हममें से कई व्यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं ऐसे व्यक्तियों में आस्था कूट-कूट कर भरी हुई होती है। ऐसे व्यक्तियों के हर काम प्रभु के नाम से शुरू होते हैं और जीवन की हर छोटी बड़ी उपलब्धि को हासिल करके उसका श्रेय भी प्रभु को ही देते हैं।
आस्था से भरे व्यक्ति भगवान के प्रति गहरा विश्वास और जुड़ाव रखते हैं ऐसे व्यक्ति भगवान से जुड़े त्यौहारों को भी विधि पूर्वक मनाते हैं।
आस्था से भरा व्यक्ति जीवन के हर कार्य के पीछे, हर घटना की वजह, हर कर्म को भगवान से जुड़ा समझता हैं।
पर ऐसे व्यक्तियों को किसी भी कार्य का समय पर न होने पर गुस्सा भी बहुत आता है और अपने आगे अन्य व्यक्तियों को तुच्छ समझने की आदत होती है लेकिन इन्हें अपने कार्य के न बनने पर भी शांति से रहना सीखना होगा और अपने गुस्से पर नियंत्रण करना सीखना होगा ।
ऐसे व्यक्तियों की सुबह प्रभु के नाम से ही शुरू होती है नहाने से पहले खाना नहीं खाते नहाने के बाद खाना खाने से पहले अपने प्रभु को भोग लगाते हैं और यह अपने परिवार को भी यही शिक्षा सिखाते हैं।
ऐसे व्यक्तियों में आस्था के साथ-साथ अहंकार भी होता है जिसके कारण यह अज्ञानी भी हो जाते हैं समाज के बहुत से कल्याण कार्यों में स्वार्थ निकालते हैं।
ऐसे व्यक्ति अपने अंदर का अहंकार संपूर्ण रूप से नष्ट नहीं कर सकते इसी कारण उसकी भक्ति भी अधूरी रह जाती है यदि व्यक्ति अपने अंदर के अहंकार को खत्म कर दे तो उसे अपने प्रभु के दर्शन भी हो जाते हैं।
भगवान के विश्वास से जुड़ी हुई एक कथा जो कि कुछ इस प्रकार हैं
सुखदेव नाम से एक व्यक्ति प्रभु में गहरी आस्था रखता था ।सुखदेव को प्रभु के दर्शन के दर्शन की चाह थी।
सुखदेव अपने प्रभु के दर्शन के लिए जगह-जगह मंदिरों में व तीर्थस्थानों में जाता था परंतु सुखदेव को प्रभु के दर्शन कहीं भी प्राप्त नहीं हुए ।
सुखदेव इस वजह से अत्यंतदुखी रहता और अपने प्रभु से दर्शन देने को विनती करता। सुखदेव ने प्रभु के दर्शन की चाह में कठोर उपवास रखे साधनाएं भी करीं। इतना करने के बाद भी जब सुखदेव को प्रभु के दर्शन नहीं प्राप्त हुए तो वह निराश रहने लगा था।
एक बार की बात है सुखदेव को आसमान में दिव्य प्रकाश दिखाई दिया प्रकाश का तेज बहुत ज्यादा होने की वजह से सुखदेव को कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था तभी दिव्य प्रकाश में से एक आवाज आई और कहने लगी सुखदेव तुम मुझे व्यर्थ ही बाहर खोज रहे हो मैं तो तुम्हारे अंदर ही विराजमान हूं।
दिव्य प्रकाश की आवाज ने कहा कि सुखदेव तुम मुझे देखना चाहते हो तो सर्वप्रथम तुम्हें अपने अंदर के अहंकार को और दिखावे को खत्म करना होगा जब तुम अपने अंहकार और दिखावे से बाहर आ जाओगे उसी समय तुम्हें मेरे दर्शन प्राप्त हो जाएंगे।
दिव्य प्रकाश से इस तरह का कथन सुनकर सुखदेव को बहुत खुशी मिली कि मेरे प्रभु तो मेरे अंदर ही विराजमान हैं और मैं मूर्ख पता नहीं कहां-कहां प्रभु के दर्शन की चाह में भटकता रहा और इसी के साथ सुखदेव ने उसी पल अपने अंदर के अज्ञान, अंहकार को खत्म होते देखा और इसके बाद सुखदेव ने आंख बंद कर ली इसके बाद सुखदेव को स्वयं में प्रभु के दर्शन प्राप्त हुए।
जिस तरह सुखदेव भगवान के दर्शन की चाह में दर-दर भटकता रहा और भगवान की दर्शन चाह में कठोर व्रत और साधनाएं करते रहा इसके पश्चात् भी सुखदेव को भगवान के दर्शन नहीं हुए।
क्योंकि सुखदेव अपने भगवान को अपने चारों तरफ खोजता रहा परंतु भगवान तो सुखदेव के अंदर विराजमान थे लेकिन अंहकार और अज्ञान की वजह से सुखदेव को अपने भीतर भगवान् के दर्शन नहीं मिले।
इस कहानी से समझ आता है कि भगवान तो कण कण में हैं पर जब तक हम अपने अहंकार को खत्म नहीं कर देते तब तक हमसे हमारे भगवान प्रसन्न नहीं होंगे और दर्शन भी नहीं देंगें।
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