तीजन बाई जो अपने तंबूरे के साथ पंडवानी शैली में गायन करती और यही से उन्हें अपनी एक पहचान मिली तीजन बाई जो कि अब हमारे बीच नहीं रहीं।
तीजन बाई का जन्म स्थान इस्पात नगरी भिलाई के करीब ही माना जाता है । तीजन बाई अपने पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं ।तीजन बाई पारधी जाति की थीं पारधी जाति को आखेट तथा पक्षियों को पकड़ने के लिए जाना जाता है। और पारधी जाति अब घूमंतु जाति मानी जाती है।
तीजन बाई को कभी अपने अनपढ़ होने का मलाल नहीं था तीजन बाई को पंडवानी विरासत में मिली थी उनके नाना बृजलाल पारधी पंडवानी कहते थे ।तीजन बाई बचपन से ही अपने नाना से पंडवानी सुनती थी और यहीं से उन्हें पंडवानी कंठस्थ हो गई।
शुरुआत में तीजन बाई को पंडवानी की दक्षिणा में ₹10 मिलें जो कि उनकी पहली कमाई थी तीजन बाई कृष्ण की भक्ति करतीं थीं।
तीजन बाई को पहचान पंडवानी शैली में गायन करने से मिली थी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के मंच पर महाभारत की कथाएं सुनाई ।
जब तीजन बाई मंच पर अपनी तंबूरे के साथ और पूरे जोश के साथ दुशासन वध, कर्ण वध और द्रोपदी चीर हरण जैसे प्रसंगों को सुनाती तो ऐसा लगता है जैसे हर किरदार जीवन्त हो उठता ।
लेकिन हर सफलता के पीछे संघर्ष भी होता है ऐसे ही तीजन बाई को सफल होने के पीछे संघर्ष से भी लड़ना पड़ा उन्हें अपने पहले पति से अलग होना पड़ा और दूसरा पति भी धोखेबाज निकला।
यहां तक कि तीजन बाई को सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की सजा भी मिली उन्हें आदिवासी समाज ने बहिष्कृत कर दिया था ।
तीजन बाई ने एक बार कहा था कि अगर वह पढ़ी-लिखी होती तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती लेकिन सरस्वती मइया की कृपा से पंडवानी ही मेरी जिंदगी हो गयी ।इच्छा शक्ति से कोई भी सीमा पर की जा सकती है ऐसा उनका मानना था।
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