किस्सा सुख और दुख का

मनुष्य जीवन भी अजीब है जिसमें मनुष्य दूसरों के जीवन में सुख को तलाशता है और अपने जीवन में दुखों को देखता है ।

देखा जाए तो दुख भी मनुष्य को तराशने के लिए आता है जब मनुष्य अपने चारों तरफ दुख पाता है तब वही मनुष्य दुःख से बाहर निकलने का रास्ता भी ढूंढ निकालता है। जब मनुष्य के अंदर इतनी शक्ति है कि वह बड़े से बड़े कष्ट से भी बाहर निकल सकता है तो फिर क्यों वह दुख देखकर घबराता है।

हर मनुष्य के अंदर एक छिपी हुई शक्ति होती है परंतु हर मनुष्य अपने अदर की शक्तियों को पहचानने की क्षमता नहीं रखता इसका कारण मनुष्य का अपने खुद पर विश्वास न होना हर कार्य में असफलता को देखना और इसी कारण मनुष्य दुखों के जाल में फंसा रहता है।

आलसी यानी दुखी व्यक्ति हाथ पर हाथ रखे बैठे रहकर अपनी बर्बादी का तमाशा देखते हैं और नसीब का रोना रोते हैं। दूसरी सबसे बड़ी वजह आलसी यानी दुख व्यक्तियों की एक बुरी आदत होती है सही समय पर कदम ना उठाना और इसी वजह से आगे चलकर यही बरी आदत दुख कारण बनती है। समय पर सही कार्य ना करना और कल पर छोड़ देना भी दुख का कारण हो सकता है।

वहीं दूसरी तरफ एक संघर्षशील व्यक्ति जो कि पूरे संघर्ष के साथ और पूरे जोश के साथ अपने कार्य को करता है बिना सफल और असफल होने की परवाह किए वह मनुष्य सिर्फ अपने कार्य से मतलब रखता है । ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी सफल होकर दिखाते हैं । और समाज को प्रेरणा भी देते है।

जिस तरह एक किसान अपनी खेती में बीज बोता है और समय-समय पर अच्छी फसल के लिए खाद और पानी डालता है और फसल अनुसार कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कराता है जिससे की अच्छी फसल प्राप्त कर सके उसके लिए भरसक प्रयास करता हैं । समय आने पर वही किसान अच्छी फसल भी प्राप्त करता है ।

इसी तरह हमें भी अपने अच्छे जीवन के लिए भरसक प्रयत्न करना होगा।

मनुष्य को समय रहते समझना होगा की सुख दुख सिर्फ मानसिक सोच और बेमतलब की दिमागी उपज है ऐसा कुछ नहीं होता बल्कि जो व्यक्ति समय पर कार्य करता है वह सुखी कहलाता है और जो व्यक्ति काम को टालने के बहाने बनाता रहता है किस कारण वह दुखों में गिरा रहता है और खुद को दुखी कहता है

वैसे भी कहां गया है जैसा बोलोगे वैसा ही फल काटोगे।

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