सुप्रीम कोर्ट ने प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम यानी पीपीपीएनडीटी कानून को सख्ती से लागू करने की जरूरत है यह कहा है ।जन्म के पूर्व लिंग की जांच कराने की और बेटे की चाहत रखना और पितृसत्तात्मक सोच और लिंग चयन की जारी प्रथाओं की कड़ी आलोचना भी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा जब तक समाज में स्त्रियों के प्रति जन्मजात कमजोर वाली सोच होना । स्त्रियां पुरूष के बराबरी नहीं ले लेती और यह एहसास नहीं होता । ऐसे प्रयासों की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए।
लिंग निर्धारण परीक्षण
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि लिंग निर्धारण क्या है यह जैविक प्रक्रिया है जो की जन्म से पूर्व होती है जीव जो कि नर है या मादा है तय करती है और विकसित करती है।
हमारे भारत देश में बेटों की चाहत सदियों पुरानी है ऐसा माना जाता रहा है की बेटे ही वंश चलाते हैं इसलिए जिस घर में बेटे नहीं होते उस घर का वंश खत्म हो जाता है यह माना गया है इसलिए हिंदू परिवारों में बेटे का होना आवश्यक होता है।
बेटियों को शुरू से ही पराया धन और घर का बोझ माना जाता रहा है इसलिए बहुत से मां-बाप जन्म पूर्व लिंग का परिक्षण करा लेते हैं और पता कर लेते हैं की होने वाला बच्चा लड़की है या लड़का जो की एक कानूनन अपराध है।
समय-समय पर सरकार द्वारा कानून बनते रहे हैं ।
पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम 1994 यह कानून भारत की संसद द्वारा एक संघीय कानून है इसके तहत कन्या भ्रूणहत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम से प्रशव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा।
प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक (पीएनडीटी) 1996 के तहत इस कानून में जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी है अगर अल्ट्रासाउंड अल्ट्रा सोनोग्राफी द्वारा कोई दंपति जन्म से पूर्व लिंग की जांच कराते हैं तो उस दंपति को, जांच करने वाले डॉक्टर को, और लैब कर्मी को 3 से 5 साल की सजा मिल सकती है और इसके अलावा 5 से ₹10 हजार का जुर्माना भी लगने का प्रावधान है।
कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए सरकार द्वारा कानून बनाया गया घटते लिंगानुपात को लेकर।
इस कानून का उद्देश्य गर्भाधान से पहले और जन्म से पूर्व लिंग चयन करने और जांच करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना था।
भारत देश में लिंग जांच कराना गैर कानूनी है।
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