वक्त में व्यक्ति को अपने दिमाग में नकारात्मकता को निकालना होगा क्योंकि एक नकारात्मक सोच ही हमारे पूरे दिमाग को खराब कर देती है और इस तरह हम अपने बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने में रुचि नहीं लेते ।

    दिमाग को पॉजिटिव रखना सीखना होगा क्योंकि हमारा दिमाग जितना सकारात्मक रवैया रखेगा उतना ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में उत्साहित रहेंगे।

    लक्ष्य प्राप्त करने में छोटी बड़ी बाधाएं आती हैं अगर व्यक्ति की सोच सकारात्मक होगी तो वह हर बड़ी से बड़ी बाधा में भी अच्छा प्रर्दशन कर सकता है और मुश्किलों में भी अवसर ढूंढ निकालेगा और सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कभी भी हताश नहीं होता क्योंकि सकारात्मक सोच से व्यक्ति को साहस मिलता है।

    अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में व्यक्ति को दृढ़ निश्चयि होना चाहिए क्योंकि इंसान को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के दौरान अच्छे बुरे समय को भी देखना पड़ता है

    लोगों द्वारा उपहास भी उड़ाया जाता है ऐसे में व्यक्ति का साहसी सकारात्मक होना और दृढ़ निश्चयि होना जरूरी होता है।

    लक्ष्य प्राप्त करने में व्यक्ति को बहुत-कुछ अच्छे बुरे अनुभव मिलते हैं कभी-कभी व्यक्ति हार मान लेता है हतास हो जाता है इस तरह की रुकावटें आती हैं लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में और जो व्यक्ति इन सब रूकावटों से ऊपर उठ जाता है वही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

  • क्रोधित स्वभाव और हंसमुख स्वभाव।

    मनुष्य फितरत ही ऐसी है कि वह नकारात्मक बातों पर जल्दी क्रोधित होकर अपना आपा खो देता है। हमारे दिमाग में एक नकारात्मक बात हर अच्छी बात पर शक करने लगती है।

    अचानक कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति के क्रोधित स्वभाव के कारण हमारा भी दिमाग खराब होता जाता है।

    कुछ व्यक्ति झगड़ालू प्रवृत्ति के ईर्षा प्रवृत्ति के और कुछ शक्की मिजाज के होते हैं ऐसे व्यक्तियों की सोच नकारात्मक होती है ऐसे व्यक्तियों का पूरे दिन बात बात पर लड़ाई करना इनकी आदत बन चुका होता है।

    नकारात्मक व्यक्तियों को किसी अन्य व्यक्ति का हंसना बोलना और उसका जरा सा भी सफल होना अच्छा नहीं लगता। नकारात्मक व्यक्तियों की सोच हर वक्त दूसरों के बारे में बुरा सोचना आदत बन जाता है और दूसरों की बुराई करना इन्हें बहुत अच्छा लगता है।

    अपने क्रोधित स्वभाव के कारण यह स्वयं अपने जीवन में औरों से बहुत पीछे रह जाते हैं। इस कारण इनके व्यवहार में नकारात्मकता साफ झलकती है।

    नकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपने जीवन की हर असफलता को दूसरों के सर मढ़ता है और अपनी नाकामियों को छुपाता भी है।

    नकारात्मक होना कमजोर मानसिकता की पहचान है नकारात्मक व्यक्ति अपने जीवन में समस्याओं से लड़ना ना चाह कर आलस को अपनाने लगते हैं।

    दूसरी तरफ हंसमुख स्वभाव का सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हमेशा दूसरों का भला सोचता है और दूसरों की मदद करने में आगे रहता है।

    सकारात्मक सोच के कारण ऐसे व्यक्तियों की समाज में अलग ही पहचान होती है और इनके सामाजिक संबंध अच्छे रहते हैं।

    हंसमुख स्वभाव के कारण व्यक्ति की सफलता भी निश्चित होती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर समस्या से निपटने का हौसला रखते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव और हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति नकारात्मक स्वभाव के व्यक्ति से दूर रहने में ही अपनी भलाई जानता है और इसी वजह से हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति क्रोधित स्वभाव के व्यक्तियों की बातों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते।

    हंसमुख स्वभाव वाला व्यक्ति जानता है शांति पाने के लिए बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शांत रहना वह जानता है की हर बात का जवाब नहीं दिया जाता कुछ फालतू की बातों को जाने दो।

    बहस में ना पड़कर अपने समय को व्यर्थ ना करके ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए एक नई सोच को अपनाते हैं।

    सकारात्मक स्वभाव का व्यक्ति अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को नहीं देखता बल्कि साहस के साथ अपनी हर परेशानी में एक अवसर ढूंढता है।

    हसमुख स्वभाव के व्यक्ति की मानसिक स्थिति मजबूत होने की वजह से वह अपने पूरे जीवन में हर वक्त खुश और शांति महसूस करता है।

    इसलिए हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपना रवैया सकारात्मक बनाएं या नकारात्मक।

    सकारात्मक व्यवहार मनुष्य को नए नए अवसर प्रदान करता है।

  • इंसान के दो चेहरे

    हमारे सामने देखने में एक इंसान होता है पर असल में उस इंसान की दो चेहरे होते हैं और हर व्यक्ति दो चेहरे रखता है।

    हम देखते हैं कुछ इंसान हर वक्त खुशमिजाज रहते हैं ।उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो जैसे की उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है।

    पर सच तो यह होता है कि व्यक्ति अपने चेहरे को हंसमुख बनाए रखता है जिस कारण हम उसके चेहरे के पीछे छुपी हुई सच्चाई को समझ नहीं पाते।

    कुछ मनुष्य के कर्मों से हम उनके बारे में कई प्रतिक्रिया बना लेते हैं और इसी आधार पर हम उसके बारे में अपने दिमाग में उसके रूप को भी समझने लगते हैं पर जब कभी भी वह इंसान अपने कर्मों से कुछ अलग करने लगता हैं तो दूसरे व्यक्तियों के मन मे उस व्यक्ति की बनाईं हुई शख्सियत को देखकर हम उस व्यक्ति से नफ़रत करने लगते हैं ।

    हम यह भूल जाते हैं कि शायद उस व्यक्ति की भी कुछ समस्याएं होंगी जिस कारण उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना पड़ा।

    वहीं कुछ व्यक्ति अपने दूसरे रूप को समाज से छुपाते हैं ।जैसे की कुछ व्यक्ति समाज में दयालु भाव को रखते हैं पर असल जीवन में वह काफी क्रोधित स्वभाव के होते हैं और समाज में अपने क्रोधित स्वभाव को इसलिए छुपाते हैं ताकि उनके दयालु भाव को देखकर जो उनकी समाज में प्रतिष्ठा है वह कहीं धूमिल ना पड़ जाए।

    इसी तरह कुछ व्यक्ति कम बातचीत करने वाले समाज से कम मिलने जुलने वाले होते हैं । ऐसे व्यक्ति हमें घमंडी और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के लगते हैं जबकि वह बहुत ही दयालु प्रवृत्ति के होते हैं।

    इसलिए हमें हर इंसान को उसके द्वारा किए गए व्यवहार से उसके प्रति धारणाएं नहीं बनानी चाहिए बल्कि हमें हर इंसान के चेहरे के पीछे छुपे दूसरे चेहरे को भी देखने की कशिश करनी चाहिए।

    इसी पर आधारित एक छोटी सी कहानी है।

    एक साहूकार था जिसके पास बहुत जमीन थी। वह साहूकार स्वभाव से कम बोलता था और लोगों से बात भी तभी करता जब उसको कोई काम पड़ता उसके इस व्यवहार की वजह से आसपास के व्यक्ति उसको घमंडी और मतलबी समझते थे।

    घमंडी और मतलबी समझने के कारण उस साहूकार से कोई व्यक्ति ज्यादा नहीं बोलता था।

    एक बार की बात है साहूकार की जमीन पर आम के बहुत सारे वृक्ष लगे थे और उन वृक्षों पर बहुत सारे आम के फल भी थे ।वृक्षों पर लगे आम के फलो को देखकर एक दिन कुछ बच्चे वृक्षों पर चढ़कर आम तोड़ने लगे की तभी साहूकार वहां आ गया ।साहूकार को आते देख बच्चे डर गए और इस कारण बच्चे वृक्ष पर से नीचे गिर पड़े बच्चों को नीचे गिरने की वजह से चोट भी आईं।

    साहूकार ने जल्दी से बच्चों के लिए इलाज मुहैया करवाया और बच्चों की सही से देखभाल भी की ।जब यह बात बच्चों के परिवारजन को पता चली तो सभी उस साहूकार के प्रति मन में बनाई घमंडी और मतलबी साहूकार के रूप को गलत मानने लगे और उसे दिन उन्हें समझ में आया जिस साहूकार को वे घमंडी और मतलबी समझते थे वह साहूकार तो बहुत दयालु निकला।

    यह कहानी हमें समझाने के लिए है कि हमें किसी भी व्यक्ति को उसके व्यवहार से नहीं समझना चाहिए बल्कि हमें उसके असल रूप को देखने की कोशिश करनी चाहिए।

    अगर हम केवल सफल लोगों के प्रति सम्मान रखते हैं और गरीब लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं तो इसमें हमारी ही गलती है।

    समाज में एक पुरानी धारणा है कि जो व्यक्ति सफल है वह व्यक्ति सब की नजरों में होशियार और समझदार है और अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में असफल है तो उसका सभी मजाक उड़ाते हैं।

    समाज की पुरानी धारणाओं से बाहर निकल कर हमें असली सच को समझना होगा। जब हम सच को देखने की कोशिश करने लगते हैं तब हमें हर व्यक्ति के दो चेहरे साफ साफ दिखाई देगा।

  • बुरे वक्त में भी अच्छा सोचो।

    मनुष्य जीवन में समय का एक जैसे रहना मुश्किल है ।जैसे मनुष्य बचपन से बाहर निकल कर युवावस्था में कदम रखता है युवावस्था से व्यक्ति वयस्क आयु में बढ़ता है तो जैसे मनुष्य का रूप बदलता है ठीक उसी प्रकार समय भी सदा एक सा नहीं रहता ।

    हम मनुष्य सदा समय को अपनी परिस्थितियों के मुताबिक बनाना चाहते हैं परंतु ऐसा नहीं हो सकता। मनुष्य के जीवन में परेशानियां दुख देती है। कभी-कभी उन परेशानियों में हम घिर जाते हैं और फिर समय को ही दोष देने लगते हैं।

    अच्छा समय आने की उम्मीद में इंसान हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है कि जब समय अच्छा आएगा तभी उस फलाने काम को करूंगा और इसी सोच में बहुत समय व्यर्थ कर देता है ।

    पर क्या कभी हमने सोचा है परेशानियों का आना जाना लगा रहता है और इसी वक्त में अगर हम कुछ अच्छा सोच कर आगे बढ़े तो शायद हम अपने इस बुरे समय को अच्छे समय में बदल सकें।

    यह पुरानी सोच है कि हमारा बुरा हाल होने की वजह किसी की बुरी नजर लगना है जबकि इस तरह की सोच अंधविश्वास की पहचान मानी गई है।

    अगर हम अपने पूरे विश्वास के साथ और सच्ची लगन और मेहनत के साथ अपने बुरे समय में भी कार्य को लगातार करते रहे और लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करने से ना रुके तो हम बदलाव ला सकते हैं।

    परिस्थितियां कभी भी मनुष्य के अनुकूल नहीं रहती बल्कि हमें परिस्थितियों के अनुकूल रहना सीखना चाहिए और जिस अच्छे समय के बारे में सोचते हैं वह अच्छा समय कभी नहीं आता । वह अच्छा समय हमेशा सपनों में ही रहता है।

    मनुष्य को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा और इसी अच्छी सोच के बदलाव के साथ सर्वप्रथम स्वयं को बदलना होगा इसलिए अपनी सोच को बदलना होगा।

    बदलते समय के साथ आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति को अपने जीवन में तरक्की पाने के लिए खुद से शुरूवात करनी होगी ना कि किसी भी तरह की मदद कीउम्मीद रखनी चाहिए ।

    बुरे समय में इंसान को साथ देने वाला भी कोई नहीं होता इस कारण मनुष्य का सोचने का तरीका भी नकारात्मक हो जाता है। और वह अपने बुरे समय में असहाय महसूस करने लगता है।

    बुरे समय में व्यक्ति की भविष्य को लेकर जो भी योजनाऐं होती हैं वह भी विफल होते हुए दिखने लगतीं हैं। ऐसे में व्यक्ति को समझदारी के साथ अपने हर कदम को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा ।

    समाज भी हमें पुरानी समझ सिखाता है कि जब आपका समय खराब चल रहा हो तो कोई भी नया काम ना करो लेकिन अब हमें इस रूढ़िवादी सोच से आगे निकल कर खुद को समझाना होगा और समाज को भी अग्रसर करने में सहयोग देना होगा।

    क्योंकि समाज की नकारात्मक सोच का फर्क हर व्यक्ति की मानसिकता पर पड़ता है ।

    सोचो जरा अगर स्वतंत्रता सेनानी देश के आजाद होने से पहले के हालातो से ना लड़ते तो क्या स्वतंत्रता सैनानी देश को अंग्रेजों से आजादी दिला पाते।

    देश को आजादी मिलना एक सबसे बड़ा उदाहरण है कि समय कितना ही खराब क्यों ना हो इंसान अगर अपने बुरे वक्त से साहस के साथ लड़ता है तो वहअपने लिए एक अच्छा समय लाने की हिम्मत रखता है और खुद को आजादी दिला सकता है।

    समय हमेशा एक जैसा ही होता है जब मनुष्य का कोई भी काम नहीं बनता है तब ऐसे में समय को ही दोष देना इंसानी फितरत होती है और हमारा दिमाग भी समय को अच्छा और बुरा समझ ने लगता है।

    अतः हमें समझना होगा हमारी अच्छी सोच ही हमें बुरे वक्त से निकलकर हमें अच्छा समय दे सकती है। इसलिए अपने बुरे समय में घबराना नहीं चाहिए बल्कि साहस के साथ अच्छे समय के लिए लगातार कोशिश करनी चाहिए और मन में विश्वास रखना चाहिए कि एक दिन हम अपनी कोशिशें से अच्छा समय ला सकते हैं।

  • सच्चा सुख संसाधनों में नहीं स्वयं में है

    मनुष्य अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सुख संसाधनों की पूर्ति करने में नष्ट कर देता है क्योंकि उसको लगता है महंगे संसाधनों से सुख मिलता है जबकि यह बिल्कुल गलत सोच है ।

    मनुष्य जीवन भर सुख के पीछे भागता है और सुख से संबंधित हर उस चीज को पाना चाहता है जो उसे सुख दे सके पर जब मनुष्य उस चीज को पा लेने के बाद भी सुख महसूस नहीं करता तो और चीजों को पाने की अभिलाषा मनुष्य के अंदर बढ़ती जाती है।

    सुख की चाहत में मनुष्य आलीशान घर बनाता है, महंगे महंगे जेवर, महंगे महंगे कपड़े और विदेशों में घूमने जाना ।यह सब कुछ सुख हासिल करने की चाहत में इंसान करता है मगर फिर भी उसे सुख महसूस नहीं होता बल्कि समस्या टेंशन और सोच विचार में मनुष्य दब जाता है ।

    समाज में ऐसे कई लोग देखे हैं जो की रईस होते हैं ऐसे व्यक्तियों के बड़े-बड़े लोगों से मिलना जुलना रहता है। यहां तक कि अमीरी दिखाने के लिए लोग सोने चांदी की बर्तनों में खाना खाते हैं जबकि उनके असल जीवन में सुकून और शांति नहीं होती।

    मनुष्य अपने जीवन में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा को भी हासिल कर लेता है और समाज में एक प्रतिष्ठित आदमी बन जाता है इतना सब होने के बाद भी इंसान खुश नहीं होता।

    यहां तक कि मनुष्य अपने बच्चों को जान पहचान के जरिए उनके पैरों पर खड़ा करने में मदद करता है और बहुत हद तक अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कर भी लेता है जीवन में सुख की कमी नहीं रहती और दुख दूर-दूर तक नहीं दिखता इस सब के बाद भी मनुष्य को सच्ची खुशी हासिल नहीं होती।

    मनुष्य को सच्ची खुशी न मिलने का एक मुख्य कारण यह भी है कि मनुष्य हमेशा सुख को अपने बाहरी दुनिया में तलाशता है जबकि सच्चा सुख तो मनुष्य के अंदर ही छुपा हुआ होता है ।

    मनुष्य जिस सच्चे सुख की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है वह सच्चा सुख महंगी से महंगी गाड़ी वेश कीमती संसाधनों में नहीं मिलता यह सच्चा सुख मनुष्य को अपने अंदर खोजना पड़ता है।

    हमने ऐसे कई मनुष्य देखे होंगे जिनके पास अपार धन दौलत होती है फिर भी उनके जीवन में शांति नहीं मिलती और हमने ऐसे भी व्यक्ति देखे हैं जिनके पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसे व्यक्ति मस्त रहते हैं क्योंकि उनके पास वास्तविक शांति होती है ।

    मनुष्य को जब वास्तविक शांति का ज्ञान हो जाता है तब वह बेहतर तरीके से समझ जाता है की सच्ची खुशी मंहगे संसाधनों में नहीं बल्कि हमारे अंदर ही छुपी होती है।

    संसाधनों में पड़कर व्यक्ति एक ऐसी दुनिया में जीने लगता है जिस बनावटी दुनिया का निर्माण सिर्फ दिखावे के लिए इंसानों ने किया है।

    दिखावे की दुनिया का निर्माण करके इंसान उसमें स्वयं फंस चुका है इस कारण व्यक्ति प्राकृतिक दुनिया जोकि भगवान की बनाई दुनिया है उसका स्वाद लेना भूल जाता है और इस कारण वह व्यक्ति सच्चे सुख को भी समझने में देर करता है।

    मनुष्य को किसी कार्य को करने से पहले दिखावे की दुनिया से पूछना नहीं पड़े और कोई भी कदम उठाने से पहले उसके मन में किसी भी तरह का डर नहीं होगा उस दिन मनुष्य को सच्चे सुख की अनुभूति होती है।

    जब व्यक्ति आजाद मन से कोई भी कार्य करता है तब उसे जो खुशी मिलती है वहीं खुशी व्यक्ति के लिए सच्चा सुख साबित होती है।

    सही मायने में सच्चा सुख परिवार के साथ रहने और एक साथ खाना खाने में जो है वह किसी महंगे संसाधन में नहीं मिलेगा।

    सच्चे सुखी कोई कीमत नहीं होती और यह हर किसी को ना मिले ऐसा भी नहीं है । सच्चे सुख की तलाश करने वालों को अपने अंदर ही सच्चे सुख को टटोलना होगा।