शिक्षक बने राजनीतिक

अभी कुछ ही समय पहले की बात है कुछ लोकप्रिय कोचिंग संस्थानों और उन कोचिंग को चलाने वाले संचालकों द्वारा अपने शैक्षणिक विषयों से हटकर देश के पत्रकारों ,भारतीय इतिहास और न जाने कितने विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर सोशल मीडिया कई मंचों से प्रहार करने लगे।

इस तरह कोचिंग संस्थान के संचालकों ने महसूस कराया कि देश को और देश की युवा वर्ग को शिक्षा की कितनी जरूरत है यह एक अच्छी बात है परंतु साथ ही साथ एक मीडिया कर्मी द्वारा की गई कोचिंग संस्थानों पर भद्दी टिप्पणियों पर बहस छेड़ दी। और देखते ही देखते राजनीति‌ शुरू कर दी।

कोचिंग संस्थानों द्वारा छेड़ी गई आपसी लड़ाई में नुकसान विद्यार्थियों का ही हो रहा है इस बात को समझना होगा और इसका असर युवा वर्ग की सोच पर क्या पड़ेगा यह समझना होगा।

शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को ज्ञान और कौशल प्रदान करना होता है ना कि उन्हें किसी विशेष वैचारिक या राजनीतिक दिशा में प्रभावित करना।

आजकल के वक्त में सोशल मीडिया की पहुंच आम आदमी से लेकर एक बड़ी हस्ती तक है और जब इस तरह की सामग्री युवा वर्ग और विद्यार्थियों को मिलेगी तो वह अपना पक्ष किसे देंगे और सोशल मीडिया से मिली सामग्री से युवाओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इस बात को भी समझना होगा।

कोचिंग संस्थान के संचालक अपनी लोकप्रियता को बढ़ावा देने के लिए ,प्रभाव डालने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से भड़काऊ भाषण देते हैं और कभी-कभी गलत भाषा का प्रयोग करते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह भी समझना होगा।

जो व्यक्ति विद्यार्थियों के लिए आदर्श होते हैं और मार्गदर्शक होते हैं जब वही अपनी जिम्मेदारी को छोड़ कर।शिक्षा के मंच का उपयोग राजनीति का अखाड़ा बनाकर करते हैं तो क्या होगा जबकि ऐसे व्यक्तियों की जिम्मेदारी सामान्य नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक होती है क्योंकि यही व्यक्ति विद्यार्थियों के और युवा वर्ग के बौद्धिक विकास के कारक होते हैं।

एक व्यक्ति को कुशल नागरिक बनाने की जिम्मेदारी शिक्षक की ही होती है यह शिक्षक भली भांति जानते हैं इसलिए शिक्षकों को सामाजिक तनाव वैचारिक संघर्ष पर राजनीति करने का हकदार नहीं बनना चाहिए।

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