पहले कभी हास्य समाज को एक कड़वा सच का आईना दिखाता था और समाज को कड़वे सच के साथ आने वाले वक्त से रूबरू कराता था और चेतावनी भी देता था।
हास्य कार कहो या व्यंग्यकार पर जब ये सत्ता से सवाल पूछता था और साथ में उसकी कमियों पर चोट करता था। तब लोगों को हास्य के साथ साथ सोचने पर भी मजबूर करता था ।
पर अब समय बदल चुका है सोशल मीडिया का समय है उसके साथ ही हास्य कार और व्यंग्यकार व्यंग्य करने का तरीका भी बदल चुका है।
पहले के वक्त में हास्य में मर्यादाएं रखी जाती थी। जो कि अब कहीं खो गई हैं। और यह सब कुछ टीआरपी पाने की अभिलाषा में हो रहा है ।
सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में मनोरंजन की सीमा लांघकर अश्लीलता, सामाजिक मर्यादाओं का हरण सा हो रहा है।
कुछ व्यंग्यकार का सामाजिक मुद्दों पर सार्थक हास्य प्रस्तुति करने के बजाय ऐसे मुद्दों का सहारा ले रहे हैं जिससे किसी व्यक्ति या समुदाय की मानवीय गरिमा को ठोस पहुंचती है और इससे उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता।
पहले जहां रचनात्मक विचार और प्रतिभा को सफलता का आधार माना जाता था अब वहां चौंकाने वाले विवादास्पद उत्तेजक कंटेंट को अधिक महत्व मिलने लगा है।
सोशल मीडिया पर लगभग-लगभग 50 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता हैं । ऐसे में डिजिटल कंटेंट मैं दिखाए गए विचार और व्यवहार धीरे-धीरे समाजिक मानक बन जाते हैं।
समय है आवश्यकता प्रतिबंधों से अधिक स्वयं पर नियंत्रण करने की और हमें तय करना होगा कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं जो दूसरों की गरिमा पर हंसे या हास्य के माध्यम से बेहतर प्रेरणा देता हो।
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