शनि देव की कथा

शनि देव की महिमा के बारे में हम सब भली-भांति जानते हैं। हम सभी अपने घर की सुख शांति के लिए शनिवार के दिन शनिदेव का प्रकोप कम करने के लिए शनि देव मंदिर में जाकर तेल का दीपक जलाया जाता है।

शनि की साढ़ेसाती

शनि देव को सूर्य का पुत्र माना जाता है ।शनि देव को काम काज यानी कि कर्म का देवता माना जाता है।शनि देव महाराज कर्म शील व्यक्ति को ही अपना प्रिय मानते हैं । शनिवार के दिन और,शनि अमावस्या पर व्रत रखकर भक्त लोग शनिदेव को प्रसन्न करते हैं और अपने जीवन में शनि देव की कूदृष्टि से बचने का उपाय भी करते हैं।

गुस्सैल और कृपामयि शनि देव

शनि महाराज किसी भी व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से फल देने का अधिकार रखते हैं। अक्सर लोगों में यह गलतफहमी रहती है कि शनि देव सिर्फ बुरे कर्मों का ही फल देते हैं जबकि ऐसा नहीं होता।

अगर किसी व्यक्ति को जब पता चलता है कि उसके उपर या उसकी कुंडली में शनि की दशा खराब है तो वह व्यक्ति विचलित हो जाता है क्योंकि शनि देव को सभी ग्रहों में और सभी देवताओं में से गुस्सैल और क्रोधित स्वभाव का माना जाता है ।

शनि देव महाराज हर किसी व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होते बल्कि अपने भक्तों पर कर्म के हिसाब से कृपा और धन भी बरसते हैं।

कथा

शनि देव भगवान की वैसे तो कई कथाएं हैं और सभी कथायें प्रचलित भी हैं। एक प्रचलित कथा जो कुछ इस प्रकार है।

शनि देव के पिताजी सूर्य देव जिनका विवाह राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा के साथ हुआ था विवाह उपरांत भगवान सूर्यदेव को पत्नी संज्ञा से तीन पुत्र हुए जो वैस्वमन, यमराज और यमुना थे।

सूर्यदेव भगवान का स्वभाव बहुत गर्म और तेज अग्नि के समान था सूर्य देव के इस व्यवहार को देखकर पत्नी संज्ञा परेशान रहती थीं और चाहती थीं कि पति सूर्य देव का अग्नि समान तेज और गर्म व्यवहार शांत रहे उसके लिए है कोशिश करती थीं।

एक बार की बात है उन्हें एक उपाय समझआया इस उपाय को पूरा करने के लिए पत्नी संज्ञा ने अपनी ही जैसी हमशक्ल स्त्री बनाई और उसका नाम स्वर्णा रख दिया ।

पत्नी संज्ञा स्वयं तपस्या करने हेतु चली गई और अपनी हमशक्ल परछाई को भगवान सूर्यदेव और पुत्रों के बारे में कार्य भी समझा गईं परछाई स्वर्णा ने भी सूर्य देव पत्नी संज्ञा को निश्चिंत होकर जाने को कहा और वादा किया कि यहां किसी को नहीं पता चलेगा की मैं आपकी परछाई हूं।

सूर्यदेव पत्नी संज्ञा तपस्या में लीन हो गईं और उधर परछाई स्वर्णा भगवान् सूर्य देव के साथ पत्नी रूप में रहने लगीं और भगवान सूर्यदेव जी को भी स्वर्णा पर शक नहीं हुआ।

भगवान सूर्य देव को परछाई स्वर्णा से तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनमें से एक पुत्र शनि थे जो की शनिदेव कहलाए ।

बचपन में शनिदेव पिता सूर्य देव के तेज का सामना करने में सक्षम नहीं थे और उन्हें देखकर घबरा जाते थे । दूसरी तरफ पिता सूर्य देव भी शनि देव के वर्ण को देखकर अपनी पत्नीसे कहते यह मेरा पुत्र कैसे हो सकता है और अपनी पत्नी की बेइज्जती करते शनि देव अपनी मां की अवेहलना होते देख पिता सूर्य देव से रुष्ट रहते ।

शनि देव जंगल में जाकर शिवजी की तपस्या करने लगे उनकी कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा तब शनि देव ने कहा प्रभु जी मेरे पिता सूर्य देव मेरी मां का अपमान करते हैं और मुझे अपना पुत्र भी नहीं समझते इसलिए मुझे पिता सूर्य देव से अधिक पूजनीय और शक्तिशाली होने का आशीर्वाद दीजिए ।

इस पर भगवान शिव जी ने शनि देव को नौ ग्रहों में सर्वक्षेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया और न्याय की दृष्टि से भी शनि देव को श्रेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया।

इस प्रकार शनि देव ने पिता सूर्य देव के व्यवहार से रुष्ट होकर अपना एक स्थान बनाया।

शनि देव न्याय के देवता हैं और वह हमारे अच्छे-बुरे कर्मों के हिसाब से ही न्याय देते हैं।

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