दश लक्षण महापर्व जैन धर्म में मनाए जाने वाला आत्म चिंतन और आत्म शुद्धि का त्यौहार है।
इस पर्व में आत्मा के दश उत्तम गुणों और उत्तम प्राप्ति के लिए मार्ग दिखाया जाता है। दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई व्रत, पूजा, संयम और वेद शास्त्रों का अध्ययन करते हैं दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाईयों का उद्देश्य मन, वचन काया को पवित्र करना और अपने कर्मों का पवित्र करना होता है।
दश धर्म के नाम
दश लक्षण महापर्व में जैन अनुयाई प्रतिदिन हर धर्म की एक-एक दिन विशेष आराधना करते हैं। इन दश लक्षण धर्म के नाम इस प्रकार हैं।
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव , उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य।
दश लक्षण महापर्व की शुरुआत दिगंबर जैन परंपरा में इसे आत्म शुद्धि संयम आत्म शुद्धि और आत्म अनुभूति का पर्व माना जाता है। भादो महीने के शुक्ल पक्ष में पढ़ने वाली पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक यह पर्व मनाया जाता है।
पुराणों में कथा के अनुसार भगवान ऋगभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती जब अपनी विजय यात्रा पूरी करके अयोध्या लौटे तो उनका चक्र रत्न नगर में प्रवेश नहीं कर पा रहा था ।इसका कारण था उनके छोटे भाई बाहुबली का उनकी अधीनता स्वीकार ना करना ।इस वजह से दोनों भाइयों में युद्ध हुआ इस युद्ध में बाहुबली विजयि रहे उन्होंने भरत को अपने हाथों पर उठा लिया पर अचानक उन्हें संसार की क्षणभंगुर ता अहंकार के दुष्परिणाम और भाई प्रेम का भान हो गया।
वाहुबली ने भरत को नीचे धरती पर उतार दिया और राज पाट पद त्याग कर दिगंबर दीक्षा ले ली। कठोर तपस्या करने के बाद भी बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पा रही थी । बाहुबली के मन में सूक्ष्म रूप से यह मान शेष था कि उन्होंने अपने बड़े भाई को यद्ध में हराया है।
जब बड़े भाई भारत को इसका आभास हुआ तो वह बाहुबली के पास पहुंचे और उन्होंने बाहुबली के चरण स्पर्श किए। अपने छोटे भाई को स्वयं के चरण स्पर्श करते देख बाहुबली का अहंकार समाप्त हो गया और उसके बाद बाहुबली को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई।
Leave a Reply