पीओके में पिछले कुछ सप्ताह से जन आंदोलन बढ़ता जा रहा है । पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू -कश्मीर(पीओके) इलाके में जारी जन आंदोलन अब सिर्फ स्थानीय असंतोष का मामला नहीं रहा बल्कि पाकिस्तान के उस नेरेटिव को चुनौती देने लगा है जिसे इस्लामाबाद दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश करते रहा है ।
यह जन आंदोलन स्थानीय मामला नहीं रहा बल्कि पाकिस्तान के शासनतंत्र ,आर्थिक नीतियों और लोकतांत्रिक भरोसे पर भी आवाज उठा रहा है।
पीओके जन आंदोलन होने की वजह है जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) जिसमें विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की चर्चा जो की 1947 में पाकिस्तान गए जम्मू कश्मीर शरणार्थियों के लिए सुरक्षित है।
परन्तु पाकिस्तान सरकार ने इस आंदोलन में शामिल आंदोलनकारियों से शांतिपूर्ण संवाद करने की जगह दमन का रास्ता अपनाया है । यहां तक कि जनांदोलन में नेता और समर्थकों की र्गिरफ्तारियां हुई है। इंटरनेट मोबाइल सुविधाओं पर पाबंदी लगा दी गई है । पीओके में जारी जन आंदोलन क्षेत्रों में खानेपीने के पदार्थों व दवाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया है इसके अलावा पुलिस फोर्स व अर्ध सैनिक बल को तैनात कर दिया गया है।
पाकिस्तान जीएएसी के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना चाह रहा है ताकि आंदोलन को जड़ से खत्म किया जा सके। आंदोलनकारी के आरोप लगाने से इस्लामाबाद का असली चेहरा स्पष्ट हो चुका है।
आंदोलनकारी भारत से मानवीय मदद मांग रहे हैं दशकों से वैश्विक मंचों पर कश्मीर के लोगों के मानवाधिकार का पैरोकार बनने का दावा करने वाला पाकिस्तान अपनेअधीन के क्षेत्र के लोगों के अधिकारों को कुचल रहा है।
भारत में भी कहा है की रेडियो पीओके में जारी जन आंदोलन पाकिस्तान द्वारा दशकों से किये जा रहे राजनीतिक शोषण मौलिक अधिकारों के दमन और प्रशासनिक अत्याचार का परिणाम है।
इतिहास बताता है की जन आकांक्षाओं वह कुछ समय के लिए अनसुना किया जा सकता है दबाया जा सकता है पर जन आकांक्षाओं को पूरी तरह स्थाई रूप से खत्म नहीं किया जा सकता।
किसी भी शासन का स्थिर रहना जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक भागीदारी होने से ही होता है।
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