भक्ति की परीक्षा

जब कोई व्यक्ति अपने हर पल में अपने ईश्वर का ही मनन करते रहता है और उसके हर कार्य की शुरुवात भगवान के नाम से ही होती है तो ऐसे व्यक्तियों को समाज में भक्त के नाम से पुकारा जाने लगता है ।

भगवान में सच्ची श्रद्धा रखने वाले भक्त अपने जीवन में भगवान की पूजा अर्चना व्रत अनुष्ठान करके जो सुख और आनंद प्राप्त करतें हैं उसकी कोई सीमा नहीं होती है।

बहुत से ऐसे भी भक्त होते है जो भगवान के मोह में कठोर से कठोर तपस्या भी कर जाते हैं । यहां तक कि अपने जरूरी कामों को भी भगवान की भक्ति के आगे तुच्छ समझते हैं।

तो कुछ व्यक्ति भगवान की भक्ति में अपना घर संसार भी त्याग देते हैं और बैरागी जीवन जीने लगते हैं।

कुछ ऐसे व्यक्ति भी भक्ति-भाव में अपनी गहरी आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन हो जाएं और इसी सपने में रहने लगते हैं।

एक ऐसी ही सच्चे भक्त की इसी प्रकार की एक कहानी है।

पुराने समय की बात है भगवान की आस्था रखने वाला एक भक्त था वह कठोर से कठोर व्रत अनुष्ठान करके अपने भगवान की पूजा अर्चना करता था वह व्यक्ति अपने भगवान पूजा आसन के कार्य को समय पर और भली भांति पूरे मन से करता था और हर पल अपने भगवान के नाम की माला भी जपता रहता था और भगवान के दर्शन हो जाए यही सोचता रहता था दर्शन मात्र सोचने से ही मन ही मन बहुत खुश रहता था परंतु काफी समय तक भक्त को भगवान की कठोर तपस्या करके भी दर्शन नहीं हुए।

भक्त होने के साथ उस व्यक्ति के अंदर अपने भगवान की भक्ति करने के प्रति अभिमान भी रहता था ।उस व्यक्ति का ऐसा मानना था कि मैं भगवान की भक्ति सबसे ज्यादा करता हूं और इस संसार में मुझसे बड़ा कोइ भक्त भी नहीं होगा ऐसी सोच के कारण उस व्यक्ति के अंदर घमंड बढ़ता ही जा रहा था।

एक बार की बात है भगवान ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची और अपने भक्त की परीक्षा लेने के लिए भगवान ने वृद्ध का रूप धारण किया और फिर अपने भक्त के घर के द्वार पर पहुंच गए उस समय वह व्यक्ति अपने भगवान की उपासना में लगा हुआ था वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने भक्त से पूछा कि तुम किस भगवान‌की उपासना कर रहे हो और क्या तुम्हारे भगवान तुम्हारी उपासना से खुश हो जाते हैं।

वृद्ध के यह कथन सुनकर उस भक्त व्यक्ति ने कहा कि मैं तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए बहुत सालों से तपस्या कर रहा हूं भगवान की तपस्या मेरी तरह कोई कर भी नहीं कर सकता तो फिर मेरे भगवान मुझसे खुश क्यों नहीं होंगे ।

वृद्ध का भेष धारण किए हुए भगवान ने कहा कि तुम इतने सालों से कठोर तपस्या कर रहे हो तो जरुर तुम्हें पृथ्वी के हर जीव में भगवान के दर्शन प्राप्त होते होंगे यह सुनकर वह व्यक्ति चुप रह गया और कुछ भी नहीं कह सका।

वृद्ध रुप में भगवान ने भक्त से कहा क्या तुमने सच्चे मन से अपने भगवान की भक्ति नहीं की यह सुनकर भी वह व्यक्ति चुप खड़ा रहा और कुछ नहीं कह सका। उसी वक्त एक भूखा व्यक्ति भक्त के द्वार पर आया और खाने के लिए खाना मांगने लगा पर उस भक्त व्यक्ति ने उस भूखे व्यक्ति को अनदेखा कर दिया परंतु वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने पास से उस भूखे व्यक्ति को भोजन कराया ।

भक्त व्यक्ति यह सब खड़ा होकर देखता रहा इस पर वृद्ध रूप में भगवान ने कहा की तुमने अपने भगवान की कठोर तपस्या दिखावे के लिए की है । तुम अगर सिर्फ सच्चे मन से भी भगवान का नाम लेते तो तुम्हें आज तुम्हारे द्वार पर आए भूखे व्यक्ति के रूप में भगवान के दर्शन हो जाते परंतु तुम्हारे अंदर अभिमान होने की वजह से तुम्हें अपने भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हुए ।

यह सुनकर भक्त व्यक्ति को अपने कार्य और कर्मों पर बहुत क्रोध आया और अपनी भूल का एहसास करते हुए वृद्ध रूप में भगवान से विलाप करने लगा और कहने लगा कि शायद घमंड में चूर होकर मैने कभी सच्चे मन से अपने भगवान की पूजा अर्चना नहीं की शाय़द इसलिए आज मेरे द्वार पर जब भगवान् आए तो मैं मूर्ख अपने भगवान को पहचान भी नहीं सका।

भक्त व्यक्ति को विलाप करते हुए देख कर वृद्ध रूप में भगवान ने अपने दिव्य स्वरूप को प्रकट करके भक्त को दर्शन दिए भक्त व्यक्ति अपने भगवान के दर्शन पाकर बड़ा ही खुश हुआ।

भगवान ने कहा कि मैं अपने भक्तों से कठोर तपस्या करने पर ही खुश नहीं होता बल्कि जो व्यक्ति सच्ची भक्ति करता है और गरीब और असहायों को मदद देता है ऐसे व्यक्तियों के प्रति मैं अपने भक्तों से सदा खुश रहता हूं।

जब व्यक्ति विनम्रता, प्रेम, सेवा और दयाभाव का व्यवहार प्रथ्वी पर मोजूद हर जीव और इंसान से रखता है तो ऐसे व्यक्तियों को हर जीव और हर इंसान में मेरे दर्शन होने लगते है।

भक्त व्यक्ति का उस दिन के बाद से अहंकार मिट गया और उसकी जगह हृदय में सच्ची भक्ति का प्रकाश फैला गया ।

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