कोई भी राष्ट्रीय या देश सीमाओं को सुरक्षित रखने से ही मजबूत नहीं हो जाता बल्कि स्पष्ट कानून शुभ व्यवस्थित नागरिक व्यवस्था से भी बनता है।
जरा सोचिए राज्य अपने नागरिकों को कैसे पहचानता है क्या राज्य किसी व्यक्ति को जीवन वृत ,जन्म परिवार ,सामाजिक उपस्थिति और सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से जानता है। या फिर राज्य समय-समय पर यह अपेक्षा करता है व्यक्ति स्वयं ही अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करें?
स्थाई नागरिकता प्रमाण पत्र का उद्देश्य प्रत्येक भारतीय नागरिक की कानूनी पहचान को स्पष्ट और प्रामाणिक बनाना हो सकता है।
अनुच्छेद 11 के अंतर्गत सांसद ने नागरिकता अधिनियम 1955 बनाया जिसमें नागरिकता अर्जित करने के विभिन्न आधार तय किए गए जैसे की -जनम, वंश ,पंजीकरण देशीयकरण और क्षेत्रीय विलय । सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत देश कोई ऐसा दस्तावेज विकसित नहीं कर सका जो दस्तावेज नागरिकता के लिए अंतिम प्रमाण पत्र कहा जा सके।
हालांकि भारतीय नागरिक के पास मतदाता पहचान पत्र ,आधार कार्ड, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, भूमि के कागजात जैसे कई साक्ष्य हैं परन्तु फिर भी इनमें से कोई भी साक्ष्य भारतीय नागरिकता का अंतिम साक्ष्य नहीं है।
नागरिकता का प्रश्न किसी साक्ष्य के लिए नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास से है ।
अब समय है भारतीय नागरिकता के प्रश्न को विवाद से नहीं बल्कि कानून द्वारा और संस्थागत सुधार की दृष्टि से सुलझाया जाए और समस्या समझने का है साथ ही साथ आवश्यकता है किसी भी व्यवस्था को बनाते समय संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों गोपनीयता और नागरिक हितों का सम्मान किया जाए।
Leave a Reply