भगवान विश्वकर्मा

हिंदू धर्म में माना जाता है भगवान विश्वकर्मा ने ही इस सृष्टि का वास्तु किया था। ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा जी को सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी दी थी भगवान विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के ही बंशज माने जाते हैं।

भगवान ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि का निर्माण किया गया उस वक्त सृष्टि एक अंडे के आकर के जैसे थी। सृष्टि का निर्माण तो हो चुका था लेकिन सृष्टि को संवारने की भी आवश्यकता थी इसलिए ब्रह्मा जी ने सृष्टि की जिम्मेदारी भगवान विश्वकर्मा जी को दे दी इस प्रकार से एक तरह यह भी कहा जा सकता है कि भगवान विश्वकर्मा जी सृष्टि के वास्तुकार हैं।

भगवान विश्वकर्मा के पुराणों और शास्त्रों के अनुसार पांचस्वरूप अर्थात अवतारों का वर्णन है। इन पांच अवतारों के नाम इस प्रकार हैं

विराट विश्वकर्मा, धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरा वंशी विश्वकर्मा, सुधन्वा विश्वकर्मा ,मृग वंशी विश्वकर्मा।

ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म थे तथा धर्म के पुत्र वास्तु देव थे। धर्म की वस्तु नामक स्त्री से शादी हुई धर्म और वस्तु के वास्तु सातवें पुत्र माने जाते हैं । वास्तु शिल्प शास्त्र के प्रेमी थे वास्तु देव की शादी अंगिरसी नामक युवती से हुई।वास्तु देव और अंगिरसी के पुत्र विश्वकर्मा थे ।

भगवान विश्वकर्मा जी ने ही पृथ्वी पर शस्त्र ,अस्त्र और औजारों का निर्माण किया था ।

भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर मशीन, पुर्जे ,हथियार , कारखानों में जो भी कार्य करने के समान होते हैं उन सभी का भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती पर पूजने का नियम होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है जितने भी काम करने के औजार कारखाने में होते हैं उन औजारों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी ने किया था।

कोई भी छोटी दुकान , कारखाना या कोई भी छोटा कारीगर हो विश्वकर्मा जयंती पर अपने औजार अपने कार्य करने मशीन पुर्ज़ों का पूजन जरूर करता है।

ै पुराणों में भगवान विश्वकर्मा जी की एक कथा प्रचलित है भगवान विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य का ताप इतना असहनीय था कि विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा को भगवान सूर्यदेव के समीप रहने में असमर्थता होती थी ।परेशान होकर संज्ञा अपने पिता की शरण में पहुंची और अपनी व्यथा अपनेपताजी विश्वकर्मा को सुनाई।

भगवान विश्वकर्मा जी ने पुत्री संज्ञा के संकट को दूर करने के लिए सूर्य देव की सहमति से सूर्य देव को अपने शिल्प पहिए पर चढ़ाया और उनके अतिरिक्त तेज के आठवें भाग को तराश कर कम कर दिया जिससे सूर्य का रूप सौम्य और सहन करने योग्य हो गया।

सूर्य देव के अलग किए गए उसी दिव्य तेज के अंशों से भगवान विश्वकर्मा जी ने ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली शस्त्रों का निर्माण किया इन शस्त्रों में भगवान विष्णु जी का सुदर्शन चक्र भगवान शिव जी का त्रिशूल और कार्तिकेय जी को शक्ति शामिल है।

ऐसा माना जाता है लंका द्वारिका इंद्रपुरी और जगन्नाथपुरी की मूर्तियों का निर्माण भी स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने किया है।

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