हनुमानजी की कथाएं अनेकों है ।हनुमान जी की हर कथा में अलग ही आनंद और सुनने में एक अलग प्रकार का रस मिलता है । हनुमान जी की कथाएं जितनी भी सुनो सब आनंदित होती है और इन कथाओं को बार-बार सुनने की भक्तों में इच्छा भी रहती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार की बात है।जब पूरी सृष्टि और धरती जलमग्न हो गई और चारों तरफ जल ही जल दिखाई दे रहा था ।सृष्टि को बचाने के लिए कहीं से कोई भी उम्मीद नहीं दिख रही थी तब महर्षि मार्कंडेय जल में स्थित एक बहुत ही विशालकाय वटवृक्ष के समीप पहुंचें।
महर्षि मार्कंडेय जी ने जल मग्न में धरती के बीच उस विशाल वटवृक्ष के पत्ते पर एक बालक को लेटे देखा जो की अत्यंत सुंदर था जिसके चेहरे पर मुस्कान के साथ अत्यंत तेज था ।महर्षि जी ने देखा कि वह बालक कोई और नहीं बल्कि साक्षात् बाल रूप में भगवान श्रीविष्णु नारायण जी थे ।
जब महर्षि मार्कंडेय उस बालक रूपी श्री विष्णु जी के पास पहुंचे तो बालक ने अपनी एक श्वांस से महर्षि जी को अपने मुख के भीतर ले लिया। श्री विष्णु जी के उदर में जाकर महर्षी जी ने देखा तो वहां उन्हें संपूर्णसृष्टि, ब्रह्मांड ,सातों दीप, पर्वत ,नदियां, सूरज ,चंद्रमा,तारे और सारे ही देवता गण मौजूद मिले ।
महर्षि मार्कंडेय जी ने जब श्री विष्णु जी के उदर में जाकर इस अलौकिक दृश्य को देखा तो यह देखकर महर्षि जी बहुत ही आश्चर्य चकित रह गए।
और उसी प्रलय के समय जब ब्रह्मांडीय और प्रचंड जलधाराएं उस बट वृक्ष को उखाड़ने का प्रयास करने लगीं तो विशाल काय वट वृक्ष की रक्षा के लिए श्री विष्णु जी के परम भक्त हनुमान जी अपनी असीम ऊर्जा के साथ और अपनी पूरी शक्ति से वहां प्रकट हो गए ।
हनुमानजी ने वट वृक्ष की रक्षा के लिए और वृक्ष को उखाड़ने से बचाने के लिए अपनी विशाल भुजाओं और पुंछ से उस वट वृक्ष को संभाला और वट वृक्ष के पत्ते पर लेटे प्रभु श्रीहरि विष्णु जी को चारों तरफ से सुरक्षित घेर लिया और इस तरह भक्त हनुमान जी ने अपनी शक्ति से प्रलय के बवंडर को शांत किया।
भक्त हनुमान अपने भक्तों के लिए भी और अपने प्रभु की रक्षा के लिए भी हर पल सेवा भाव के साथ सदा हजिर रहते हैं।
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