हमारे देश में हर त्योहार को जोरदार और बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है गणेश भगवान के त्यौहार को भी भारतीय लोग धूमधाम से मनाते हैं।
गणेश भगवान जो की बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। गणेश त्योहार महाराष्ट्र सहित पूरे देश में 12 दिनों तक मनाया जाता है यह त्यौहार गणेश चतुर्थी से प्रारंभ होकर गणेश चतुर्दशी तक मनाया जाता है।
हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है गणेश जी मूर्ति की स्थापना गणेश चौथ के दिन स्थापना करने से लेकर गणेश चतुर्दशी तक भगवान गणेश अपने भक्तोंके सारे दुःखों को हर लेते हैं साथ ही भक्तजन की विनती को भी स्वीकार करते हैं।
गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मिट्टी की बनी हुई मूर्ति का भक्तों द्वारा गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। भगवान गणेश जी की मूर्ति की स्थापना से लेकर विसर्जन तक भक्त अपने गणेश जी का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करते हैं और उनकी सेवा भी करते हैं।
12 दिन के गणेशोत्सव में भक्त और भगवान का गहरा रिश्ता बन जाता है और अपनापन जुड़ने की वजह से जब गणेश मूर्ति का विसर्जन किया जाता है तो कई भक्त की आंखें नम हो जाती है।
गणेश चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है गणेश प्रतिमा के विसर्जन के समय अपने भगवान को विदाई देते वक्त भक्तों की आंखों में आंसू भी दिखाई पड़ते हैं।
अगले बरस फिर से आना ऐसे जयकारे बोलते हुए भक्त ढोल नगाड़ों के साथ विधि विधान से पूजा अर्चना और आरती के बाद अपने भगवान गणेश जी का विसर्जन करने ले जाते हैं।
भगवान गणेश जी की मूर्ति विसर्जन के वक्त पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा जाता है इसके लिए कृत्रिम कुंड भी बनाए जाते हैं जिससे कि पर्यावरण से बचा जा सके और भक्तों की आस्था को भी ठेस ना पहुंचे।
भगवान गणेश से जुड़ी हुई एक कथा है जो कि इस प्रकार है।
भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है जब भक्तों के जीवन से दुखों को हर लेते हैं इस वजह से भगवान गणेश जी विघ्नहर्ता नाम से पहचाने गया।
कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है नरांतक और देवांतक नाम के दो असुर थे। दोनों असुरों ने देवताओं और ऋषि मुनियों के जीवन से शांति खत्म कर दी ।असुरों के आतंक से ऋषि मुनि अपने तप और साधना भी नहीं कर पा रहे थे और देवताओं को भी दोनों असुरों का संकट खत्म करने का और उनसे छुटकारा मिलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था । असुरों ने अपनी शक्ति और बल के आधार पर देवताओं ऋषि मुनियों को और साधुओं को अपने आतंक से भयभीत कर दिया था इस कारण तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मच गई थी अशांति फैल गई थी देवताओं साधुओं और ऋषि-मुनियों के मन मे डर का माहौल बन गया था।
असुरों से निपटने और शांति चाहने के लिए जब देवताओं को कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वे सब भगवान गणेश जी की शरण में पहुंच गए और गणेश जी से मदद की गुहार लगाने लगे देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा असुरों से संकट मुक्त कराइए ।
भगवान गणेश जी ने अपने भक्तों की पुकार सुनकर दिव्य रूप धारण कर लिया भगवान गणेश जी के दिव्य तेज को देख कर देवता और ऋषि मुनि भी नतमस्तक हो गए भगवान गणेश जी ने अपने दिव्य पराक्रम से दोनों असुरों को युद्ध में हरा दिया और दोनों असुरों का नाश करके धर्म और सत्य को विजय दिलाई।
असुरों का अंत होने के बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी से विनती की और कहा कि हे प्रभु अब आप ही हम सभी के विध्नों को हरने वाले हैं अतः आप ही अब विघ्नहर्ता कहलायेंगे।
भगवान गणेश जी अपने भक्तों के संकट को हरने में जरा भी देर नहीं लगाते।
भगवान गणेश जी को शुभ कार्यों में प्रथम निमंत्रण दिया जाता है जिससे कार्यों के अच्छे-से पूर्ण हो सकें ऐसी भावना रखी जाती है।
भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है जिससे पता चलता है कि हमारे गणेश भगवान छोटे जीव को भी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक मानते हैं।