Category: Bhakti Katha

  • जय गणेश देवा

    हमारे देश में हर त्योहार को जोरदार और बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है गणेश भगवान के त्यौहार को भी भारतीय लोग धूमधाम से मनाते हैं।

    गणेश भगवान जो की बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। गणेश त्योहार महाराष्ट्र सहित पूरे देश में 12 दिनों तक मनाया जाता है यह त्यौहार गणेश चतुर्थी से प्रारंभ होकर गणेश चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

    हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है गणेश जी मूर्ति की स्थापना गणेश चौथ के दिन स्थापना करने से लेकर गणेश चतुर्दशी तक भगवान गणेश अपने भक्तोंके सारे दुःखों को हर लेते हैं साथ ही भक्तजन की विनती को भी स्वीकार करते हैं।

    गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मिट्टी की बनी हुई मूर्ति का भक्तों द्वारा गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। भगवान गणेश जी की मूर्ति की स्थापना से लेकर विसर्जन तक भक्त अपने गणेश जी का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करते हैं और उनकी सेवा भी करते हैं।

    12 दिन के गणेशोत्सव में भक्त और भगवान का गहरा रिश्ता बन जाता है और अपनापन जुड़ने की वजह से जब गणेश मूर्ति का विसर्जन किया जाता है तो कई भक्त की आंखें नम हो जाती है।

    गणेश चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है गणेश प्रतिमा के विसर्जन के समय अपने भगवान को विदाई देते वक्त भक्तों की आंखों में आंसू भी दिखाई पड़ते हैं।

    अगले बरस फिर से आना ऐसे जयकारे बोलते हुए भक्त ढोल नगाड़ों के साथ विधि विधान से पूजा अर्चना और आरती के बाद अपने भगवान गणेश जी का विसर्जन करने ले जाते हैं।

    भगवान गणेश जी की मूर्ति विसर्जन के वक्त पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा जाता है इसके लिए कृत्रिम कुंड भी बनाए जाते हैं जिससे कि पर्यावरण से बचा जा सके और भक्तों की आस्था को भी ठेस ना पहुंचे।

    भगवान गणेश से जुड़ी हुई एक कथा है जो कि इस प्रकार है।

    भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है जब भक्तों के जीवन से दुखों को हर लेते हैं इस वजह से भगवान गणेश जी विघ्नहर्ता नाम से पहचाने गया।

    कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है नरांतक और देवांतक नाम के दो असुर थे। दोनों असुरों ने देवताओं और ऋषि मुनियों के जीवन से शांति खत्म कर दी ।असुरों के आतंक से ऋषि मुनि अपने तप और साधना भी नहीं कर पा रहे थे और देवताओं को भी दोनों असुरों का संकट खत्म करने का और उनसे छुटकारा मिलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था । असुरों ने अपनी शक्ति और बल के आधार पर देवताओं ऋषि मुनियों को और साधुओं को अपने आतंक से भयभीत कर दिया था इस कारण तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मच गई थी अशांति फैल गई थी देवताओं साधुओं और ऋषि-मुनियों के मन मे डर का माहौल बन गया था।

    असुरों से निपटने और शांति चाहने के लिए जब देवताओं को कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वे सब भगवान गणेश जी की शरण में पहुंच गए और गणेश जी से मदद की गुहार लगाने लगे देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा असुरों से संकट मुक्त कराइए ।

    भगवान गणेश जी ने अपने भक्तों की पुकार सुनकर दिव्य रूप धारण कर लिया भगवान गणेश जी के दिव्य तेज को देख कर देवता और ऋषि मुनि भी नतमस्तक हो गए भगवान गणेश जी ने अपने दिव्य पराक्रम से दोनों असुरों को युद्ध में हरा दिया और दोनों असुरों का नाश करके धर्म और सत्य को विजय दिलाई।

    असुरों का अंत होने के बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा कि हे प्रभु अब आप ही हम सभी के विध्नों को हरने वाले हैं अतः आप ही अब विघ्नहर्ता कहलायेंगे।

    भगवान गणेश जी अपने भक्तों के संकट को हरने में जरा भी देर नहीं लगाते।

    भगवान गणेश जी को शुभ कार्यों में प्रथम निमंत्रण दिया जाता है जिससे कार्यों के अच्छे-से पूर्ण हो सकें ऐसी भावना रखी जाती है।

    भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है जिससे पता चलता है कि हमारे गणेश भगवान छोटे जीव को भी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक मानते हैं।

  • भक्ति की परीक्षा

    जब कोई व्यक्ति अपने हर पल में अपने ईश्वर का ही मनन करते रहता है और उसके हर कार्य की शुरुवात भगवान के नाम से ही होती है तो ऐसे व्यक्तियों को समाज में भक्त के नाम से पुकारा जाने लगता है ।

    भगवान में सच्ची श्रद्धा रखने वाले भक्त अपने जीवन में भगवान की पूजा अर्चना व्रत अनुष्ठान करके जो सुख और आनंद प्राप्त करतें हैं उसकी कोई सीमा नहीं होती है।

    बहुत से ऐसे भी भक्त होते है जो भगवान के मोह में कठोर से कठोर तपस्या भी कर जाते हैं । यहां तक कि अपने जरूरी कामों को भी भगवान की भक्ति के आगे तुच्छ समझते हैं।

    तो कुछ व्यक्ति भगवान की भक्ति में अपना घर संसार भी त्याग देते हैं और बैरागी जीवन जीने लगते हैं।

    कुछ ऐसे व्यक्ति भी भक्ति-भाव में अपनी गहरी आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन हो जाएं और इसी सपने में रहने लगते हैं।

    एक ऐसी ही सच्चे भक्त की इसी प्रकार की एक कहानी है।

    पुराने समय की बात है भगवान की आस्था रखने वाला एक भक्त था वह कठोर से कठोर व्रत अनुष्ठान करके अपने भगवान की पूजा अर्चना करता था वह व्यक्ति अपने भगवान पूजा आसन के कार्य को समय पर और भली भांति पूरे मन से करता था और हर पल अपने भगवान के नाम की माला भी जपता रहता था और भगवान के दर्शन हो जाए यही सोचता रहता था दर्शन मात्र सोचने से ही मन ही मन बहुत खुश रहता था परंतु काफी समय तक भक्त को भगवान की कठोर तपस्या करके भी दर्शन नहीं हुए।

    भक्त होने के साथ उस व्यक्ति के अंदर अपने भगवान की भक्ति करने के प्रति अभिमान भी रहता था ।उस व्यक्ति का ऐसा मानना था कि मैं भगवान की भक्ति सबसे ज्यादा करता हूं और इस संसार में मुझसे बड़ा कोइ भक्त भी नहीं होगा ऐसी सोच के कारण उस व्यक्ति के अंदर घमंड बढ़ता ही जा रहा था।

    एक बार की बात है भगवान ने अपने भक्त की परीक्षा लेने की सोची और अपने भक्त की परीक्षा लेने के लिए भगवान ने वृद्ध का रूप धारण किया और फिर अपने भक्त के घर के द्वार पर पहुंच गए उस समय वह व्यक्ति अपने भगवान की उपासना में लगा हुआ था वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने भक्त से पूछा कि तुम किस भगवान‌की उपासना कर रहे हो और क्या तुम्हारे भगवान तुम्हारी उपासना से खुश हो जाते हैं।

    वृद्ध के यह कथन सुनकर उस भक्त व्यक्ति ने कहा कि मैं तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए बहुत सालों से तपस्या कर रहा हूं भगवान की तपस्या मेरी तरह कोई कर भी नहीं कर सकता तो फिर मेरे भगवान मुझसे खुश क्यों नहीं होंगे ।

    वृद्ध का भेष धारण किए हुए भगवान ने कहा कि तुम इतने सालों से कठोर तपस्या कर रहे हो तो जरुर तुम्हें पृथ्वी के हर जीव में भगवान के दर्शन प्राप्त होते होंगे यह सुनकर वह व्यक्ति चुप रह गया और कुछ भी नहीं कह सका।

    वृद्ध रुप में भगवान ने भक्त से कहा क्या तुमने सच्चे मन से अपने भगवान की भक्ति नहीं की यह सुनकर भी वह व्यक्ति चुप खड़ा रहा और कुछ नहीं कह सका। उसी वक्त एक भूखा व्यक्ति भक्त के द्वार पर आया और खाने के लिए खाना मांगने लगा पर उस भक्त व्यक्ति ने उस भूखे व्यक्ति को अनदेखा कर दिया परंतु वृद्ध के रूप में भगवान ने अपने पास से उस भूखे व्यक्ति को भोजन कराया ।

    भक्त व्यक्ति यह सब खड़ा होकर देखता रहा इस पर वृद्ध रूप में भगवान ने कहा की तुमने अपने भगवान की कठोर तपस्या दिखावे के लिए की है । तुम अगर सिर्फ सच्चे मन से भी भगवान का नाम लेते तो तुम्हें आज तुम्हारे द्वार पर आए भूखे व्यक्ति के रूप में भगवान के दर्शन हो जाते परंतु तुम्हारे अंदर अभिमान होने की वजह से तुम्हें अपने भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हुए ।

    यह सुनकर भक्त व्यक्ति को अपने कार्य और कर्मों पर बहुत क्रोध आया और अपनी भूल का एहसास करते हुए वृद्ध रूप में भगवान से विलाप करने लगा और कहने लगा कि शायद घमंड में चूर होकर मैने कभी सच्चे मन से अपने भगवान की पूजा अर्चना नहीं की शाय़द इसलिए आज मेरे द्वार पर जब भगवान् आए तो मैं मूर्ख अपने भगवान को पहचान भी नहीं सका।

    भक्त व्यक्ति को विलाप करते हुए देख कर वृद्ध रूप में भगवान ने अपने दिव्य स्वरूप को प्रकट करके भक्त को दर्शन दिए भक्त व्यक्ति अपने भगवान के दर्शन पाकर बड़ा ही खुश हुआ।

    भगवान ने कहा कि मैं अपने भक्तों से कठोर तपस्या करने पर ही खुश नहीं होता बल्कि जो व्यक्ति सच्ची भक्ति करता है और गरीब और असहायों को मदद देता है ऐसे व्यक्तियों के प्रति मैं अपने भक्तों से सदा खुश रहता हूं।

    जब व्यक्ति विनम्रता, प्रेम, सेवा और दयाभाव का व्यवहार प्रथ्वी पर मोजूद हर जीव और इंसान से रखता है तो ऐसे व्यक्तियों को हर जीव और हर इंसान में मेरे दर्शन होने लगते है।

    भक्त व्यक्ति का उस दिन के बाद से अहंकार मिट गया और उसकी जगह हृदय में सच्ची भक्ति का प्रकाश फैला गया ।

  • ईश्वर की खोज

    हममें से कई व्यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं ऐसे व्यक्तियों में आस्था कूट-कूट कर भरी हुई होती है। ऐसे व्यक्तियों के हर काम प्रभु के नाम से शुरू होते हैं और जीवन की हर छोटी बड़ी उपलब्धि को हासिल करके उसका श्रेय भी प्रभु को ही देते हैं।

    आस्था से भरे व्यक्ति भगवान के प्रति गहरा विश्वास और जुड़ाव रखते हैं ऐसे व्यक्ति भगवान से जुड़े त्यौहारों को भी विधि पूर्वक मनाते हैं।

    आस्था से भरा व्यक्ति जीवन के हर कार्य के पीछे, हर घटना की वजह, हर कर्म को भगवान से जुड़ा समझता हैं।

    पर ऐसे व्यक्तियों को किसी भी कार्य का समय पर न होने पर गुस्सा भी बहुत आता है और अपने आगे अन्य व्यक्तियों को तुच्छ समझने की आदत होती है लेकिन इन्हें अपने कार्य के न बनने पर भी शांति से रहना सीखना होगा और अपने गुस्से पर नियंत्रण करना सीखना होगा ।

    ऐसे व्यक्तियों की सुबह प्रभु के नाम से ही शुरू होती है नहाने से पहले खाना नहीं खाते नहाने के बाद खाना खाने से पहले अपने प्रभु को भोग लगाते हैं और यह अपने परिवार को भी यही शिक्षा सिखाते हैं।

    ऐसे व्यक्तियों में आस्था के साथ-साथ अहंकार भी होता है जिसके कारण यह अज्ञानी भी हो जाते हैं समाज के बहुत से कल्याण कार्यों में स्वार्थ निकालते हैं।

    ऐसे व्यक्ति अपने अंदर का अहंकार संपूर्ण रूप से नष्ट नहीं कर सकते इसी कारण उसकी भक्ति भी अधूरी रह जाती है यदि व्यक्ति अपने अंदर के अहंकार को खत्म कर दे तो उसे अपने प्रभु के दर्शन भी हो जाते हैं।

    भगवान के विश्वास से जुड़ी हुई एक कथा जो कि कुछ इस प्रकार हैं

    सुखदेव नाम से एक व्यक्ति प्रभु में गहरी आस्था रखता था ।सुखदेव को प्रभु के दर्शन के दर्शन की चाह थी।

    सुखदेव अपने प्रभु के दर्शन के लिए जगह-जगह मंदिरों में व तीर्थस्थानों में जाता था परंतु सुखदेव को प्रभु के दर्शन कहीं भी प्राप्त नहीं हुए ।

    सुखदेव इस वजह से अत्यंतदुखी रहता और अपने प्रभु से दर्शन देने को विनती करता। सुखदेव ने प्रभु के दर्शन की चाह में कठोर उपवास रखे साधनाएं भी करीं। इतना करने के बाद भी जब सुखदेव को प्रभु के दर्शन नहीं प्राप्त हुए तो वह निराश रहने लगा था।

    एक बार की बात है सुखदेव को आसमान में दिव्य प्रकाश दिखाई दिया प्रकाश का तेज बहुत ज्यादा होने की वजह से सुखदेव को कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था तभी दिव्य प्रकाश में से एक आवाज आई और कहने लगी सुखदेव तुम मुझे व्यर्थ ही बाहर खोज रहे हो मैं तो तुम्हारे अंदर ही विराजमान हूं।

    दिव्य प्रकाश की आवाज ने कहा कि सुखदेव तुम मुझे देखना चाहते हो तो सर्वप्रथम तुम्हें अपने अंदर के अहंकार को और दिखावे को खत्म करना होगा जब तुम अपने अंहकार और दिखावे से बाहर आ जाओगे उसी समय तुम्हें मेरे दर्शन प्राप्त हो जाएंगे।

    दिव्य प्रकाश से इस तरह का कथन सुनकर सुखदेव को बहुत खुशी मिली कि मेरे प्रभु तो मेरे अंदर ही विराजमान हैं और मैं मूर्ख पता नहीं कहां-कहां प्रभु के दर्शन की चाह में भटकता रहा और इसी के साथ सुखदेव ने उसी पल अपने अंदर के अज्ञान, अंहकार को खत्म होते देखा और इसके बाद सुखदेव ने आंख बंद कर ली इसके बाद सुखदेव को स्वयं में प्रभु के दर्शन प्राप्त हुए।

    जिस तरह सुखदेव भगवान के दर्शन की चाह में दर-दर भटकता रहा और भगवान की दर्शन चाह में कठोर व्रत और साधनाएं करते रहा इसके पश्चात् भी सुखदेव को भगवान के दर्शन नहीं हुए।

    क्योंकि सुखदेव अपने भगवान को अपने चारों तरफ खोजता रहा परंतु भगवान तो सुखदेव के अंदर विराजमान थे लेकिन अंहकार और अज्ञान की वजह से सुखदेव को अपने भीतर भगवान् के दर्शन नहीं मिले।

    इस कहानी से समझ आता है कि भगवान तो कण कण में हैं पर जब तक हम अपने अहंकार को खत्म नहीं कर देते तब तक हमसे हमारे भगवान प्रसन्न नहीं होंगे और दर्शन भी नहीं देंगें।

  • सच के रास्ते पर भगवान की प्राप्ति

    हम सभी मनुष्य अपने अच्छे बुरे कार्य में भगवान को याद करते हैं। जब कोई व्यक्ति तरक्की के रास्ते पर उपलब्धियों को प्राप्त करता है तो अपने भगवान को ही अपनी उपलब्धियां का श्रेय देकर धन्यवाद कहता है ।इसी प्रकार जब व्यक्ति दुखों में घिर जाता है तो समाधान के लिए दुखों से बाहर निकलने का उपाय भी‌ सुलझाने में भगवान से मदद की गुहार लगाता है ।

    मनुष्य के अंदर का विश्वास ही भगवान होने का सबूत बताता है और फिर हम मनुष्य भगवान के दर्शन की चाह में बहुत कुछ करने की हिम्मत भी रखते हैं।

    किसी न किसी बहाने मनुष्य ईश्वर को खोजता है यह मनुष्य का विश्वास ही होता है कि वह अपने भगवान को खोजते हुए मंदिर में तीर्थ में जाकर जो संतुष्टि पाता है वह संतुष्टि मनुष्य को कहीं भी नहीं मिलती ।।

    धार्मिक स्थलों पर मनुष्य की आस्था की भीड़ होती है और इस भीड़ में भी मनुष्य शांति बनाए रखता है क्योंकि उसका विश्वास होता है कि भगवान कहीं ना कहीं से अपने भक्त को देख रहा है। ऐसे में कोई भी कार्य अचानक हो जाता है तो उसे ‌हम मनुष्य भगवान की ही शक्ति समझ लेते हैं।

    यहां तक कि मनुष्य शक्तियों के पीछे भगवान की कोई योजना समझता है इसलिए उसका विश्वास और भी गहरा होता जाता है कि भगवान नाम की कोई तो शक्ति है मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन व्रत रखता है और विधि-पूर्वक पूजा पालन भी करता है ।

    कुछ लोगों के जीवन में सुख शांति की वजह भी भगवान को ही माना जाता है यहां तक कि इंसानों का विश्वास है की बुरे कर्मों की सजा भी भगवान ही देते हैं। इस प्रकार मनुष्य का विश्वास मानता है कि इस सृष्टि की रचना भगवान ने ही की है।

    पर क्या कभी सोचा है कि भगवान को प्राप्त कर लेने से इंसान के जीवन का उद्धार हो जाएगा यह सोचना हमारा शायद गलत ही होगा क्योंकि हमें समझना होगा कि जब तक हम सच्चे इंसान नहीं बन जाते तब तक हमें ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती ।

    भगवान की प्राप्ति करने वाला इंसान कोई साधारण इंसान नहीं होता बल्कि एक ऐसा इंसान जो दया भाव से भरा हो जिस इंसान का हृदय दूसरे के दुखों को देखकर करुणा से भर जाए जिस इंसान के मन मस्तिष्क में अहंकार नाम की चीज ना हो सत्य हो और धर्म-कर्म के प्रति दायित्व निभाने का साहस हो ऐसा मनुष्य ही अपने भगवान को प्राप्त कर सकता है।

    परंतु एक ऐसा इंसान जो कि घमंड से भरा हो ‌इंसानियत का ज्ञान ना रखता हो जिस इंसान के मन में झूठ और कपट भरा हुआ हो जिस इंसान को दूसरे इंसानों के दुख से कोई लेना-देना ना हो ऐसे इंसान को भगवान की प्राप्ति होना असंभव और मुश्किल है।

    ऐसा व्यक्ति कितना ही पाठ पूजा करने का ढोंग रच ले परंतु भगवान की प्राप्ति असंभव ही रहती है।

    यदि मनुष्य सच्चे मन से बिना दिखावे के इंसान के सुख-दुख में काम आने लगे गरीबों की सेवा करने लगे तो धीरे-धीरे मनुष्य को भगवान की आस्था में विश्वास होने लगता है और भगवान प्राप्ति के मार्ग दिखाई देने लगते हैं।

    हमें समझना होगा मनुष्य जीवन जितना स्वार्थ से दूर रहेगा जितना दूसरों की भलाई के लिए नेक काम करेगा उतना ही उसका मानसिक संतुलन अच्छा रहेगा मानसिक संतुलन अच्छा होने से मनुष्य अच्छे कार्यों की तरफ झुकाव रखने लगता है और दूसरों लिए भी जीना सीखने लगता है।

    मनुष्य जीवन जब दूसरों के लिए जीने लगता है तब वास्तविक सुख की अनुभूति होने लगती है और जीवन के अर्थ को समझने लगता है।

    भगवान प्राप्ति से तात्पर्य मनुष्य को दूसरों के सुख-दुख में काम आना दया भाव को रखना और हर वक्त स्वयं के लिए ना जीकर गरीब इंसानों की मदद के लिए अपने जीवन को लगा देना भी भगवान की प्राप्ति ही होता है।

    सच्चे और नेक काम करने से मनुष्य को जीवन का सच्चा अर्थ समझने आने लगता है इस तरह ईश्वर को प्राप्त करने से पहले मनुष्य को स्वयं को एक सच्चा इंसान बनाना सीखना होगा।

    सच्चा इंसान बनने के लिए मनुष्य को कठिन परीक्षा देनी पड़ती है मनुष्य को अपने सुखों से ऊपर सोचना पड़ता है अपने अहम् से बाहर निकलकर ही मनुष्य भगवान प्राप्ति मार्ग को देख सकता है।

  • ऋषि पंचमी

    ऋषि पंचमी का व्रत हिंदू धर्म में मुख्य माना गया है इस उपवास को रखने के नियम और आचरण है जो की अति आवश्यक हैं।

    व्रत के नियम

    संकल्प और समय अवधि

    ऋषि पंचमी का व्रत सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त तक रहता है इस व्रत में सुबह स्नान करते समय संकल्प लेकर व्रत को शुरू करना चाहिए।

    व्रत का खान पान

    ऋषि पंचमी व्रत में फलाहार करके या फिर सिर्फ पानी पीकर रखा जाता है इस व्रत में नमक और प्याज अनाज प्रयोग नहीं करना चहिए ।

    मन और शरीर को साफ रखें

    इस व्रत में अपने मन मे अच्छा ही सोचें कोई भी बुरा विचार सोचने से बचें इसके अलावा अपने शरीर को भी साफ रखना इस व्रत का नियम है।

    सप्त ऋषि पूजन

    इस व्रत में चौकी पर कपड़ा बिछाकर और सातों ऋषियों की तस्वीर रखकर पूजन करना चाहिए और ऋषि पंचमी की कथा को सुनना चाहिए।

    ऋषि पंचमी हिंदी के महीने भादो महीने के अनुसार शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सप्तऋषियों जो की कश्यप, अति, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम ने जमदग्नि और वशिष्ठ तथा माता अरुंधति की पूजा अर्चना करने का व्रत रखने की परंपरा है।

    ऋषि पंचमी का व्रत रखने से भूल चूक या फिर अनजाने में हुए पाप और दोष से प्रायश्चित करने के लिए किया जाता है।

    ऋषि पंचमी व्रत कथा

    ऋषि पंचमी की पुराणों में एक कथा है। प्राचीन काल में उंत्तक नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ व अपनी दो संतानों के साथ रहते थे। ब्राह्मण की पुत्री का विवाह एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था पर विवाह के कुछ समय बाद पुत्री के पति की मृत्यु हो गई तो वह पुत्री अपने माता-पिता के पास रहने के लिए लौट आई।

    एक रात की बात है ब्राह्मण की पत्नी सुशीला ने देखा कि उनकी पुत्री के शरीर पर बहुत सारे कीड़े रेंग रहे थे यह देखकर पत्नी सुशीला ने अपने पति उंत्तक से इसका कारण पूछा तो ब्राह्मण उंत्तक ने बताया कि उनकी पुत्री ने पूर्व जन्म में अशुद्ध अवस्था में पूजा के बर्तनों खाद्य-सामग्री व देवस्थान को स्पर्श किया था।

    इतने सारे दोष होने के बाद भी हमारी पुत्री ने अपने पूर्व जन्म में दोष निवारण के लिए ऋषि पंचमी का व्रत तक नहीं रखा इस कारण हमारी पुत्री को यह कष्ट भोगना पड़ रहा है।

    इसके पश्चात् पत्नी सुशीला के कहने पर उंत्तक ने अपनी पुत्री को उसके पुनर्जन्म के दोष से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि पंचमी का विधिपूर्वक व्रत रखने को कहा।

    पुत्री ने भी अपने पिता द्वारा बताए गए नियम से ऋषि पंचमी का विधिपूर्वक व्रत रखा पूजा अर्चना की और अपने पुनर्जन्म किए गए दोष को दूर करने के लिए क्षमा मांगी और इस प्रकार उंत्तक और सुशीला की पुत्री के दोष दूर हो गए।

  • भगवान विश्वकर्मा

    हिंदू धर्म में माना जाता है भगवान विश्वकर्मा ने ही इस सृष्टि का वास्तु किया था। ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा जी को सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी दी थी भगवान विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के ही बंशज माने जाते हैं।

    भगवान ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि का निर्माण किया गया उस वक्त सृष्टि एक अंडे के आकर के जैसे थी। सृष्टि का निर्माण तो हो चुका था लेकिन सृष्टि को संवारने की भी आवश्यकता थी इसलिए ब्रह्मा जी ने सृष्टि की जिम्मेदारी भगवान विश्वकर्मा जी को दे दी इस प्रकार से एक तरह यह भी कहा जा सकता है कि भगवान विश्वकर्मा जी सृष्टि के वास्तुकार हैं।

    भगवान विश्वकर्मा के पुराणों और शास्त्रों के अनुसार पांचस्वरूप अर्थात अवतारों का वर्णन है। इन पांच अवतारों के नाम इस प्रकार हैं

    विराट विश्वकर्मा, धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरा वंशी विश्वकर्मा, सुधन्वा विश्वकर्मा ,मृग वंशी विश्वकर्मा।

    ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म थे तथा धर्म के पुत्र वास्तु देव थे। धर्म की वस्तु नामक स्त्री से शादी हुई धर्म और वस्तु के वास्तु सातवें पुत्र माने जाते हैं । वास्तु शिल्प शास्त्र के प्रेमी थे वास्तु देव की शादी अंगिरसी नामक युवती से हुई।वास्तु देव और अंगिरसी के पुत्र विश्वकर्मा थे ।

    भगवान विश्वकर्मा जी ने ही पृथ्वी पर शस्त्र ,अस्त्र और औजारों का निर्माण किया था ।

    भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर मशीन, पुर्जे ,हथियार , कारखानों में जो भी कार्य करने के समान होते हैं उन सभी का भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर पूजने का नियम होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है जितने भी काम करने के औजार कारखाने में होते हैं उन औजारों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी ने किया था।

    कोई भी छोटी दुकान , कारखाना या कोई भी छोटा कारीगर हो विश्वकर्मा जयंती पर अपने औजार अपने कार्य करने मशीन पुर्ज़ों का पूजन जरूर करता है।

    ै पुराणों में भगवान विश्वकर्मा जी की एक कथा प्रचलित है भगवान विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य का ताप इतना असहनीय था कि विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा को भगवान सूर्यदेव के समीप रहने में असमर्थता होती थी ।परेशान होकर संज्ञा अपने पिता की शरण में पहुंची और अपनी व्यथा अपनेपताजी विश्वकर्मा को सुनाई।

    भगवान विश्वकर्मा जी ने पुत्री संज्ञा के संकट को दूर करने के लिए सूर्य देव की सहमति से सूर्य देव को अपने शिल्प पहिए पर चढ़ाया और उनके अतिरिक्त तेज के आठवें भाग को तराश कर कम कर दिया जिससे सूर्य का रूप सौम्य और सहन करने योग्य हो गया।

    सूर्य देव के अलग किए गए उसी दिव्य तेज के अंशों से भगवान विश्वकर्मा जी ने ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली शस्त्रों का निर्माण किया इन शस्त्रों में भगवान विष्णु जी का सुदर्शन चक्र भगवान शिव जी का त्रिशूल और कार्तिकेय जी को शक्ति शामिल है।

    ऐसा माना जाता है लंका द्वारिका इंद्रपुरी और जगन्नाथपुरी की मूर्तियों का निर्माण भी स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने किया है।

  • दश लक्षण महापर्व

    दश लक्षण महापर्व जैन धर्म में मनाए जाने वाला आत्म चिंतन और आत्म शुद्धि का त्यौहार है।

    इस पर्व में आत्मा के दश उत्तम गुणों और उत्तम प्राप्ति के लिए मार्ग दिखाया जाता है। दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई व्रत, पूजा, संयम और वेद शास्त्रों का अध्ययन करते हैं दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाईयों का उद्देश्य मन, वचन काया को पवित्र करना और अपने कर्मों का पवित्र करना होता है।

    दश धर्म के नाम

    दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई प्रतिदिन हर धर्म की एक-एक दिन विशेष आराधना करते हैं। इन दश लक्षण धर्म के नाम इस प्रकार हैं।

    उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव , उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य।

    दश लक्षण महापर्व की शुरुआत दिगंबर जैन परंपरा में इसे आत्म शुद्धि संयम आत्म शुद्धि और आत्म अनुभूति का पर्व माना जाता है। भादो महीने के शुक्ल पक्ष में पढ़ने वाली पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक यह पर्व मनाया जाता है।

    पुराणों में कथा के अनुसार भगवान ऋगभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती जब अपनी विजय यात्रा पूरी करके अयोध्या लौटे तो उनका चक्र रत्न नगर में प्रवेश नहीं कर पा रहा था ।इसका कारण था उनके छोटे भाई बाहुबली का उनकी अधीनता स्वीकार ना करना ।इस वजह से दोनों भाइयों में युद्ध हुआ इस युद्ध में बाहुबली विजयि रहे उन्होंने भरत को अपने हाथों पर उठा लिया पर अचानक उन्हें संसार की क्षणभंगुर ता अहंकार के दुष्परिणाम और भाई प्रेम का भान हो गया।

    वाहुबली‌ ने भरत को नीचे धरती पर उतार दिया और राज पाट पद त्याग कर दिगंबर दीक्षा ले ली। कठोर तपस्या करने के बाद भी बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पा रही थी । बाहुबली के मन में सूक्ष्म रूप से यह मान शेष था कि उन्होंने अपने बड़े भाई को यद्ध में हराया है।

    जब बड़े भाई भारत को इसका आभास हुआ तो वह बाहुबली के पास पहुंचे और उन्होंने बाहुबली के चरण स्पर्श किए। अपने छोटे भाई को स्वयं के चरण स्पर्श करते देख बाहुबली का अहंकार समाप्त हो गया और उसके बाद बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई।

  • कण कण में भगवान

    आस्था से और विश्वास से भरा हुआ व्यक्ति अपने चारों भगवान की बनाई हुई इस दुनिया के हर कण में प्रभु को पाता है और ऐसे व्यक्ति का विश्वास कहता है की संसार के हर कण मे भगवान हैं।

    ऐसी कई कथाएं प्रचलित हैं जब भक्त को भगवान के हर कण मे दर्शन हुए हैं।

    प्राचीन काल में एक समय की बात है धर्मकेतु नाम के राजा थे राजा को अपने राजा होने का उनके वैभव और शक्ति का बहुत ही अभिमान था इस कारण राजा धर्मकेतु गरीबों को हेय दृष्टि से देखते थे और गरीबों की दुर्दशा का मज़ाक़ बनाते।

    एक बार की बात है राजा धर्मकेतु के महल में एक तपस्वी साधु आए। साधु को देखकर राजा धर्मकेतु ने पहले तो क्रोध में देखा और फिर क्रोधित स्वर में साधु महाराज से कहा कि हे साधु तुम्हारे पास मुझे देने के लिए ऐसा क्या खास है जो तुम मेरे महल में आ गए।

    तपस्वी साधु राजा द्वारा उड़ाए गए उपहास को सहन करके और चुपचाप राजा के महल से वापस लौट गए।

    रात्रि के वक्त राजा ने स्वप्न देखा स्वप्न में राजा ने अपने महल को खाक होते देखा। महल के धूल में बदलने के बाद तपस्वी साधु को भी देखा तपस्वी साधु के पीछे भगवान विष्णु भी खड़े दिखाई दिए ।साधु मौन रूप में खड़े खड़े भगवान के चरणों की तरफ संकेत कर रहे थे की तभी राजा की आंख खुल गई। अजीब सा सपना देखने के कारण राजा धर्मकेतु भयभीत होकर कांप रहा था ।

    राजा को पिछले दिन की बात याद आ गई जब उसने तपस्वी साधु को बेइज्जत किया और साधु का उपहास उड़ाया था। राजा धर्मकेतु समझ गया कि वह तपस्वी साधु कोई साधारण साधु नहीं था बल्कि उस साधु के अंदर स्वयं भगवान विष्णु जी का निवास है । यह सोच समझ कर और अपने किए हुए व्यवहार पर अफसोस करते हुए राजा धर्म केतु नंगे पैर उस तपस्वी साधु की कुटिया की तरफ भागने लगा और कुटिया पहुंचकर तपस्वी साधु के चरणों में सर रख दिया ।

    राजा धर्मकेतु तपस्वी साधु से अपने किए गए बुरे व्यवहार के लिए माफी मांगने लगा और तपस्वी साधु से कहने लगा साधु महाराज मैं आपके दिव्य रूप को देख चुका हूं और मुझे आपके अंदर श्री विष्णु जी के दर्शन हुए।

    इस पर तपस्वी साधु ने कहा हे राजा तुम जिस दिन हर जीव जंतु में हर प्राणी में और संसार के हर कण में प्रभु के दर्शन देखना सीख जाओगे उस दिन तुम एक सच्चे इंसान बन जाओगे और मानव कल्याण के,जीव कल्याण के हित के बारे में भी भला सोचने लगोगे और इस तरह तुम्हारा भी कल्याण होगा।

    तपस्वी साधु से यह वचन सुनकर राजा धर्मकेतु का उस दिन के बाद से जीवन बदल गया और जीवन के प्रति नजरिया भी बदल गया ।

    अब धर्मकेतू राजा गरीबों के कल्याण की सोचने लगे ,अपने राज्य के विकास के बारे में भी अच्छा सोचने लगा।

    इस कहानी से हमें यह समझ आता है कि मनुष्य को हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए बल्कि अपने अलावा सभी जीव जंतुओं के प्रति इंसानों के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।

    हर कण में भगवान है यह सोचकर हमें इस प्रकृति का भी धन्यवाद कहना चाहिए जो हमारे जीवन को सरलता और सुगमता से जीने में सहायक है ।

  • बहुला चतुर्थी

    बहुला चतुर्थी हिन्दी महीनों के अनुसार भादो महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ती है। बहुला चतुर्थी का व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र ,अच्छी सेहत और सुरक्षा के लिए रखतीं हैं।

    इस व्रत में भगवान गणेशजी की पूजा होती है और साथ में बहुला गाय और बछड़े की भी पूजा की जाती है।

    गोधूलि बेला(शाम का समय)

    बहुला व्रत में पूजा कर ने का समय गोधूलि बेला होता है शाम के लगभग 4से5 बजे के वक्त में इस पूजा को कर लेना चाहिए ।

    पूजा का भोग

    बहुला व्रत में गाय और गाय के बछड़े को गुड और चना खिलाना चाहिए और व्रत रखने वाली महिलाएं भी गुड और चना के भोग से ही अपना व्रत खोलतीं हैं।

    दूध और दूध से बने पदार्थ का त्याग।

    बहुला चतुर्थी के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को दूध और दूध से बने पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए व्रत की मान्यता है कि इस दिन गाय का दूध नहीं लेना चाहिए बल्कि गाय का दूध गाय के बछड़े को ही पिलाना चाहिए।

    बहुला चतुर्थी व्रत कथा

    भादो महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है ।बहुला चतुर्थी पर माताएं अपनी संतान की सेहत ,सुरक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। व्रत पूजन के समय कथा भी सुनी जाती है।

    पुराणों में कथा के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान विष्णु जी ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया तब स्वर्ग लोक से देवी-देवता भगवान् विष्णु रूप में श्री कृष्ण जी की लीला देखने की चाह रखते थे।

    श्री कृष्ण के सलोने रूप और नटखट लीलाओं को देखने के लिए अनेकों देवी देवताओं का मन करता और गोपियों, ग्वालों का रूप धारण करके रासलीला में आ जाते ।

    इसी प्रकार स्वर्ग की कामधेनु के मन में भी प्रभु श्री कृष्ण के अद्भुत रूप और लीला को देखने की और प्रभु की सेवा करने की प्रबल इच्छा हुई। अपनी इस प्रबल इच्छा को पूरी करने के लिए कामधेनु ने बहुला नाम की गाय का रूप धारण करके नंदबाबा की गौशाला में आ गई।

    श्री कृष्ण जी का बहुला गाय से अधिक स्नेह और मोह जुड़ गया था।

    एक दिन की बात है श्री कृष्ण जी ने सत्य निष्ठा बाद धर्म पालन की परीक्षा लेने का विचार बनाया और वह गौशाला में बंधी सभी गायों को लेकर वन में घास चराने ले गए।

    वन में घास चरते-चरते बहुला गाय बहुत दूर निकल गई और वह अपने झुंड से बिछड़ गई भगवान श्री कृष्ण जी ने यह देखकर हिंसक सिंह का रूप धारण कर लिया और बहुला गाय के आगे जाकर रास्ता रोक लिया ।

    बहुला गाय अपने रास्ते में हिंसक सिंह को देख कर घबरा गई और घबराते हुए बोली की वनराज सिंह मेरा बछड़ा घर पर है मुझे एक बार अपने बछड़े से भेंट करके आने दो और मै आपको वचन देती हूं बछड़े से मिलकर वापस आपके पास आ जाऊंगी।

    श्री कृष्ण रूप में सिंह ने उसे बहुला गाय को जाने दिया और बहुला गाय की सत्य निष्ठा को देखकर श्री कृष्ण जी अपने रूप में आ गए और प्रसन्न होकर बहुला गाय को आशीर्वाद दिया।

    तभी से बहुला गाय और बछड़े के लिए व्रत रखने की शुरुआत हुई ।

  • भक्ति को भगवान का आशीर्वाद

    भक्त और भगवान का रिश्ता बड़ा ही अद्भुत और चमत्कारों से भरा हुआ है। प्राचीन काल से ही भक्त अपने भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कठिन से कठिन तपस्या करता और फलस्वरूप अपने आराध्य को मनाकर अपनी मनोकामनाओं का वरदान प्राप्त करता है ।

    भगवान भी अपने भक्त की कठिन से कठिन तपस्या को देखकर और उसके मन में अपने प्रति आदर भाव को देख कर प्रसन्न हो जाते हैं ।

    भक्त और भगवान से जुड़ी हुई अनंत कथाएं हैं।

    प्राचीन काल में असुर भी देवताओं की कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त करते थे।

    कहानी

    एक बार एक असुर महादेव जी की कठोर तपस्या करने घने जंगलों में गया और और वहां जाकर महादेव जी की तपस्या करने में तल्लीन हो गया।

    तपस्या करते-करते असुर को कई वर्ष बीत गए इस बीच भीषण आपदाएं आईं पर उस असुर की तपस्या मे कोई वाधा नहीं पड़ती।

    समय बीतता गया और असुर ने अपनी तपस्या को खत्म नहीं किया और आखिर में महादेव जी उस असुर की कठोर तपस्या को देखकर प्रसन्न हुए।

    महादेव जी ने असुर से वरदान मांगने को कहा तो इस पर असुर ने निर्भीक और निडरता का वरदान मांगा।

    महादेव जी से असुर निर्भिक और निडरता का वरदान पाकर बहुत ही प्रसन्न हुआ। असुर के अंदर अंहकार और घमंड भी बढ़ता गया असुर तपस्या द्वारा महादेव से मिले वरदान का दुरुपयोग करता गया। असुर गरीब और असहाय लोगों को पीड़ा देने लगा और उनको पीड़ित देखकर असुर बहुत प्रसन्न होता ।जब देवता और ऋषि मुनि भी उसके अत्याचारों से परेशान रहने लगे तब उन्होंने भगवान गणेश जी के पास जाना उचित समझा।

    असुर से लड़ने का और उसको रोकने का जब कोई उपाय नहीं रहा तो सभी देवताओं और ऋषि मुनियों ने भगवान गणेश जी की शरण में जाकर असुर से बचने का उपाय खोजा।

    भगवान गणेश जी ने देवताओं और ऋषि मुनियों की दुःख की व्यथा सुनी। गणेश भगवान ने अपने दिव्य और शक्तिशाली रूप को धारण किया और वक्रतुंड रूप में प्रकट हुए।

    वक्रतुंड रूप में गणेश जी ने शक्तिशाली असुर से युद्ध किया। यह युद्ध काफी वक्त चला युद्ध के दौरान गणेशजी ने अपने वक्रतुंड रूप में असुर के घमंड और अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दिया दिया।

    फल स्वरुप गणेश जी ने असुर को उसकी गलतियों का एहसास दिलाया और उसके अहंकार को बाहर निकाल दिया ।

    असुर में भगवान गणेश जी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगी और स्वयं का आत्मसमर्पण कर दिया।

    वक्रतुंड रूप में भगवान गणेश जी ने असुर की आत्मसमर्पित भावना से खुश होकर असुर को भक्त होने का वरदान दिया और इसी के साथ असुर की भक्ति को भी वरदान मिला।