सुख भी अपना दुख भी अपना

जीवन में सुख तो हर कोई चाहता है और सुख की चाह व्यक्ति को अपने सपनों में भी दिखाई पड़ता है । क्योंकि मनुष्य प्रवृत्ति होती ही ऐसी है।

सुखी जीवन की कामना मनुष्य की चाहत होती है पर क्या सोचने मात्र से ही जीवन में खुशियां आ जाएंगी तो मैं यहां बता दूं की सुखी जीवन की कामना रखने वालों को पहले मेहनत करना सीखना होगा और उसके बाद सुखी जीवन की कामनाएं पूरी होते दिखने लगेंगी।

सोचने वाली बात यह है कि हर मनुष्य सुख के पीछे ही क्यों भागते रहता हैं हर आरामदायक लगने वाली वस्तु हमें सुख का एहसास कराती है और उस सुख के एहसास को पाने के लिए हम जी तोड़ मेहनत करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद उस आरामदायक वस्तु को खरीद कर घर ले आते हैं लेकिन कुछ समय बाद फिर से हमें और कोई वस्तु दिखाई पड़ती है जो की सुख का एहसास कराती है और फिर से हम उसे पाने की कोशिश करते हैं और पहले की तरह उस आरामदायक वस्तु को पाने के लिए उसी के सपने देखने लगते हैं जब तक कि हम उसे आरामदायक वस्तु को हासिल ना कर लें और यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है पर क्या कभी सोचा है कि हम इंसानों के अंदर एक होड़ लगी हुई है दिखावे की जिससे हम एक दूसरे को दिखावे के चक्कर में महंगे से महंगे संसाधन देने लग जाते हैं बिना यह सोच की क्या यह हमारे काम का है या नहीं बस और दिखावे में आकर इसी को हम सुख समझ बैठे हैं।

आज के वक्त में इंसान का जीवन बहुत कठोर हो चुका है और सरल जीवन को कठोर जीवन बनाने का श्रेय इंसान को ही जाता है शुरुआत में तो किसी भी इंसान को पता नहीं चल पाता कि वह सुख के नाम पर एक गहरे दलदल में फंसता जा रहा है जब सुख के नाम पर इंसान दल-दल में धंस चुका होता है उसके बाद उसे महसूस होता है जो सुख दिख रहा था वह सुख न होकर असंतुष्ट जीवन की वजह बन जाता है।

इसी तरह इंसान दूसरे के जीवन में या अपने जीवन में कड़ी मेहनत को दुख समझ बैठता है यदि किसी इंसान के पास में मंहगे संसाधन नहीं है तो भी हम उस व्यक्ति को दुखी ही समझते हैं हम समझ चुके होते हैं की महंगे संसाधन होना सुख की पहचान होती है जब किसी के पास संसाधन के नाम पर कुछ भी नहीं होता तो ऐसे व्यक्तियों को समाज में सब निम्नवर्ग का समझ लेते हैं

हमें समझना होगा जिस तरह सुख हमारे जीवन का हिस्सा है उसी तरह दुख भी हमारे ही जीवन का हिस्सा होता है। यदि हम सब समझ जाएं की सुख और दुख जीवन के हिस्से से होते हैं तो शायद हमारा जीने का तरीका बेहतर हो जाएगा और हम चेन और शांति के साथ अपने जीवन को व्यतीत करने लगेंगे।

इंसान के जीवन में दुख आने से इंसान सतर्क को सावधान रहना सीख जाता है मैं जीवन के बहुमूल्य होने के मतलब को जान जाता है दुखों का जीवन में आना एक तरह से इंसान की पहचान भी होने का तरीका होता है जोकी हर इंसान की बेहतरी का निर्माण करने के लिए होता है।

इसलिए मनुष्य को कभी घबराना नहीं चाहिए सुख और दुख को अगर जीवन का हिस्सा मान लिया जाए तो हम जीवन में आने वाले अचानकसुख और दुख को देखकर खुद को संभालने में बेहतर होते चले जाते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के पास सुख संसाधन की भरपूर मात्रा है तो ऐसे व्यक्तियों को समाज गरीब और दुखी व्यक्तियों की मदद करनी चाहिए यह करने के बाद मनुष्य को जो सुख प्राप्त होता है उसकी परिभाषा करना कठिन होगा परंतु इतना जरूर कह सकते हैं किसी की मदद के बाद मिलने वाले सुख की अनुभुति संसाधनों के सुख से कहीं बढ़कर होती है।

दुख भी एक प्रकार का जीवन की प्रक्रिया मात्र होती है और गहराई से समझा जाये तो वह दुख भी एक तरह का छलावा ही होता है जो कि मनुष्य को भ्रमित करने आता है और साथ में मनुष्य की सहनशक्ति को भी भांपना चाहता है यदि मनुष्य यह समझ जाए की सुख और दुख जीवन के समय के नाम है जो कि इंसान ने ही दिए हैं तो वह दुख के होने पर भी विचलित नहीं होगा।

जितना ज्यादा मनुष्य सुख के नाम पर संसाधन रूपी भोगों में पड़ेगा वह उतना ही खुद को भाग दौड़ जैसे जीवन में फंसा पाएगा और जो मनुष्य जितना भी सुख और दुख के ऊपर होकर सोचना शुरू करेगा तब उसको अपने विचलित होने की वजह पता चल जाएगी।

सुख और दुख के ऊपर के जीवन की समझ आने पर मनुष्य को सुख भी अपना और दुख भी अपना लगने लगता है वे अपने दुख से भी उतना ही मोह करता है जितना की सुख से ऐसे व्यक्तियों की नजर में सुख और दुख के कोई मायने नहीं होते मैं अपने जीवन के हर पल को आनंद के साथ जीने लगते हैं।

इसलिए सुख और दुख हमारे ही द्वारा बनाए गए जीवन का छलावा मात्र होता है और इन छलावों में फंसकर जीवन जीने की आदत पड़ चुकी है।

सुख और दुख सिर्फ हमारी सोच का फर्क होता है जितना जल्दी हम इस दिखावे और छलावे की दुनिया से बाहर निकल आएंगे उतना ही हम जीवन को सही तरीक़े से सीख सकेंगे।

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