खुश रखिए अपने बचपन को

आज के वक्त में बच्चों को भी उनका बचपन खुलकर नसीब नहीं हो रहा जैसा कि हमारा बचपन था पहले के वक्त में बच्चों का बच्चों के साथ घुल-मिल कर खेलना होता था जिससे जिससे बच्चों का मानसिक विकास सही तरीके से होता था।

आज के वक्त में बच्चे अपने बचपन में ही फोन को लेकर गेम खेलना सीख गए हैं जो कि आगे चलकर एक बुरी आदत बन जाता है जिससे बच्चों में बहुत चिड़चिड़ापन ,गुस्सा करना जैसा व्यवहार करना आ गया है ।

वैसे कहा जाये तो कि बचपन कभी भी खत्म नहीं होता इंसान के बड़े होने पर भी बचपन इंसान के अंदर हमेशा मोजूद रहता है ।

हम यहां पर हर इंसान के अंदर के बचपन की बात कर रहे हैं देखा जाए तो हर व्यक्ति उम्र से तो बड़ा हो जाता है पर फिर भी उसके अंदर एक बचपन हमेशा जिंदा रहता है और यह बचपन रहना भी चाहिए।

क्या कभी देखा है जब व्यक्ति बहुत ज्यादा खुश हो जाता है तो खुशी में वह जोरों से हंसने लगता है और कभी-कभी तो खुशी में आकर तेज आवाज़ में गुनगुनाने भी लगता है यह सब व्यवहार व्यक्ति के अंदर के बचपन का ही होता है।

हम कब बड़े हो जाते हैं कब हमारा बचपन खत्म हो जाता है हमें पता तक नहीं चलता पर अगर हम चाहे तो अपने बचपन को हमेशा जी सकते हैं।

घर के बड़े लोगों को अपने से छोटों को खुश रहना और बचपन को जीना सिखाना चाहिएं और उन्हें अपने बच्चों को ये भी बताना चाहिए कि इंसान को अपना बचपन हमेशा जीना चाहिए ।जब घर के बड़े अपने अंदर के बचपन को जिंदा रहते हैं और समय-समय पर बच्चों कि तरह छोटी छोटी खुशियां को भी मनाते हैं तो उस घर के छोटों को भी छोटी बातों पर और बेमतलब की खुशी में खुश रहना आ जाता है ।

बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के ऊपर कई जिम्मेदारियां आ जाती है और उन जिम्मेवारियों के बीच में फंसकर इंसान हंसना और खुश रहना लगभग भूल सा जाता है पर अगर हम चाहे तो जिम्मेदारियां को निभाते हुए भी अपने बचपन को आजाद रख सकते हैं ।

जिस तरह एक छोटा बच्चा किसी छोटी और असाधारण चीज के प्रति उतावलापन दिखाता है अगर हम भी जरा जरा सी और फालतू की लगनेवाली चीज के प्रति उतावलापन दिखाएं तो हमारा बचपन उस उतावलेपन को देखकर बहुत खुशी महसूस करेगा और इस कारण हम अपने आप ही खुश रहने लगेंगे। इस तरह यहां कहने का मतलब यह हुआ की असली खुशी छोटी-छोटी बातों में मिलती है।

खुश रहने का मतलब यह कतई नहीं होता कि आपके पास महंगे संसाधन ‌हों और। बहुत सारा रुपए पैसा हो बल्कि अपने अंदर के बचपन को समय-समय पर खिल -खिलाने देने से हमारे मस्तिष्क को बहुत बड़ी खुशी मिलती है।

कुछ व्यक्ति यह समझना चाहते हैं कि अपने अंदर के बचपन को कैसे जिया जाए या अपने अंदर की बचपन को कैसे दोबारा से जागृत किया जाए इसके लिए आप अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए कि अपने बचपन में आप किन चीजों से या किन कार्यों से बहुत ज्यादा खुश हो जाया करते थे।

अपने बचपन में किए गए कार्यों को जब आप उसी उतावलेपन से फिर से दोहराते हैं तो आपको असीम खुशी बढ़ाने के कारण भी मिल जाएंगे आप समझ जाओगे की खुशियां किसी भी चीज को खरीदने से नहीं बल्कि कुछ कार्यों से मिलती है।

बड़े होने का मतलब यह नहीं होता कि आप अपने बचपन को हमेशा के लिए भूल जाएं बल्कि बड़े होने का मतलब अपने से छोटों को खुश रहने की वजह सिखाई जायें ।

आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में इंसान चैन से ना खा रहा है और ना ही चैन से सो पा रहा है। हम इंसान अपनी दिनचर्या में ऐसे व्यस्त हो चुके हैं जिस तरह एक मशीन जो बिना रुके कार्य करती रहती है ठीक वैसे ही इंसानों‌‌ की हालत हो चुकी है।

क्या याद है बचपन के दिनों में कैसे एक साधारण पत्थर भी हमारे खेल का बहुत बड़ी वजह बन जाता था लेकिन अब महंगे खिलौनों से भी ‌बच्चा खेलने नहीं चाहता ।

इसलिए हमें समझना होगा की बचपन को हमारे अंदर हमेशा बनाए रखने के लिए बच्चों की तरह बनना होगा और छोटी-छोटी चीजों से खुश रहना सीखना होगा।

खुश रहने के लिए व्यक्ति जिस दिन अपने बचपन को जिंदा रखना सीख जाएगा उसके लिए खुश रहना कोई मुश्किल काम नहीं रहेगा।

हमें यह भी समझना होगा बड़े होने का मतलब जिम्मेदारियां संभालना ही नहीं होता बल्की खुश रहना भी होता है जितना मनुष्य खुश रहता है उतनी ही उसे कम थकान महसूस होगी और इससे जीवन भी खुशियों से भरा लगने लगेगा।

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