बहुला चतुर्थी हिन्दी महीनों के अनुसार भादो महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ती है। बहुला चतुर्थी का व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र ,अच्छी सेहत और सुरक्षा के लिए रखतीं हैं।
इस व्रत में भगवान गणेशजी की पूजा होती है और साथ में बहुला गाय और बछड़े की भी पूजा की जाती है।
गोधूलि बेला(शाम का समय)
बहुला व्रत में पूजा कर ने का समय गोधूलि बेला होता है शाम के लगभग 4से5 बजे के वक्त में इस पूजा को कर लेना चाहिए ।
पूजा का भोग
बहुला व्रत में गाय और गाय के बछड़े को गुड और चना खिलाना चाहिए और व्रत रखने वाली महिलाएं भी गुड और चना के भोग से ही अपना व्रत खोलतीं हैं।
दूध और दूध से बने पदार्थ का त्याग।
बहुला चतुर्थी के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को दूध और दूध से बने पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए व्रत की मान्यता है कि इस दिन गाय का दूध नहीं लेना चाहिए बल्कि गाय का दूध गाय के बछड़े को ही पिलाना चाहिए।
बहुला चतुर्थी व्रत कथा
भादो महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है ।बहुला चतुर्थी पर माताएं अपनी संतान की सेहत ,सुरक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। व्रत पूजन के समय कथा भी सुनी जाती है।
पुराणों में कथा के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान विष्णु जी ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया तब स्वर्ग लोक से देवी-देवता भगवान् विष्णु रूप में श्री कृष्ण जी की लीला देखने की चाह रखते थे।
श्री कृष्ण के सलोने रूप और नटखट लीलाओं को देखने के लिए अनेकों देवी देवताओं का मन करता और गोपियों, ग्वालों का रूप धारण करके रासलीला में आ जाते ।
इसी प्रकार स्वर्ग की कामधेनु के मन में भी प्रभु श्री कृष्ण के अद्भुत रूप और लीला को देखने की और प्रभु की सेवा करने की प्रबल इच्छा हुई। अपनी इस प्रबल इच्छा को पूरी करने के लिए कामधेनु ने बहुला नाम की गाय का रूप धारण करके नंदबाबा की गौशाला में आ गई।
श्री कृष्ण जी का बहुला गाय से अधिक स्नेह और मोह जुड़ गया था।
एक दिन की बात है श्री कृष्ण जी ने सत्य निष्ठा बाद धर्म पालन की परीक्षा लेने का विचार बनाया और वह गौशाला में बंधी सभी गायों को लेकर वन में घास चराने ले गए।
वन में घास चरते-चरते बहुला गाय बहुत दूर निकल गई और वह अपने झुंड से बिछड़ गई भगवान श्री कृष्ण जी ने यह देखकर हिंसक सिंह का रूप धारण कर लिया और बहुला गाय के आगे जाकर रास्ता रोक लिया ।
बहुला गाय अपने रास्ते में हिंसक सिंह को देख कर घबरा गई और घबराते हुए बोली की वनराज सिंह मेरा बछड़ा घर पर है मुझे एक बार अपने बछड़े से भेंट करके आने दो और मै आपको वचन देती हूं बछड़े से मिलकर वापस आपके पास आ जाऊंगी।
श्री कृष्ण रूप में सिंह ने उसे बहुला गाय को जाने दिया और बहुला गाय की सत्य निष्ठा को देखकर श्री कृष्ण जी अपने रूप में आ गए और प्रसन्न होकर बहुला गाय को आशीर्वाद दिया।
तभी से बहुला गाय और बछड़े के लिए व्रत रखने की शुरुआत हुई ।
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