भक्ति को भगवान का आशीर्वाद

भक्त और भगवान का रिश्ता बड़ा ही अद्भुत और चमत्कारों से भरा हुआ है। प्राचीन काल से ही भक्त अपने भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कठिन से कठिन तपस्या करता और फलस्वरूप अपने आराध्य को मनाकर अपनी मनोकामनाओं का वरदान प्राप्त करता है ।

भगवान भी अपने भक्त की कठिन से कठिन तपस्या को देखकर और उसके मन में अपने प्रति आदर भाव को देख कर प्रसन्न हो जाते हैं ।

भक्त और भगवान से जुड़ी हुई अनंत कथाएं हैं।

प्राचीन काल में असुर भी देवताओं की कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त करते थे।

कहानी

एक बार एक असुर महादेव जी की कठोर तपस्या करने घने जंगलों में गया और और वहां जाकर महादेव जी की तपस्या करने में तल्लीन हो गया।

तपस्या करते-करते असुर को कई वर्ष बीत गए इस बीच भीषण आपदाएं आईं पर उस असुर की तपस्या मे कोई वाधा नहीं पड़ती।

समय बीतता गया और असुर ने अपनी तपस्या को खत्म नहीं किया और आखिर में महादेव जी उस असुर की कठोर तपस्या को देखकर प्रसन्न हुए।

महादेव जी ने असुर से वरदान मांगने को कहा तो इस पर असुर ने निर्भीक और निडरता का वरदान मांगा।

महादेव जी से असुर निर्भिक और निडरता का वरदान पाकर बहुत ही प्रसन्न हुआ। असुर के अंदर अंहकार और घमंड भी बढ़ता गया असुर तपस्या द्वारा महादेव से मिले वरदान का दुरुपयोग करता गया। असुर गरीब और असहाय लोगों को पीड़ा देने लगा और उनको पीड़ित देखकर असुर बहुत प्रसन्न होता ।जब देवता और ऋषि मुनि भी उसके अत्याचारों से परेशान रहने लगे तब उन्होंने भगवान गणेश जी के पास जाना उचित समझा।

असुर से लड़ने का और उसको रोकने का जब कोई उपाय नहीं रहा तो सभी देवताओं और ऋषि मुनियों ने भगवान गणेश जी की शरण में जाकर असुर से बचने का उपाय खोजा।

भगवान गणेश जी ने देवताओं और ऋषि मुनियों की दुःख की व्यथा सुनी। गणेश भगवान ने अपने दिव्य और शक्तिशाली रूप को धारण किया और वक्रतुंड रूप में प्रकट हुए।

वक्रतुंड रूप में गणेश जी ने शक्तिशाली असुर से युद्ध किया। यह युद्ध काफी वक्त चला युद्ध के दौरान गणेशजी ने अपने वक्रतुंड रूप में असुर के घमंड और अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दिया दिया।

फल स्वरुप गणेश जी ने असुर को उसकी गलतियों का एहसास दिलाया और उसके अहंकार को बाहर निकाल दिया ।

असुर में भगवान गणेश जी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगी और स्वयं का आत्मसमर्पण कर दिया।

वक्रतुंड रूप में भगवान गणेश जी ने असुर की आत्मसमर्पित भावना से खुश होकर असुर को भक्त होने का वरदान दिया और इसी के साथ असुर की भक्ति को भी वरदान मिला।

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