Category: Bhakti Katha

  • भक्ति रस में – संतोषी व्रत कथा

    शुक्रवार के दिन मां संतोषी की पूजा अर्चना की जाती है।मां संतोषी की पूजा अर्चना करने से भक्त लोगों के जीवन में सुख शांति की कृपा बनी रहती है और मंगल कार्य भी समय-समय पर होते रहते हैं।

    मां संतोषी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली विपदाओं को भी मां संतोषी हर लेतीं हैं।

    इस दुनिया में सबके जीवन में भांति-भांति के दुख-सुख हैं हर व्यक्ति की अभिलाषा होती है कि उसका जीवन सुख शांति से बीते और इस अभिलाष को लेकर ही भक्ति लोग माता संतोषी से जीवन में सुख शांति की कामना करते हैं।

    संतोषी माता की कहानी

    बहुत पहले की बात है एक नामी और प्रसिद्ध राजा थे ।राजा के बारे में कहा जाता था की जो भी व्यक्ति किसी भी तरह की मदद के लिए राजा के महल में जाता तो राजा उसकी मदद करने के लिए सदा तत्पर रहते।

    इसी प्रकार उस राजा की रानी भी बहुत ही दयालु प्रकृति की थी । राजा और रानी गरीबों के सुख दुख का ख्याल रखते और अपने राज्य की हर समस्या का समाधान ढूंढते।

    राजा और रानी अपने इस कार्य की वजह से बहुत प्रसिद्ध थे। राजा पराक्रमी और साहसी था जिस कारण किसी भी शत्रु का राजा के पराक्रम का सामना करने का साहस नहीं होता था।

    राजा और रानी अपने महल में पूरी सुख-सुविधा से रहते थे परंतु राजा रानी के जीवन में एक बहुत बड़ा दुख भी था वह दुख था संतान सुख शादी के काफी वक्त गुजर जाने के बाद भी राजा और रानी इस सुख से वंचित थे।

    राजा और रानी मां संतोषी में गहरी आस्था रखते थे और पूरा दिन मां संतोषी की पूजा करते।

    एक बार की बात है राज्य में अकाल पड़ गया जिस कारण पूरे राज्य की फसल भी नष्ट हो चुकी थी ।राजा को अकाल से आई समस्या के बारे में और फसल नष्ट हो जाने के बारे में पता चला तो राजा बहुत ही दुखी हुए।

    प्रजा के दुख को देखकर राजा ने अपने महल के तहखाने में रखा अनाज गरीबों में बंटवाया लेकिन अपने लिए एक अन्न का दाना नहीं रखा जिससे कि प्रजा भूखी न रहे राजा के इस निर्णय से प्रजा बहुत खुश हुई और दुखी भी हुई की राजा रानी इतने दयालु होने के बाद संतान-सुख से वंचित हैं।

    राजा और रानी के इस त्याग और व्यवहार से संतोषी माता अति प्रसन्न हुईं।

    संतोषी माता ने राजा और रानी को सपने में आकर कहां कि जिस तरह राज्य में आई भुखमरी को खत्म करने के लिए तुमने अपने तहखाने के सारे अनाज को प्रज्ञा में बंटवा दिया यह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुई और इसके साथ ही मैं तुम दोनों की भक्ति से भी प्रसन्न हूं में वरदान देती हूं की कुछ समय में ही तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा और यह कहकर संतोषी मां आलोप हो गईं।

    इसके बाद कुछ समय बीत जाने पर राजा और रानी के जीवन में संतान सुख आ गया।

    अब राजा और रानी का मां संतोषी की भक्ति भाव में श्रद्धा बढ़ गई और इसके साथ ही राजा और रानी अपने प्रजा के सुख-दुख में साथ देने लगे और प्रजा के बच्चों को अपनी संतान समान मानने लगे।

    राजा और रानी के जीवन में संतान सुख मां संतोषी के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ और मां संतोषी का आशीर्वाद राजा और रानी के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर मिला।

    मां संतोषी ने जैसे राजा और रानी के जीवन में संतान सुख दिया ऐसे ही मां संतोषी अपने भक्तों के जीवन में हर दुख को हर लेती हैं और उसकी जगह सुख को देती हैं। जय संतोषी माता की।

  • भक्ति रस में -गणेश कथा

    बुधवार का दिन भगवान गणेश की का बार होता है भगवान गणेश जी बुद्धि के देवता माने जाते हैं और अपने भक्त पर जब दयाल होते हैं तो उसके घर में धन दौलत की बरकत होती है।

    भगवान गणेश जी की जो कोई व्यक्ति नियम के साथ पूजा अर्चना करता है तो भगवान गणेश जी उसकी बुद्धि को बढ़ाकर सत्कर्म मार्ग पर ले जाते हैं और ऐसे व्यक्ति का भगवान श्री गणेश हमेशा साथ देते हैं।

    जिस घर में भगवान् गणेशजी को पूजा जाता है उस घर में माता लक्ष्मी जी स्वयं निवास करती हैं क्योंकि माना जाता है भगवान गणेश जी को जहां पूजा जाता है वहां भगवान गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी भी जाती है।

    गणेश कथा

    बहुत पहले की बात है एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी । बूढी अम्मा अपनी छोटी सी कुटिया में अकेली रहती थी परिवार के नाम पर वह अकेली थी।

    वह बूढी अम्मा भगवान श्री गणेश में गहरी आस्था रखती थी। प्रतिदिन भगवान श्री गणेश जी की आराधना करती। भगवान गणेश जी की आराधना करने के लिए सर्वप्रथम अपने हाथों से मिट्टी की भगवान गणेश जी की मूर्ति बनाती और उसके बाद गणेश जी की विधि-विधान से पूजन करती ।

    प्रतिदिन गणेश जी की पूजा करने के बाद दोपहर में मिट्टी से बनी भगवान गणेश जी की मूर्ति टूट जाती जिस कारण है बूढी अम्मा दुखी रहती। वह हर बार अच्छी मूर्ति बनाने की कोशिश करती और हर बार उसके द्वारा बनाई हुई मिट्टी की मूर्ति टूट जाती ।यह देखकर वह भगवान गणेश जी से मूर्ति टूट जाने का कारण पूछती और विनती करती कि अगली बार भगवान गणेश जी की मूर्ति ना टूटे।

    एक बार की बात है उसी गांव के साहूकार का घर बन रहा था घर बनाने के लिए मजदूर आए हुए थे ।बूढी अम्मा मजदूरों को काम करते देखकर उनके पास आकर बोली की क्या तुम मेरे लिए भगवान गणेश जी की पक्की मूर्ति बना दोगे ।यह सुनकर मजदूर हंसने लगे और बोले की अम्मा हमारे पास बहुत काम है ऐसे फालतू के काम करने के लिए हमारे पास समय नहीं है मजदूरों से यह बात सुनकर बूढी अम्मा वहां से चुपचाप चली गई।

    मजदूर अपने काम में लग गए। मजदूर दीवार को बना रहे थे पर दीवार बार-बार टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती जिस वजह से मजदूर परेशान हो गए दो-तीन दिन यही चलता रहा साहूकार ने आकर मजदूर को देखा और पूछा कि दीवार अभी तक क्यों नहीं बनी तो मजदूरों ने कहा पता नहीं क्यों साहूकार जी हम दीवार को बार-बार तोड़ कर सही बनाने की कोशिश कर रहे हैं परंतु बार-बार दीवार टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है।

    मजदूरों में से एक मजदूर ने साहूकार से कहा की कुछ दिन पहले एक बूढ़ी अम्मा आईं थीं और हमसे भगवान गणेश जी की पक्की मूर्ति बनाने की कह रही थी ।पर हमने मना कर दिया शायद इस वजह से हमारी दीवार सीधी नहीं बन रही साहूकार यह सुनकर बूढी अम्मा की कुटिया में गया और कहने लगा की अम्मा मैं आपके लिए संगमरमर के पत्थर की भगवान गणेश जी की मूर्ति बनवा दूंगा यह सुनकर बुद्धि अम्मा प्रसन्न हो गई।

    कुछ दिन पश्चात साहूकार भगवान गणेश जी की संगमरमर के पत्थर की मूर्ति बनवा कर ले आया और बूढी अम्मा को दे दी । अब बूढी अम्मा उस संगमरमर की मूर्ति की पूजा करती और प्रसन्न रहने लगी।

  • भक्ति रस में: हनुमान कथा

    मंगलवार को वीरवार भी कहां जाता है और इसको वीरवार कहने के पीछे का कारण हनुमान जी को वीर हनुमान कहने की वजह है।

    मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति को चोला चढ़ाया जाता है और बूंदी के लड्डू का प्रसाद वितरण किया जाता है।

    राम भक्त हनुमान

    रामायण में हमने देखा और पढ़ा भी है कि किस तरह हनुमान जी ने सेवक बनकर भगवान राम की सेवा की और भगवान राम के अनंत कार्य भी किए।

    हनुमान जी भगवान राम जी के कार्यों के लिए सदा तत्पर रहते और शीघ्रातिशीघ्र कार्य करने के लिए आतुर रहते।

    हनुमान जी अपने आराध्य राम जी के साथ रहने में ही और उनके कार्य करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझते।

    हनुमान कथा

    रामायण में श्री राम और भक्त हनुमान के कई वृतांत है उन्हीं में से एक इस प्रकार है-

    एक बार की बात है माता सीता अपने केशों को बना रहीं थीं कि तभी हनुमान जी किसी कार्य बस माता सीता के पास आए और कुछ समय के लिए माता सीता के पास ही विश्राम करने बैठ गए।

    माता सीता को केश सज्जा करते देख हनुमानजी अति प्रसन्न हो रहे थे ।माता सीता जी केश सज्जा के बाद अपने हाथ की उंगली से सिंदूर लेकर अपनी मांग को भरने लगी यह देखकर उत्सुकता वश हनुमानजी ने माता सीता से मांग में सिंदूर भरने का कारण पूछा तो इस पर सीता माता पहले तो हंस पड़ी और उसके बाद कहने लगीं मैं अपने आराध्य श्रीराम की दीर्घायु के लिए अपनी मांग में सिंदूर लगाती हूं इससे भगवान श्री राम की आयु बढ़ेगी ।

    हनुमान जी यह सुनकर बहुत खुश हुए और सोचने लगे कि मेरे प्रभु श्रीराम जी की माता सीता जी के जरासे सिंदूर लगाने से आयु बढ़ जाती है तो क्यों ना मैं अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाऊं जिससे मेरे प्रभु श्रीराम जी की आयु और अधिक बढ़ने लगेगी यह सोचकर हनुमान जी वहां से चले गए।

    अगले दिन हनुमान जी पूरे शरीर पर सिंदूर लगाकर श्री रामजी के आगे आये ।श्री राम जी ने जब हनुमान जी को सिंदूर लगाए हुए देखा तो हनुमान जी से इसका कारण पूछा तब हनुमान जी ने बताया कि सिंदूर लगाने से प्रभु जी आपकी आयु बढ़ेगी इस कारण मैंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया है यह सुनकर श्री राम जी ने कहा हनुमान तुम्हें यह किसने बताया तब हनुमान जी ने कहा माता सीता जी रोज अपनी मांग में सिंदूर भरतीं हैं और उन्होंने ही मुझे बताया।

    श्री राम जी हनुमान जी की इस भक्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुए भगवान श्री राम जी ने हनुमानजी को वरदान दिया कलयुग में भक्त तुम्हें चोला चढ़ाया करेंगे जिसमें तुम्हारे पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया जाया करेगा यह सुनकर हनुमान जी अति प्रसन्न हुए।

    इस तरह से हनुमान जी को सिंदूर लगाने का वरदान स्वयं श्री राम जी ने दिया है।

  • भक्ति रस में : महाकाल नगरी उज्जैन

    मध्य प्रदेश जिसे भारत का हृदय भी कहा जाता है और जिसमें मध्य प्रदेश की आत्मा बसती है ।उज्जैन शहर के बारे में ऐसा कहा जाता है। उज्जैन में स्थित महाकाल मंदिर जिसका जितना गुणगान किया जाए उतना ही कम है।

    शिप्रा नदी किनारे बसा यह नगर और मंदिर जिसे महादेव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक ज्योतिर्लिंग माना जाता है जो कि उज्जैन मंदिर में स्थित है।

    उज्जैन मंदिर

    उज्जैन मंदिर या कहो महाकाल मंदिर या फिर देवों के देव महादेव की नगरी यहां भक्तों ने भक्ति के प्रेम में रंगकर अपने आराध्य को कई नाम दिए हैं । यहां प्रतिदिन हजारों लाखों की संख्या में भक्त महाकालेश्वर मंदिर में अपने देव महादेव जी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर की एक विशेषता है यहां शवों की चिताओं से मिली राख से महाकाल का श्रंगार किया जाता है और आरती भी की जाती है।

    बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में माना जाता है और इस मंदिर में भगवान् महाकालेश्वर का मुख दक्षिण दिशा की ओर है।

    महाकालेश्वर मंदिर का रहस्य

    महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े कई रहस्य भी हैं जो कि समय-समय पर मानव जाति को इन रहस्यों पर सोचने पर मजबूर कर देती है।

    महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भक्त लोग प्रसाद में चढ़ावे के रूप में मदिरा चढ़ाते हैं और महाकालेश्वर की मूर्ति को भक्त स्वयं अपने हाथों से मदिरा पिलाते भी हैं और कहते हैं महाकालेश्वर इस मदिरा का रस पान भी करते हैं। इस कारण भक्त लोगों की महाकालेश्वर मंदिर से गहरी आस्था और लगाव है।

    बाबा महाकालेश्वर का श्रृंगार और आरती जलाए गए शव की राख से होता है।

    महाकालेश्वर की इस आरती के दर्शन के लिए बहुत दूर से भक्त आते हैं।

    महाकालेश्वर मंदिर को लेकर भक्ति और आस्था से जुड़े ऐसे कई रहस्य प्रचलित हैं।

    मृत्यु से मोक्ष

    मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के रहस्यों के साथ-साथ मृत्यु से मोक्ष भी प्राप्त होता है । महाकालेश्वर के दर्शन मात्र से मृत्यु सय्या पर पड़े व्यक्ति के संकट कट जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है। इस तरह भगवान महाकाल अपने भक्तों के जीवन में आए संकट को दूर करते हैं और मृत्यु के समय बुरे कर्मों के पापों को भोगने से मोक्ष दिलाने में सहायक बनते हैं।

    12 सालों में कुंभ का मेला भी उज्जैन में ही लगता है इसका एक कारण उज्जैन नगरी को पवित्र और आस्था की दृष्टि से धार्मिक माना जाता है।

    उज्जैन में आकर भक्त लोग अपने पापों को पवित्र नदी में नहा कर धोते हैं और महाकाल के दर्शन करके अपनी अकाल मृत्यु के संकट को दूर करने की प्रार्थना भी करते हैं।

    आस्था और धार्मिक

    उज्जैन को महाकाल की नगरी कहां जाता है और भगवान महाकालेश्वर स्वयं अपनी नगरी का ध्यान रखते हैं भक्त लोगों में ऐसी आस्था और धार्मिक विश्वास है।

    पुराने समय में माना जाता है उज्जैन नगरी में वेद ज्योतिष आयुर्वेद धार्मिक यज्ञ अनुष्ठान की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी।

    ऐसी आस्था और धार्मिक विश्वास आज भी यहां रहने वाले व्यक्तियों के मुख से सुना जाता है।

    महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का वर्णन जितना हो उतना कम ही लगता है। महाकालेश्वर मंदिर से भक्तों की गहरी आस्था है।

    भारत देश में कई धर्म के लोग हैं। लेकिन हिंदू सबसे पुराना धर्म माना जाता है और हिंदू धर्म से जुड़ी धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं।

  • शनि देव की कथा

    शनि देव की महिमा के बारे में हम सब भली-भांति जानते हैं। हम सभी अपने घर की सुख शांति के लिए शनिवार के दिन शनिदेव का प्रकोप कम करने के लिए शनि देव मंदिर में जाकर तेल का दीपक जलाया जाता है।

    शनि की साढ़ेसाती

    शनि देव को सूर्य का पुत्र माना जाता है ।शनि देव को काम काज यानी कि कर्म का देवता माना जाता है।शनि देव महाराज कर्म शील व्यक्ति को ही अपना प्रिय मानते हैं । शनिवार के दिन और,शनि अमावस्या पर व्रत रखकर भक्त लोग शनिदेव को प्रसन्न करते हैं और अपने जीवन में शनि देव की कूदृष्टि से बचने का उपाय भी करते हैं।

    गुस्सैल और कृपामयि शनि देव

    शनि महाराज किसी भी व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से फल देने का अधिकार रखते हैं। अक्सर लोगों में यह गलतफहमी रहती है कि शनि देव सिर्फ बुरे कर्मों का ही फल देते हैं जबकि ऐसा नहीं होता।

    अगर किसी व्यक्ति को जब पता चलता है कि उसके उपर या उसकी कुंडली में शनि की दशा खराब है तो वह व्यक्ति विचलित हो जाता है क्योंकि शनि देव को सभी ग्रहों में और सभी देवताओं में से गुस्सैल और क्रोधित स्वभाव का माना जाता है ।

    शनि देव महाराज हर किसी व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होते बल्कि अपने भक्तों पर कर्म के हिसाब से कृपा और धन भी बरसते हैं।

    कथा

    शनि देव भगवान की वैसे तो कई कथाएं हैं और सभी कथायें प्रचलित भी हैं। एक प्रचलित कथा जो कुछ इस प्रकार है।

    शनि देव के पिताजी सूर्य देव जिनका विवाह राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा के साथ हुआ था विवाह उपरांत भगवान सूर्यदेव को पत्नी संज्ञा से तीन पुत्र हुए जो वैस्वमन, यमराज और यमुना थे।

    सूर्यदेव भगवान का स्वभाव बहुत गर्म और तेज अग्नि के समान था सूर्य देव के इस व्यवहार को देखकर पत्नी संज्ञा परेशान रहती थीं और चाहती थीं कि पति सूर्य देव का अग्नि समान तेज और गर्म व्यवहार शांत रहे उसके लिए है कोशिश करती थीं।

    एक बार की बात है उन्हें एक उपाय समझआया इस उपाय को पूरा करने के लिए पत्नी संज्ञा ने अपनी ही जैसी हमशक्ल स्त्री बनाई और उसका नाम स्वर्णा रख दिया ।

    पत्नी संज्ञा स्वयं तपस्या करने हेतु चली गई और अपनी हमशक्ल परछाई को भगवान सूर्यदेव और पुत्रों के बारे में कार्य भी समझा गईं परछाई स्वर्णा ने भी सूर्य देव पत्नी संज्ञा को निश्चिंत होकर जाने को कहा और वादा किया कि यहां किसी को नहीं पता चलेगा की मैं आपकी परछाई हूं।

    सूर्यदेव पत्नी संज्ञा तपस्या में लीन हो गईं और उधर परछाई स्वर्णा भगवान् सूर्य देव के साथ पत्नी रूप में रहने लगीं और भगवान सूर्यदेव जी को भी स्वर्णा पर शक नहीं हुआ।

    भगवान सूर्य देव को परछाई स्वर्णा से तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनमें से एक पुत्र शनि थे जो की शनिदेव कहलाए ।

    बचपन में शनिदेव पिता सूर्य देव के तेज का सामना करने में सक्षम नहीं थे और उन्हें देखकर घबरा जाते थे । दूसरी तरफ पिता सूर्य देव भी शनि देव के वर्ण को देखकर अपनी पत्नीसे कहते यह मेरा पुत्र कैसे हो सकता है और अपनी पत्नी की बेइज्जती करते शनि देव अपनी मां की अवेहलना होते देख पिता सूर्य देव से रुष्ट रहते ।

    शनि देव जंगल में जाकर शिवजी की तपस्या करने लगे उनकी कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा तब शनि देव ने कहा प्रभु जी मेरे पिता सूर्य देव मेरी मां का अपमान करते हैं और मुझे अपना पुत्र भी नहीं समझते इसलिए मुझे पिता सूर्य देव से अधिक पूजनीय और शक्तिशाली होने का आशीर्वाद दीजिए ।

    इस पर भगवान शिव जी ने शनि देव को नौ ग्रहों में सर्वक्षेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया और न्याय की दृष्टि से भी शनि देव को श्रेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया।

    इस प्रकार शनि देव ने पिता सूर्य देव के व्यवहार से रुष्ट होकर अपना एक स्थान बनाया।

    शनि देव न्याय के देवता हैं और वह हमारे अच्छे-बुरे कर्मों के हिसाब से ही न्याय देते हैं।

  • भक्ति कथा में संतोषी व्रत कथा

    शुक्रवार का दिन संतोषी माता का दिन होता है। इस दिन भक्त लोग संतोषी माता का व्रत रखते हैं। इस व्रत को रखने के लिए व्रति व्यक्ति को खट्टी चीजों से परहेज़ करना होता है।

    संतोषी व्रत को करने से मां संतोषी की अपने भक्तों पर कृपा बनी रहती है और हर दुख में मां संतोषी अपने भक्तों के दुखों को हरने आती है। शुक्रवार संतोषी मां के व्रत में कथा भी सुनी जाती है ।

    संतोषी माता की कहानी

    बहुत समय पहले की बात है ।एक नगर में एक परिवार में सात भाई मिलजुल कर रहा करते थे ।सात भाइयों में से सबसे छोटा भाई कुछ कमाता नहीं था।

    सात भाइयों की मां अपने बेटों को स्वयं अपने हाथों से भोजन परोस कर खिलाती थी ।मां पहले 6 पुत्रों को खाना खिलाती उसके बाद 6 पुत्रों की थाली में से बचा हुआ खाना सबसे छोटे बेटे को खिलाती ।छोटे पुत्र की पत्नी को यह बात अच्छी नहीं लगती वह अपने पति को यह बात बताती है कि तुम्हारी मां सबसे पहले तुम्हारे 6 भाइयों को भोजन खिलाती हैं उसके बाद बचा हुआ खाना उनकी थाली में से तुम्हें खाने को देती है। पत्नी की यह बात सुनकर उस युवक को विश्वास नहीं हुआ।

    एक दिन उसने अपनी मां को पहले 6भाइयों को भोजन खिलाते देखा उसके बाद थाली में से बचा हुआ खाना उसके लिए लाते हुए देखा। यह देखकर उसे अपने ना कमाने का बहुत दुख हुआ।

    वह अपनी पत्नी के पास गया और कहने लगा कि मैं दूसरे देश कमाने के लिए जा रहा हूं।यह सुनकर उसकी पत्नी ने कहा यह तो बहुत अच्छी बात है पर मुझे अपनी कोई निशानी दे जाओ पति ने अपने हाथ की अंगूठी को निशानी के तौर पर पत्नी को दे दी। पति ने भी अपनी पत्नी से कोई निशानी देने को कहा तो उस वक्त उसकी पत्नि के हाथ गोबर से बिगड़े हुए थे उसने अपने हाथों को पति की पीठ पर निशान बनाते हुए कहा कि ये है मेरी निशानी।

    निशानी लेकर वह युवक दूर एक नगर में पहुंचा और काम तलाश करने लगा वहीं एक दुकान पर बैठे सेठ से जाकर काम मांगा सेठ को भी दुकान पर काम करने के लिए एक नौकर की तलाश थी ।सेठ ने कहा कि तुम मेरी दुकान पर काम कर सकते हो लेकिन तुम्हारे काम को देखकर ही तुम्हारी तनख्वाह बता सकता हूं युवक ने कहा जैसी आपकी मर्जी।

    युवक सेठ की दुकान पर मेहनत के साथ काम करने लगा उसकी मेहनत को देखकर सेठ ने उसको अच्छी तनख्वाह देना शुरू कर दिया ।कुछ समय बाद ही सेठ का विश्वास युवक पर गहरा हो गया । 12 साल बीत चुके थे सेठ उसको काम में आधी हिस्सेदारी देने लगा और इस तरह वह युवक बहुत अमीर हो गया।

    दूसरी तरफ युवक की पत्नी से उसके घर में सौतेला व्यवहार किया जाता था। युवक के परिवार वाले युवक की पत्नी को दुखी रखते और दिन भर उसको घर के काम में लगाए रखते । खाने के नाम पर भूसी की रोटी नमक के साथ देते।

    युवक की पत्नी जंगल में लकड़ी काटने जाती रास्ते में मंदिर पड़ता जिसमें शुक्रवार वाले दिन संतोषी माता की मूर्ति के सामने काफी महिलाएं पूजा अर्चना करती थीं।

    एक बार युवक की पत्नी ने उन महिलाओं से पूछा क्या यह व्रत करने से सारे पाप और दुख नष्ट हो जाते हैं तो इस पर सारी महिलाएं बोलने लगी कि हां बहन अगर कोई सच्चे मन से संतोषी माता का व्रत रखता है और अनुष्ठान करता है संतोषी माता प्रसन्न होकर भक्तों के सारे दुख नष्ट कर देती हैं।

    युवक की पत्नी ने पूछा कि मैं कैसे इस व्रत का पालन करूं मुझे इसका नियम बताइए तो एक महिला ने बताया शुक्रवार वाले दिन नहा-धोकर कम से कम सवा रुपए का गुड़ चना हाथ में लेकर संतोषी माता की कथा सुननी चाहिए और जो आपकी इच्छा है उस इच्छा के पूरा होने पर माता संतोषी का अनुष्ठान भी कर देना चाहिए।

    युवक की पत्नी ने पूछा अनुष्ठान में क्या करना होगा महिला ने बताया अनुष्ठान वाले दिन नहा धोकर और कथा सुनकर खीर और पूरी बनाकर 5 या 8 बच्चों को भोजन कराना चाहिए। पर ध्यान रखना भोजन में कोई भी खट्टी चीज ना हो अन्यथा अनुष्ठान पूरा नहीं होगा यह व्रत बहुत ही सरल और सादा है इस व्रत को कोई भी रख सकता है।

    युवक की पत्नी ने लकड़ियां बेचकर जो रुपए मिले उनसे गुड और चना लिया और शुक्रवार वाले दिन नहा-धोकर संतोषी माता के मंदिर में चली गई और माता के सामने विनती करने लगी हे मां मै गरीब और दुखी महिला हूं और अज्ञानी हूं मैं कुछ नहीं जानती इसलिए जैसा मुझसे होगा मैं वैसे ही आपकी पूजा अर्चना करूंगी इसलिए कोई ग़लती हो जाये तो मुझे माफ करें।

    युवक की पत्नी हर शुक्रवार को माता संतोषी की सच्चे भाव से पूजा अर्चना करती। कुछ दिन हो जाने पर माता संतोषी ने उसकी पूजा भाव से खुश होकर उसको दर्शन दिए और कहा बताओ पुत्री तुम्हें क्या चाहिए इस पर युवक की पत्नी ने कहा माता संतोषी मेरे पति दूर देश में गए हैं और उन्हें 12 साल हो चुके हैं अब मुझे उनकी याद आती है।

    माता संतोषी ने उस युवक को सपना दिया और कहा कि बहुत समय हो चुका है अब अपने घर को लौट जाओ। जब सुबह युवक उठा तो उसे भी अपने घर की याद आने लगी युवक ने कुछ दिन के अंदर अपना सारा सामान और धन इकट्ठा किया और अपने घर को लौट गया।

    युवक की पत्नी ने अपने पति को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुई। युवक की पत्नी ने माता संतोषी के अनुष्ठान के बारे में कहा तो युवक ने कहा कि हां हम दोनों मिलकर माता संतोषी का अनुष्ठान करेंगे।

    पति-पत्नी ने विधि विधान से माता संतोषी का अनुष्ठान किया ।

    जैसे माता संतोषी ने पति-पत्नी के दुख दूर किये ऐसे ही संतोषी माता सबके दुख दूर करें।

  • भक्ति कथा में श्री विष्णु कथा

    बृहस्पतिवार के दिन जो भक्त श्री विष्णु जी का व्रत पालन करते हैं उन्हें पीला वस्त्र और पीला भोजन ही खाना चहिए। बृहस्पतिवार के व्रत में केले के पेड़ के पास बैठ कर श्री विष्णु जी की कथा सुननी चाहिए । बृहस्पति के दिन आटे की लोई में थोड़ी-सी हल्दी और चने की दाल मिलाकर गाय को खिलाने मात्र से भी जीवन में आए संकट खत्म हो जाते है।

    श्री विष्णु कथा

    प्राचीन काल में एक राजा थे । राजा न्याय प्रिय थे ।गरीबों की सुनते थे व नगर वासियों की दुख दरिद्रता दूर करने की सदा कोशिश करते थे और जो भी राजा के दरबार में भिक्षा मांगने आते उन्हें भरपूर दान दक्षिणा भी देते थे ।

    राजा की रानी अत्यन्त क्रोधित एवं गुस्सैल स्वभाव की थी और राजा का गरीबों को दान दक्षिणा देना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। रानी प्रति दिन राजा को दान दक्षिणा देने की मना करती थी परंतु राजा रानी की एक भी ना सुनता और दोनों हाथों से दान दक्षिणा दान करने में लगा रहता।

    एक बार जब राजा शिकार करने के लिए वन गए थे तभी बृहस्पति देव साधु के भेष में महल में भिक्षा मांगने आए तो रानी ने भिक्षा देने से मना कर दिया और कहा मैं तो दान करने से परेशान हो गई हूं ।अगर यह धन नष्ट हो जाए तो मुझे बहुत शांति मिलेगी।

    यह सुनकर साधु ने कहा यह तो मैं पहली बार सुन रहा हूं कि तुम्हें धन अच्छा नहीं लगता इसे नष्ट करना चाहती हो। अगर तुम चाहो तो अपने धन को गरीबों के कल्याण में लगा सकती हो ।

    रानी ने कहा मैं अपना धन किसी को भी नहीं देना चाहती। रानी की बात सुनकर साधु ने तथास्तु कहा और कहा जैसा तुम चाहो वेसा ही होगा और यह कहकर साधु रूप में बृहस्पति देव आलोप हो गए।

    राजा के महल से सारी धन संपत्ति नष्ट हो गई और यहां तक की राजा का परिवार खाने के लिए भी तरसने लगा। राजा भी काम ढूंढने के लिए दूसरी जगह के लिए चले गये।

    राजा जंगल में लकड़ी काटकर बेचकर अपने जीवन व्यतीत करने लगे। रानी की दासियां कम हो गई जिस कारण रानी अपने बहुत से काम स्वयं करती धन की कमी के कारण कभी-कभी भूखा भी रहना पड़ता इस कारण वह दुखी रहती।

    एक बार रानी ने अपनी दासी को अपनी बहन के यहां रूपए पैसे की मदद लेने के लिए भेजा जब दासी रानी की बहन के यहां गई तब रानी की बहन श्री विष्णु जी की कथा में व्यस्त थी जिस कारण वह दासी से कोई बात ना कर सकी। दासी खाली हाथ ही लौट गई।

    श्री विष्णु जी की पूजा खत्म होने के बाद रानी को अपनी बहन द्वारा भेजी हुई दासी से ना बोल पाने का दुख हुआ उसने तुरंत अपनी दासी को अपनी बहन के यहां भेजा और कहलवाया की श्री विष्णु जी की कथा में व्यस्त होने के कारण आपकी बहन बोल ना सकी जिसका उन्हें बहुत खेद है।

    जब दुखी रानी को अपनी बहन की दासी से बहन के न बोलने का कारण पता चला तो उसने पूछा क्या श्री विष्णु जी की कथा से सारे दुख और पाप खत्म हो जाते हैं।

    रानी की बहन की दासी ने दुखी रानी को बताया कि हां अगर कोई सच्चे मन से श्री विष्णु जी की भक्ति भाव के साथ उपासना करता है और वृत का पालन विधि विधान से करता है तो श्री विष्णु जी अपने भक्तों की सारे पाप और दुख खत्म कर देते हैं।

    यह सुनकर दुःखी रानी ने श्री विष्णु जी का व्रत रखने का विचार बनाया और सच्चे मन और विधि विधान से भगवान श्री विष्णु जी की आराधना में जुट गई।

    कुछ समय बाद भगवान श्री विष्णु जी उसकी पूजा अर्चना से प्रसन्न होकर साधु रूप में दुखी रानी के द्वार पर आए और कहने लगे बोलो रानी तुम्हें क्या चाहिए रानी ने साधु रूप में श्री विष्णु जी को पहचान लिया और कहने लगी हे भगवान मुझसे हुईं गलतियों को माफ कर दो और मेरे पति वापस लौट आएं ऐसा वरदान दीजिए। भगवान तथास्तु कहकर आलोप हो गए।

    भगवान विष्णु जी के आशीर्वाद से राजा अपने घर को लौट आए और फिर से पहले के जैसे धन-धान्य सुख-शांति राजा-रानी के जीवन में आ गई।

    इस प्रकार श्री विष्णु जी की पूजा अर्चना से दुखी रानी ने वैभव प्राप्त किया।

  • भक्ति कथा में गणेश कथा

    बुधवार व्रत नियम

    भक्तजन बुधवार के व्रत को रखते हैं और गणेश जी की उपासना करते हैं ।जो भक्त सच्ची लगन से भगवान गणेश जी की अर्चना करते हैं तो भगवान गणेश जी भी अपने भक्तों के मन की बात को भांपकर उनकी मुराद पूरी करते हैं।

    बुधवार व्रत नियम में साफ सफाई का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है क्योंकि भगवन गणेश बुद्धि के देवता माने गए हैं और जिस घर में साफ सफाई रहती है वहां बुद्धि भी निवास करती है और जिस घर के सदस्य उच्चबुद्धि रखते हैं वह अपने कार्य को भी भली भांति करना जानते हैं और अपने कार्यों में सफल भी होते हैं।

    उच्च बुद्धि से किए गए कार्य तो सफल होते ही हैं उन कार्यों को करने से भगवान गणेश जी के आशीर्वाद से महालक्ष्मी भी उसे घर में विराजमान होती है क्योंकि पुराणों में बताया गया है जिस घर में गणेश जी निवास करते हैं वहां लक्ष्मी देवी जी भी स्वयं निवास करने आ जाती हैं। श्री गणेश जी को बुद्धि का देवता माना गया है जिन लोगों पर भगवान श्री गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं उन लोगों को अपने हर कार्य में सफलता मिलती है।

    भगवान गणेश की कथा

    भगवान श्री गणेशजी की बहुत सी कहानी भक्त लोगों ने सुनी हैं इसी प्रकार गणेशजी की कथा इस प्रकार है।

    प्राचीन समय की बात है एक छोटे-से गांव में एक परिवार रहता था। उस परिवार में एक प्यारी-सी छोटी-सी लड़की अपने मां बाप के साथ बड़े प्यार से रहती थी।

    लड़की का नाम रूपवती था।वह छोटी लड़की अपनी बातों से सबको हंसाती थी और पूरे दिन खेलती रहती थी उसे खेलते देखकर उसके मां-बाप बड़े खुश हुआ करते थे।

    एक बार गांव से थोड़ी दूरी पर गणेश मेला लगा हुआ था।गांव के सारे बच्चे गणेश मेला देखने जा रहे थे तो इस पर उस छोटी लड़की ने अपनी मां से मेला देखने जाने के लिए कहा ।मां ने कहा गणेश मेला तो गांव के बाहर लगा है और तुम छोटी हो इस पर लड़की जिद करने लगी और गणेश मेला जाने के लिए कहने लगी।

    बच्ची को जिद करते देख मां ने कहा की अच्छा चली जाओ मेला देखने यह कहकर मां ने छोटी लड़की के हाथ में दो लड्डू और एक बर्तन में पानी दिया और कहा गणेश मेला में पहले गणेश जी को लड्डू का भोग लगाना और पानी देना और उसके बाद तुम भी खा लेना ।

    शाम हो गई गणेश मेला भी खत्म हो गया।सब गणेश मेला देखकर लौट भी आए परन्तु वह छोटी लड़की नहीं लौटी ।बहुत देर रात होने के बाद वह लड़की अपने घर पहुंची।

    लड़की को आते देख चिंतित मां लड़की को गले लगाकर पूछने लगी बेटी मेले से तो सब जल्दी लौट आए थे तुझे इतनी देर कहां हो गई ।छोटी लड़की ने कहा मां जो तुमने लड्डू दिए थे गणेश भगवान के लिए वह लड्डू गणेश भगवान ने बहुत देर से खाये जिस कारण आने में मुझे देर हो गई।

    लड़की ने यह भी बताया कि मां गणेश भगवान ने लड्डू खाकर मुझे कुछ भी मांगने को कहा पर मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मैं क्या मांगू तो इस पर गणेश भगवान ने मुझसे कहा कि अभी तुम अपने घर जाओ बहुत देर हो चुकी है और जो भी तुम चाहती हो वह सब तुम्हें मिल जाएगा। मां ने यह सुनकर बेटी से कहा चलो बहुत रात हो गई है सोते हैं ।मां बेटी जाकर सो गए फिर जब सुबह हुई तो बेटी ने देखा की जो कुछ उसके मन में था वह सब उसके घर में है मौजूद था। यह सब भगवान गणेश जी के आशीर्वाद से हुआ था।

    इस तरह गणेश भगवान ने उस छोटी लड़की की भक्ति देखकर और प्रसन्न होकर उसे धन-धान्य दिया।

    भगवान गणेश जी को किसी भी शुभकार्य में प्रथम निमंत्रण दिया जाता है माना जाता है गणेश जी मंगल कार्य को सही तरह से पूर्ण करते हैं और आने वाली विपदा को हर लेते हैं ।भगवान गणेश जी भक्त के इस विश्वास को पूरा करते हैं । जय श्री गणेश।

  • हनुमानजी की कथा

    आज के वक्त में भी हम चाहे कितने ही आगे क्यों ना निकल जाएं पर हम भारतीयों में श्रद्धा और आस्था कूट-कूट कर भरी है और इसका कारण है हमारे पूर्वजों से चली आ रही भगवान में उनकी आस्था का होना ।

    आज हम यहां बात कर रहे हैं भगवान हनुमान जी की शक्ति और साहस की । भगवान हनुमान भक्त हनुमान के नाम से ज्यादा पहचाने जाते हैं और हम सब ये भली-भांति जानते भी हैं।

    जब जब भक्तों को दुखों का सामना करना पड़ता है या किसी गंभीर असहाय रोग से पीड़ित होते हैं या किसी तरह की विपदा में फंसते हैं तब ऐसे में कोई साथ नहीं देता और सारे रास्ते बंद हो जाते हैं तब सिर्फ एक ही रास्ता नजर आता है ।

    और वे हैं हनुमानजी । हनुमानजी अपने भक्तों कों दुखों से बाहर निकालते हैं ,रोगों का नाश करते हैं और अपने भक्त की हर पीड़ा को समझते हैं ऐसे हनुमानजी को शत-शत प्रणाम।

    हनुमान कथा

    बहुत पहले की बात है एक छोटे से गांव में एक पंडित अपनी पत्नी के साथ रहता था । पंडित अपनी छोटी सी कूटिया में रहता था और भिक्षा मांग कर जीवन यापन करता था और भिक्षा रूप में जो कुछ भी मिल जाता उसी में दोनों संतुष्ट होकर रह रहे थे और अपने जीवन से लगभग खुश थे।

    पर फिर भी उनके जीवन में एक कमी थी और वह कमी थी संतान का सुख जो कि उन्हें शादी के काफी वक्त बाद भी नहीं प्राप्त हुआ था ।पंडित और पंडिताइन इस दुख की वजह से बहुत निराश रहते थे और किसी के भी बच्चे को देखकर खुश हो जाया करते थे।

    पंडित पंडिताइन किसी के भी बच्चे को खेलते हुए देखते तब उन्हें संतान का न होना और दुख देता क्योंकि गांव के काफी लोग उन दोनों को समय-समय पर ताना मारते थे । गांव वाले उन्हें देखकर कहते कि इनका चेहरा देखना भी अपशगुन होता है और पूरा दिन भी खराब निकलता है ऐसी कड़वी बातों को सुनकर पंडित पंडिताइन बहुत दुखी हो जाते थे।

    दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को सांत्वना देते और और समझाते थे पर अकेले में दोनों ही अपने कर्मों को कोसते थे।

    पंडित पंडिताइन हालांकि निर्धन थे कभी-कभी खाने को भी पेट भरकर नहीं मिलता था और फटे हुए कपड़े पहनते थे पर फिर वे अपनी इस हालात पर दुखी नहीं होते थे और नाही निर्धनता को लेकर रोते थे।पर संतान न होने के दुख से ज्यादा दुखी रहते थे ।

    एक बार मंगलवार के दिन पंडित भिक्षा मांगने के लिए गांव में गए पर किसी भी घर से भिक्षा नहीं मिली उल्टा उन्हें आलोचना ही सुनने को मिली जिससे उनका मन भर आया और दुखी होकर घर की तरफ लौट आए। पंडिताइन ने जब पंडित जी को खाली हाथ और पंडित जी की आंखों में आसूं देखिए तो वह सब समझ गई।

    पंडिताइन ने कहा आज मंगलवार का दिन है और आज के दिन हनुमानजी की पूजा की जाती है और मैंने सुना है भगवान हनुमान अपने भक्तों के हर संकट को हर लेते हैं तो क्यों ना हम भी भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना पूरे विधि विधान से करके हनुमान जी को प्रसन्न करने की कोशिश करें।

    जब अगला मंगलवार आया तो पति-पत्नी ने सुबह जल्दी उठकर सारे काम करके नहा धोकर तैयार होकर पूरे विधि विधान से हनुमानजी का उपवास रखा और मंदिर जाकर हनुमान जी के दर्शन भी किए ।

    पंडित पंडिताइन अब हर मंगलवार को पूरी श्रद्धा के साथ और पूरे नियम से हनुमान जी का व्रत पालन करने लगे।

    कुछ समय बीत जाने पर हनुमान जी ने उनकी भक्ति-भाव और पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर दर्शन दिए ।और पंडिताइन को संतान सुख का आशीर्वाद भी दिया ।

    कुछ समय बाद पंडित पंडिताइन के घर एक बालक ने जन्म लिया जिससे पंडित पंडिताइन के जीवन में खुशियां ही खुशियां फैल गईं।

    पंडित और पंडिताइन ने अपने घर संतान होने की खुशी को हनुमान जी से मिले आशीर्वाद को माना और उसके बाद से पंडित और पंडिताइन का विश्वास हनुमान जी की भक्ति में और बढ़ गया । पंडित और पंडिताइन हमेशा के लिए हनुमान जी के ही भक्ति बन कर गये।

    हनुमानजी अपने भक्तों के हर दुख का निवारण करते हैं और सदा भक्तों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं।

  • क्यों लोकप्रिय है सावन का महीना सुहागन स्त्रियों के लिए

    सावन का महीना भगवान् शिव जी का महीना माना जाता है। इस सावन के महीने में भगवान शिव मन्दिर में भक्त जनों की भीड़ प्रायः देखने को मिलती रहती है।

    सावन के महीने में शिव जी के जय कारें लगाते हुए भक्त कांवड़ यात्रा शुरू करते हैं। कुंवारी लड़कियां सुयोग्य वर पाने की इच्छा रखकर भगवान शिवजी का व्रत रखती हैं तो कुंवारे लड़के भी शिव जी पर जल अर्पण करते हैं। इस तरह सावन के महीने में हर भक्त अपनी इच्छा लेकर शिव जी के दर्शन को जाते हैं।

    इसी प्रकार सावन महीना सुहागन स्त्रियों के लिए भी विशेष बताया गया है ।सावन महीने में अगर कोई सुहागन स्त्री अपने पति की लंबी उम्र और पति के अच्छे सौभाग्य के लिए विधि विधान से माता पर्वती और भगवान शिव की आराधना सच्चे मन से करती है तो उसके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर माता पार्वती उस स्त्री को सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देती हैं।

    सावन मास में सुहागन स्त्रियों के कार्य

    सावन महीने में जिस तरह बारिश की वजह से धरती पर हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है ठीक वैसे ही सावन महीने में सुहागन स्त्रियों द्वारा किए गए कार्यों से स्त्री के वैवाहिक जीवन में खुशियां ही खुशियां नजर आने लगती हैं ।

    यदि सावन महीने में कोई सुहागन स्त्री माता पार्वती के मंदिर में जाकर भक्ति-भाव से पूजा अर्चना करती है और माता पार्वती के सिंदूर से अपनी मांग को भरे तो उसके पति की आयु भी बढती है ऐसा कहा जाता है।

    इसके आलावा सावन महीने के दौरान सुहागन स्त्रियों को हरे रंग का वस्त्र धारण करना हाथों में हरे कांच की चूड़ियों का पहनना और मेहंदी लगाना शुभ और महत्वपूर्ण बताया गया है।

    सावन का महीना हर सुहागन स्त्री के लिए खास होता है क्योंकि सावन के महीने में भगवान शिव और माता पार्वती जी अपने भक्तों की विनती को सुनते हैं और स्वीकार भी‌ करते हैं और कोई भी सुहागन स्त्री जब सच्चे मन से अपने पति के सौभाग्य की कामना करती है तो माता पार्वती जी उस स्त्री को धन-धान्य के साथ और सौभाग्य के साथ सुहागन होने का वरदान देती हैं।

    सावन का महीना हर भक्त के लिए विशेष माना जाता है क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती को भी प्रिय है। पूरे सावन के महीने में सोमवार के दिन को वृत रखा जाता है और जगह-जगह पर भगवान शिव मंदिर के पास मेले भी लगते हैं।

    भगवान शिव माता पार्वती के साथ सावन के पूरे महीने धरती पर निवास करने आते हैं, शिव पुराण कथा में कहा जाता है।