व्यवस्था और प्रशासन में कितनी जरूरी है पारदर्शिता

कोई भी बड़ा कार्य हो या किसी बड़े कार्य के लिए की गई घोषणायें जब होती है ।तो उसमें सबसे पहले उस कार्य में हुए हर वक्त की व्यवस्था ,विश्वास और पारदर्शिता को लेकर मन में कई सवाल उठते रहते हैं और इन सवालों का उठना मानवीय क्रिया है।

हम बात कर रहे हैं बीते वक्त में हुए छात्रों द्वारा आंदोलन, नीट पेपर लीक होना, संसद के मानसून सत्र का बार-बार रद्द होना और इसके अलावा बारिश के मौसम में नई सड़कों का धंसना यह सब समस्त समस्या है जो मिलजुल कर हमारे देश की व्यवस्था और प्रशासन की नितियों पर सवाल उठाती हुई दिख रही है। साथ में इन सब कार्यों मे पारदर्शिता का हो ना क्या जरूरी नहीं है।

इन सब में जनता का भरोसा भी होता है और जब देश की व्यवस्था और प्रशासन पर से विश्वास उठ जाता है तो फिर इस सबकी जवाबदेही किस से मिलेगी ।

भ्रष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए केवल आर्थिक क्षति का विषय नहीं होता बल्कि न्याय ,विश्वास, व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन जाता है। जब उसमें मनमानी चलती है।

पर क्या व्यवस्था और विश्वास की सारी जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन का ही दायित्व है क्या इसमें देश के नागरिक का कोई दायित्व नहीं हमें यह भी समझना होगा।

किसी भी देश के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने में उस देश की सरकार जिम्मेदार मानी जाती है। जब सरकार अपनी दायित्व को भली भांति ना निभाकर अपनी मर्जी से चलाती है । तो जनता भी क्रोधित होकर जवाब देने के अभियान में जुट जाती है और इसका ताजा उदाहरण पूरा देश अभी बीते दिनों मे देख चुका है।

जब निर्णयों , व्यवस्था और विश्वास में पारदर्शिता ना होकर पक्षपात किया जाता है तब विकास की गति तेज नहीं बल्कि धीमी पड़ जाती है यह समझना होगा हमारे देश को चलाने वालों को ।व्यवस्था या निर्माण कार्य में जब भ्रष्टाचार होने पर इसे कानून से जोड़ा जाता है जो कि प्रयाप्त या पूर्ण नहीं कहलाता है बल्कि यह शासन का भी दायित्व है कि हर कार्य को पारदर्शिता के साथ करे जिससे जनता के विश्वास को कायम रख सके ।

आचरण और अनुशासन में रहकर लोकतंत्र के मूल्यों का सम्मान किया जाना चाहिए प्रशासन का अर्थ केवल भ्रष्टाचार पर कार्रवाई नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें अनियमितता की संभावना ना रहे ।

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