जब भी मनुष्य कोई निर्णय लेना चाहता है अपने किसी जरूरी काम के लिए। निर्णय लेते वक्त व्यक्ति कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है।
असमंजस की स्थिति हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो आती है पर क्या ऐसे में हमें अपने जीवन के छोटे बड़े निर्णय लेना दूसरों से पूछ कर लेना होगा जब आप निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं तो आपका परिवार आपका समाज आपके दोस्त जैसा चाहते हैं अगर आप भी उनकी खुशी में अपने निर्णय को लेते हैं तो क्या यह आपके जीवन के लिए धोखा नहीं कहलाता । यहां यह सब कहने का मतलब ऐसा नहीं है कि हमें अपने परिवार की और समाज की बातों को सुनना समझना नहीं चाहिए समय-समय पर हमें अपने परिवार और समाज की बातों को सुनकर भी निर्णय लेने चाहिए।
व्यक्ति माने या ना माने परंतु जब आप अपने छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए सहारा ढूंढते हैं तो आपको आदत पड़ जाती है इस सहारे की ।आपके जीवन के हर निर्णय को स्वयं से लेने में आप असहाय सा महसूस करने लगते हैं आपको अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर संदेह रहने लगता है जो कि आपके स्वयं के विश्वास के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।
जब व्यक्ति अपने जीवन के भी छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए भी सहारे पर निर्भर रहता है तो एक तरह से वह अपने मानसिक विकास और स्वयं की तरक्की मे स्वयं से धोखा भी कर रहा होता है क्योंकि जब तक कोई भी व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना नहीं सीखेगा वह जीवन भर अज्ञानी बनकर रह जाएगा।
कोई भी अपने कार्यों के निर्णय दूसरों से पूछ कर लेता है तो वह व्यक्ति अंदर से डरा और सहमा हुआ भी रहने लगता है और खुद पर पूरी तरह से विश्वास भी नहीं कर पाता ऐसे व्यक्तियों की छवि समाज में भी अविश्वसनीय लोगों में गिनी जाती है ।
स्वयं पर विश्वास न करके मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धोखा खुद से ही करता है यदि व्यक्ति अपने डर से बाहर निकलकर खुद पर विश्वास रखते हुए अपने छोटे-छोटे निर्णयों को खुद से लेना सीखता है तो उसे अच्छे हो बुरे की समझ होने लगती हैऔर बिना यह सोचे कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय सही साबित होंगे या ग़लत तो उसके अंदर विश्वास बनता जाएगा और वह खुद पर विश्वास भी करने लगेगा।
जब व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखता है तो ऐसे व्यक्ति का जीवन के प्रति नजरिया भी बदल जाता है और वह छोटे-छोटे जोखिम लेना भी शुरू कर देता है।
व्यक्ति को अपना अच्छा बुरा स्वयं से सोचना सीखना होगा तभी व्यक्ति अपने जीवन का भरपूर आनंद ले सकेगा।
मनुष्य जब भी दूसरों के निर्णयों में अपनी हां मिला देता है तो कहीं ना कहीं अंदर से वह व्यक्ति दुख महसूस करने लगता है दूसरे व्यक्ति आपके जीवन के निर्णय को लेने में अपना नजरिया लगाते हैं जबकि वे लोग कभी यह नहीं जान पाएंगे कि आपकी खुशी कैसे निर्णयों में होगी।
इस पृथ्वी पर हर व्यक्ति को अपने निर्णय लेने का पूरा अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त है तो ऐसे में कोई व्यक्ति अपने जीवन के खास निर्णय को लेना दूसरों पर क्यों डाल देता है व्यक्ति को समझना होगा की जीवन उसका है तो निर्णय लेने का हक भी उसका ही होना चाहिए ।
व्यक्ति अपने जीवनकाल में बहुत कुछ हासिल कर लेता है यदि वह अपने निर्णय को लेना सीख जाता है निर्णय लेने से व्यक्ति सही गलत की पहचान करना सीखता है और आत्म विश्वासी बन जाता है।
अगर आप भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हो तो अपने निर्णय दूसरों कि कहने पर लीजिए । पर क्या कभी सोचा है कि क्या दूसरों के आपके जीवन के निर्णय लेने से आप वही बनेंगे जो आप चाहते थे तो उसका जवाब होगा नहीं आप वह नहीं बन पाएंगे जो जो छवि आपने लिए अपने मन में बनाई है आप भी उस भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे जिसमें व्यक्ति जीवन भर अपनी समस्याओं में घिरे रहता है वह व्यक्ति हर पल हर दिन अपनी खुशियों का गला घोंटता है और नसीब का रोना रोता रहता है।
ऐसे व्यक्तियों को कभी पता नहीं चल पाता कि उनके जीवन के दुख का वास्तविक कारण क्या है वह हमेशा दुख को अपना नसीब समझकर पूरा जीवन जी लेते हैं।
यह विडंबना एक व्यक्ति कि नहीं बल्कि पूरे समाज की है व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं से न लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और अपनी इस घटिया सोच की आदत को अपने बच्चों को भी सिखा देता है।
इस प्रकार एक व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय को स्वयं से न लेकर खुद को तो दुखी रखता है साथ में अपनी आने वाली पीढ़ी को भी आगे न बढ़ने के रास्ते नहीं समझा पाता है।
अपनी पुरानी और घटिया सोच से बाहर निकलने का रास्ता शुरुआत में थोड़ा कठिन लगता है और मुश्किल भी लगता है हो सकता है स्वयं से निर्णय लेने से आपको कुछ नुकसान भी हो परंतु स्वयं से निर्णय लेने से एक बात तो तय है कि आप अपने जीवन के बारे में सही ढंग से समझने लगते हैं और कभी ना कभी आप अपने निर्णय लेने से वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे जो आपके मन में सपने की तरह हर पल रहा होता है।
मनुष्य को अपने निर्णय लेना सीखकर एक नया मुकाम हासिल करना चाहिए और खुद को भीड़ का हिस्सा बनने से रोकना होगा।
जो व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं से लेना सीख जाता है तो ऐसे व्यक्ति और व्यक्तियों की निगाह में सम्मान जनक जगह बना लेते हैं और ऐसे व्यक्तियों की वजह से समाज भी तरक्की करने लगता है।
अतः हमें अपने निर्णय स्वयं से लेना सीखना होगा और साथ ही दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिए गए निर्णयों का भी सम्मान करना सीखना होगा।
अपने से छोटों और परिवार में बच्चों के द्वारा लिए गए सही निर्णय लेने की हिम्मत को सराहना भी चाहिए और इसके अलावा बच्चों और छोटों को सही और बूरे निर्णय लेने में फर्क भी बताना होगा क्योंकि बुरे निर्णय लेने से हम कहीं ना कहीं अपना और अपने से जुड़े व्यक्तियों का बुरा भी कर रहे होते हैं इसलिए हमें निर्णय लेते वक्त समझदारी से काम लेना होगा।
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