मनुष्य जीवन सदियों से हमेशा कुछ खोजते हुए ही आया है क्योंकि मनुष्य के मन मे खोजने की क्रिया निरंतर चलती रहती है और जिज्ञासु प्रकृति का स्वभाव ही मनुष्य जीवन है ।
कभी-कभी मनुष्य की खोज अपने आसपास होती है तो कभी-कभी खोज करने के लिए अपने मन के अंदर की यात्रा पर निकल पड़ता है। वह जानना चाहता है अपने कई सवालों के जवाब जैसे की क्या ईश्वर है, इस ब्रह्मांड को किसने रचा जीवन क्या है मृत्यु क्या है अच्छे बुरे कर्म क्या हैं और क्या बाकई कर्मों के हिसाब से फल मिलते हैं । ऐसे कई अनगिनत सवाल मनुष्य मन में उठते रहते हैं।
कभी-कभी मनुष्य ब्रह्मांड की शक्ति को भी समझना चाहता है मनुष्य सूरज ,चंदा ,तारे और नीले आकाश को व गृहों की गति को समझना और जानना चाहता है और इन रहस्यों को उजागर करना चाहता है।
कभी तो मनुष्य खुद से ही सवाल करता है और उनके जवाब भी खुद से देता है इसलिए सबसे पहले मनुष्य को अपनी खुद की पहचान को समझना होगा ।
जैसे-जैसे हम स्वयं से सवाल जवाब करते जाते हैं तो हमें खुद से ही ब्रह्मांड की रहस्यमई शक्तियों का ज्ञान होता जाता है। क्योंकि मानव मस्तिष्क के पास ढेरों शक्तियां हैं।
इसी प्रकार मनुष्य अपने अंदर मन की यात्रा में भी बहुत सारे सवालों का जबाब आप प्राप्त कर लेता है और उसे ज्ञात हो जाता है जीवन मरण और अच्छे बुरे कर्म क्या है और इन कर्मों से प्राप्त फल क्या है।
जितना हम अपने अंदर खोज करते हैं यह खोज उतनी ही और बढ़ती जाती है ।हैरत तो तब होती है कि यह खोज मनुष्य की कभी खत्म नहीं होती है।
देखा जाए तो यह खोज अगर मनुष्य के मस्तिष्क में न आती तो शायद आज भी मनुष्य चांद पर अपने कदम न रख पाता और अंतरिक्ष के,ब्रह्मांड के असीमित ज्ञान से भी वंचित रह जाता ।
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