पारले-जी

आज पारले-जी बिस्किट को हर कोई जानता है इसकी पहचान से सब बाकिफ हैं यह पारले-जी बिस्किट जो की कभी बच्चों के टिफिन में तो कभी चाय के साथ तो कभी सफर में दिख जाता है। पर क्या कभी सोचा है इस पारले-जी बिस्किट की शुरुआत कैसे हुई । हम में से बहुत ही कम लोग इसके बारे में जानते हैं की पारले-जी बिस्कुट की शुरुआत मुनाफे के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रवाद के लिए हुई थी।

स्वदेशी निर्मित पारले-जी

1920 के वक्त की बात है जब अंग्रेजों का शासन था और हमारे भारत देश में अंग्रेज लोगों की फैक्ट्री का ही बाजार था और अंग्रेजों का ही दबदबा था ।उस वक्त भारत देश में स्वदेशी आदोलन जोर-शोर से हो रहा था और तब यह तय किया गया की भारतीय ब्रांड का बिस्किट भी होना चाहिए। बिस्किट स्वादिष्ट और सस्ता होना चहिए और विदेशी बिस्किट को टक्कर दे सके इस तरह पारले-जी बिस्किट की शुरुआत हुई और पारले -जी बिस्किट की नींव रखी गईं ।

मोहनलाल दयाल चहान

मोहनलाल दयाल चौहान ने उस वक्त जर्मनी जाकर बिस्किट के लिए कन्फेक्शनरी का कार्य सीखा और और बिस्किट बनाने के लिए जरूरत की मशीन को भी जर्मनी से लाए ।

कारखाने की शुरुआत

मोहनलाल दयाल चौहान जी ने मुंबई के विले पार्ले मे एक छोटी-सी जगह में पारले-जी बिस्कुट के कारखाने की शुरुआत की इस कार्य में 12 लोगों ने अपना सहयोग दिया।

बिस्किट का नाम

मुंबई के विले पार्ले में बिस्किट के ब्रांड की शुरुआत हुई इसलिए बिस्किट का नाम पारले-जी रखा गया। और इस तरह पारले-जी बिस्कुट की नींव रखी गई हालांकि उसे वक्त संसाधन कम थे। और इस तरह पारले-जी बिस्किट की शुरुआत राष्ट्रवाद की वजह से हुई ।

हालांकि बिस्किट बनने से पहले शुरुआत ऑरेंज कैंडी से हुई थी और 10 साल बाद पारले जी की शुरुआत हुई।

इस तरह हम कह सकते हैं। पारले-जी बिस्किट की शुरुआत राष्ट्रवाद की वजह से हुई ।शुरुआत में पारले-जी बिस्किट ने काफी संघर्ष दखा और संसाधन भी कम थे ।अंग्रेजों का शासन था और पारले-जी ने फिर भी हार नहीं मानी। सुवाद में वेमिसाल और लजवाब यह है हमारी पारले-जी बिस्किट की कहानी।

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